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Sunday, 27 October 2013

ब्लैक डायमंड के लिए ब्लड बाथ

आज मोबाइल ने पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा है या मोबाइल को दुनिया ने, सच चाहे जो कुछ भी हो, उसकी घंटी सुने बिना चैन नहीं मिलता और अगर दिन भर में मैसेज, ताजा खबर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो से आयी है, जहां कोल्टान नाम की धातु की ८० फीसदी खदानें हैं। कोल्टान एक प्रकार का अयस्क है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न इलेक्ट्रानिक उपकरणों के निर्माण में होता है। इसमें नामोबियम और टैंटेलम जैसी धातुएं भार...ी मात्रा में पायी जाती हैं। टैंटेलम में मौजूद खनिज तत्व को टैंटेलाइट कहते हैं, जिसकी मदद से सेलफोन, डीवीडी प्लेयर, लैपटाप और कम्प्यूटर इत्यादि बनाये जाते हैं। खासकर मोबाइल के निर्माण में इसके महत्व के कारण दुनिया भर की मोबाइल कंपनियों में कोल्टान की डिमांड दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही है। सेलफोन में इसका काम बोल्टेज नियंत्रण और ऊर्जा संरक्षण करने का होता है।कोल्टान के मामले में प्रकृति कांगों गणराज्य पर मेहरबान रही है। कांगों गणराज्य मध्य अफ्रीका में स्थित एक देश है, जिसकी सीमा गबोन, कैमरून, मध्य अफ्रीकी गणराज्य तथा काबिन्डा के वाह्य क्षेत्र अंगोलन और गिनी की खाड़ी से मिलती है। इसके अलावा भी कोल्टान अलग-अलग मात्राओं में आस्ट्रेलिया, ब्राजील, थाईलैण्ड, मलेशिया, इथियोपिया और चीन आदि देशों में पाया जाता है। भविष्य में इसके सउदी अरब, मिश्र, ग्रीनलैण्ड, कनाडा और अफगानिस्तान में भी पाये जाने की संभावना है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अलावा कांगों और उसके पड़ोसी देशों में रहने वाले बाहुबलियों ने अपनी-अपनी सभाएं और समितियां बना रखी हैं तथा कोल्टान के लिए उनमें आपस में जंग जारी है। खदानों से कोल्टान निकालने के लिए बच्चों से मजदूरी करायी जाती है, उनके स्कूल तबाह कर दिये गये हैं और महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ हो रहा है। सूचना जगत में क्रान्ति लाने वाले इस अयस्क ने 1998 से अब तक के 14-15 वर्षों में हजारों जिन्दगियों का खून बहाया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले दशक में इस अयस्क ने हर महीने लगभग 45 हजार जिन्दगियां ली हैं। काले रंग की इस धातु को ब्लड डायमंड कहकर पुकारा जाने लगा है। प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समाज का अधिकार होता है, यह बात दुनिया के लगभग सभी विद्वानों, दार्शनिकों, मनीषियों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों ने कही है। कोल्टान की अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारी कीमतों को देखते हुए स्थानीय और अन्तर्राष्ट्रीय ताकतें इसके दोहन में लगी हुई हैं। कांगों के स्थानीय निवासी कोल्टान की बेसिनों में हाथ से इसकी खुदाई करते हैं। कोल्टान युक्त मिट्टी की खुदाई करके वे इसे बर्तन में रखते हैं और उसमें पानी भर देते हैं। थोड़ी देर बार कोल्टान अयस्क बर्तन की तली में आकर बैठ जाता है। इस प्रकार एक आदमी दिनभर मेहनत करके लगभग 1 किलो कोल्टान प्राप्त कर लेता है। एक समय इसकी अन्तर्राष्ट्रीय कीमत 600 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंच गयी थी, लेकिन आज एक स्थानीय मजदूर कोल्टान की खुदाई से 200 डालर प्रतिमाह तक की कमाई कर सकता है। इस लूट का एक और पहलू है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि कोल्टान की खुदाई और उसकी बिक्री के काम में एकाधिकार जमाने के लिए स्थानीय नगरिक समूहों में भयंकर युद्ध चल रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार पड़ोसी देश रवांडा की सेना ने 18 महीने से भी कम समय में 250 लाख डालर के कोल्टान की खुदाई की। युगांडा और बुरूंडी की सेनाओं ने भी कोल्टान की स्मगलिंग बेल्जियम जैसे देशों में की है। कांगों के उस मुख्य इलाके में जहां कोल्टान की खदानें भारी मात्रा में हैं, काहूजी बेगा नेशनल पार्क स्थित है। इस पार्क में पहाड़ी गुरिल्ला प्रजाति का निवास भी है। कोल्टान के लिए युद्ध के कारण गुरिल्ला आबादी आधे से भी कम रह गयी है। खुदाई को आसान बनाने के लिए खदानों के आसपास की आबादी को विस्थापित कर दिया गया है। इस विस्थापन से उपजी गरीबी के कारण ये गुरिल्ले भोजन के काम में लिये जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच वर्षों में लगभग 90 प्रतिशत गुरिल्ला आबादी नष्ट हो चुकी है और अब वे लगभग ३ हजार की संख्या में ही बचे हैं।
ये आंकड़ें हमारे विकास की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। विकास की यह वह दौड़ है, जिसमें आम आदमी की जिन्दगी, उसका वर्तमान, उसका भविष्य सब कुछ पैसे के बल पर खरीद लिया जाता है। प्रतिकार में जो ताकतें सामने खड़ी होती हैं, उन्हें कुचल दिया जाता है। दमन की नींव पर खड़ी हो रही, इस विकसित सभ्यता के बरक्स कुछ मासूम जिन्दगियां है, कुछ अंधकार में डूबे भविष्य हैं और कुछ चिंतायुक्त वर्तमान है, जिनकी तरफ हर नजर कुटिल बनकर ही उठती हैं और मजदूरों का तैरता हुआ खून, उनकी जिन्दगी के सपनों को बहा ले जाता है। सौ साल पहले गांधी ने हिन्द स्वराज्य के माध्यम से कहा था कि यह शैतानी सभ्यता है और एक दिन यह सभ्यता खुद ही खुद को नष्ट कर देगी। हिन्द स्वराज्य में लिखे ये दोनों वाक्य, आज की भयानकता के सापेक्ष सत्य और प्रामाणिकता के उद्घोष वाक्य बन गये हैं। इसलिए भारत ने भले ही गांधी को सूली पर लटका कर चैन पा लिया हो, पर बाकी दुनिया को भारत के गांधी की जरूरत ज्यादा महसूस हो रही है। मानव के रक्त से नहायी कांगों की धरती, गांधी की नित्य प्रासंगिक होती चेतना पर मुहर लगाती है।
                                                                                                                                  - प्रेम प्रकाश