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Tuesday, 5 August 2014

लालमनी का लल्ला और लल्ला की मुनिया

 

लल्ला ८ बरस का है.. तीन चार साल पहले उसकी मां लालमनी उसको गोद में लिए आती  और कैम्पस के तीन चार घरों में झाड़ू पोछा करती,बर्तन मांजती... लल्ला उसके पीछे-पीछे दौड़ता रहता.इससे लालमनी का काम प्रभावित होता इसलिए सभी उसे डाँटते थे.. बच्चा होने के नाते लोगो का जो सहज प्यार उसका स्वाभाविक हक था,वह भी उसे नसीब न था...कभी-कभार कोई बाहर से आने वाला मेहमान या कोई एक दूसरा उसे थोडा पुचकार भी देता ,वरना तो प्रायः सभी उसे डांटकर ही बोलते थे.. साल दो साल बाद लल्ला अपनी माँ के साथ पैदल चलकर आने लगा और रास्ते में जो भी मिलता- "ए दू रुपया दा....., ए पइसा दा....." ऐसे बोलता चलता और लालमनी उसे झपिलाती चलती.. कुल मिलाकर एक नंबर का बदमाश बच्चा था लल्ला... गंगा में राजघाट पर अंग्रेजों द्वारा बनवाये ऐतिहासिक मालवीय पुल के नीचे बसी हुई गरीब मल्लाहों की बस्ती से यहाँ कैंपस तक आते-आते बीच रास्ते में कभी जी टी रोड पर,कभी बसंत महिला महाविद्यालय की तरफ जाने वाली सड़क पर तो कभी इस कैम्पस के अन्दर लल्ला कई लोगो को ठोंक भी देता था और कई लोगो से ठोंका भी जाता था.इस साल तो यह बस्ती गंगा की बाढ़ में पूरी ही डूब गयी थी और सैकड़ों की संख्या में इन मल्लाह-परिवारों के सामने जीवन,जीविका तथा अस्तित्व का संकट उपस्थित हो गया था.पुल के नीचे जहाँ इनकी आबादी गुजर-बसर करती है,वहां आस-पास का जल-क्षेत्र सरकार ने कछुआ-सेंचुरी के तौर पर संरक्षित घोषित कर रखा है.अब पता नही क्यों घोषित कर रखा है,लेकिन कर रखा है.इस इलाके में कभी भी इन्हें मछली आदि मारने की छूट नही है.जब पूरी बस्ती सड़क पर आ गयी तो लालमनी पर काम का बोझ बढ़ गया.ऐसे संकटों के समय लालमनी का पति प्रायः निर्विकार ही रहता था.सारी जिम्मेदारी लालमनी की थी.कहाँ रहना है,कैसे जीना है,सब उसे ही देखना था,लेकिन लल्ला को क्या फर्क पड़ता.वो तो वैसे ही मां का पल्लू पकडे उसके काम पर आता और या तो मां को तंग करता या फिर दूसरे बच्चों के साथ भिड़ा रहता.हमको भी कभी-कभी उससे चिढ हो जाती थी.कभी-कभी मेरे सामने ऐसे ऐंठता कि एक हाथ से मां की साडी पकड़ लेता और दूसरा हाथ तथा दोनों टांगें फैलाकर आधा रास्ता छेंक लेता और बड़ी अदा से कहता-"पइसा दा.."....इतना गन्दा बच्चा,बिखरे हुए बाल,आँखों से बहता कीचड,पीले-पीले,टूटे दांत,बहती हुई नाक,गन्दी-सी चड्ढी,जमीन तक लटकता हुआ नाडा और शरीर से आती मछली की गंध.मै किचकिचा के लालमनी की तरफ देखता-"ये क्या सिखाती हो तुम इसको...?"पता नही क्यों लेकिन मेरे सामने आकर लालमनी भी बच्चे को नही डांटती थी,और नही तो हमी को नसीहत देती-"लड़का मांगत हौ,त दे दा..."......"आ हम्मे एगो सड़ियो चाही.भाभी परसाल देले रहलीं,तवन फाट गयल..अब जाड़ा आ गयल हौ..कह दिहा भाभी से..कहियो चूल्ह-बासन कर देब.."मै एक या दो रूपया झुंझलाते हुए लल्ला को पकड़ाता और "जा के भाभिये से लीहा.."कहते हुए आगे बढ़ जाता.

 लालमनी मेरे घर काम नही करती थी

.लेकिन इतना हक फिर भी मुझपर रखती थी कि एक साड़ी की उसकी डिमांड हमेशा बनी रहती.उसकी एक साड़ी के लिए यहाँ रहने वाले सभी उसके कर्जदार थे.कैंपस में सभी से उसका नाता था.उसका पति दिनभर सिवई-मंडी में मजदूरी करता और शाम को दारु पीकर देर रात घर लौटता.सवेरे हिसाब होता तो दस-बीस जो भी बचता,पति-पत्नी आपस में बाँट लेते.फिर लल्ला को लिए लालमनी इधर आती और उसका पति सिवई-मंडी जाता.पति के शराब पीने से अब उसे कोई फर्क नही पड़ता था.सबकुछ करके हार गयी थी वो.यही दस-बीस से गृहस्थी चलेगी,ये नियति मान चुकी थी लालमनी.हम हमेशा उससे कहते कि लल्ला का नाम स्कूल में लिखा दे.इसपर हमेशा उसका जवाब होता-"इस्कुलिये ना जाला.हरामी,दिनभर गुड्डी उड़ावेला."पूरे कैंपस में सभी लल्ला को समझाते,डांटते पर वो स्कूल जाने को तैयार नही होता था.लालमनी ने उसका नाम सरकारी स्कूल में लिखवा दिया,तब भी नही.मां के मारने-पीटने पर कभी-कभी खाना मिलने के लालच में जाता भी...लेकिन वही....कभी-कभी.
 <p>पिछले साल अचानक देखा तो लालमनी गोद में एक नवजात बच्ची को लिये आने लगी</p>
.सबको कौतूहल हुआ,सबने पूछा और सबने जाना कि लालमनी की गोद में उसकी देवरानी की बेटी की बच्ची है.इसे पैदा करने के बाद इसकी मां मर गयी.लालमनी के अलावा दुनिया में उसका दूसरा कोई नही है,इसलिए लालमनी उसे पालेगी.कई महीने बाद जब बच्ची कुछ बड़ी हुई तो लल्ला उसे गोद में लेकर आने लगा.लालमनी जबतक अपना काम निपटाती,तबतक लल्ला बच्ची को खेलाता,बझाता और दूसरे छोटे बच्चों से झगडा भी करता.लेकिन अब ये मुनिया की जिम्मेदारी लल्ला को परेशान किये रहती थी,वह कायदे से झगडा भी नही कर पाता था.अचानक मुनिया चिल्लाने लगती तो उसे दौड़कर उसके पास पहुंचना पड़ता.जिन घरों में लालमनी काम करती थी,उनमे से ही किसी घर के सामने पड़े स्थायी पालने में मुनिया को लेटाने की सुविधा भी उसे मिल गयी थी.कभी-कभी पालने से दूर होने पर लल्ला मुनिया को जमीन पर लिटाकर ही बच्चों से भिड जाता था.कारण चाहे कुछ भी हो,लेकिन उसका भिड़े रहना एक जरूरी दृश्य था.बच्चों के साथ उसके झगडे का कारण अक्सर कटी हुई पतंगें होती थीं.उनको लूटने के लिए जब बच्चे दौड़ते,तब लल्ला मुनिया को लेटाने के लिए कोई न कोई जगह खोज ही लेता और पतंग लूटने के युद्ध में जूझ पड़ता.ऐसे में कई बार मुनिया जोर-जोर से चिल्लाने लगती और लालमनी उसे कस के पीट देती.गला फाड़ के रोता..फिर भी गले पड़ी इस नयी मुसीबत को कंधे पर लादे मां के पीछे-पीछे चल पड़ता.

 अचानक एक दिन एक गजब हुआ 

,सुनकर हमसब सन्न रह गए.शाम के धुंधलके में खबर आई कि लालमनी मर गयी.अरे....?हाँ,लालमनी बीमार तो लग रही थी.अरे,नही-नही.अरे ये कैसे..?ओह,ये क्या..?तमाम तरह की प्रतिक्रियाएं होने लगीं.हम भागे-भागे उसके घर पहुंचे तो एक दुखद उत्कंठा थी कि लालमनी कैसे मर गयी और एक भारी चिंता थी कि अब लल्ला और मुनिया का क्या होगा.उसका बाप तो शराबी है,वो क्या पालेगा बच्चों को..!तमाम तरह की चर्चाएँ और बातें लालमनी की चौकठ पर सिर धुनती रहीं.लालमनी को कैंसर था,ये बात उसे भी नही मालुम थी,ये सब तो बस्ती में पता चला.कुछ दिन बीते....और हममे से कुछ लोगों ने लल्ला का नाम फिर से सरकारी स्कूल में लिखवा दिया.बिन मां की दुनिया में रहने,जीने का ढंग जिसे जितना मालूम था,सबने उसे समझाया और अपनी-अपनी मदद का भरोसा देकर लौट आये.लल्ला की ज़िन्दगी बदल गयी.उसे न जाने क्या सूझा,वह नियम से स्कूल जाने लगा.हम चकित थे,उसके स्कूल से लौटने तक उसका बाप मुनिया को संभालने लगा.लल्ला आ जाता तो घर और मुनिया,दोनों को संभाल लेता.उसके बाप को देर से जाने के कारण देर तक काम करना पड़ता,इस वजह से उसकी दारु कम होने लगी.देर रात बाप के लौटने तक लल्ला खाना भी बना लेता और इस बीच मुनिया को खिला-पिलाकर सुला भी देता.अब लल्ला के लिए गुड्डी लूटने का कोई मौका ही नही था .देव दीपावली के दिन घाट से लौटते हुए रात के १० बजे लल्ला दिख गया अचानक.मैंने सोचा कि १०-२० दे दूँ उसको...कि तभी लल्ला चहक कर सामने आ गया.उसके हाथ में दूध का पैकेट था.मैं थोडा विह्वल हो गया.लल्ला अपनी उम्र से बड़ा दिखने लगा था.मैंने ज़मीन पर बैठकर उसको पकड़ लिया और पूछा-''क्या हाल है...?मुन्नी कहाँ है..?'' वो बोला-''बाऊ देखत हउवन.आज छुट्टी न हौ.देवदीपावली हौ .''मैंने १० रुपये उसको दिए.वो बोला-पइसा हौ हमरे पास.देखा...'' देखा तो उसकी मुठ्ठी में २०-३० रु.दबे पड़े थे.वो बोला-''इस्कुले रोज जाईला ,बहिनी ठीक हौ.'' मैंने किसी तरह अपने आंसू रोके और १० रुपये उसकी जेब में डालकर चला आया.अचानक आज दोपहर को देखा तो लल्ला कैम्पस में अपनी बहन के साथ खेल रहा था.. वो आगे-आगे दौड़ रही थी और लल्ला पीछे-पीछे उसे पकड़ रहा था ... इस बीच में आसमान में कितनी ही पतंगे टूट टूट कर नीचे गिर रही थी..बच्चे लूट भी रहे थे लेकिन लल्ला को मुन्नी के सिवा जैसे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था.. कैम्पस के सारे बच्चे कौतूहल के साथ लल्ला को घेरे हुए थे और लल्ला सबके सामने हीरो बना हुआ था.. वह सबको बता रहा था- "गुड्डी के मंझे से लपेटा के मुनिया गिर गयल ,ओकर कपार फूट गयल, गुड्डी न लूटे के चाही- गुड्डी न उडावे के चाहीं.. इस्कूले जाए के चाही.. हम मुनिया के पढ़ाईला " बच्चों ने कितने ही सवाल पूछे.लल्ला की बातें सुनकर सभी अचम्भे में थे.. कोई कहता लल्ला खाना भी बनाता है यार.. कोई कहता लल्ला अपनी बहन को पढ़ता भी है, लल्ला गुड्डी नहीं लूटता.उसका बाप तो सो जाता है लेकिन ८ साल की उम्र में लल्ला लगभग डेढ़ साल की मुनिया को एक समर्पित माँ की तरह पाल रहा है.. लल्ला मुनिया को रोज सुबह दातून करा के नाश्ता कराता है.. मुनिया को नहलाना, उसे खाना खिलाना, सुलाना, उसके कपडे धोना, ये सारे काम अब लल्ला की जिम्मेदारी है.. मुनिया को कोई परेशानी हो,ये उसको बर्दाश्त नहीं है,ऐसे समय में वह किसी से भी भिड सकता है.. बाकी झगडा करना उसने पूरी तरह छोड़ दिया है,पतंग लूटने की तरफ तो उसका ध्यान ही नहीं जाता..८ साल का एक बच्चा पूरी तरह एक माँ बन गया है.समाज के मुख्य प्रवाह से दूर,यह घटना चुपचाप घट रही है.लेकिन एक सवाल पीछा नही छोड़ता कि लल्ला और मुनिया का झुग्गी-झोपड़ी-जीवन आखिर किसकी चिंता का विषय होना चाहिए......?

Sunday, 3 August 2014

अपना अपना मतलब

पहलवान अजित सिंह अखाड़े में हैं.सालों बाद आज उनको अखाड़े में आया देखकर पूरी भाजपा अखाड़े में उतर आई है.एकदम टटके,ताजे हिन्दू ह्रदय सम्राट बने संगीत सोम अखाड़े के आर-पार फैली हुई उनकी टांगों पर थाप दे रहे हैं.कुछ अनन्य देशभक्तों ने पहुँचते ही उस्ताद के हाथ पाँव के बाल नोचने शुरू कर दिए हैं.वैसे अखाड़े की बोली में इस काम को चोंथना कहते हैं,लेकिन जो लोग नोचना समझते होंगे,वे चोंथना अपने आप समझ जायेंगे.समर्...पित भाजपाइयों को उस्ताद की डांट पड़ रही है--ये क्या किया सालों..हम कितना समझाते हैं कि हर चीज की प्रक्रिया होती है.लाउडस्पीकर लगवाने की भी होती ही होगी..डालडा घी वाला टीन का कनस्तर ले आते,उसी से बन जाता भोंपू.ई ट्रेन का पटरी उखाड़ने से भोंपू बजेगा..?आंय..!केजरिवलवा से ट्रेनिंग ले रहे हो तुम लोग..?आंय..!धरना परदरसन हमारे लोग का काम है बुडबक नही तो...?आंय..!ऊ लोग करता है तो हम बोलते हैं कि नही...कि अराजकता फैला रहा है सब...अब ऊ prem prakash भी बोलेगा कि तुम लोग भी अराजकता फैलाता है..अब बताओ,क्या मुंह दिखाएँगे हम...?आंय..!केतना समझाता हूँ अरे डीएम का आँख फोड़ दिया तुमलोग..अरे तोड़ फोड़ करना ही था तो गरदनियाँ उतार लाते..कुछ तो अंतर दिखाई पड़ता देशभक्त लोग में और अराजक लोग में...आंय..!उस्ताद का भाषण चल रहा है और राष्ट्रवादी सेना चोंथ रही है.उठा उठा के दू चार को अखाड़ा की मेड पर पटक मारे हैं अजित सिंह.लेकिन बच्चे लोग आज सब दांव-पेंच सीख के जाने के मूड में हैं.तभी पेड़ पर चिड़िया कुहुंकती है--कुहुंकू...कुहुंकू...कुहुंकू...!गिरोह के नये बछडो के कान खड़े हो जाते हैं.अजित सिंह पियरी माटी में लथराये हुए हैं.जैसे नये मुल्ले प्याज़ ज़ारा ज्यादा ही खाते हैं,वैसे ही नये नये राष्ट्रवादी थोडा हल्ला-गुल्ला ज्यादा ही मचाने लगते हैं.एक अति-उत्साही राष्ट्रवादी तो अजित सिंह की गर्दन पर ही चढ़ के पेड़ की डाल पकड़ लेता है.वो चिड़िया की गर्दन मरोड़ देना चाहता है.उस्ताद के लिए सम्मान-भाव से भरा हुआ नौसिखिया राष्ट्रवादी चिल्लाता है-हमरे ओस्तदवा को चिढाती है साली चिरई की औलाद..तेरी तो...तभी डाल टूट जाती है.राष्ट्रवादी अखाड़े में चारो खाने चित्त.उस्ताद खउरिहा जाते हैं-हट साले,एक चिरई नही मार सकता तो क्या करेगा..क्या, बोल क्या रही है साली..?तभी चिड़िया एक बार फिर कुहुंकती है--कुहुंकू...कुहुंकू...कुहुंकू...!!ओ....तो जे बात है..लाल बुझक्कड़ बूझी गये,और न बूझा कोय.गोड में चाकी बान्हि के हरिना भागा होय..!!का उस्ताद..का उस्ताद..का बोली चिरई..उस्ताद चिड़िया के उद्घोष का भाष्य करते हैं.उस गिरोह के अकेले नेता हैं अजित सिंह,जिनपर हनुमान और सरस्वती दोनों की बरोब्बर कृपा रहती है.उस्ताद बोले-चिरई कुश्ती लड़ना चाहती है.बोल रही है-गदा,मुकदर और कसरत...गदा,मुकदर और कसरत..!अर्र्रर्रे बाह...गज्जब...राष्ट्रवादियों में उस्ताद की बात सुनते ही सुनामी आ जाती है-'अब चिरइयो लड़ेगी कुश्ती..हा हा हा..देखा उस्ताद..मोदी जी आये हैं..नया ज़माना लाये हैं..कीरा,बिच्छी,चिरई,चुरुंग सब बरोब्बर..सब बरोब्बर..बाह भई बाह...नारेबाजी के बीच ही देशभक्तों का ध्यान बगल से सब्जी खरीदकर लौट रही भद्र महिला पर जाता है.राष्ट्रवादी लोग महिला लोग का बहुत इज्जत करता है..नयका बछरू मकनाते हुए--हे चाची..हे चाची..तनी सुनिहो तो..ईई चिरइया का बोलत है...?अब चाची के दिमाग में तीस रूपये किलो वाली प्याज़ चढ़ी हुई है.बोलती है-अरे बोहार जाय तोर चिरइया रे..आग लगी सगरी बजरिया में,गोरी गाये मल्हार..!!हे चाची..हे चाची..चिरइया का बोलत है..?चाची ने ध्यान से सुना-कुहुंकू...कुहुंकू...कुहुंकू...!!अरे निबहुरा रे..चिरइया तो बोलत है-लहसुन,पियाज,अदरक...लहसुन,पियाज,अदरक...अरे बाप रे,मोदी जी की सरकार में चाची ने उस्ताद की बात काट दी.मचल कोहराम.गदा,मुकदर और कसरत...कि लहसुन,पियाज,अदरक...चिरइया का बोलत है आखिर..!तबले चिरइया फिर बोली-कुहुंकू...कुहुंकू...कुहुंकू...!!अब उस्ताद ने कपालभाति शुरू कर दी-छोड़ साला चाची को...ध्यान से सुन चिरई का बोलत है..इसी बीच रामनामी ओढ़े कौनो पंडित जी निकल आये कहीं से-का पहलवान जी,हें हें..का हो रहा है अखाड़े में..हें हें..?अरे हो का रहा है यार.कबड्डी खेल रहे हैं अउर का..!!हे पंडित..हे पंडित..तनी ध्यान से सुनो तो चिरइया का बोलत है..!आंय..पंडित जी ने ध्यान लगाया..दूनो कान रोपा और चहक के बोले-एकदम साफ़ तो बोलत है पहलवान.का,अकिलिया घुटने में चली गयी है का..?..कुहुंकू...कुहुंकू...कुहुंकू...!! अरे,चिरइया बोलत है-राम,लछिमन,दसरथ....राम,लछिमन,दसरथ..!अजित सिंह चेलों के साथ बउरा गये..लगे कलइया मारने सब एक साथ..फोन लगाओ सालों..prem prakash को फोन लगाओ.अब कोई रस्ता नही.पगलवा दोगे सब के सब तुमलोग..पूछो पूछो..prem prakash से पूछो-चिरइया का बोलत है.

भइया,जलंधर के अखाड़े से बनारस फोन मिलाया गया..हलो..हलो..अजित सिंह हाँ,हमहीं बोल रहे हैं भाई साहब.ई एगो चिरई है..का मालूम का तो बोलत है.तनिक पहिचानिए तो prem prakash जी...आंय..अच्छा अच्छा सुनाइये सुनाइये..कुहुंकू...कुहुंकू...कुहुंकू...!!अब ईका मतलब लहसुन,पियाज,अदरक...होगा कि राम,लछिमन,दसरथ....होगा कि गदा,मुकदर और कसरत...होगा....का होगा...?ई गदा मुकदर वाला पर हमरा कॉपीराइट है वइसे....हा हा हा..बनारस से फोन पर ठहाका लगा तो राष्ट्रवादी चौकन्ने हो गये..इतनी हिम्मत ओस्ताद जी..सरकार मोदी जी की..अउर हंसिहें prem prakash जी...?आंय..!......फोन पर आवाज आई-अरे अजित भइया,चिरई तो साफे साफ़ बोलत है-अपना अपना मतलब...अपना अपना मतलब...मकनाते हुए नये बछरू गच्चा खा जाते हैं..उस्ताद को पसीना आ जाता है.चिरइया उड़ जाती है.सारे राष्ट्रवादी मिल के एक साथ मोदी जी को फोन लगा रहे हैं.उस्ताद की आवाज सबसे तेज है-देखौ भइया मोडी जी..ई prem prakash को तो देश निकाला दे दो हाँ,समझे कि नाही...!ओट तुहें हम दिए थे.ऊ prem prakash नही दिया था..अब हमारे सबके रहते चिरई चुरुंग का बोली भाषा ऊ बूझेगा...?आंय..