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Monday, 4 August 2014

भूदान-गंगोत्री

15 अप्रैल 1951.....पदयात्रा पर निकले विनोबा जी हैदराबाद के नज़दीक पोचमपल्ली गाँव पहुंचे.निर्मला देशपाण्डे सहित अनुयायियों की भारी भीड़ भी संत के साथ थी.धनाढ्यों का गाँव था.सबने दिल खोल कर स्वागत किया.विनोबा जी के संतत्व की सुकीर्ति दिग्दिगंत में फैलती हुई देशो की सीमाएं पार कर गयी.यह वही विनोबा थे जिन्हें 1911 में गांधीजी ने दुनिया का पहला सत्याग्रही घोषित किया था.यह संतत्व का तत्व विनोबाजी की ज़िन्दगी में बचपन से ही घुला मिला था.गांधीजी के योग्यतम शिष्यों में से पहले और एकमात्र विनोबा जी ही थे.मेरे गुरुजी आदरणीय रामप्रवेश शास्त्री कहते हैं कि गांधी महामैगनेट था,इसलिए उसके सीधे संपर्क में आने वाले लोगों में मैगनेट कुछ ज्यादा ही घुल कर समाया.यूँ तो दूर-दूर तक संपर्क में आने वाले साधारण लोहे के टुकड़े भी अच्छे-खासे चुम्बक हो गये.इसीलिए ये वो दौर था जबके इतिहास के पन्ने महापुरुषों की भीड़ से खचाखच भरे हुई मिलते हैं.यह चुम्बकत्व विनोबा में कुछ ज्यादा ही घनीभूत होकर समा गया था.इसलिए वे गाँधी के एकमात्र आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बने.इस सत्व को वहन करने योग्य कोई दूसरा था भी नही.गांधी जी लिखकर गये कि जब मै ना रहूँ तो मुझे मरा हुआ मत समझ लेना.मै अपनी कब्र में से भी बोलूँगा.समय ने सिद्ध किया कि यह बात गांधीजी नही,उनकी विभूति लिख रही थी.दुनिया ने देखा कि गांधी के जाते ही विनोबा बड़े रिदम में बोल उठे थे.दुनिया ने यह भी देखा कि विनोबा के हाथों वह अजूबा घटित हुआ,जिसकी कोई दूसरी मिसाल दुनिया के किसी भी देश के इतिहास में नही मिलती.

पोचमपल्ली में स्वागत और भोजन के बाद आस-पास के 10-20 गाँवों के लोग जुटे और एक विशाल सभा जुड़ी.गांधी के बाद गांधी का सन्देश लेकर विनोबा पैदल देशाटन पर निकले थे.हर गाँव में सभा होती.उनके साधु गुणधर्म के कारण लोग खिंचे चले आते थे.किसी दो हज़ार आबादी वाले गाँव की सभा में 10-10 हज़ार तक लोग जुट जाते थे.यह भी वैसी ही बड़ी सभा थी.चर्चा शुरू हुई.....देश,काल,और परिस्थितियों पर चर्चा के बाद बात आध्यात्म की ओर मुड़ी.इहलोक-उहलोक की चिंताओं,चर्चाओं की स्थिति यह थी कि लोग सवालों की झड़ी लगा देते थे और विनोबा जी शास्त्र-सम्मत,विचार-सम्मत और संवेदना-सम्मत शब्दों से समाधान करते थे.शब्द को ब्रह्म मानते थे वे.चर्चा की दिशा जातिगत और सामाजिक भेद-भाव,असमानता और समाज में बढती ऊंच-नीच की खाई की ओर मुड़ी....भूमिहीनों और भूमिवानो की बात चली तो विनोबा जी ने लोगों से सवाल नही,एक बात पूछी-----आपमें से कितने ही ऐसे हैं जिनके पास हज़ारों बीघे ज़मीन है और आपमें से ही कितने ऐसे भी हैं जो आपके खेतों में मजदूरी करते हैं.आपमें से कौन ऐसा है जो अपने हज़ार बीघे में से अपने भूमिहीन भाई को दो-चार बीघे ज़मीन दे सके..?बात एक प्रवाह में पूछी थी विनोबा ने,आगे बढे ही थे कि पोचमपल्ली के बड़े ज़मींदार रामचंद्र रेड्डी उठ खड़े हुए,विनोबा जी के पैर छू के बोले -बाबा 80 एकड़ देता हूँ....विनोबा जी हठात चुप हो गये.यकबयक सभा भर में सन्नाटा छा गया.लोगों में घोर आश्चर्य छा गया.ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज़मींदार जिन्दगी भर सूद ही वसूलते रहे....गुलामों की जिंदगी नाप ली और मूल कभी पूरा ही नही हुआ,जो जमींदार किसी को एक धेला ना दे,उनमे से कोई एक 80 एकड़ ज़मीन दान कर दे..लेकिन 'कोई एक' तो केवल कहने की बात है.ज़मीन देने वालो की संख्या दो,तीन,चार,पांच तक पहुँच गयी....विनोबा जी भी साश्चर्य इस 'घटना' को देख रहे थे.जी हाँ ,यह घटना,घटना इस सन्दर्भ में थी कि तब की दुनियां में यह बिलकुल नई बात हो रही थी.नई बात तो यह आज की दुनिया में भी है,लेकिन तब ज़मींदारी का कुचक्र था.जिसमे गरीब किसान मजदूर पिस चुके थे.ज़मीन का खेल तब आज की तरह गन्दा ही नही था,हत्यारा भी था.आज का तो किसान भी आत्महत्या करता है लेकिन तब का मजदूर भी ज़मींदारों के ज़ुल्म से संघर्ष करके जीता था.

विनोबा जी ने उस पल को बड़ी गहराई से महसूस किया.उन्हें लगा कि गांधी के बाद भी गांधी का काम हो सकता है.पोचमपल्ली में ज़मीन पाकर विनोबा की जैसे युवावस्था लौट आई हो.उन्हें एक असंभव सा सपना सच होते दिखने लगा.उन्हें लगा कि देश के गरीब भूमिहीनों को भी ज़मीन दी जा सकती है....भूपतियों से ज़मीन ली जा सकती है......और कहीं अंतर्गुहा में प्रवेश करते हुए विनोबा ने वहीँ बैठे-बैठे भूदान के लिए आन्दोलन चलाने का संकल्प ले लिया.उसके बाद तो फिर क्या भूदान हुआ......! विनोबाजी ने तेरह हज़ार कि.मी.से ज्यादा रास्ता पैदल चलकर नापा और सालभर में 45 लाख एकड़ ज़मीन इकठ्ठा कर ली..जंगल में आग की तरह यह प्रेरणा पूरे समाज में बही...यह विनोबा का प्रभामंडल ही था कि लोगों में ज़मीन देने की होड़ लग गयी..लोग उन्हें सन्देश भेज-भेजकर बुलवाते थे और जमीन देते थे..कितनी ही ग्राम सभाओं और जमीदारों ने तो प्रस्ताव पास करके विनोबा जी के नाम ग्रामदान ही कर दिया..यहाँ तक कि बिहार ने तो पूरा प्रदेश ही दान कर दिया..बिहार ने ही सबसे ज्यादा भूदान भी किया.दुनिया के किसी मुल्क में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता,जहाँ लोगों ने 45 लाख एकड़ जमीन केवल मांगकर पा ली हो..दुनिया आँख फाड़ के देख रही थी इस गतिविधि को..सरकार के जिम्मे ये एक नया काम आ पड़ा--मिली हुई जमीन को बांटने का..और वह जमीन आजतक बंट रही है दोस्तों..भूमिहीनों को जमीन बांटने की कवायद आज 62 सालों से चल रही है..आजतक केवल 20 लाख एकड़ जमीन ही बांटी जा सकी है,वो भी केवल कागजों में.मौके पर कुछ और ही हालात हैं...बाकी जमीन का तो पता भी नही है..जमीनें लापता हो गयी..ये हम हैं..विश्व-गुरु कहलाते नही अघाते..एक आध्यात्मिक चेतना के बल पर घटित हुए एक चमत्कारी आन्दोलन का परिपाक धूल खा रहा है..और दबंगों ने जगह जगह भूदान की जमीनें दबा रखी हैं.नाजायज कब्जे कर रखे हैं..यहाँ तक कि फ़कीर द्वारा मांगी गयी जमीनें कितनी तो बिक भी गयीं.दुनिया के सामने उपस्थित हुई रक्त-विहीन क्रान्ति की यह पहली,एकमात्र और अनूठी घटना अपना सिर धुन रही है..जमीन का सवाल अगर इस रास्ते हल हो गया होता तो आज का भारत वैसा नही होता,जैसा आज वह है..तस्वीर कुछ और ही होती..अफसोस.............................

Sunday, 3 August 2014

दुर्गादास राठौर

दुर्गादास राठौर मारवाडाधिपति महाराज जसवंत सिंह के धीर-वीर-गंभीर और शेरदिल सेनापति;अनन्य सेनानी थे.लहू की गरमी भुजाओं में फड़कती और व्यक्तित्व का रुआब मूंछों में झलकता.औरंगजेब के दांत खट्टे कर देने वाला वीरप्रसूता भारत-भूमि का गर्वीला लड़ाका.मारवाड़ की सरजमीं जिसके सदके जाती है और भारत भूमि जिसकी आज भी कर्जदार है,दुर्गादास मारवाड़ के प्रसिद्ध राठौर सरदार थे.. वे जोधपुर रियासत के मंत्री असिकर्ण के पुत्र... थे.औरंगजेब की ओर से तब राजा जसवंत सिंह काबुल अभियान पर थे,जब दस दिसम्बर 1678 को उनकी मृत्यु हो गई.उस समय उनकी दो रानियाँ गर्भवती थीं.एक बच्चा तो नही बचाया जा सका लेकिन दूसरी रानी का बच्चा जब पैदा हुआ,तब राज-परिवार औरंगजेब के नियन्त्रण में था.उसने रानी और नवजात अजित सिंह को कब्जे में लेकर उन्हें मार डालने की साजिश रची.मारवाड़ को मुगलिया सल्तनत का हिस्सा बनाने का इससे ज्यादा उपयुक्त अवसर उसे नही मिलने वाला था,क्योंकि एक तरफ तो वो मराठों की ताक़त से जूझ ही रहा था,इधर राठौरों ने भी उसे नाकों चने चबवा दिए थे.साम्राज्य और शाही सेना के कब्जे से मारवाड़-वंश के आखिरी चिराग को निकाल लाने की चुनौती वीरवर दुर्गादास के सामने पहाड़ की तरह खड़ी हो गयी.मारवाड़ संकट में था.राजपूत बौखलाए हुए थे और उनकी सारी उम्मीदें एकमात्र दुर्गादास जी की स्वामिभक्ति में सहारा ढूंढ रही थीं..ये उस योद्धा के पुरुषार्थ की पहली आग थी,जो दिल्ली में फट पड़ी.राठौर सरदारों ने औरंगजेब से आग्रह किया कि वे अजीतसिंह को मारवाड़ की गद्दी का उत्तराधिकारी स्वीकार करें। लेकिन औरंगज़ेब ने यह शर्त रखी कि अजीतसिंह मुसलमान हो जाए तो उसे मारवाड़ की गद्दी का उत्तराधिकारी माना जा सकता है। औरंगज़ेब ने अजीतसिंह और उनकी विधवा माँ को पकड़ने के लिए मुग़ल सैनिक भेजे, किन्तु चतुर वीर दुर्गादास ने औरंगज़ेब की यह चाल विफल कर दी। उन्होंने कुछ राठौर सैनिकों को मुग़ल सैनिकों का सामना करने के लिए भेज दिया.उस रण-कौशल,उस देशभक्ति और उस जूनून को आहत भाव से देखता रह गया औरंगजेब और दुर्गादास रानी और राजकुमार को मुगल सेना को चीरते हुए ले उड़े.एक बलिदान यहाँ भी हुआ था.एक मारवाड़ सैनिक की पत्नी ने युवराज की जगह सुलाकर अपना बच्चा यहाँ भी कुर्बान किया था,जिसका जिक्र इतिहास में प्रायः नही होता है.औरंगज़ेब को धोखा हुआ तो उसने जोधपुर पर क़ब्ज़ा करने के लिए विशाल मुग़ल सेना भेजी। 1680 ई. में जो युद्ध हुआ, उसमें राठौरों का नेतृत्व दुर्गादास ने बड़ी ही बहादुरी से किया। औरंगज़ेब का चौथा पुत्र अकबर(द्वितीय) अपनी वंश-परम्परा के मुताबिक पिता से विद्रोह कर चुका था.वह राठौरों से जा मिला.इस घटना से औरंगजेब सनाका खा गया.लेकिन उसने अपनी चाल चल दी.अपने विद्रोही बेटे अकबर के नाम उसने युद्धभूमि में एक पत्र भिजवाया,जिसमे लिखा था कि तुमने राठौरों के साथ मिलकर उनकी जासूसी करने का काम जिस खूबी से अंजाम दिया है,हम उससे बहुत खुश हैं.योजनानुसार पत्र राठौर सरदार तक पहुंचा दिया गया और इस खेल को न समझ पाने के कारण राठौर भडक उठे.इस छल नीति के चलते औरंगजेब अपना तख़्त बचा ले गया,वरना ये वो समय था जब राजपूत और अकबर मिलकर तख्त पलट सकते थे.एक ये दिन था कि उसके बाद कभी औरंगजेब दुर्गादास से गाफिल नही रहा और जीवनभर उन्हें नीचा दिखाने की जुगतें खोजता रहा.जब दुर्गादास को वास्तविकता का पता लगा तो वे अकबर को ख़ानदेश बगलाना होते हुए मराठा राजा शंभूजी के दरबार में ले गये. दुर्गादास ने बहुत प्रयत्न किया कि राजपूत, मराठा और अकबर की फ़ौजें मिलकर औरंगज़ेब से युद्ध करें, लेकिन आलसी शम्भूजी इसके लिए तैयार नहीं हुआ। दुर्गादास 1687 ई. में मारवाड़ वापस लौट आये. यद्यपि मेवाड़ ने औरंगज़ेब से संधि कर ली थी, तथापि मारवाड़ की ओर से दुर्गादास लगातार 20 वर्ष तक औरंगज़ेब के विरुद्ध युद्ध करता रहे.1707 ई. में जब औरंगज़ेब की मृत्यु हुई,उसके बाद ही नये मुग़ल बादशाह ने अजीतसिंह को मारवाड़ का महाराज स्वीकार किया.

इस घटना के बाद अकबर ने देश छोड़ दिया और ईरान चला गया.अबतक की कहानी का इतिहास तो सर्वज्ञात है,लेकिन इसके बाद की कहानी में वीरता के अलावा जो धीरता है,शत्रुता के अलावा जो मनुष्यता है,मुझे उसकी कहानी कहनी है.अकबर(द्वितीय) के दो बच्चे थे.शाहजादा बुलंद अख्तर और शाहजादी सफीयत.फारस की और प्रस्थान करते हुए अकबर को अपने बच्चों की फ़िक्र थी.कहाँ रखे,किसे सौंपे..!इस कथानक का जब आज भी स्मरण करता हूँ तो ह्रदय उमड़ आता है.इस भरी दुनिया में अकबर अपने बच्चे सौंप सके,ऐसा विश्वसनीय कोई था ही नही,मारवाड़ सेनापति दुर्गादास को छोडकर.ये मनुष्यता के चरम उत्कर्ष की कहानी है,जब सबसे बड़े दुश्मन के घर की इज्ज़त और भविष्य दोनों एक साथ दुश्मन के घर आ पड़े.अपने बच्चे दुर्गादास को देकर अकबर ने निश्चिन्त मन ईरान की राह ली..दुर्गादास पर तिहरी जिम्मेदारी आन पड़ी.मारवाड़ के भविष्य युवराज अजित सिंह और औरंगजेब-वंश के नौनिहालों को एक साथ पालने और मारवाड़ को उसका उत्तराधिकारी मिल जाने तक मारवाड़ की सुरक्षा करना उनका धर्म था.मै दुहराता हूँ..जी हाँ,यही उनका 'धर्म' था..लेकिन इस पाठ की असल कहानी तब शुरू होती है,जब अजित सिंह और सफीयत एक साथ ही जवान हुए.दुर्गादास जी बूढ़े हो चले थे.मारवाड़ की गद्दी पर राज-वंश का खडाऊं रखकर दुर्गादास जी निर्लिप्त मन राज्य को जुगाये चल रहे थे.इसी बीच नौजवान अजित सिंह और सफीयत एकदूसरे के प्रेमाकर्षण में पड़ गये.अजित सिंह उतावले हो रहे थे.वे सफीयत की असीम सुन्दरता पर मुग्ध थे और सफीयत प्यार के वशीभूत तो थी लेकिन अभी भी उसके जज्बात पर उसके दिमाग का नियंत्रण बना हुआ था.उसने अजित को समझाया-महाराज,आपका राज्य संकट में है.उसे आपकी जरूरत है और राजपूत सरदार या प्रजा मुसलमान महारानी स्वीकार नही करेंगे.लेकिन अजित को तब सफीयत के अलावा और कुछ सूझता ही नही था और इसी आवेग में वे वो बात कह गये,जिसपर सफीयत फट पड़ी..''नहीं चाहिए मुझे राज्य..और नही चाहिये मुझे प्रजा..मुझे सिर्फ और सिर्फ सफीयत चाहिए..''सफीयत ने फटकारा..''किसी क्षणिक आवेग के वशीभूत अपने कर्तव्य पथ से विचलित होने वाला पुरुष नारी शक्ति का समर्थन कभी नही पा सकता.''अजित इस जवाब से व्यथित हो उठे.उन्होंने दिल खोलकर रख दिया और पूछा कि सफीयत,तुम मुझसे दूर क्यों भाग रही हो..?सफीयत ने जज्बात का मान रखा और कहा कि जब दिल किसी को प्यार करने लगे किन्तु प्यार करने के लिए स्वतंत्र न हो,तो उससे दूर ही भागता है.दो मनों में पल रहे इस जज्बे से अनजान दुर्गादास राज-काज में व्यस्त थे..लेकिन एक शख्स था,जिसके अंदर का शैतान धीरे-धीरे दम तोड़ रहा था और उसकी जगह कहीं मोह माया,अपना पराया के लरजते भाव जन्म ले रहे थे.औरंगजेब को अब सफीयत और बुलंद की याद सताने लगी थी.उसने दुर्गादास को बुलवा भेजा.हरकारे थे औरंगजेब के विश्वसनीय ईश्वरदास जो दुर्गादास की वीरता के कायल थे.उन्होंने वचन दिया कि मैंने औरंगजेब की आँखों में पश्चाताप के आंसू देखे हैं.आप चलिए,कोई धोखा नही होगा.कूटनीतिक तैयारियों के साथ दुर्गादास जी औरंगजेब के दरबार में हाज़िर हुए.मिलते ही बूढ़े बादशाह ने धमकी दी-इस्लामपुरी तक आ तो गये हो दुर्गादास,वापस नही जा पाओगे.इतना सुनते ही ईश्वरदास के हाथ अपनी तलवार की मूठ पर जा लगे.दुर्गादास ने कहा-शांत रहिये ईश्वरदास जी,आज औरंगजेब की तलवार मेरी गर्दन नही छू सकती.फिर औरंगजेब से बोले-जहाँपनाह..आपने दुर्गादास का नाम भी दौलतबेग रख लिया हो तो आपकी मर्जी.मै तो ब्रह्मपुर को ही जानता हूँ,इस्लामपुरी को नही..औरंगजेब ने कहा-मेरा तुमसे ठिठोली का भी नाता है दुर्गादास..लेकिन क्या तुम्हे सच में डर नही लगता मुझसे..?दुर्गादास ने कहा-मै जनता हूँ औरंगजेब पक्का हिसाबी है.ज़िन्दपीर से वो डरे जहाँपनाह,जिसके पास सफीयत और बुलंद अख्तर न हों.मै जानता हूँ जबतक मेरे दोस्त के बच्चे मेरे पास हैं,आपकी तलवार दुर्गादास को छू भी नही सकती.औरंगजेब हारी हुई हंसी हंसा और असल बात पर आया-मेरे बच्चे मुझे दे दो दुर्गादास...राठौर बोला-वे वहां सुरक्षित हैं....''अब क्या बुढ़ापे में बदला लोगे हमसे...?ये तो सोचो,अब अजित सिंह भी जवान हो रहे हैं.''.....''नही नही,मै कौन होता हूँ हुज़ूर,लेकिन मुझे महारानी से इजाज़त लेनी होगी.बच्चे राज्य के संरक्षण में हैं.ठहाका लगा के हंसा औरंगजेब..किसे बेवकूफ बना रहे हो दुर्गादास..क्या मुझे मालूम नही कि दुर्गादास की मर्जी के बिना मारवाड़ में एक पत्ता भी नही हिलता...?....''लेकिन महारानी पत्ता नही हैं जहाँपनाह...वे पूर्ण सत्ता प्राप्त महारानी हैं.''....ओह्ह्हह्ह्ह्ह...तलवार हाथों से दूर जा गिरी और नर-पिशाच घुटनों पर हो आया..दुर्गादास ने पासा फेंका-अगर जहाँपनाह युवराज अजित सिंह को मारवाड़ नरेश स्वीकार कर लें तो महारानी से बात की जा सकती है..घायल तड़प उठा,लेकिन उम्र साथ छोड़ चुकी थी.फिर भी उसका अहंकार उसके साथ था.उसने जवाबी पासा फेंका-तुम चाहो तो मै तुम्हे महाराज घोषित कर सकता हूँ.दुर्गादास बोले-राजपूत को गाली मत दो जहाँपनाह.इन बूढी हड्डियों में रक्त की गर्मी अभी बहुत बाकी है.राजपूत कुछ भी कर सकता है,अपनी वफादारी का सौदा नही कर सकता.आपको सफीयत चाहिए तो मुझे पूर्ण राज्य चाहिए.औरंगजेब की आँखों में आंसू तैर आये देखकर पिघले दुर्गादास और कहा-जहाँपनाह,राजपूत निजी रिश्तों का मान करना जानता है.मै भी ठिठोली ही कर रहा था.मैंने आपके आंसू देखे.आपके बच्चे आपको मिल जायेंगे..इतना सुनना था कि हहाकर दौड़ा औरंगजेब और दुर्गादास को बाहों में भर लिया..''मै जानता था तुम क्रूर नही हो सकते..
लौट आये दुर्गादास तो सफीयत ने पूछा-बाबा,आप हमे राजनीति की बिसात पर हार आये..?टूटकर रोये दुर्गादास-नही मेरी बच्ची,ऐसा कभी मत सोचना.तेरे दादाजान बहुत बूढ़े हो गये हैं,उन्हें सच में तुम्हारी याद आती है.मैंने उन्हें रोते देखा..सफीयत चौंकी-क्या...क्या कहा आपने..?आलीजाह रोते हैं....?उनके आंसू छूकर देखे आपने...?लाल तो नही थे..?...नही बेटी,अब वे सचमुच पश्चाताप कर रहे हैं...ये अचानक ज़िन्दपीर के लिए बाबा के मन में उमड़ता प्यार देखकर सफीयत को संशय हो आया..बात क्या है आखिर..! लेकिन उसे पता कैसे लग सकता था कि सयानी होती बेटियों के पिता इतने निश्चिन्त और अनजान नही होते.उन्हें युवराज के विचलन की खबर थी.अचानक अजित सिंह उधर आ ही निकले और सफीयत के जाने की बात सुनी तो ज़ारा रुआब खा गये.बोले-आप कौन होते हैं ये फैसला करने वाले..युवराज मै हूँ और मेरे होते सफीयत को कोई नही ले जा सकता.दुर्गादास जी ने विनम्रता से कहा-मेरा सिर महाराज की शान में झुकता है,लेकिन ये बेटी तो अपने बाप की अमानत है मेरे पास और ये कोई राज्य की संपदा नही है.इसके बारे में अंतिम फैसला मै ही करूँगा.हाँ,उसमे महारानी मां की सहमति भी जरूर होगी.बौखला उठे युवराज और बोले-''इसीलिए तो आपने मुझे अभीतक बच्चा बना के रखा है.इस तरह तो राज्य पर ही नजर गडाए बैठे हैं आप.''आत्मा चीत्कार कर उठी दुर्गादास की और चिल्ला पड़े मुकुंद दस खीची,जो वहीँ खड़े थे.वही मुकुंद दास खीची,जिनका बच्चा आततायी की तलवार के नीचे रखकर बचाए गये थे अजित सिंह.चिल्ला पड़े मुकुंददास-उडो महाराज..खूब उड़ो...लेकिन इस बूढ़े पंछी के डैनों का अपमान करोगे तो जो तलवार तुम्हे अबतक बचाने के लिए लहू पीती आई है,उसे अपना धर्म ज्ञात है.किसी से पूछने नही जाना होगा मुझे..यहीं फैसला हो जाएगा.''शांत होइए मुकुंद दास जी..दुर्गादास जी बोले...''शिविका का प्रबंध कीजिये.मुझे बेटी विदा करनी है.''अजित सिंह ने तलवार निकाल ली तो सफीयत ने धिक्कारा..ये अपमान सहन नही होगा महाराज..इतना याद करके खुश रहिये कि सफीयत आपकी मुहब्बत दिल में लिए जा रही है..मुकुंद दास और दो अन्य कहारों के साथ मिलकर दुर्गादास जी ने बेटी की शिविका को कन्धा लगाया तो शेर की आँखों से दो बूँद लहू चूकर मारवाड़ की मिटटी में विलीन हो गये..............................................
....................................................इसके बाद की कहानी इतिहास है मित्रों.अजित सिंह ने बौखलाकर कहा था-मै तुम्हे देशनिकाला देता हूँ दुर्गादास....और डोली आगे बढ़ गयी..रोते जाते थे और चलते जाते थे दुर्गादास जी..सीमा पर रुके और अपनी कांवर बुलंद अख्तर को सौंपी..''दादाजान को ये कुरआन देना बेटी..कहकर छिछियाकर रोये दुर्गादास..रो पड़ी सफीयत भी.दोनों भाई बहन दादा के घर पहुंचे...तो बस एक दृश्य बाकी रह गया,जिसका ज़िक्र भाई द्रिग्विंदुमणि सिंह ने अपने कमेन्ट में किया था.औरंगजेब बहुत खुश था.उसने सफीयत और बुलंद अख्तर को कुरआन पढाने के लिए मौलवी बुलाया तो सफीयत को याद आया-''बाबाजान,बाबा ने आपके लिए कुरआन पाक भेजी है..''...कुरआन पाक....?दुर्गादास ने...?ठिठोली करता है वो,चलो तुम्हे सीखने के काम आएगी....''लेकिन मुझे तो कुरआन पूरी याद है..बाबा ने इस्लामी रवायत की पूरी तालीम दिलाई है हमे..''...कहकर सफीयत कुरआन की आयतें उच्चारने लगी..औरंगजेब का मुंह खुला का खुला रह गया..वह अवाक था मित्रों और इतिहास में दर्ज है कि औरंगजेब का मन दुर्गादास के लिए श्रद्धा से भर उठा.ये अलग बात है कि उसने मारवाड़ की गद्दी पर अजित सिंह को मान्यता फिर भी नही दी...और ये काम उसके इंतकाल के बाद ही हुआ.पूरी तरह स्वतंत्र और संप्रभु मारवाड़ अजित सिंह को सौंपकर दुर्गादास राठौर ने सन 1720 में इस संसार से विदा ली..

बाबा बताते थे

बाबा बताते थे कि हमीद गदहिया गोल में आया तभी से गदहा था.पढ़ाई लिखाई में पूरी तरह जीरो बटा सन्नाटा.किताबों से उसको बैर था,और स्कूल से नफरत.बहुत बार तो उस्मान चा पीठ पर लाद कर जबरन स्कूल पहुंचा जाते.अब आधा टाइम तो वो स्कूल में भी रोता ही रहता.और जब चुप होता तो कुछ न कुछ ऐसा कर देता कि हेडमास्टर मुंशी जी उसको ठोंक देते.होता ये कि रोने घिघियाने के बाद जबरन स्कूल पहुंचाए जाने की खुन्नस में वो स्कूल में ...किसी न किसी से झगडा फानता और किसी न किसी को पीट देता.शरीर से मजबूत था.अजीब दुस्साहसी था,बाप की मार खा कर स्कूल आता,बदले में किसी न किसी को पीटता और बाद में मुंशी जी की छड़ी खाता.इतना उसका रोज का नही तो साप्ताहिक धंधा तो था ही.उसका मन तीन कामों में खूब लगता--किसी से कुश्ती लड़नी हो...गुलेल चलानी हो...या मंगई नदी में तैरना हो.....लेकिन ये तीनों काम किस काम के,अगर पढ़ाई ही नही हो रही है तो..?थोडा बड़ा हुआ तो उस्मान चा उसे पुश्तैनी दुकान पर बैठाने लगे लेकिन वहीँ कौन सा उसका मन लगता था.बाप दिन भर सिलाई करता और ये दिन भर गुलेल चलाता.एकाध बार यहाँ भी ठोंका जाता.उस्मान चा उसे पकड़ के लाते और अपने सामने स्टूल पे बैठा देते.डांट के कहते-बैठ के देख कैसे सिलाई होती है.तब हमीद का कोई बस नही चलता.चुप-चाप माधो की मूरत बना मशीन की खट खट खट खट सुनता रहता.चौदह-पंद्रह साल के किशोर हमीद के मन में पलटनिया सिपाही बनने का ख़्वाब पलने लगा था.सिलाई मशीन की खट खट खट खट जैसे-जैसे तेज़ होती,वैसे-वैसे उसके अन्दर मशीन गनों की दग दग दग दग तेज़ होने लगती.देश अभी आज़ाद हुआ ही था और उन दिनों सेना समेत तमाम सरकारी विभाग लोगों को पकड़ पकड़ कर नौकरियों पे रख लेते थे.सेना में जाने से लोगबाग अपनों को रोकते थे,बचाते थे.बाबा बताते थे कि पलटनियाँ वाले अफसर किसी भी हट्टे-कट्टे नौजवान को देखते तो उसे सेना में ले लेते.परिवार वाले सुनते तो सिर धुनते क्योंकि तब सेना में जाने का मतलब सीमा पर लड़ना और मरना ही होता था.ऐसी हालत में हमीद के लिए बहुत मुश्किल था कि वो अपना सपना माँ-बाप को बताए...
मजबूत कसे हुए फौलादी जिस्म के कारण सत्रह अट्ठारह का होने तक हमीद आस-पास के गाँवो में प्रसिद्ध हो चला था.इलाके में होने वाला ऐसा कोई दंगल नही था जिसमे हमीद ने दो-चार कुश्तियां न मारी हो...ये वो दौर था जब अखाढ़े गावों की शान हुआ करते थे.इसलिए हमीद लोकप्रिय तो हो रहा था लेकिन कुश्ती के आलावा लोगबाग उसे मूरख ही समझते थे.गदहा तो वो था ही.बाबा बताते थे कि मेरे साथ ही पढता था हमीद.उसके सेना में जाने वाली बात की भनक उस्मान चा को लगी तो उन्होंने बुद्ध का बुद्धत्व रोकने की गरज से चट-पट उसका ब्याह कर दिया.शादी के बाद हमीद भरमाया तो सही लेकिन एक दिन अचानक जैसे उसके पुरुषार्थ की पहली आग ही फूट पड़ी हो.धामुपुर में उस दिन कुछ दबंग लोग गुंडई पर उतर आये.एक गरीब हिन्दू परिवार की फसल जबरन काटने के लिए जमींदार साहब के करीब 50 लठैत आ धमके.ऐसे मौकों पर आम तौर पर गाँव का गाँव तब अपने अपने घरों में घुस जाता था.हमीद ने सुना तो भुजाएं फड़फड़ाने लगीं.घर भर रोकता ही रह गया लेकिन लाठी लिए हमीद दोस्त के खेत में उतर आया.बाबा कहते थे कि हमीद के लिए दोस्त बड़ी बात थी और दोस्त के हिन्दू होने से कोई फर्क नही पड़ता था.यह बताते हुए बाबा की आखें चौड़ी हो जाती थीं कि 50 लट्ठबाजों को अकेले हमीद ने घंटों लड़ाया और अंततः मार भगाया.ये 1954 का साल था.ज़मींदारों की पेशाब से तब गांवो में चिराग जला करते थे.क्या मजाल कि कोई चूं भी कर दे.हमीद की खोज होने लगी.करीब-करीब यही वह समय था जब हमीद ने रेल में भारती होने का बहाना करके आधी रात को गाँव छोड़ दिया.और घर वालों की चोरी सेना में भारती हो गया.उन दिनों कश्मीर में आतंकवाद तो नही था,लेकिन कबीलाई हुआ करते थे.जो भारत में घुस कर लूट-पाट और हत्याएं किया करते थे.ऐसे ही एक कुख्यात पाकिस्तानी डाकू इनायत का खौफ पूरे कश्मीर पर था.नये-नये रंगरूट हमीद ने इनायत को जिंदा धर दबोचा.और उसकी वीरता की धमक 1960 में ही पूरे देश ने सुनी.1962 की हार ने उसमे जैसे एक पागलपन भर दिया था.1965 का युद्ध जब शुरू हुआ तो हमीद छुट्टियों में गाँव आया हुआ था.घर के सामने वाले पेड़ पर 'मर्खौकिया' चिरई बोलने लगी थी.इसका बोलना अशुभ का संकेत होता है.लेकिन इसको कोई मारता नही है.भगा देते हैं लोग..लेकिन हमीद को कौन समझाए...!उसके हाथ में उसकी गुलेल मचल उठी.अँधेरी रात....मरर्खौकिया की आवाज़...मुआ मुआ मुआ....गुलेल की गोली आवाज़ पर छूटी ....सटाआआआक......मरर्खौकिया चिरई नीचे....शब्दभेदी गोली....शब्दबेधी निशाना...!!पलटन से सन्देश आया--हाजिर हो...युद्ध शुरू हो गया है...जाते जाते रसूलन बीबी रो पड़ी थीं...मफलर लपेट दिया था शौहर के गले में,सो यादों में सफ़र देर तक मदमाता रहा...
10 सितम्बर 1965 का दिन..अमृतसर के पश्चिमी क्षेत्र कसूर पर पाकिस्तानी सेना ने पूरी तैयारी से हमला बोला था.हमीद खेमकरण में तैनात थे.पाकिस्तानी सेना के मुकाबले भारतीय सैनिक कम थे और उतने हथियार भी नही थे,जिनसे मुकाबला बराबरी पर भी रोका जा सके..उनके पास अजेय अमेरिकी पैन्टन टैंकों का बेड़ा था..और हमीद के पास तोप से लैस केवल एक जीप थी बस.हमीद को लगा कि ऐसे तो उन टैंकों पर एक खरोंच भी नही लायी जा सकेगी.सिर पर लेकिन खून सवार था.लक्ष्य तय किया और ज़िन्दगी का जुआ खेल गया हमीद.छिपते छिपाते पाकिस्तानी खेमे में घुसकर मिटटी के एक टीले के पीछे लगा दी जीप..और इसके बाद जो हुआ,वो सब इतिहास है..अमेरिका और पाकिस्तान का गुरूर चूर चूर होकर रणक्षेत्र में पड़ा था..पाकिस्तानी बंदूकों ने हमीद की ओर मुंह करके आग बरसानी शुरू कर दी..लेकिन हमीद का मोर्चा तब भी जारी था.गोलियों से छलनी शरीर लिए दगदगाती हुई अपनी मशीनगन का मुंह खोले हमीद पाकिस्तानी सेना पर चढ़ आया..तबतक न जाने कितनी गोलियों ने एक साथ हमीद को,उसके घर को और मेरे गाँव को एक साथ छेद डाला था...वीरगति पाने से पहले सैकड़ों पाकिस्तानी सिपाहियों को जन्नत बख्श दी हमीद ने..बाबा बताते थे कि अपनी जान देकर गाजीपुर के हमीद ने अमृतसर को बचा लिया..सरकार ने हमीद को परमवीर चक्र की घोषणा की और प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री धामुपुर आये..बाबा बताते थे कि उस्मान चा को बांहों में भरकर शास्त्री जी ने पूछा-आपके बेटे ने देश का मस्तक ऊंचा किया है,क्या चाहते हैं आप हमसे....?आप जो मांगें,सरकार अवश्य देगी...बाबा बताते थे कि उस दिन उस्मान चा चाँद भी मांग लेते तो शास्त्री जी चाँद तोड़ लाते...लेकिन मांगी दो चीजें...फफकते हुए उस्मान चा ने माँगा था--धामुपुर से गाजीपुर एक सड़क दे दो साहब....और गंगा पर एक पुल....!!दोनों बन गये...आज भी हैं...तबके मुसलमान भी काफिर होते थे क्या..?गंगा पर पुल मांग लिया...कोई मस्जिद ही मांग लेते...बाबा बताते थे कि उस्मान चा अंतिम समय तक कपड़े ही सीते रहे..रोज चार किलोमीटर दूर दुल्लहपुर बाज़ार में स्थित अपनी दूकान पर पैदल ही जाते और पैदल ही लौटते...ईद आती तो उस्मान चा की दूकान ईदी से भर जाती और पचइयां आती तो इलाके भर के अखाडियों,पहलवानों के लिए उस्मान चा फ्री में लंगोट सिलते.....रसूलन बीबी आज करीब नब्बे साल की हैं....लेकिन आज भी खट खट खट खट चलती हैं...बिलकुल किसी मशीनगन की तरह....दग दग दग दग...क्या हिन्दू,क्या मुसलमान,रसूलन बीबी हम सभी की आजी हैं बस...और दिख गयीं तो पैर जरूर छूते हैं हम....ईद मुबारक हो हिन्दुस्तान....ईद मुबारक हो गाजीपुर....ईद मुबारक हो धामुपुर....आप सभी को,हम सभी को ईद मुबारक...ईद मुबारक..ईद मुबारक...!!!!!!!!!!!!