शब्द-यात्रा:अदहन
Saturday, 19 March 2016
श्रद्धांजलि नही, तिलांजलि दें...!
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एक बार दादा धर्माधिकारी मुंबई से पटना जा रहे थे। वरिष्ठ स्वतन्त्रता सेनानी होने के अतिरिक्त दादा धर्माधिकारी तब महाराष्ट्र धारा सभा के स...
अमन और तालीम ही स्थायी समाधान हैं
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एक समय ऐसा भी था जब पठानकोट का मास्टरमाइंड हमारी जेल मे बंद था। याद आ रहा है 1999 का वह प्लेन हाईजैक। मसूद अज़हर का भाई रऊफ असगर भाई को छुड़ा...
हम अपने गौरवशाली इतिहास की फिराक मे नही, हम अपने लिए गौरवशाली भविष्य की फिराक मे हैं।
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एक बार दो जर्मन नेशनल्स बनारस आए तो मुझसे मिलना हुआ। वे दोनों लविंग कपल थे लेकिन शादीशुदा नही थे। जल्दी ही शादी करने वाले थे और एकदूसरे के ...
जिंदगी चल रही है
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डीजे की धाँय धाँय आवाज किसी बारात का संकेत कर रही है। सामने से ट्रैफिक भी ठिठक रहा है। प्रह्लादघाट से राजघाट की ओर इस ढलान पर .....वो कोई ब...
तुम्हें श्रद्धांजलि नही दूंगा
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अरोड़ा जी के बाद उनकी बेटी रचना अरोड़ा ने गाँडीव की ज़िम्मेदारी संभाली और मुखपृष्ठ पर सम्पादकीय लिखना शुरू किया। परंपरा से उलट हर सम्पादकीय क...
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