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Monday, 28 April 2014

बनारस:आधा जल में,आधा थल में..

बनारस के घाटों की ओर कैमरे का मुह करके मीडिया चैनल दुनिया को बनारस की घाट-संस्कृति की महत्ता बता रहे हैं.कुछ कैमरे मंदिरों की ओर,कुछ गलियों की ओर और कुछ का रुख बाज़ारों की ओर है.ये चैनल संसार को वही बनारस दिखा रहे हैं,जिसे सब पहले से जानते हैं---शोरूम-बनारस---.बनारस में छोटे-बड़े मंदिरों की संख्या 1,50,000 के आस-पास है.गलियों में,सीढ़ियों पर,दीवारों पर,चबूतरों पर,रेती पर,छज्जों पर,घरों में,घोसलों में...,पेड़ों में,तालाबों में,कहाँ नही है मंदिर.....!इन सभी में घंटा-घड़ियाल बजते ही रहते है,शंखनाद होता ही रहता है,और धार्मिक,सांस्कृतिक गतिविधियाँ चलती ही रहती हैं.इनमे से लगभग आधे मंदिरों को चलाने,संभालने वाले समूहों,समितियों में जैनों,बौद्धों,मुसलमानों,सिक्खों और ईसाईयों के नाम भी शामिल हैं.साल भर चलने वाली काशी की रामलीला के अनेक पात्र अनेक जिलों,अनेक प्रदेशों और अनेक धर्मो से होते हैं.बनारस की गलियां अपनी बनावट में ईंट-पत्थर की ही हैं,लेकिन अपने चरित्र में रबड़ जैसी होती हैं.तीन फुट चौड़ी गली में एक मिनट के अन्दर 5 सांड,10 मोटरसाइकिलें,50 साइकिलें और 500 आदमी एक साथ बड़े आराम से एक दुसरे को क्रॉस कर सकते हैं.गली फैलती हो जैसे....!लेकिन मजाल क्या कि कोई सांड किसी की ओर ताके भी.एकदम गऊ जैसे......विश्वनाथ गली में रामदाना,अक्षत,आदि की बोरियां लादे ट्रालियां भी इस भीड़ के बीच से उतने ही आराम से गुज़र जाती हैं.सांड की निगाह केवल इन्ही बोरियों पर होती है.फूल,माला,रोली,चन्दन आदि की बोरियों की ओर सांड देखता भी नही.लेकिन चावल और रामदाने की बोरी गुजरी नही कि अचामक नन्दी की सींघ बोरी के अन्दर.क्रॉस करते-करते भी दो चार किलो प्रसाद नीचे.नन्दी का काम हो गया.....!बनारस में बाज़ारों की शाम प्रायः सालभर गुलज़ार ही रहती है.इस रौनक में विशुद्ध सांस्कृतिक हलचलें भी शामिल हैं.प्रसिद्द अडियों के अलावा यहाँ मर रही अडियाँ भी हैं,जहाँ कभी बनारस की साहित्यिक रवायतों की नीव डाली जाती थी.भारतेंदु से लेकर प्रेमचंद तक ने जो नीव रखी,उसे काशीनाथ सिंह तक सम्मृद्ध रखने वाले साहित्यकारों की उम्र बढ़ने,सक्रियता घटने और उदासीनता के कारण ऐसी कई अडियाँ अब सुनसान हैं और अपनी विरासत को याद कर रही हैं.प्रेमचंद कम से कम महीने में एक बार लमही से पैदल प्रसाद जी के घर उनसे मिलने आया करते थे.बीस किलोमीटर के इस रास्ते में चार अडियाँ थीं,क्या गुल खिलते रहे होंगे जब कामायनी का कवि और गोदान का सर्जक दोनों एक साथ बैठते होंगे.उच्चतम साहित्यिक मूल्यों की ये बनारसी सांस्कृतिक विरासत किसी चैनल का आकर्षण नही है..गलियों की जीवन-संस्कृति उनका विषय नही है.32 लाख से ऊपर की आबादी जिन गाँवों में बसी हुई है,जिन छोटी बड़ी नदियों से घिरी हुई है,जिन काम-धंधों में लगी हुई है,इन बातों से इन चैनलों को कोई मतलब नही है.इनके लिए बनारस में दिखाने को आठ-दस बड़े मंदिर हैं,बनारस की साडी है,बुनकर है,बीएचयू है और गंगा है..इन्होने अगर पढ़ा होता कि बनारस आधा जल में है,आधा थल में है,आधा मन्त्र में है,आधा शव में है और आधा तो अकेले धूमिल के गाँव में है,तो वे वोट का रुझान जानने इन जगहों पर होते.मेरे मित्र केशव शरण का एक हाइकू बनारस के साहित्यिक गलियारों में खूब चलता है,क्योंकि यह बनारस का चित्र और चरित्र दोनों बनाता है.....कहीं भी रहो......अजान की आवाज.....सुनाई देगी....इसी को कहते हैं गंगा-जमुनी संस्कृति.आजकल यह सवाल सोशल मीडिया पर छाया हुआ है.आदमी की ज़िन्दगी का हर पहलू जैसे कि बाज़ार में ही आ खड़ा हुआ है.इस बाज़ार में,बाजारू संस्कृति के चुनाव-प्रचार के नमूने भी हैं.शहर में पानी की सभी बड़ी टंकियों के ऊपर बीजेपी के झंडे और सभी प्रमुख चौराहों पर उसकी होर्डिंग्स हैं.कांग्रेस,सपा,बसपा के कार्यकर्ता उदास-मन अपने-अपने गाँवों,मुहल्लों में हैं.ऐसे में आम आदमी पार्टी के पक्ष में करीब 5 हज़ार लड़के टोपी लगाए,पैंट पहने और शरीर पर नारे लिखवाये दिन-दिनभर सड़क पर पैदल टहल रहे हैं और मुंह से कुछ नही बोल रहे हैं.ऐसे में हर-हर महादेव की नगरी में हर-हर मोदी का नारा देने वाले दलों का गढ़ बनने से बनारस इनकार करने जा रहा है.सुना है,मोदी के खिलाफ सभी दल अरविन्द के समर्थन में इकठ्ठा हो रहे हैं.भीलों ने लूट लिया वन, राजा को खबर ही नही.

Monday, 24 March 2014

बनारस का बुढवा मंगल:एक विहंगम अवलोकन

रास-रंग,राग-भंग,फगुआ-चैती,गुलाल-अबीर,केवडा-गुलाब और दूध-मलाई में डूबी ठंढाई,बीच गंगा में बजडों का बेडा और सारी रात की मस्ती...यह बनारस का बुढवा मंगल है.1730 से लेकर अब तक यानी लगभग 284 वर्ष.. बीच में कई वर्ष छूटे भी,लेकिन इतनी बार आयोजित होकर भी जो अभी जवान है और जिसका नाम लेते ही बच्चे-बूढ़े सब जवान हो जाते हैं , वह है बनारस का अपना बुढवा मंगल. बनारसी रहन सहन , जीवन शैली , अलमस्त फक्कड़शाही और निराले रंग- ढंग की पहचान देता एक प्रतीक उत्सव.. यह जल-उत्सव है. भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक वर्णन देखिये- -गंगा में चहुंओर से,दीपहिं दीप लखात. नावनि सो सुरसरि छिप्यो,जल नही नेकु दिखात. तब नावों से गंगा पट जाती थी और और 'जल नहीं नेकु दिखात' का चित्र चरितार्थ होता था.. वह चित्र इस बार भी उपस्थित था.. जल नही नेकु दिखात--यह नदी की व्यथा-कथा है.. जल- पुरुष राजेन्द्र सिंह कहते हैं.. अब गंगा है ही कहाँ.?? जल नहीं नेकु दिखात.. ..जो दीखता है,वो तो मात्र जल-मल है. 9 अप्रैल 2013 की शाम बनारस के दशास्वमेध घाट पर बुढ़वा मंगल की महफ़िल सजी. यह संस्कृति का सरकारी आयोजन था. बनारस के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों की मेजबानी में ऐतिहासिक विरासत को जिन्दा रखने की इस कोशिश ने काशी के मानस में कई दिनों से उल्लास घोल रक्खा था.

इस पर्व के ऐतिहासिक आख्यानों से गुजरते हुए कई बार लगा कि पहले इस आयोजन की सांस्कृतिक जमीन बहुत समृद्ध थी. कल्पना के उन दृश्यों का आवाहन करें,जब भारतेंदु और महाराज बलवंत सिंह के होते रास-रंग की यह महफ़िल गंगा की गोद में सजा करती थी..तब में और अब में जो सबसे बड़ा फर्क आया है,वो ये की तब गंगा थी,पर अब गंगा नही है.जो गंगा आज काशी के घाटों को छूकर गुजर रही है. तब इन घाटों पर चढ़कर लहराया करती थीं. क्योकि तब वह थी. अब तो वह बह नही रही है,गुजर रही है..बस गुजर रही है. डॉ शुकदेव सिंह की बात बड़ी प्रासंगिक है- "तब बनारस के सभी रईस,जिनमे भारतेंदु हरिश्चंद, शाह घराने के लोग, सुडिया राजघराने के पंडित शिव कुमार शास्त्री के पूर्वज, काशीपुरा के मालिक बाबू प्रभुनारायण सिंह के पुरनिया ,भद्दूमल कोठी वाले रईस , घुघ्ररानी गली वाले केडिया , सितारे हिन्द के परिवार वाले ओसवाल, भेलूपुरा के बच्चा बाबू के पूर्वज , शिवाला के जगन्नाथ दास रत्नाकर के घर वाले , राजा मोतीचंद , बाबू किशोरी रमण , दारागंज वाले अस्थाना कायस्थों के पूर्व पुरुष , गली-गली के मस्त मौले 'बदमाश दर्पण' वाले तेग अली ,बड़े रामदास , छोटे रामदास , जद्दन बाई दालमंडी वाली, हुस्ना बाई , छप्पनछुरी,सकलडीहा वाले नन्हकू सिंह - सभी रंगीन मिजाज वालों के बीच सारी रात गाते-बजाते, गुलाब की पंखुड़ियों से खेलते , इत्र-फुलेल, ठंढाई,कसेरू का शर्बत, भांग-बूटी का गोला-गोली, माज़ूम , बर्फी खाते हुए नाच गाना सुनते थे. कुछ ऐसे बुढ़वे भी होते थे जो आपस में जुड़े हुए बजडों को अलग-थलग करने के लिए गंगा में डुबकी लगाकर रस्सी काट देते थे. रईस एक तरफ,नाचने वाली दूसरी तरफ, तबलची तीसरी तरफ, सारंगी वाले चौथी तरफ घाट-घाट पर बहने लगते थे. इसी को रंग में भंग कहते थे.अब तो यह मुहावरा ही लोगों की समझ में नही आता कि रंग में भंग, भांग है या भेद- विभाजन. अब मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट पर केवल धुआं-धुआं हो रहा है.कैसे पढ़े जांय बुढवा मंगल के आसाद..! कैसे याद करूँ बनारस के वे दिन और ये दुर्दिन..!'' काशी का यह प्राचीन लक्खा उत्सव कब शुरू हुआ,यह शोध का विषय है.शायद गोस्वामी तुलसीदास के समय इसकी शुरुआत हो गयी थी.जेम्स प्रिन्सेप 1830 में 'बनारस इलस्ट्रेटेड' में बुढवा मंगल का चित्र और काशी-खंड का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार के दिन लोग दुर्गा जी का दर्शन करने जाते थे.. दुर्गाकुंड के पास मेला लगता था .. यहाँ भस्म रमाये , मोरपंखी बांधे बहुरूपिये घुमते दिखाई देते थे.. नृत्य होते थे और फ़कीर गाते थे.. शाम को यह मेला गंगा तट पर आ जाता था.. रात के नौ बजे काशी नरेश रामनगर किले से अपनी "सोनमुखी" पर बैठे , हुक्का पीते काशी के घाटों की तरफ आते थे, जहाँ 'हिंगुन' का गाना होता था.. राजा बलवंत सिंह और मीर रुस्तम अली एक ही झरोखे से इसका आनंद उठाते थे.. डॉ मोतीचंद और पंडित कुबेर नाथ शुक्ल के अनुसार बनारसियों ने 1730 में काशी के चकलेदार मीर रुस्तम अली को बिजया (भांग) छनाकर खांटी बनारसी बना दिया था.. तबसे वे सारे त्यौहार बड़े उत्साह से मनाते थे..'बनारस गजेटियर' लिखता है कि रजा बलवंत सिंह को ब्रह्महत्या लगी थी.. उसी के प्रायश्चितस्वरूप उन्होंने गंगा पूजा की और रात्रि में उत्सव किया, जो बाद में बुधवा मंगल बन गया.. महाराजा ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह ने इस उत्सव का रूप निखारा और ,मेले को चरमोत्कर्ष पर पंहुचा दिया.. उनके दरबार में भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसी प्रतिभाएं थीं.. महाराज के अनुसार मेले के संस्थापक्क भारतेंदु के दादा बाबू हरषचंद थे.. इतिहास बताता है कि भारतेंदु युग में मेला जमकर होता था लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के समय मेला शिथिल हो गया.. वैसे तो बनारस में गलियां अभी भी हैं और हैं तो मस्तमौले भी लेकिन वे सभी अब केवल गालियों में ही मडराते हैं..

हाँ तो जब हम अस्सी घाट से नाव से चले तो उस दिन बुढवामंगल की संध्या झुक रही थी.. अपनी छाती पर दो दर्जन से अधिक बजडों के बोझ से बेखबर गंगा अपने टूटते घाटों और सिकुड़ती धारा को हवा के थपेड़ों से सम्हालती आगे बढ़ रही थी.. गंगा के पेटे में एक उमस है, दर्द और दुर्गन्ध का एक भभूका हो जैसे.. पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग के अधिष्ठाता रामानंद तिवारी , उनकी धर्मपत्नी पुष्पा जी और बीएचयू के प्रोफ़ेसर राजा वशिस्ठ त्रिपाठी के साथ हम चले नाव लेकर सत्वर... तो सुमित्रानंदन पन्त याद आ गये और मन में उमड़ उठा उनका वह चित्र-काव्य- "सैकत शय्या पर दुग्ध धवल , तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल. लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल.." हाँ सही तो है.. लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल... पर न तो दुग्ध है, न ही उसकी धवलता.. बस एक गहन श्यामलता है, जो चारो और पसरी हुई है.. गंगा में हमारा नौका-विहार दमघोंटू उमस से भर जाता है... नाव को दिशा देता माझी जनरेटर चालू कर देता है और काले होते वातावरण में घुलता हुआ धुंआ नाव की गति को तेज कर देता है.. घाटों पर लगे बड़े-बड़े हैलोजन बल्बों की रौशनी गंगा की कालिमा को चीरती है.. दूर दशाश्वमेध घाट पर बजडों की महफिल दिखने लगी है.. हम मेले में पीछे से दाखिल हो रहे हैं.. सामने से आने में सुरक्षा का सरकारी घेरा रोकता है... बजडों पर जो हैं, वे इस आयोजन से जुड़े लोग ही हैं.. काशी का साधारण जन घाट पर ही है- दूर से ही मस्ती का आलम देखता हुआ.. मेजबान जिला कलेक्टर और आयुक्त महोदय की अगवानी हो रही है.. मुख्य मंच पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान के जमाई अली अब्बास खान की शहनाई गूँज रही है..हम मुख्य बजड़े पर आते हैं लेकिन ऊपर चढ़ने से हमें रोक दिया जाता है.. बुढवा मंगल की मस्ती का खुमार थोडा उतरता है.. हम बगल वाले बजड़े की ओर लपकते हैं.. उधर पुलिस वाले खड़े हैं.. डीएम साब आ रहे हैं.. मुख्य कार्यक्रम रोक दिया गया है.. कार्यक्रम संचालक की आवाज गूंजती है- हर हर महादेव.... पीछे से कमिश्नर साहब की नाव भी आ रही है.. शहनाई के स्वर रुक गये हैं.. घाटों पर जनता सकुचाई-सी तटस्थ मन से खडी है.. रईसों के बजड़े अलग हैं..- आजकल धन्नासेठों को ही रईस मान लेने का प्रचलन है.. जिनके निमन्त्रण पर हम आये थे, उन डीएम और कमिश्नर महोदय के बजडारोहण के तुरंत बाद मुख्य मंच पर सरगोशियाँ शुरू हो जाती हैं.. शहर के सम्मानित नागरिक और सुप्रसिद्ध कलाविज्ञ राजेश्वर आचार्य ने माइक सम्हाला हुआ है.. जब वे बोलते हैं तो लगता है जैसे साक्षात सरस्वती बोल रही हैं.. उम्मीद जगती है कि जलोत्सव के शबाब का समय शायद आ पहुंचा.. आचार्य राजेश्वर के स्वर हवा में तैरते हैं- "आयुक्त महोदय आज इस कार्यक्रम में संयुक्त होकर नियुक्त हुए हैं." संयुक्त होकर अर्थात सपत्नीक, यह अर्धनारीश्वर भगवान की भूमिका है.आचार्य उसी भाव में आतिथेय का परिचय दे रहे हैं.. संयुक्त आयुक्त को नियुक्त करते हुए आचार्य राजेश्वर की शब्दावली को काशीवासी थोडा असहज भाव से सुन रहे हैं.. आखिर ये सरकारी अधिकारियों की वही फ़ौज है, जो जिस जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए मान पाती है, उसी में खयानत के लिए अदालतों में फटकारी जाती है.. गंगा के बेटे माँ का दर्द कैसे सहें.. और कैसे सुने अपनी नदियों का आर्तनाद!वरुणा के पेटे में आज होटल खड़े हैं,असी नदी का पता ही नही है.रही गंगा,तो उसके लिए करोड़ों खर्च करके भी न हम उसे अविरल कर पाए,न निर्मल कर पाए.गंगा पर आज बुढवा मंगल का बोझ भी भारी है.प्लास्टिक कचरे के साथ-साथ फूल-मालाओं के रूप में हम अपनी श्रद्धा का कचरा भी गंगा को सौंपने आये हैं.मेहमानों का स्वागत करने की परम्परा मेजबानों के स्वागत में चरित्र बदल रही है.इस बार का सांस्कृतिक जलोत्सव सदियों पुराने व्याकरण को तोड़ रहा है.लेकिन रसिक-जन तो फगुआ और चैती के रस में डूबने आये हैं.इन उपालाम्भों से तैरकर बाहर आते लोगों को देर नही लगी.संगीत का नशा बनारस में आम और ख़ास दोनों के सिर सवार ही रहता है.फिर बुढवा मंगल तो मस्ती भरे माहौल का प्रतिनिधित्व करता है.इस सांगीतिक आयोजन ने साल दर साल अपने इतिहास के पन्नों में सुनहरा अध्याय जोड़ा है.अली अब्बास खान साहब ने परम्परागत शैली में चैती और होली की धुनें सुनायीं.उनके बाद आयीं रेवती साकलकर और उनके बाद जब अनुराधा पाल के मंच पर आने की घोषणा हुई तो बजडों और घाटों पर जमा रसिक-समाज सावधान हो गया.देश की एकमात्र महिला तबला-वादक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुकीं अनुराधा पाल ने राग शंकरा और दुर्गा में निबद्ध अनूठी जुगलबंदी पेश की.बनारस,पंजाब,दिल्ली और मेरठ घरानों की वादनशैली प्रस्तुत करते समय उनकी उँगलियों की चपलता देखकर काशीवासियों को पंडित किशन महाराज की याद हो आई.गत और उठान आदि परम्परागत शैलियों के साथ अनुराधा ने अन्त्याक्षरी भी पेश की.इसके बाद जब पंडित महादेव प्रसाद के राग मिश्र खमाज में रचित ठुमरी पर कुमुद दीवान ने तान लिया तो पुरनियों के मन में गिरजा देवी और सिद्धेश्वरी देवी की स्मृतियाँ ताजा हो गयीं.हर हर महादेव के जयघोष के साथ काशी के जन-समाज ने इन सुर-साधिकाओं का अभिनन्दन किया.
काशी में बुढवा मंगल के होने का जहाँ एक गौरवशाली इतिहास है,वहीँ उसके न होने का भी अपना इतिहास है.आज़ादी की लड़ाई के दौरान जब 1919 में जलियांवाला बाग़ में कत्लेआम हुआ,तो काशी उसके गम में डूब गयी.यह आयोजन कई साल स्थगित रहा..इसके पहले 1835 में बुढवा मंगल ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए प्रेरित किया.तत्कालीन काशी नरेश ईश्वरीनारायण सिंह के आमंत्रण पर चरखारी-नरेश रतन सिंह सहित बुंदेलखंड के कई राजा बुढवा मंगल में भाग लेने काशी आये थे.राजाओं में अंग्रेजों के अत्याचार की बात चली.यहाँ हुए फैसले के मुताबिक़ 1836 में बुंदेलखंड में चरखारी के सूपा नामक स्थान पर बुढवा मंगल आयोजित किया गया,जिसमे बुंदेलखंड की 42 रियासतों के राजाओं ने भाग लिया.उल्लेखनीय है कि स्वतन्त्रता का प्रथम राजनैतिक प्रस्ताव 1836 में आयोजित बुढवा मंगल के इसी अवसर पर पारित किया गया था.

Sunday, 9 February 2014

क्या दिन थे वे ...


हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी बेटी के लिए शादी खोजने वालों को तिलकहरू/देखहरू कहते हैं.मेरी स्मृतियाँ अभी वैसी ही ताज़ी हैं.साल 1989 बीत चला था.मै लगभग 20 बरस का हो रहा था और मेरे तिलकहरु आने लगे थे और "अभी बच्चा है" कहकर बाबूजी टालने लगे थे.ऐसे करते हुए बाबूजी तीन साल खींच लाये.. मै 23 का हुआ और लौटे हुए तिलकहरूओं की संख्या हुई 19.मेरे बाबा उस समय 85 पार कर रहे थे.बाबा बाबूजी पर चिल्लाते थे- "लइका के बूढ क के बियाह करबा...? तोहार मति ठीक काम न करत ह...अपने के टाटा बिड़ला बुज्झत हउआ..??"... "अरे अभी पढ़ रहा है पढने दीजिये" कहके बाबूजी किसी तरह बाबा को समझाते.दूसरी तरफ अम्मा थीं.बाबूजी का रोज कान भरती- "अब हमके पतोह चाही बस"......
तब हम चंदौली पॉलीटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा के दूसरे साल में थे और मुगलसराय में रहते थे.बाबूजी गोरखपुर में शाहपुर थाने पर सबइंस्पेक्टर पोस्ट थे.उन दिनों मोबाईल,फोन,कंप्यूटर कुछ न होने से चिठ्ठियों के ज़रिये बाते पहुचाई जाती थी.. दो चार महीने पर जब सब लोग गाँव पर इकठ्ठा होते तो बाबा लाठी लिए हुए घर से बाहर तक टहलते और चिल्लाते - ''असों बियाह होके रही''.ऐसे ही एक मौके पर पता चला कि 20वें तिलकहरू की आमद हो गयी है.बाबा बता रहे थे-''बड़ा मानिंद आदमी हउवन..जिला में उनकी मतिन पंडित ना मिली..सीताराम पांडे के इलाका जानेला.. हम जबान दे देले हईं.. बियाह क के मानब..आ जे बिच्चे में बोली ऊ ई गोजी देख लेव..'' बाबूजी खाना खा रहे थे और सर झुकाए सुन रहे थे.. तबतक माथे तक घूँघट डाले अम्मा प्रगट हुई - "जाईं आप आराम करीं..बियाह त असों होइबे करी" बाबूजी दबाव में आ चुके थे.. दोनों चाचा , चाची मूक समर्थक.. बाबूजी और बाबा जो भी फैसला ले लें , वो सबको मंजूर..इस तरह लगभग एक राय-सी बन गयी कि 20वें तिलकहरू को लौटाना नहीं है.यही 20 वीं आमद मेरी ज़िन्दगी में दाखिल हुई.पता चला कि लड़की के पिता फौजी है.मेरे छोटे भाई बहन सारे के सारे खुश कि भइया की शादी होगी और भाभी आएगी.अम्मा के पाँव धरती पर न पड़ें.एक अच्छा सा दिन तय करके बाबूजी ने मुझे बुलवा भेजा.हम गाँव पहुँचे तो पता चला कि आज तिलकहरू आने वाले हैं, क्या गहमा गहमी थी ! बाबा दो भाई और बाबूजी ३ भाई...सबका मिलाजुला संयुक्त परिवार छत्तीस लोगो का था.चारो बुआ, चारो फूफा..सब लोग इकठ्ठा थे.लड़की के पापा और बाबा लड़के को देखने आने वाले थे.पूरे गाँव में ही उस दिन एक अजीब-सी ख़ुशी का माहौल था.हमारी हालत बड़ी विचित्र थी..गाँव में जिधर भी निकलते ,जो भी मिलता, धीरे से मुस्कुरा के निकल लेता था.हमारी हालत बहुत पतली थी उन दिनों..पूरा गाँव ही तीन चार पीढ़ी पहले के पूर्वजो के परिवारों से बना था..हर कोई चाचा,बाबा,भैया,चाची,बुआ,अम्मा,आजी या भाभी - सबसे ऐसे ही रिश्ते थे.गाँव में बड़ों की संख्या ज्यादा थी.मुझसे छोटे कम ही लोग थे,सब तो बड़े ही थे..मै शरमाया-शरमाया सा कहीं भी जाता तो हर किसी को मुस्कुराता देखकर खुद मुस्कुराना भूल गया था.गाँवों में भाभी लोग भौजी होती हैं, वो लोग भी बड़ों की नज़र बचा के कुछ न कुछ मजा ले ही लेती थीं......
लड़की के पिता चूंकि फौजी थे.इसलिए शाम की बैठक में होने वाले दामाद की पेशी हुई..नाम,पढाई-लिखाई,काम-धाम,सोच-सपना,नौकरी-चाकरी...तरह-तरह के सवालों से मुकाबला था.मै बहुत असहज महसूस कर रहा था.खैर,सारे रिश्तेदारों के बीच बैठा घंटों अपनी घबराहट से झूझता रहा.अन्दर ही अन्दर उस पूरे माहौल से चिढ भी हो रही थी,लेकिन बाबूजी की सिखावन थी कि-''कोई चिढ भी हो तो चेहरे से ज़ाहिर नही होनी चाहिए.बुरी से बुरी मनोदशा में भी अच्छे से अच्छा व्यवहार किया जा सकता है,किया जाना चाहिए.आधा तो मै बाबूजी के डर से ही बैठा रहा,हालत सच में पतली थी.सामूहिक आदेश और बाबूजी के इशारे से मै अन्दर पंहुंचा तो अम्मा,चाची,बुआ सब की ख़ुशी का ठिकाना नही था...शादी तय.
सात फरवरी 1993 को वैलेंटाइन वीक के पहले दिन शादी की तिथि निश्चित हो गयी (लेकिन तब हमें वैलेंटाइन के बारे में कुछ भी पता नही था,ये भी नही की ये भी कुछ होता है ).मैंने किसी को कहते सुना की लड़की सआदतपुर के इंटर कालेज में पढ़ती है.मेरी अक्तूबर में परीक्षाएं होने वाली थी.मै इंस्टीट्यूट चला गया.बाबूजी गोरखपुर चले गये और सारे रिश्तेदार अपने घर.घर में सोलह साल बाद शादी का मौका आया था.पूरा गाँव ही करीब-करीब शादी की तैयारियां कर रहा था.मेरे मन के अन्दर चिडचिडाहट के बाद भी लड्डू तो फूट ही रहे थे.चिडचिडाहट ये कि अभी शादी का मन नही था मेरा.फिर भी शादी के चार महीने बाकी थे.सबका घर आना जाना बढ़ गया था.मैंने अम्मा से कई बार कहा कि लड़की मुझसे छः साल छोटी है.अभी मत करो शादी.बाबूजी से तो कहने की हिम्मत ही नही थी,भले ही बाबूजी कहते थे कि अपनी सारी बातें मुझसे कहा करो.अम्मा मेरी बात पर घूर कर देखती.कहतीं कि तुम लड़की की फोटो देखकर बताओ,लड़की कहाँ छोटी है तुमसे.कोई भी मेरी एक बात सुनने को तैयार नही था.......
एक दिन अपने इन्स्टीट्यूट में ही था कि खयाल आया,क्यों न लड़की से ही मिल लें.पता तो था कि सआदतपुर में पढ़ती है.मैंने दोस्तों से बात कह दी.निकेश ने मुझे चढ़ाया-''चल यार देख आते हैं''.झटपट बात फैली और हम तीन जने सआदतपुर चल दिए.बनारस से गाज़ीपुर,गाजीपुर से जंगीपुर,जंगीपुर से सआदतपुर.पूछते हुए हम स्कूल पर पंहुंच गये.घर में बताया किसी से नही था.पूरी सेटिंग चोरी से की थी,इसलिए आधा तो डरे हुए थे,आधा दोस्तों का साथ था और बाबूजी का कहा एक वाक्य कि शादी के लिए अपनी पसंद बता सकते हो,निर्णय नही ले सकते.आधे में इस एक बात का संबल था कि बाबूजी से पसंद-नापसंद बता सकता हूँ तो देखकर कह दूंगा कि लड़की मुझे पसंद नही है.स्कूल के सामने जब हम लोग जीप से उतरे तो पहले ठेले पर जा कर जलेबी खायी.हिम्मत जुटा रहे थे कि स्कूल में किसी से लड़की के बारे में कैसे पूछेंगे.शर्म भी आएगी और पिटाई भी हो सकती है.पूरा इलाका गाँवों से भरा हुआ है.शहर 15 किलोमीटर दूर है.ग्रामीण रहन-सहन तब ऐसा था कि सड़कों पर लोग कम ही दिखाई देते थे,चट्टियों और बाजारों में लोग काम-धाम से खाली होकर ही जुटते थे.बाकी समय नई-नई बनी उस संपर्क-सड़क पर कभी-कभी हल बैल लिए हलवाहे किसान आ जा रहे होते.चारों ओर सूना-सूना ही था.स्कूल के गेट पर इधर-उधर तीन चार दुकानें थी.एक साइकिल का पंचर बनाता था,दूसरी चाय की दूकान थी,तीसरी पान की,जिसमे सिगरेट,बीडी,बिस्कुट आदि भी था.इसी तीसरी दूकान पर पंहुंच कर हम लोगों ने पांच रु.में दालमोठ का एक पैकेट खरीदा और तीनों खाने लगे.अगल-बगल देखसुन कर दूकानदार से बातचीत भी करने लगे.यह दुकानदार मुझे बड़ा मुफीद जरिया लगा.चूँकि मेरा गाँव वहा से पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर ही था,इसलिए बोली समान थी.निकेश मुंगेर-पटना से था लेकिन ज़्यादातर शहरों में रहने के कारण उसे भोजपुरी लगभग नही आती थी.मैंने ही दुकानदार से बातचीत शुरू की.पता चला उसका नाम कन्हैया था.उसको मिलाकर हमलोगों ने अपनी पोलपट्टी उसको बता दी.वह तैयार भी हो गया.बोला-''भईया,हम किसी से सनेसा भेज के लड़की को बाहर बुलवा देंगे.आप लोग दूर से देख लेना..''मै बोला -''यार बात करा दो थोडा किसी बहाने..वह तैयार हो गया और बोला -''भईया हम सनेसा भिजवा देंगे कि आपके कोई रिश्तेदार आये है.वो बाहर आएगी तो आप लोग बात कर लेना लेकिन हमारा नाम नही खुलना चाहिए..''. हम लोग तैयार हो गये.वह बोला एक घंटा टहल के आइये आप लोग तब तक हम जोह भेजवाते हैं.मुझे 1985 में हाईस्कूल फर्स्टक्लास पास करने पर बाबूजी ने एच एचएमटी कोहिनूर घडी दी थी.मैंने टाइम देखा- दो बज रहे थे.कम से कम बनारस तो लौटना ही था..bhu में निकेश के साथ रुक के चंदौली अगले दिन भी जा सकते है,यही सब सोच के हम लोग सड़क पर टहलने लगे.तीन शहरी टाइप लड़कों का उधर गावों में दिखना तब एक दृश्य होता था.वहां दुकानों पर हम लोगो के बारे में चर्चा होने लगी थी.घंटे भर बाद कन्हैया के पास पहुँचे तो वह हकला कर बोला-''भैया हम नही बुला पायेंगे.आपलोग भी जाइये न तो पिटा जाइएगा.सब लोग जान गये हैं.फौजी की बेटी है,उसके गाँव के और लड़के लड़कियां भी यहाँ पढ़ते हैं.अभी खबर फैलेगी.आप लोग पक्का पिटा जाइएगा.हमारी हिम्मत टूटने लगी थी लेकिन एक बात मुझे टिकाये हुए थी कि हम उनके होने वाले दामाद हैं यार,पिटेंगे थोड़ी न.निकेश बोला-''चल आगे तक टहल के आते हैं..''
हम लोग सडक पर सीधे टहलते हुए आगे बढ़ने लगे.अचानक स्कूल की एक लड़की बाहर आई.मैंने हिम्मत जुटाकर उससे नाम पूछा और कहा-''बहन जी,किरन से मिलवा दोगी...?''वो मारे ख़ुशी के उछलकर बोली-अभी मिलवाती हूँ.उसने अन्दर जाकर कहा होगा.लड़कियों में बात फ़ैल गयी.कुछ लड़कों में भी हलचल होती देखकर हमलोग घबराकर आगे बढ़ गये और दूर निकल आये करीब १ किलो मीटर.लेकिन वहां से भी बिलकुल सीध में स्कूल साफ़ साफ़ दिख रहा था.वहां एक खलबली-सी मची थी कि तीन लड़के बैग टाँगे सड़क पर घूम रहे हैं और किसी लड़की को देखने आये हैं.वहां सड़क के किनारे कडाहे में गुड खौलाया जा रहा था.तीन,चार लोग थे.हम लोग उन लोगों से बतियाने लगे.महिया तैयार थी.उन लोगों ने कहा-''आप लोग तो शहर से आये हो,महिया खाओ.भूख तो लगी ही थी.हम तीनों माहिया खाने लगे और कनखियों से स्कूल की ओर भी देखते रहते कि उधर क्या हो रहा है.माहिया खाते हुए ही नज़र आया कि स्कूल के बाहर लाल कपड़ों में एक लड़की हमारी तरफ चली आती है.मै झट से पानी पीने लगा और एकटक उधर ही देखने लगा.उस समय गावों की सड़कों पर वाहन भी यदा-कदा ही नज़र आते थे.दूर तक साफ़ दिख रहा था,फिर भी एक किलोमीटर की दूरी का अपना महत्व होता है.इतनी दूर से दिख रहा लड़कीनुमा वह बड़ा सा धब्बा जब साफ़-साफ़ लड़की जैसा दिखने लगा तो पता नही कैसे,पर मै जान गया कि वह किरन ही आ रही है.हम तीनों भी स्कूल की तरफ बढ़ने लगे.धीरे-धीरे लड़की बड़ी होती गयी-हाथ में किताबों की फाइल दबाये हुए,लाल शलवार सूट पहने सत्रह साल की बारहवीं की छात्रा किरन के जब हम करीब पंहुंचे तो मेरे दोस्त आगे बढ़ लिए.अब उस सुनसान सड़क पर आम के पेड़ के नीचे मै खड़ा था और मुझसे 3,4 फीट की दूरी पर सहमी-ठिठकी एक लड़की खड़ी थी.चारों ओर स्कूल के अलावा और कहीं कोई दिखाई न दे.नीचे की ओर देखती हुई,पैर का अंगूठा अप-डाउन करती,फ़ाइल संभालती हुई किरन बेहद खबराई हुई थी.मेरा भी कलेजा मुंह को आने लगा था.हमें मालूम था कि कभी भी, कोई भी उधर आ सकता है.मैंने हिम्मत जुटाई और पूछा -''तुम किरन हो न...?''वह गुस्से में बोली -''कोई और नही था क्या परिवार में देखने वाला..?आपको ही आना था...?बेइज्जती करा दिया आपने.अब देख लिया न,अब यहीं बता के जाइए कि मै पसंद आई या नही ..?''.....अब रोमांटिक तो पता नही,लेकिन एक साथ इतने सारे सवाल सुन के मेरे होश तो फाख्ता हो गये.मै किसी तरह बोला -''देखो किरन हम चोरी से आयें हैं छुट्टी लेकर और तुमको देखने नही आये हैं.खुद को दिखाने आये हैं कि तुम मुझे देख लो और नापसंद कर दो,वैसे भी मै तुमसे 6 साल बड़ा हूँ.''वो चुप रही.मैंने फिर कहा कि-'' देखो हमको अभी बनारस लौटना है,तुम घर जा कर सबको बता देना कि वो लड़का मुझे देखने आया था और बहुत खराब है.मै उससे शादी नही करूंगी''..वह चुप खड़ी अंगूठा हिलाती रही.फिर हम हाथ जोड़ कर चलने को हुए तो वह भी आगे बढ़ गयी.मुझे पीछे से उसकी आवाज़ सुनाई पड़ी-''एक फोटो भिजवा दीजियेगा..''मैंने सामने देखा तो स्कूल की छुट्टी हो गयी थी और लड़के-लड़कियों का झुण्ड बाहर सड़क पर आ चुका था.लगभग उसी समय सड़क से गुजरी एक बस में बैठे किरन के चाचा-चाची ने हमें देख लिया था.स्कूल में सब यह जान चुके थे कि एक लड़की को देखने एक लड़का आया है.सड़क छोड़कर किरन अपने गाँव की पगडंडी पर उतर गयी और मै दोस्तों के साथ स्कूल से लौटते,शोर मचाते लड़कों के बीच से निकलकर इस पार आ गया.थोडा आगे लड़कियों की टोली थी.आस-पास छितराई हुई लड़कियां हमें ही देख रही थी.हम तीनों नज़र झुकाए निकल आये.स्कूल पर पहुंचे तो कन्हैया अपनी दुकान बंद करके जा चुका था.हम लोग जल्दी-जल्दी गाजीपुर पहुंचे,गाजीपुर से बनारस,देर रात bhu हॉस्टल पहुंचे तो किसी ने बताया कि आपके पिताजी आये थे.घिघ्घी बंध गयी कि अब क्या जवाब देंगे.लेकिन कोई जरिया नही था बाबूजी से बात करने का.ऑफिस से बाबूजी की चिट्ठी मिली ''तुरंत गोरखपुर आ जाओ''..मै तुरंत गोरखपुर के लिए चल पड़ा........
5 दिसंबर 1992 को लड़की देखने गया था मै.7 फरवरी 1993 को मेरी शादी थी.7 दिसंबर को गोरखपुर पहुंचा तो बाबूजी क्वार्टर पर ही मिले.राधा स्वामी सत्संग-भवन के पास सिर्कुलेटिंग एरिया बिछिया में बाबूजी रहते थे..बाबूजी अनुशासन के बेहद सख्त थे.पूरे पुलिसिया अनुशासन में ही सबको रखना चाहते थे और खुद अनुशासन के हम सबसे ज्यादा पाबन्द थे.जाड़ा,गर्मी,बरसात कोई भी मौसम हो,भोर में 4 बजे उनके सिर पर पानी पड़ ही जाता था.एक घंटा वो चुपचाप पद्मासन योग में बैठा करते थे,फिर एक घंटा भजन सुनते.हम हर पोस्टिंग पर उनके साथ रहते थे.वो तो पोलिटेक्निक में मेरे चयन और उनके गोरखपुर ट्रान्सफर के कारण हमें अलग-अलग रहना पड़ा.मुझे बाबूजी का पूरा अनुशासन मालूम था.जब भजन शुरू होती तब वे हम तीनों भाई-बहन को जगा देते और हम लोग उठ कर पहले भजन गाते फिर दोनों भाई-अम्मा,बाबूजी और गुडिया का पैर छूते.गुडिया मुझसे 6 साल छोटी है,छोटे भाई से भी 4 साल छोटी है.लेकिन बाबूजी कहते कि तुम दोनों गुडिया का पैर छूकर उसे रोज़ प्रणाम किया करो,क्योंकि लडकियां देवी होती हैं.उसके बाद बाबूजी वर्दी चढाते और थाने पर चले जाते थे ,अम्मा चूल्हे-चौके में लपटती और हमलोग स्कूल कि तैयारी में,लेकिन बाबूजी मेरे प्रति मोह से ज्यादा ग्रस्त रहते थे.मेरे ही जन्मदिन पर तीनों भाई बहन का जन्मदिन एक साथ मनता.गुडिया उनकी cid ऑफिसर थी,वो दिन भर हम लोगों के साथ मिली भी रहती थी,बड़ी मासूमियत से खेलती भी रहती और शाम को चोरी छुपे बाबूजी को दिनभर की रिपोर्ट भी करती..'भैया ने बच्चा को आज बिना गलती के मारा,(छोटे भाई को वह आज भी बच्चा ही कहती है ),बच्चा ने भैया का कहना नही माना,आज भैया सड़क पर साइकिल चला रहे थे,और बच्चा ने पप्पू से पिल्लों के लिए लड़ाई की,हम और बच्चा दिनभर में 5 घंटा पढ़े लेकिन भैया केवल दो घंटे ही पढ़े.भैया एक दिन और सड़क पर साइकिल चला रहे थे,मै आपको बताना भूल गयी थी.इस तरह की पूरी रिपोर्टिंग करके वो फिर हम लोगों के साथ वैसे ही मिल जाती.सवेरे बाबूजी क्लास लगाते,बाबूजी के मुंह से हमारे एक-एक राज़ खुलते,और हम दोनों भाई भौचक्के रह जाते.सोचते कि इनको पता कैसे चल जाता है.ज़रूर बाबूजी एक्स्ट्रा पॉवर का नाम है.वे कहते थे कि मै अपनी तीसरी आँख यहीं पेड़ पर टांगकर जाता हूँ.जब वापस आता हूँ तो वह मुझे सारी बात बता देती है.अगले दिन हमलोग पेड़ पर खूब ढेले मारते कि बाबूजी की आँख आज गिरा देंगे..वो तो हमें बहुत बाद में पता चला कि ये सब गुडिया करती थी.नालायक रोज़ पैर भी छुआती थी,पिटवाने का इंतजाम भी किये रहती थी और अपने देवी भी बनी रहती थी,बाबूजी की तो खैर सबसे प्यारी,लाडली बेटी थी ही....
इसी तरह की सिखावन,अनुशासन और देहाती माँ तथा पुलिसिया बाप की परवरिश में पले थे हम.बाबूजी के सामने एक भय होता था,एक एक्सरे मशीन होती थी,एक अनुशासन का दायरा होता था,जिसके प्रभाव में हम 24 घंटा रहते थे.बाबूजी हमें ठीक से सोने का तरीका और आसन भी समझाते थे.बायीं करवट,शरीर सीधा,थोडा धन्वाकार,बायाँ हाथ तकिये और सिर के बीच,दायाँ हाथ जाँघों पर,ये सोने का उनका सर्वोत्तम आसन था.खैर,मै बाबूजी के सामने पंहुंचा तो उनसे पहले उनके सवालों से सामना हुआ.उनकी नज़रें जैसे-जैसे ऊपर उठीं,मेरी वैसे-वैसे नीचे झुकीं-----------
''परसों कहाँ थे तुम..?''
''लड़की देखने गया था''-सीधे सवाल का सीधा ही जवाब देना ठीक था.
''लड़की देखने....?क्यों..?कौन लड़की....?''
''हम किरन को देखने उसके स्कूल गये थे.''
''स्कूल गये थे...?क्यों...?''
''अम्मा ने कहा था.''
''अच्छा....''-बाबूजी का चेहरा तमतमाने लगा था.
''तो तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गयी है..?हेमामालिनी से बात चलाऊं क्या...?ठीक रहेगी...?''
आज मेरे पैर का अंगूठा अपने-आप अप-डाउन हो रहा था.मै हिम्मत जुटाकर किसी तरह बोल पाया-''बाबूजी,लड़की हमसे छः साल छोटी है,और मै उसे पसंद भी नही.''
''तो,मना कर दूं..?''
मै चुप....किसी तरह खड़ा था बस.
.......और बाबूजी ने गुस्से में संदेसा भिजवा दिया-''शादी नही होगी''
यहाँ से वहाँ तक धरती हिल गयी.उधर तो हलचल मची ही हुई थी कि लड़का लड़की देखने खुद आया था.अगले हफ्ते गाँव पर फिर जुटान हुई.किरन के पिताजी घर आये.बाबूजी मुझे लेकर गाँव पहुंचे.मै सीधे घर में अम्मा के पास भागा.अम्मा बोली-''क्यों झूठ बोल रहे हो कि लड़की ने तुम्हे नापसंद कर दिया...?''मै बड़ी मासूमियत से बोला-''अम्मा,उसी ने कहा था मुझसे.'' अम्मा ने धमाका किया-''तो उसने अपने बाल क्यों काट लिए...??''मै भौचक्क-''बाल काट लिए..?क्यों...?अरे बाप रे,बिन बाल के कैसी रहेगी..?अम्मा ने पूरी बात बतायी.किरन के घर पूरा तूफ़ान आया हुआ था.उसके चाचा-चाची ने हमें देखा था सड़क पर,लड़का अपने दोस्तों के साथ लड़की देखने आया था,ज़रूर आवारा होगा.किरन कि दादी ने ताना मारा था--''-बेंट भर का लड़का,इतना इतराता है,बिना किसी को बताये देखने चला आया...?आगे क्या करेगा''.किरन चुप-चाप सब सुन रही थी.सब ठीक था लेकिन लड़का आवारा है,ये बात उसे अच्छी नही लग रही थी,लेकिन एक तो लड़की जात,वो भी गाँव की,चुप होकर सब सुन रही थी.भुनभुनाते हुए दादी किरन से बोली--''नही करनी ऐसे लड़के से शादी..जितनी उसकी लम्बाई है,उससे लम्बे तो मेरी बच्ची के बाल हैं.''बस यही बात ग्राम-बाला को चुभ गयी.किरन ने घर में जाकर कैंची उठायी और अपने बाल लगभग एक फुट काट डाले..इस सत्याग्रह का मौन सन्देश पाकर घर वाले घबरा उठे.बाल क्यों काटे..??कोई समझ नही पा रहा था.दादी को अपनी बात याद थी.इसलिए वो हवा का रुख समझ रही थी.उन्होंने बेटे से कहा-''उनकी घरे जा भईया,बियाह उहवें होई''
अम्मा से पूरी बात सुनकर मै स्तब्ध था.अम्मा बोली--''बाबू,अब हम शादी से मना नही कर सकते..तुम लड़की देख आये हो,अब वो हमारी है.किसी लड़की को अपने बाल बहुत प्यारे होते हैं उसने अपनी दादी के ताने के जवाब में अपने बाल छोटे करके मौन सत्याग्रह संघर्ष छेड़ दिया है..वो तुमसे ही शादी करेगी.''मुझे काटो तो खून नही-''वो तो मुझे डांट रही थी अम्मा ...?''बाहर बाबूजी बोल रहे थे-लड़के ने लड़की देख ली है..आपकी बेटी हमारी बेटी...शादी होगी...ज़रूर होगी..''
मेरी योजना फेल हो चुकी थी.मै किरन के कटे बालों का शिकार हो चुका था.मेरे पास शब्द नही थे.अम्मा कह रही थी शादी-ब्याह भगवान् के घर में तय होता है.27 जनवरी को तिलक और 7 फरवरी को शादी हो गयी.एक वो दिन था एक आज का दिन है 21 साल सचमुच हरहराते हुए कब गुज़र गये,पता ही नही चला.इस बीच बाबूजी चले गये.किरन के कटे हुए बालों ने रस्सी बनकर मुझे बाँध लिया,उज्ज्वल आया,श्रेया आई और हर्षित भी आया.किरन के बाल फिर कभी उतने लम्बे नही हुए. वह आज भी कहती है कि बाल काट कर मैंने ठीक नही किया.कवियों और लेखकों से कभी शादी नही करनी चाहिए.24 घंटा कागज़ बीनते ही बीतता है.इतने बड़े संयुक्त परिवार में 16 साल बाद आई बहू ने अपने समर्पण से अपने लिए अनंत यश बटोरा.बाबूजी जीवनभर मुग्ध रहे.अपने ही गाँव जवार में कई बार मै किरन के काम से पहचाना जाता हूँ.आस-पास के गांवों में बड़ी बूढियों को कहते सुना है--''ऊ दरोगा जी के बडकी पतोहिया इनहीं क मेहरारू हईं न...?''किरन की इस व्याप्ति के पीछे उसकी गजब की कर्त्यव्यपरायणता है.मेरी शादी के बाद जब सालभर बाद छोटी चाची अचानक चल बसी तो उनके 4 बच्चे अम्मा की ज़िम्मेदारी बन गये.मुझे याद है,मैंने किरन से कहा था-अपने बच्चे पर थोडा कम ध्यान देना,मुझे बुरा नही लगेगा.अगर तुम्हारा उज्ज्वल और चाची का किशन कहीं एक साथ खड़े हों,तो किशन को गोद में उठा लेना.उसने इसका शब्दशः निर्वाह किया.चाची का छोटा बच्चा तब 4 माह का था,अब 20 साल का है.उज्ज्वल 19 साल का है.
हम तुम्हार्रे ऋणी हैं किरन.36 जनों का मेरा संयुक्त परिवार आज 44-45 की संख्या पार कर रहा है और अभी भी सब एक साथ है,तो उसमे किरन की लम्बी भूमिका है.......!

Tuesday, 5 November 2013

एक शाम वरूणा को लजाते देखा!


मेरे गांव से चलने वाली बस तब 9 रूपये के किराये में बनारस पहुंचा देती थी, जहां से आने में अब 80 रूपये लगते हैं। यह 1984 की बात है। कम्प्यूटर नाम की किसी नयी मशीन का दुनिया में तब बहुत शोर मचा हुआ था, जो लाखों और करोड़ों के जोड़-घटाने पलक झपकते कर देती थी। दुनिया विकास के नये-नये मानदण्ड स्थापित कर रही थी। हमारा देश भी विकसित होने लगा था। अपने गांव के देहाती वातावरण से निकलकर जब हम बनारस पहुंचते थे, तो शहर का चमत्कार और विकास की रफ्तार देखकर चमत्कृत रह जाते थे। बनारस में महमूरगंज नाम की कोई जगह है, ये देहात से आने वाला हर व्यक्ति जानता था, क्योंकि वह रेडियो सुनता था और बनारस का रेडियो स्टेशन महमूरगंज में था। सारनाथ में रेडियो का टॉवर है, यह जान लेने के बाद हम ट्रेन या बस में से ही उसे देख लिया करते थे। बड़े-बड़े, पक्के-पक्के मकान, चारों ओर सड़कें, टैम्पो, रिक्शे... सब अजीब लगता था। पाण्डेयपुर, कचहरी से होते हुए जब हमारी बस वरुणा के पुराने पुल पर पहुंचती थी, तो कोर्स में पढ़ी हुई जयशंकर प्रसाद की कविता-अरी! वरुणा की शान्त कछार, तपस्वी के विराग की प्यार... सहज ही कानों में गूंजने लगती थी। मन वरुणा जल की कल-कल सुनकर शहर में घुसते ही हरिया उठता था। मुख्य शहर शुरू होने से पहले, इसी पुल पर हमें हमारे देहात का अंतिम वातावरण मिलता था। नीचे वरुणा की किल्लोलें... कल-कल, छल-छल... और दूर-दूर तक दिखते हरी नदी के हरे पाट। स्वच्छता और हरियाली की चादर-सी बिछी दिखती थी। मेरा गांव मुझे इसी जगह छोड़कर वापस चला जाता था। इतने में बस आगे बढ़ जाती और शहर-शहर होते हुए हम गंगा के किनारे राजघाट पहुंच जाते थे। तब हमारे मन में गांव और नदी दोनों साथ-साथ रहते थे। फिर धीरे-धीरे हम भी विकसित होने लगे। गंगा, वरुणा, प्रसाद, कविता... सब विकास का शिकार हो गये।
कल काफी समय बाद मैं अपने मित्र और वरिष्ठ हिन्दी कवि केशव शरण के साथ वरुणा के उसी पुराने पुल पर खड़ा था। दोनों पुलों के बीच वरुणा के किनारे शास्त्री घाट का सरकार ने कायाकल्प कर दिया है। सुंदर सीढ़ियां ऊंची होती हुई दूर सड़क तक दिखायी देती हैं। एक मंच भी बना है 'ओपेन एयर थियेटर' जैसा। केशव शरण बता रहे थे कि यहां हर साल एक या दो बार कोई बड़ा कार्यक्रम होता है और काफी भीड़ जुटती है। लेकिन यह भीड़ अपनी संस्कृति का केचुल घाट पर ही छोड़कर वापस चली जाती है। हम दो घंटे से ज्यादा समय तक वहीं खड़े रहे। वरुणा काशी की निजी धरोहर है, भौगोलिक रूप से ही नहीं, सांस्कृतिक और पौराणिक रूप से भी। प्रसाद जी की कविता अचानक मन में सिर उठाने लगी। विराग के प्यार की ध्वनि और शांत कछार की बदबू एक साथ मन से टकराये। विषैले हो चुके पानी को अपने गर्भ में समेटे वरुणा के पेट से दुर्गंध आ रही थी। काशी ने अपने मिजाज के हिसाब से कई सारी निजी संस्कृतियां भी विकसित की हैं, बहुत कुछ उसे प्रकृति से भी मिला है। न जाने कितनी संस्कृतियों की गवाह दक्षिणवाहिनी गंगा जब बनारस पहुंचती है तो उत्तरवाहिनी हो जाती है और काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक छटा में एक हार की तरह टंग जाती है। लेकिन वरुणा तो काशी की अपनी नदी है, क्योंकि इसका उदय-अस्त दोनों काशी और प्रयाग के बीच ही है। यह सत्य बड़ा भयानक है कि तिल-तिल कर मरती वरुणा बहुत कष्ट में है। वह अपनी झुर्रियायी हथेलियों से अपने माथे पर भिनभिनाती हुई मक्खियों को हटाती है तो दुर्गंध का एक भभूका-सा उठता है। वरुणा दर्द में है, उसके घाव रिस रहे हैं। लेकिन काशी अपनी ही रौ में विकास के रास्ते पर बेतहाशा दौड़ रही है। वरुणा और अस्सी के बीच बसी काशी अपने तटबंध तोड़कर अनियंत्रित फैल रही है। सड़कों पर विकास का सैलाब आया है, लेकिन गंगा और वरुणा की धारा में अब सैलाब नहीं आता। लोग भ्रम में हैं कि नदी कल-कल कर रही है, वह तो त्राहि-त्राहि कर रही है। लोग भ्रम में हैं कि नदी बह रही है, वह तो ठहरी हुई है। लोग भ्रम में हैं कि काशी में गंगा भी है, वरुणा भी है, यह तो नदी की देह भर बची है, जो अब शव होने ही वाली है।
समाज की संस्कृति समाज के लोगों से ही बनती है-गरीब हो या अमीर, छोटा हो या बड़ा, खुद समाज हो या सरकार। समाज के विकास के लिए सरकार ने जो दिशा पकड़ी, उसने समाज को अमीर और गरीब में बांट कर रख दिया। धीरे-धीरे गरीब आदमी आम आदमी में और अमीर आदमी पूंजीपति में बदल गया। पूंजीपति कारखाने चलाता है, मुनाफा कमाता है और अपने कारखानों का कचरा नदी में फेंकता है। पूंजपति आम आदमी का शोषण करता है। वह नदी का भी शोषण करता है। पूंजीपति नदियों के पेटे में होटल भी चलाता है और इस तरह नदी की जमीन पर कब्जा करता है। आम आदमी नदी के पेटे में हल चलाता है और नदी के साथ ही जीता-मरता है। नदी की भी अपनी जमीन होती है। मूल धारा से पांच सौ मीटर की दूरी तक दोनों तरफ की जमीन नदी की होती है। यह जमीन नदी को समाज या सरकार नहीं, प्रकृति देती है। लेकिन वरुणा की अपनी कोई जमीन नहीं है। काशी में तो इतनी जमीन गंगा को भी नसीब नहीं है, वरुणा को तो इसकी आधी भी नहीं। यह संस्कृति के विकास की कहानी है। यह काशी की विकासशील नयी संस्कृति है।
हम देख रहे थे वरुणा का पैâलाव, उसके शहरी हो चुके झुकाव, उसका विस्तार और दोनों पाटों पर सिकुड़ती हुई उसकी सीमाएं। वरुणा के घावों को छूने की हमारी कोशिश, उस पार पड़े वूâड़े के ढेर और वरुणा-जल को मल बनाते पॉलीथीनों के पहाड़ में बिला जाती है। वरुणा की स्वच्छता में कभी हरियाली समाहित थी, तब वरुणा हंसती थी, इठलाती थी और गंगा से मिलने के लिए दौड़ती हुई जाती थी। आज वह अपने दु:ख पर रोये भी तो आंसू बहाने को पानी नहीं है उसके पास। इस घाट से संगम के बीच वरुणा रेंगते हुए चलती है। उसके किनारों पर विकास की दहाड़ गूंजती है। बीच में आते हैं किला कोहना के जंगल। राजघाट की इन जंगली वादियों तक आते-आते कारखानों के रसायनों से मिलकर वरुणा झाग-झाग हो उठती है। अपना बचा-खुचा न और संवरा चुके पानी की एक क्षीण-सी नाली, गंगा को सौंप कर वरुणा अपना मुंह जंगलों की ओर फेरकर लजाती है। नाली बन चुकी वरुणा, नाला बन चुकी गंगा को भींचकर जब रोती है, तो संगम की चटखदार दुपहरिया भी काली हो जाती है। वरुणा के घाट पर खड़ा मैं संगम तक की इस यात्रा में वरुणा के दर्द को महसूस करना चाहता हूं। आज काशी अपनी नदियों का पानी नहीं पी सकती। उधर गंगा लजाती है, इधर वरुणा लजाती है। अपनी नदी की मौत पर काशी को रूदन ठानना चाहिए, पर लगता है गंगा और वरुणा के साथ-साथ काशी की आंखों का पानी भी मर चुका है। अब जाना कि विकास के लिए नदी और पहाड़ की नहीं, अंधी दौड़ की जरूरत होती है। हम और केशव शरण शास्त्री घाट की मनोरम सीढ़ियां फलांग आये और इस दौड़ में शामिल हो लिये।