नीतीश कुमार ने बिहारी मजूरों की गाढ़ी कमाई के पाँच करोड़ रूपये मालिकान मद्रासियों को भेजे हैं। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने तो अपनी पहली तनखा ही भेज दी। मुझे खुशी है कि आफत मे पड़े हमारे अन्नदाताओं को बिहारियों के पसीने की सुगंध कुछ राहत पहुंचायेगी। अब देखने की बात ये है कि इन मजूरों की रोजी रोटी चलाने वाले पंजाबियों,मद्रासियों , गुजरातियों और मुंबईकरों की आभिजात्य भावनाओं को अपने खानदानी मजूरों की इस माली मदद से कोई ठेस तो नही पहुंचेगी। अभी कल ही की तो बात है, जब इन अभिजात्यों ने बिहार चुनावों के बाद बिहारी मजदूरों की भर्तियाँ लेनी शुरू की थीं...और आज अचानक ये हो गया कि अपने ही सिर विकास कंपनी लिमिटेड की लाठियाँ बरस गईं। हम कोई मजा नही ले रहे, ऐसी बुलाई हुई आपदाओं का मजा लिया भी नही जा सकता, लेकिन मजूरों की भी तो अपनी पीड़ा होती है न साहेबान। इसे हमारी वही पीड़ा समझिए कि हम आपसे लेते हुए शर्मिंदा नही होते क्योंकि जो लेते हैं, अपना हाड़ ठठाकर लेते हैं। अब दे रहे हैं तो थोड़ी झेंप है। मालिकों का सिर हमारे सामने झुके ये हमे भी तो सहन नही है। अच्छा किया राजहंसों...! विपत्ति मे पड़े हुओं की मदद करना हमारा फौरी दायित्व है। ....और मजूर अपने मालिकों का मेहना-ताना भूलकर भी भाईचारा निभाना जानता है। याद रखना बिहारियों हमारे नैतिक और सांस्कृतिक दर्प का रंग बहुत गाढ़ा है। ये बात पूंजी और पैसों मे दिनरात डुबकियाँ लगाने वालों को जरा कम समझ मे आएगी। जब हमारे पूर्वज गिरमिटिया बनाकर मॉरीशस आदि देशों मे ले जाये गये थे तो उनके एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में रामायण थी बस। उनके झोले में तुलसी का पौधा और जुबान पर भोजपुरी भाषा थी। यह विरासत जो आज मॉरीशस को मॉरीशस बनाती है,वो उन्हे हमारे पूर्वजों से मिली है और वे इसे बहुत संभाल कर रखते हैं। लगभग डेढ़ सौ सालों के संघर्ष ने गिरमिटिया मजदूरों की कहानी बदल दी है, जिन खेतों में बिहारियों के बाप-दादों ने मजदूरी की थी, आज उनके वंशज उन जमीनों के मालिक हैं। इसलिए फिर कहता हूँ लौटो अपने देस.....! याद करो अपना इतिहास और भरोसा करो अपनी प्रतिभा और श्रमशील संस्कृति पर। सारा धन बिहार की मिट्टी मे है। अपनी मिट्टी को जगाओ। अपने गिरमिटिया संस्कारों से मॉरीशस ही क्यो, अपने बिहार को भी सम्मृद्ध बनाओ। हम ऐसे तैसे पूंजीधर्मी तानों का बुरा नही मानते....!
Thursday, 31 December 2015
अच्छा किया राजहंसों...! लेकिन अब लौटो...!!
नीतीश कुमार ने बिहारी मजूरों की गाढ़ी कमाई के पाँच करोड़ रूपये मालिकान मद्रासियों को भेजे हैं। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने तो अपनी पहली तनखा ही भेज दी। मुझे खुशी है कि आफत मे पड़े हमारे अन्नदाताओं को बिहारियों के पसीने की सुगंध कुछ राहत पहुंचायेगी। अब देखने की बात ये है कि इन मजूरों की रोजी रोटी चलाने वाले पंजाबियों,मद्रासियों , गुजरातियों और मुंबईकरों की आभिजात्य भावनाओं को अपने खानदानी मजूरों की इस माली मदद से कोई ठेस तो नही पहुंचेगी। अभी कल ही की तो बात है, जब इन अभिजात्यों ने बिहार चुनावों के बाद बिहारी मजदूरों की भर्तियाँ लेनी शुरू की थीं...और आज अचानक ये हो गया कि अपने ही सिर विकास कंपनी लिमिटेड की लाठियाँ बरस गईं। हम कोई मजा नही ले रहे, ऐसी बुलाई हुई आपदाओं का मजा लिया भी नही जा सकता, लेकिन मजूरों की भी तो अपनी पीड़ा होती है न साहेबान। इसे हमारी वही पीड़ा समझिए कि हम आपसे लेते हुए शर्मिंदा नही होते क्योंकि जो लेते हैं, अपना हाड़ ठठाकर लेते हैं। अब दे रहे हैं तो थोड़ी झेंप है। मालिकों का सिर हमारे सामने झुके ये हमे भी तो सहन नही है। अच्छा किया राजहंसों...! विपत्ति मे पड़े हुओं की मदद करना हमारा फौरी दायित्व है। ....और मजूर अपने मालिकों का मेहना-ताना भूलकर भी भाईचारा निभाना जानता है। याद रखना बिहारियों हमारे नैतिक और सांस्कृतिक दर्प का रंग बहुत गाढ़ा है। ये बात पूंजी और पैसों मे दिनरात डुबकियाँ लगाने वालों को जरा कम समझ मे आएगी। जब हमारे पूर्वज गिरमिटिया बनाकर मॉरीशस आदि देशों मे ले जाये गये थे तो उनके एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में रामायण थी बस। उनके झोले में तुलसी का पौधा और जुबान पर भोजपुरी भाषा थी। यह विरासत जो आज मॉरीशस को मॉरीशस बनाती है,वो उन्हे हमारे पूर्वजों से मिली है और वे इसे बहुत संभाल कर रखते हैं। लगभग डेढ़ सौ सालों के संघर्ष ने गिरमिटिया मजदूरों की कहानी बदल दी है, जिन खेतों में बिहारियों के बाप-दादों ने मजदूरी की थी, आज उनके वंशज उन जमीनों के मालिक हैं। इसलिए फिर कहता हूँ लौटो अपने देस.....! याद करो अपना इतिहास और भरोसा करो अपनी प्रतिभा और श्रमशील संस्कृति पर। सारा धन बिहार की मिट्टी मे है। अपनी मिट्टी को जगाओ। अपने गिरमिटिया संस्कारों से मॉरीशस ही क्यो, अपने बिहार को भी सम्मृद्ध बनाओ। हम ऐसे तैसे पूंजीधर्मी तानों का बुरा नही मानते....!
संगमरमरी व्यंग्य। मजबूत किन्तु कोमल।
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