बनारस के घाटों की ओर कैमरे का मुह करके मीडिया चैनल दुनिया को बनारस की घाट-संस्कृति की महत्ता बता रहे हैं.कुछ कैमरे मंदिरों की ओर,कुछ गलियों की ओर और कुछ का रुख बाज़ारों की ओर है.ये चैनल संसार को वही बनारस दिखा रहे हैं,जिसे सब पहले से जानते हैं---शोरूम-बनारस---.बनारस में छोटे-बड़े मंदिरों की संख्या 1,50,000 के आस-पास है.गलियों में,सीढ़ियों पर,दीवारों पर,चबूतरों पर,रेती पर,छज्जों पर,घरों में,घोसलों में...,पेड़ों में,तालाबों में,कहाँ नही है मंदिर.....!इन सभी में घंटा-घड़ियाल बजते ही रहते है,शंखनाद होता ही रहता है,और धार्मिक,सांस्कृतिक गतिविधियाँ चलती ही रहती हैं.इनमे से लगभग आधे मंदिरों को चलाने,संभालने वाले समूहों,समितियों में जैनों,बौद्धों,मुसलमानों,सिक्खो ं और ईसाईयों के नाम भी शामिल हैं.साल भर चलने वाली काशी की रामलीला के अनेक पात्र अनेक जिलों,अनेक प्रदेशों और अनेक धर्मो से होते हैं.बनारस की गलियां अपनी बनावट में ईंट-पत्थर की ही हैं,लेकिन अपने चरित्र में रबड़ जैसी होती हैं.तीन फुट चौड़ी गली में एक मिनट के अन्दर 5 सांड,10 मोटरसाइकिलें,50 साइकिलें और 500 आदमी एक साथ बड़े आराम से एक दुसरे को क्रॉस कर सकते हैं.गली फैलती हो जैसे....!लेकिन मजाल क्या कि कोई सांड किसी की ओर ताके भी.एकदम गऊ जैसे......विश्वनाथ गली में रामदाना,अक्षत,आदि की बोरियां लादे ट्रालियां भी इस भीड़ के बीच से उतने ही आराम से गुज़र जाती हैं.सांड की निगाह केवल इन्ही बोरियों पर होती है.फूल,माला,रोली,चन्दन आदि की बोरियों की ओर सांड देखता भी नही.लेकिन चावल और रामदाने की बोरी गुजरी नही कि अचामक नन्दी की सींघ बोरी के अन्दर.क्रॉस करते-करते भी दो चार किलो प्रसाद नीचे.नन्दी का काम हो गया.....!बनारस में बाज़ारों की शाम प्रायः सालभर गुलज़ार ही रहती है.इस रौनक में विशुद्ध सांस्कृतिक हलचलें भी शामिल हैं.प्रसिद्द अडियों के अलावा यहाँ मर रही अडियाँ भी हैं,जहाँ कभी बनारस की साहित्यिक रवायतों की नीव डाली जाती थी.भारतेंदु से लेकर प्रेमचंद तक ने जो नीव रखी,उसे काशीनाथ सिंह तक सम्मृद्ध रखने वाले साहित्यकारों की उम्र बढ़ने,सक्रियता घटने और उदासीनता के कारण ऐसी कई अडियाँ अब सुनसान हैं और अपनी विरासत को याद कर रही हैं.प्रेमचंद कम से कम महीने में एक बार लमही से पैदल प्रसाद जी के घर उनसे मिलने आया करते थे.बीस किलोमीटर के इस रास्ते में चार अडियाँ थीं,क्या गुल खिलते रहे होंगे जब कामायनी का कवि और गोदान का सर्जक दोनों एक साथ बैठते होंगे.उच्चतम साहित्यिक मूल्यों की ये बनारसी सांस्कृतिक विरासत किसी चैनल का आकर्षण नही है..गलियों की जीवन-संस्कृति उनका विषय नही है.32 लाख से ऊपर की आबादी जिन गाँवों में बसी हुई है,जिन छोटी बड़ी नदियों से घिरी हुई है,जिन काम-धंधों में लगी हुई है,इन बातों से इन चैनलों को कोई मतलब नही है.इनके लिए बनारस में दिखाने को आठ-दस बड़े मंदिर हैं,बनारस की साडी है,बुनकर है,बीएचयू है और गंगा है..इन्होने अगर पढ़ा होता कि बनारस आधा जल में है,आधा थल में है,आधा मन्त्र में है,आधा शव में है और आधा तो अकेले धूमिल के गाँव में है,तो वे वोट का रुझान जानने इन जगहों पर होते.मेरे मित्र केशव शरण का एक हाइकू बनारस के साहित्यिक गलियारों में खूब चलता है,क्योंकि यह बनारस का चित्र और चरित्र दोनों बनाता है.....कहीं भी रहो......अजान की आवाज.....सुनाई देगी....इसी को कहते हैं गंगा-जमुनी संस्कृति.आजकल यह सवाल सोशल मीडिया पर छाया हुआ है.आदमी की ज़िन्दगी का हर पहलू जैसे कि बाज़ार में ही आ खड़ा हुआ है.इस बाज़ार में,बाजारू संस्कृति के चुनाव-प्रचार के नमूने भी हैं.शहर में पानी की सभी बड़ी टंकियों के ऊपर बीजेपी के झंडे और सभी प्रमुख चौराहों पर उसकी होर्डिंग्स हैं.कांग्रेस,सपा,बसपा के कार्यकर्ता उदास-मन अपने-अपने गाँवों,मुहल्लों में हैं.ऐसे में आम आदमी पार्टी के पक्ष में करीब 5 हज़ार लड़के टोपी लगाए,पैंट पहने और शरीर पर नारे लिखवाये दिन-दिनभर सड़क पर पैदल टहल रहे हैं और मुंह से कुछ नही बोल रहे हैं.ऐसे में हर-हर महादेव की नगरी में हर-हर मोदी का नारा देने वाले दलों का गढ़ बनने से बनारस इनकार करने जा रहा है.सुना है,मोदी के खिलाफ सभी दल अरविन्द के समर्थन में इकठ्ठा हो रहे हैं.भीलों ने लूट लिया वन, राजा को खबर ही नही.
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