Sunday, 3 August 2014

लमही महोत्सव-2014

भारतीय हिंदी साहित्य के मुखपत्र की तरह प्रतिष्ठित था,जब 'हंस' पहली बार निकलना शुरू हुआ .....तब प्रेमचन्द जी के साथ हिंदी मनीषी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का नाम भी पत्रिका के सम्पादक की जगह छपा करता था .वे भी उनका सहयोग करते थे......'मुंशी' सिंगल इनवर्टेड कॉमा में प्रेमचन्द के नाम के पहले छपता था.संपादक द्वय मुंशी प्रेमचन्द कहने की एक रवायद चल पड़ी जो बाद में प्रेमचन्द जी के नाम के साथ चिपक कर रह गय...ी.वरना उनके नाम के साथ मुंशी शब्द का प्रयोग उन्होंने खुद कभी नही किया.उ.प्र.सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा हर साल आयोजित किया जाने वाला 'लमही महोत्सव' आज अपने दुसरे दिन में व्यस्त रहा.प्रेमचन्द जी की कहानियां---सद्गगति,पंच परमेश्वर,गरीब की हार.......आदि की नाट्य प्रस्तुतियां हुईं.लगभग दो हज़ार के आस-पास लोग रहे होंगे.ये आयोजन लमही गाँव के अन्दर प्रेमचन्द जी के आँगन में होता है.एक छोटी सी लाइब्रेरी है,उनकी मूर्ति है,घर उनका संरक्षित है,खाली रक्खा गया है.उनके दालान,कमरे,उनकी लिखने की टेबल,उनका रहन-सहन....सब अंदाजा लग जाता है वहां जा कर....सीढियों से उतरिये तो पत्थर की कुछ प्लेट्स रक्खी हैं.जिनपे प्रेमचन्द के कथा-पात्रों का रेखांकन है.मै देखना चाहता हूँ,महसूस करना चाहता हूँ कि उस साहित्य की कोई सुवास मिल जाए.वहीँ पत्थरों की प्लेट्स में डूब जाइए,पूरा प्रेमचन्द कथा साहित्य अगर कहीं है तो वहीँ है.इन प्लेट्स को वहीँ दीवारों में लगा देना चाहिए,घर के बाहर एक कुआं है और गाँव के अन्दर एक पोखरा है जो प्रेमचन्द का अपना देखा हुआ बचा है.वरना हर साल ये महोत्सव न हो तो,न गाँव प्रेमचन्द को पहचाने न प्रेमचन्द आज के इस गाँव को.
महाजनी सभ्यता के खिलाफ लिखते हुए करोणों भारतीयों की तरह प्रेमचन्द जी का सामाजिक जीवन विदेशी शासक के अधीन था.....कित्तने दबाव में,कित्तना लिखा उन्होंने......कल इसी त्रिदिवसीय महोत्सव की उद्घाटन संगोष्ठी में शामिल हुआ.जब कैमूर की पहाड़ियों में तिलिस्म और ऐयारी की कहानियां लिखी जा रही थी तब हिंदी के तीन शिखर पुरुष--जयशंकर प्रसाद,आचार्य रामचंद शुक्ल,और प्रेमचन्द बनारस में अपने-अपने अनूठे अंदाज़ में लिख रहे थे.कविता,आलोचना और कहानी की ये तीन विभूतियाँ एक कालखंड में एक साथ साधना कर रही थीं.इसी तरह की तमाम साहित्यिक,आध्यात्मिक और देशज परम्पराएं काशी की रीढ़ हैं.महाजनी सभ्यता यानी ग्लोबलाइजेशन....यानी बाज़ार........बाज़ार का पंजा आज के सामाजिक जीवन पर बुरी तरह जमा हुआ है.यह जकड बढती ही जा रही है.ये अलग बात है कि बाज़ार में साढे नौ नं.का जूता उपलब्ध नही है.अगर आपके पाँव का साइज़ साढ़े नौ है तो आप इस मार्केट के लिए फिट नही है.आपको नौ या दस से ही काम चलाना पड़ेगा.यही एक मात्र रास्ता बचा है,ये बात आपको बाज़ार समझाएगा,आपका माइंड वाश कर देगा.फिर आप बाज़ार के मुताबिक़ सोचेंगे.....कल महोत्सव का आखिरी दिन है.लोकसंस्कृति,लोककला,लोकसाहित्य,लोकपरम्परा,लोक उत्सव आदि के सम्यक संरक्षण की दृष्टि से संस्कृति विभाग द्वारा प्रेमचन्द जी को याद करते रहना प्रशंसनीय गतिविधि है.गाँव के बाहर प्रवेश द्वार है..यहाँ भी दोनों तरफ प्रेमचन्द जी के कथा-पात्रों की बड़ी बड़ी आकृतियाँ हैं...अच्छा,मनभावन लगता है उन आकृतियों के साथ कुछ पल खड़े होना...

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