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Saturday, 26 April 2014

देश की पैनी निगाह में एक राजनैतिक आन्दोलन

  
पिछले तीन सालों में भारत की राजनीतिक आबोहवा में ये जो एक उत्साहजनक बदलाव आया दिख रहा है,उसके पीछे अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक उपस्थिति है.देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी का जन्म एक परिघटना की तरह है,तो इसलिए कि इसने मूल्यों की बात उठाई.संवैधानिक मूल्यों की,सामाजिक मूल्यों की और रा...जनीतिक मूल्यों की बात करने वाले ये लोग व्यवस्था में बदलाव की सवा अरब आबादी की सामूहिक इच्छा के वाहक बन गये.व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट और बेशर्म हो चुकी है,और इसका पूरा आर्थिक व सामाजिक बोझ केवल और केवल आम आदमी पर है.इस व्यवस्था को भ्रष्ट करने वाले राजनेता,नौकरशाह व पूँजीपति कुल मिलाकर जितना देश को देते है,आम आदमी आज भी उससे ज्यादा ही देता है.फिर भी वह हाशिये का हाशिये पर ही है.विडंबना है कि जिसका इस व्यवस्था को चलाते रहने में सबसे बड़ा योगदान है,उसी पर यवस्था की सबसे ज़बरदस्त मार भी पड रही है.क्या गज़ब की बात है कि भारत की संरचना में बहुतायत में उपस्थित आम आदमी देश बनाता है.इसी संरचना का लगभग0.05 प्रतिशत वह ख़ास हिस्सा जो राजनेता, नौकरशाह या पूंजीपति के रूप में है,सरकार बनाता है.इन ख़ास लोगों को शासन करने का अधिकार देकर देश ने सरकार की तरफ से आँखे फेर लेने की प्रवृत्ति पाल ली,तो इन आम लोगों से शासन करने का अधिकार लेकर सरकार ने देश की तरफ से नज़रें फेर लेने की प्रवृत्ति पाल ली.यह प्रवृत्ति इतनी बुरी साबित हुई कि लोकतांत्रिक सत्ता पूरी तरह पूँजीनियंत्रित हो गयी.इन 67 सालों में देश पूरी तरह त्रस्त हो गया और व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट हो गयी.असमानता का अनुपात इतना बढ़ गया कि असहनीय हो गया.व्यवस्था रावण हो गयी और देश बन्दर हो गया.बीच का अनुपात आज समुन्दर जितना बड़ा है.एक पुल तो बांधना ही है,उस पार तो जाना ही है,और लंकादहन करना ही है,वक्त की इस ज़रुरत को आवाज़ दी अरविन्द केजरीवाल ने और एकबारगी पूरे देश में अरविन्द के पक्ष में एक खामोश लहर बन गयी.क्योंकि अरविन्द बात कर रहे थे देश की दूसरी आज़ादी की,अरविन्द बात कर रहे थे देश में स्वराज की,अरविन्द बात कर रहे थे व्यवस्था की शक्ति को घर-घर बांटने की और अरविन्द बात कर रहे थे बदलाव की.ख़ास बात यह कि यह सब बातें करते हुए अरविन्द रास्ता पकड़ रहे थे गांधी का.देश ने देखा वे कान में तेल डाले आराम की नींद में मस्त व्यवस्था को जगाने के लिए उपवास कर रहे थे,उसे झकझोरने के लिए सड़कों पर पानी की बौछारें झेल रहे थे,व्यवस्था के सिपाहियों द्वारा सड़कों पर घसीटे जा रहे थे,उपेक्षा और उपहास का दौर तबतक बीत चुका था,बौखलाई हुई व्यवस्था ने उनकी आवाज़ न सुनने का फैसला किया था और अपने लिए खतरा समझकर सीधे-सीधे अरविन्द से भिड़ने लगी थी.व्यवस्था के विरोध में जनसमर्थन बढ़ता गया.और अंदाज़े लगा रहा देश तब भौचक रह गया जब दिल्ली के लोगों ने बैलेट बॉक्स के ज़रिये अरविन्द को सत्ता की ताकत सौंप दी.देश में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं.सामूहिक चेतना का निर्णय ईश्वरीय निर्णय होता है.नर से नारायण होने की कल्पना भारत के आध्यात्मिक मानस ने की ही है.दिल्ली के लोगों ने ऐतिहासिक फैसला इस अर्थ में दिया कि बहुमत के करीब लाकर छोड़ दिया.8 सीटों की कमी रखकर इस तरह दिल्ली ने अरविन्द केजरीवाल को अपनी कसौटी पर रख लिया.समाज की सामूहिक चेतना ने उन्हें उसी नैतिकता की भट्ठी में झोंक दिया,जिसकी सार्वजनिक जीवन में मांग करते हुए वे यहाँ तक पहुंचे थे.अब निभाओ गांधी मूल्य.अब करो स्थापना नये राजनीतिक मूल्यों की.ताकि बदलाव दिखे.जिस चीज़ के लिए तुमने पूरी व्यवस्था को अपने निशाने पर ले लिया,उस चीज़ को स्थापित करो.करो वचनपालन,दो समर्थन-लो समर्थन,व्यवस्था संभालो-विपक्ष में बैठो,अब अपने काम में गांधी का दर्शन कराओ.
अरविन्द घनघोर परीक्षा में थे.उन्होंने कुछ नई लीकें बनानी शुरू भी कीं.उनके होने की हनक साफ़-साफ़ महसूस भी होने लगी. कई भ्रष्ट राजनितिक परम्पराओं ने उनके होने भर से मुह छिपा लिया.देश ने बड़े आनंद से देखा कि विधायकों की खरीद-फरोख्त नहीं हुई. देश ने सुखद आश्चर्य से देखा कि सभी एक दूसरे को सत्ता संभालने के लिए आमंत्रित कर रहे थे. जनता से पूछ-पूछ कर फैसले करने तक तो अरविन्द और उनके आन्दोलन पर गांधी की छाप का असर साफ़-साफ़ देखा जा रहा था, लेकिन उसके बाद भटकाव भी नज़र आने लगे.दिल्ली में सरकार बनाने के फैसला ही मुझे एक बुनियादी भटकाव लगता है, मैंने उस समय भी लिखा था कि अरविन्द को सरकार बनाने का कोई प्रयास कत्तई और किसी हालत में नही करना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा शुरू किये गये इस राजनैतिक आन्दोलन को जनता ने बहुमत का जनादेश नही दिया था. संविधान की देखिये या भारत के राष्ट्रीय मानस की देखिये,दोनों दृष्टिकोण से उन्हें सरकार बनाने के लिए मत नही मिला था.यद्यपि बहुमत तो किसी को नहीं मिला, लेकिन उनसे बड़ा जनमत तो परम्परागत दल को ही मिला था. ऐसे में चाहिए तो यही था कि जीते हुए 28 विधानसभा क्षेत्रों में अरविन्द स्वराज की स्थापना के लिए काम करते दीखते. सरकार कौन बनाता, बनाता या नही बनाता, इसके विकल्प तलाशना उपराज्यपाल के जरिये केवल और केवल केंद्र सरकार की जिमीदारी थी.पूर्ण बहुमत के अभाव में संवैधानिक संकट की स्थिति में अल्पमत सरकार की अवधारणा ने भी जोड़-तोड़ की राजनीति खडी करने में बड़ी भूमिका निभाई है.. जो लोग व्यवस्था को भ्रष्ट करते चले आये हैं, उन लोगों ने अपनी सुविधा के लिए कई-कई आदर्श वाक्य भी गढ़ डाले हैं,आपने 28 सीटें जीती हैं,सरकार बनाना आपका नैतिक दायित्व है.आप सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं,यह बात अरविन्द को वे लोग समझा रहे थे जो उनसे ज्यादा ताकत लेकर भी इस नैतिक दायित्व से पहले ही भाग रहे थे. अरविन्द राजनीति के इन बड़े खिलाडियों के झांसे में आ गये और उनके अखाढ़े में उतरने का साहस कर बैठे.49 दिनों के शासन में अरविन्द ने सरकार का नया चेहरा भी दिखाया,कुछ नये मापदंड भी बनाये,कुछ दुस्साहस भरे फैसले भी लिए,कुछ गलतियाँ भी कीं,कुछ नाकामियां भी हिस्से आयीं,और यह सब करते हुए कई बार वे बड़े खिलाड़ियों के जाल में भी फंसे.कुल मिलाकर इन 49 दिनों ने अरविन्द की चमक में थोड़ी चकाचौंध भी पैदा की और उनकी छवि थोड़ी मलिन भी की.सत्ता पाते ही आन्दोलन से लोगों को जोड़ने और पार्टी के विस्तार के प्रयास में आबादी की जो बहुतायत संख्या आन्दोलन में दाखिल हुई,उसके कई चेहरे थे.कई विचार थे,कई आस्थाएं थीं,और कई चरित्र थे,कहने की ज़रुरत नही कि इसमें राजनीतिक रंग भी थे.इसके बाद से अरविन्द का आन्दोलन उनके नियंत्रण से बाहर जाने लगा.उसी परम्परागत राजनीति के तत्व आन्दोलन में दाखिल होने लगे,जिनके खिलाफ़ इस संभावना को राजधानी के लोगों का चमत्कारी जनसमर्थन मिला था.अलग-अलग लोग अलग-अलग बातें कहने लगे,उन्ही कार्पोरेट घरानों,उन्ही राजनीतिक नेताओं,उन्ही नौकरशाहों और उन्ही पूंजीपतियों से पार्टी का आकर बड़ा होने लगा,जिनका विरोध करने के कारण ही उसका अस्तित्व स्वीकार किया गया था.अरविन्द कई जगह समझौते करते दिखे.जो सपना लेकर वे चले थे,उसको पूरा करने की राह में आशुतोष जैसों की कोई जरूरत नही थी.कश्मीर और खाप आदि के बारे में प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव के बयानों की कोई ज़रुरत नही थी.अपना खर्च चलाने के लिए जो दिल्ली देश की जीडीपी का 3.4 % राजस्व अन्य राज्यों से लेती है,उस दिल्ली की राज्यसीमा के विद्यार्थियों के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय में आरक्षण का प्रस्ताव करने की कोई ज़रुरत नही थी.सरकार का इस्तीफ़ा देने का फैसला करने की कोई ज़रूरत नही थी.
किसी भी संगठन का चरित्र उसके नेतृत्व की स्वीकार्यता और उसके विजन से ही बनता-बिगड़ता है.जहाँ एक तरफ इसका क्षरण हो रहा था वहीँ दूसरी तरफ निजी स्तर पर अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री के रूप में बिना किसी सुरक्षा के मफ़लर बांधे अकेली गाडी में दिल्ली की सड़कों पर टहल रहे थे,बड़े पूँजीपतियों के खिलाफ मुकद्दमे दर्ज करा रहे थे.व्यवस्था की साजिश भरी जकड़नों से जूझते हुए बिजली और पानी की दरें कम कर रहे थे,इलेक्ट्रोनिक और सोशल मीडिया की मांग पर मकान बदल रहे थे और 67 साल के इतिहास में पहली बार किसी चुनी हुई सरकार के मुखिया के तौर पर मिनट-मिनट की जननिगरानी से गुजर रहे थे.इस जन-निगरानी में वर्तमान व्यवस्था की पोषक शक्तियों की अपनी बनाई कूटनीतिक कसौटियां और कटाक्ष भी शामिल थे.अरविन्द और उनकी सरकार 49 दिन तलवार की धार पर थी.देश पहली बार देख रहा था कि गलत करे या ठीक,अरविन्द की सरकार लोगों के कहने पर फैसले बदल रही थी,कहीं अड़ भी रही थी लेकिन कुल मिलाकर जवाबदेह नज़र आ रही थी.सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद लोकसभा चुनाव के इस पड़ाव पहुँचने तक कई सारे निर्णय उलटे पड़े.उम्मीदवारों का चयन कई जगह गलत हुआ.उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया कई बार ढीली पड़ी.कई बार अन्य नेताओं के बडबोले बयान आ गये.और कई बार तो वे हद भी लांघ गये.पार्टी के कितने ही उम्मीदवार मैदान छोड़कर हट गये,कितने ही बिक गये,और आन्दोलन इस स्थिति पर नियंत्रण नही कर पाया.हालांकि इसका कारण पार्टी में मचा भेडियाधसान और पुराने खिलाड़ियों की बौखलाहट ही थी,जिसके चलते फर्रूखाबाद जैसी महत्वपूर्ण सीट पर सलमान खुर्शीद जैसे भ्रष्ट व्यवस्था के भ्रष्ट प्रतीक के लिए भी मैदान खाली छूट गया.इस बीच कुछ दुस्साहस भरे फैसले भी लिए गये जिनके चलते इस आन्दोलन का आकर्षण अबतक बना हुआ है,जिसके चलते अरविन्द के जरिये व्यवस्था के अन्दर गांधी जी के राजनीतिक मूल्य दाखिल हो सकने की हम जैसे कितनों की ही उम्मीद अभी बनी हुई है.अरविन्द का गुजरात जाकर विकासवाद की प्रतीक व्यवस्था से टकराना और बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला ऐसे दुस्साहस भरे फैसलों में शामिल है.लेकिन पार्टी और आन्दोलन की पूरी शक्ति लेकर बनारस में बैठ जाने का उनका फैसला मुझे बहुत उचित नही लगा.देश की चार सौ से ज्यादा अन्य सीटों पर भी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में हैं, जहाँ केवल आन्दोलन लड़ रहा है,पार्टी नही .राष्ट्रीय नेतृत्व को उन जगहों पर भी समय और शक्ति लगानी चाहिए.आन्दोलन से भावनात्मक रूप से जुड़े जुनूनी कार्यकर्ताओं की फ़ौज तो बनारस के ज़र्रे-ज़र्रे में लगी ही हुई है और हर मतदाता के जेहन में हर वक्त मौजूद रहने का चमत्कार पूर्ण काम कर ही रही है.सभी जगह नही तो अरविन्द को बनारस के आस-पास की सीटों पर जरूर ध्यान देना चाहिए,शाज़िया इल्मी तथा कुमार विश्वास जैसे अपने बहुबाती नेताओं और उनके शब्दों,विचारों को भी आन्दोलन के चरित्र में ढालना चाहिए या फिर कुछ कठोर निर्णय करने चाहिए.अरिन्द केजरीवाल को यह नही भूलना चाहिए कि देश की उनपर पैनी निगाह है..

Sunday, 9 February 2014

ये हठधर्मी लोग..

 

ऐसा लगता है कि जैसे गंगा अपने तटबंध तोड़कर दिल्ली एनसीआर में उतर आई हो,जिसे देखो वही एक डुबकी लगाकर पवित्र हो लेना चाहता है.''आप

''वालों ने अपनी तुरही की नाद पर दिल्ली का आसमान जीत लिया ,तो देश एकबारगी भौंचक रह गया.इस सुखद आश्चर्य का अभी पहला ही अध्याय लिखने-पढने में जुटे देश की खुमारी अभी उतरी भी नही थी कि पटकथा के पृष्ठ जल्दी-जल्दी बदलने लगे.स्क्रीन पर बड़े-बड़े अक्षरों में सवाल आया कि अपने पद और कद से बड़े लोगों की उम्मीद करता देश क्या फिर छला गया है..?पिछले बीस दिनों में हमने देखा कि ''आप''के संस्थापक सदस्यों में से कई,अपना राजनैतिक बौनापन छुपा नही पा रहे हैं और स्थिति यह बन गयी है कि अगर कुछ समझदारी और संवेदना की बात सुननी हो ,तो अरविन्द केजरीवाल या मनीष सिसौदिया के अलावा कोई नही दिखता...
हम अपनी राजनीति के अजीबोगरीब दौर में आ खड़े हुए हैं.मुझे लगता है कि पिछले बीस दिन में

अरविन्द केजरीवाल की सरकार और पार्टी ने एक साथ अपनी अपरिपक्वता और गंभीरता दोनों का परिचय दिया है.लेकिन इसके बावजूद मुझे कहना है कि 'आप' को वक्त की नजाकत समझनी होगी.उन्हें बहुत तेज़ गति से बहुत बड़ा होने और आगे बढ़ते जाना की ज़रुरत है ,वरना उसे हलाल करने वाली ताकतें अपनी पूरी आक्रमणशक्ति के साथ अपनी तलवारों को धार दे रही हैं.आम आदमी कुर्सी तक तो पहुंचा सकता है ,लेकिन कुर्सी पर बैठने और उसे संभालने की सलाहियत तो उन्हें खुद पैदा करनी पड़ेगी.पिछले बीस दिनों में आप और आप की सरकार ने जो कुछ किया है उससे कुछ उम्मीदें टूटती भी हैं.कुछ बंधती भी हैं.'आप' सरकार ने जहाँ कार्य-संस्कृति की नीव डालने के कई एक मौके इन बीस दिनों में गँवाये हैं वहीँ इन्ही बीस दिनों में यह भी लगने लगा है की दिल्ली में एक ऐसी सरकार बन गयी है जो नाम से तो आम है ही,अपने नजरिये से भी आम आदमी जैसी ही है.. कम से कम इतना भरोसा तो बन ही गया है कि और कुछ हो न हो , सुनवाई तो होगी ही, सवालों के जवाब तो आयेंगे ही.कार्य संस्कृति के अभाव की झलक उस घटना के बाद दिखी जब एक नवजात बच्ची का शव कूड़े के ट्रक में फेंका पाया गया.. आम आदमी के प्रति आम हिकारत का यह भाव अब हमारा रास्ट्रीय चरित्र है.. दिल्ली में आम आदमी की सरकार होंबे के बावजूद हवा बदलती नहीं दिखी.. वही तौर तरीके,वैसे ही बयान , वैसी ही राजनीति और वैसी ही वितृष्णा. सिर्फ इतना हुआ होता कि सरकार के मंत्री उस अभागे पिता को अपनी गाडी में लेकर अस्पताल की तरफ भागते दिखाई देते तो समस्या से जूझने का एक सकारात्म्क सन्देश निकलता.. बच्ची के शव का सच जब खुलता तब खुलता, कम से कम पहली जकडन तो टूटती.. सरकार के मंत्री आम आदमी के साथ खड़े तो दिखाई देते.जैसा दुसरे मामले में दीखता है.मंत्रियों के रात्रिभ्रमण,नाईजीरियाई लड़कियों के गाड़ी रोकने और पुलिस को छपा मारने का आदेश देते मंत्रियों के आचरण को लेकर देश में घमासान मचा हुआ है. तो इसलिए कि आप सरकार के मंत्री का यह कदम उसी जकडन को तोड़ने वाला कदम है.. बेशक दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए.. अगर ऐसा होता,तो अपराधियों के रैकेट के साथ पुलिस की मिलनमारी की जकड़न भी टूटती.. तब सिस्टम की ढकोसलेबाज आवाजें भी नहीं सुनाई पड़ती.यह बेहद जेनुइन मामला था,जिसे राजनीतिक और प्रशासनिक जड़ता की भेंट चढ़ा दिया गया.इस जड़ता का जवाब देने के लिए धरने पर जाने का दिल्ली सरकार का निर्णय बेहद लोकतांत्रिक,बहुत नया और मठाधीश राजनीतिज्ञों को नया राजनैतिक सबक सिखाने वाला कदम साबित होगा.अपनी-अपनी तलवारों पर सान चढ़ा रहे समूह पूछ रहे हैं कि सरकार और उसके मंत्री यही सब करते रहेंगे तो दूसरे जरूरी काम कब करेंगे.ऐसे सवालों का सिर्फ एक जवाब है कि पिछले 67 सालों में कितनी ही तो सरकारें बनी और सब के सब दूसरे ही काम करते रहे.लेकिन आदमी नहीं बने.कम से कम इस सरकार के लोग आदमी तो बने रहें..
दिल्ली के कानून मंत्री ने न्यायाधीशों की जुटान की बात कही, तो लगा जैसे बर्र का छत्ता छेड़ दिया हो किसी ने, लेकिन इसमें ग़लत कुछ भी नही था.अगर कोई मंत्रिमंडल, सरकार की बदली हुई प्राथमिकताओ से न्यायपालिका को अवगत कराना चाहता है, तो यह किसी भी ओर से आलोचना का विषय नहीं होना चाहिए.यह तो स्वागत योग्य कदम है क्युकी न्यायपालिका की प्रतिबद्धता का एक जरूरी अर्थ शीघ्र और सस्ता न्याय होता है.यह कडवी सच्चाई है कि भारत में न्याय के प्रति प्रतिबद्धता इस अर्थ में

अपनी बुनियादी कसौटियों से भटक गयी है लेकिन बेहतर होता अगर इसकी पहल स्वयं मुख्यमंत्री की तरफ से होती.दिल्ली के कानूनमंत्री के स्तर से जब ऐसी पहल होती है, तो इसमें न्याय-विवेक की कमी दिखाई पड़ती है.नयी सरकार को इस विवेक की जरूरत आगे भी पड़ती रहेगी.कश्मीर का मामला बेहद नाजुक है.न्याय-विवेक की तरह ही यहाँ परिस्थिति-विवेक की जरूरत है.प्रशांत भूषण अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसी या वैसी बयानबाजियों से कश्मीर जैसी बुरी तरह उलझी हुई समस्याएं सुलझने के रास्ते पर नहीं जाती.प्रशांत भूषण जो बोल रहे हैं, अगर वे मानते है कि वही सही है, तो यह जिम्मेदारी भी उन्ही की बनती है कि वे पूरे देश को भी उसी मनोभूमिका में ले आयें.यह बहुत कठिन काम है.इसलिए यहाँ परिस्थिति-विवेक की जिम्मेदारी प्रशांत भूषण की ज्यादा है.कश्मीर कोई साधारण समस्या नहीं, बल्कि अब एक नासूर बन चुका है और इतिहास के ऐसे नासूर बयानों से ठीक नहीं होते.. यह बिलकुल संभव है कि मई २०१४ के बाद कश्मीर और प्रशांत भूषण बिलकुल आमने-सामने खड़े हों, तब देखेंगे उनकी बयानबाजियां किस करवट बैठती हैं..
अब ये अरविन्द केजरीवाल के ऊपर है कि वे अपनी ईमानदारी को कबतक बनाये रख पाते हैं क्योंकि यही उनकी पूँजी है

.सारा जनाधार केवल इसी कारण उनके साथ है.आज लाखों की संख्या में लोग 'आप' की सदस्यता ले रहे हैं.अरविन्द और उनके आन्दोलन की ईमानदारी और उद्देश्य की ऊंचाई जबतक बनी रहेगी,तबतक लोग उनके साथ रहेंगे.हमे याद रखना चाहिए कि 'आप' का राजनातिक उदय कांग्रेस की हठधर्मिता और बीजेपी की अकर्मण्यता का परिणाम है.

जनता कौन है आखिर....?

 


भारत के संविधान में लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना का स्पष्ट विधान है,जिसमे जन-प्रतिनिधियों,लोक-सेवकों, और समूचे तंत्र को लोकहित में काम करने का स्पष्ट निर्देश भी है.'सरकार' शब्द की कल्पना और अवधारणा ही इसी आधार पर टिकी हुई है.समाज ने जब पहली बार अपने लिए सरकार की जरूरत महसूस की होगी,तो उसके पीछे लोकहित,लोकसुरक्षा और लोकानुराग ही प्रमुख तत्व थे.इस बार 25 जनवरी को गणतंत्र-दिवस की पूर्वसंध्या पर भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्र के नाम अपने सन्देश में कहा कि सरकार का काम परोपकार करना नही है.राष्ट्रपति के इस एक वाक्य ने न केवल एक उलझन,बल्कि एक संवैधानिक संकट भी उपस्थित कर दिया है.जब राष्ट्रपति ही संविधान की भावना के विपरीत जाकर तथ्यों को तोड़े-मरोड़े तो बाकी देश क्या करे..!जब राष्ट्रपति,जो स्वयं भी प्रथम श्रेणी के लोकसेवक हैं,संविधान के निर्देशक तत्वों का मखौल उड़ा रहे थे,तो क्या हम ये समझें कि राष्ट्रपति-भवन से लम्बे समय तक कट्टर कांग्रेसी होनेका कर्ज/फर्ज अदा किया जा रहा था..?अगर सरकार का काम परोपकार या लोककल्याण करना नही है,तो हम एक नागरिक होने के नाते भारत के राष्ट्रपति से यह जानना चाहते हैं कि सरकार का काम वास्तव में क्या है..?
26 जनवरी 1950 को अंगीकृत किये गये संविधान की शुरुआत में ही एक शब्द आता है 'जनता',जिसे 'हम भारत के लोग' कहकर परिभाषित किया गया है.बहुत बार ऐसा होता है कि निश्चित शब्दों में बाँधी गयी परिभाषाएं उस पारिभाषिक शब्द की सम्पूर्ण व्यंजना करने में अक्षम हो जाती हैं.आखिर यह 'जनता' है कौन..?यह प्रश्न इसलिए भी उठता है कि इसी जनता के मत से चुनी हुई सरकारें इसी संविधान के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ उठाती हैं.पद के साथ जुड़ा यह दूसरा शब्द 'गोपनीयता' आखिर किसके सापेक्ष है..?जनता के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की शासन-व्यवस्था जनता से ही किसी किस्म की गोपनीयता आखिर कैसे बरत सकती है..?पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा दिए गये धरने के दौरान देखा गया कि मुख्यमंत्री ने सड़क से ही सरकार चलाने का उपक्रम भी किया.तमाम विभागों और कार्यालयों की कई फाइलों और कागजात पर मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों ने हस्ताक्षर किये और सड़क पर ही सरकार के जरूरी कामकाज निपटाए..अदालत में प्रश्न उठाया गया है कि मुख्यमंत्री ने गोपनीय फाइलें सड़क पर मंगवाकर पद से जुड़ी गोपनीयता की शपथ का उल्लंघन किया है..अब एक अहम् प्रश्न ये है कि वहां सड़क पर जो उपस्थित थी,वह जनता ही तो थी.या अधिक से अधिक यह कह सकते हैं कि वह जनता की ही एक टुकड़ी थी.अब शासन जब जनता का ही है और जनता के लिए ही है तो जनता से गोपनीयता कैसी..?मेरा सवाल यहीं से निकलता है कि अगर वहां उपस्थित लोगों को जनता नही कहा जा सकता तो,जनता आखिर है कौन..?


गाँधी जी की कुछ बातें जो बहुतायत में उद्धृत की जाती हैं,उनमे से एक वह भी है,जो उन्होंने वायसराय हाउस में राष्ट्रपति निवास बनाने के प्रस्ताव पर कहा था.उन्होंने कहा था कि भारत जैसे गरीब देश के राष्ट्रपति को लोकसेवक-धर्म का कठोर पालक होना चहिये.इतने बड़े महल में रहने का अधिकार उसे नहीं है.वायसराय हाउस में अस्पताल खोला जाना चाहिए,जहाँ जरूरतमंदों का इलाज और सेवा बेहतर ढंग से हो सके.उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार में जन-भागीदारी होनी चाहिए.. नीतियों और निर्णयों में जनमत शामिल होना चाहिए.इन शब्दों के अर्थ के आलोक में अगर सरकारी कार्यप्रणाली की बात करें तो आलीशान भवनों और कार्यालयों में चाकचौबंद व आरामदेह ऐय्याशगाहें बनाकर वहां से सरकार नही चलाई जानी चाहिए.गांधी के सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक और प्रशासनिक सिद्धान्तो,आदर्शों व सूत्रों को व्यापक समाज ने तब भी सर्वस्वीकृति दे रखी थी,जब देश की आबादी ३३ करोड़ थी और अब भी दे रखी है,जब आबादी तबसे चारगुना बढ़ गयी है.हालाँकि इस सवा अरब जनता में एक बड़ा हिस्सा वह भी है जो गाँधी को बुरा मानता है,उनके जीवन को पाखंड कहता है,उनकी नीतियों को कायराना कहता है,यहाँ तक कि उनको राष्ट्रीय आन्दोलन का खलनायक तक कहा जाने लगा है.नाथू राम गोडसे को शहीद बताने और उसका यशगान करने वाली एक पीढ़ी आ चुकी है.लेकिन फिर भी अभी भारत की जनता, संस्थाएं और व्यवस्थाएं, ये सभी कुल मिलाकर आमतौर पर गांधी की वैचारिक दृढ़ता और समाजशास्त्रीय आध्यत्मिकता को पूरी आस्था से स्वीकार करती हैं.भारत के चुनाव-आयोग में पंजीकृत छोटे-बड़े चार हज़ार के आस-पास राजनैतिक दलों में से कोई एक भी ऐसा नही है,जिसने अपने विज़न में गांधी-विचार और उनकी परिकल्पनाओं को लिखित रूप में स्वीकार न किया हो.बाद में सत्ता-शीर्ष पर पहुंचे दलों ने इन आदर्शों को छूना भी मुनासिब नही समझा,ये अलग बात है.और जितना छुआ भी गया,उतना गांधी,सरकारी गांधी में तब्दील कर दिए गये.पिछले 68 सालों में हमने सरकार और समाज की हैसियत से कई टुकड़ों में गांधी का विखंडन किया है.इतने काल-खंड में इस आवृत्ति से विखंडन की दूसरी कोई क्रिया नही हुई होगी.लोहिया ने गांधी के ये विखंडन भांपे थे--एक था सरकारी गांधी,एक था मठी गांधी,एक था कुजात गांधी.ये टुकड़े वृहत्तर समाज ने नहीं,समाज के एलीट तबके और सरकार के तत्व ने मिलकर किये थे,लेकिन अब तो गांधी हज़ारों टुकड़ों में बिखर गये हैं--अब तो हठी गांधीवादी भी हैं, सरकारी के अलावा राजनैतिक गांधीवादी भी हैं.

ज्यादा आगे बढ़ने से विषयांतर होगा,इसलिए अगर टुकड़ों में बिखरे इस गांधी के किसी भी अंश को अगर कोई सरकार व्यवहार में अपनाती है तो यह सड़क से सरकार चलाने का दृश्य तो असल में गांधी की स्थापना का कार्य है.इस आधार पर तो सभी राजनैतिक दलों को दिल्ली सरकार को समर्थन देना चाहिए.जनता के शासन में जनता के बीच बैठकर जनता की फाइलें खुलने लगें तो मुझे लगता है कि लोकतंत्र अपनी परिपूर्णता पा लेगा.रह गयी वैदेशिक और सुरक्षा सम्बन्धी सावधानियां और गोपनीयता की बात तो ये गोपनीयता किनसे बरती जानी है,उन्हें चिह्नित तो कीजिये,उनकी घोषणा तो कीजिये.लेकिन उसी तरह जनता को भी चिह्नित कीजिये.ताकि पता तो चले कि सड़क से सरकार चलाने का यह कारनामा कितना जरूरी है.इस शिकायत पर तो अदालत को सुनवाई ही नही करनी चाहिए क्योंकि गाँधी की फोटो हर जज की कुर्सी के पीछे टंगी है न.हाँ उसी सरकार से यह अपेक्षा ज़रूर की जानी चाहिए और समग्र समय व कार्य-योजना के साथ की जानी चाहिए कि आपको लोगों ने गांधी कहा, क्योंकि आपने आज़ादी की दूसरी लड़ाई का आह्वान किया.आपके राजनैतिक आन्दोलन में देशभर के लोगों ने राज्यवार जो आपको अपना,समय,श्रम और मेधा दी,वह इसलिए नही कि कालान्तर में उसी तरह की चोर उचक्की एक और राजनैतिक पार्टी बन जाय,जैसी अभी तक की पार्टियाँ रही.आप से हमें रामराज चाहिए.आप से हमें खुशहाल समाज चाहिए.स्वराज की टोपी पहनकर आप ने दिल्ली में स्वराज लाने का वादा किया है और पूरे देश को यह सपना दिखाया है..


आप अपना वह कल्पित तंत्र लागू कीजिये.आपको दिल्ली में कोई ताज नही मिल गया है,और मई जून में भी आप हिन्दुस्तान नरेश नही बनने जा रहे हैं.आपको अभी मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गयी है,उस हैसियत से आपका संघर्ष अभी बाकी है.अगर लम्बी दूरी तय करनी है,तो टाईट रस्सी पर चल कर पहाड़ पार करने की योजनायें घातक हो सकती हैं.यद्यपि इस रस्सी पर चलने का साहस करना और व्यवस्था से इस तरह टकराना अभिनंदनीय है,किन्तु सारी ताकत इस दिशा में केन्द्रित होनी चाहिए कि सत्ता का स्वरुप विकेन्द्रित हो...ज्योही सत्ता विकेन्द्रित होगी (और अपने शुद्ध रूप में होगी),उसी क्षण से हर दिशा में सम्पूर्णता से विकास दिखेगा....जैसे रात में बारिश हो जाय और सुबह पहाड़ी भी हरिया उठे और घाटी भी,ऐसा दृश्य बनना चाहिए...समाज के हर तबके में न्याय पहुंचे,समाज की खुद की टूटन भी थोडा रुके,लोगों का सरकार में विश्वास जागे.एक ऐसी सरकार मिलने की आहट से राष्ट्रपति को तो खुश होना चाहिए और कहना चाहिए कि हाँ,सरकार लोक-कल्याण के लिए ही है.उन्हें सरकार से कहना चाहिए कि अपनी समयबद्ध कार्य-योजना पेश करो.सरकार को परोपकार तो करना ही चाहिए.

Tuesday, 12 November 2013

पतनशील लोकतंत्र में आखिरी उम्मीद

११ की शाम प्रशांत जी को फोन मिलाया तो बोले मै बिजावर में हूँ प्रेम जी,......१९ दिसम्बर को कुशीनगर में हिन्द स्वराज पर एक गोष्ठी का आयोजन है.मै चाहता हूँ कि आप भी उसमे शामिल हों.सामदोंग रिंपोंछे मुख्य अतिथि होंगे.....वे बोले जरूर आऊंगा,अभी तो चुनाव तक बिजावर में काफी व्यस्त हूँ.मैंने कहा..चुनाव और प्रशांत जी..?ये तो कोई मेल नही है.खैर मैंने पूछा...चुनाव तक...?क्या कोई खास बात है...?उसके बाद जो बातें और जानकारी सामने आई,वो आप सबके साथ शेयर करने से पहले ये बताना जरूरी है कि प्रशांत जी मेरे फ्रेंड,फिलोसोफर और गाइड हैं.. यानी मेरे वैचारिक गुरु.. उनका सबसे बड़ा परिचय ये है कि वे सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन में लोकनायक जय प्रकाश नारायण के अन्तरंग सहयोगी तथा उनके प्रिय रहे.उस पूरे दौर को जीने, महसूस करने,योजनाये बनाने और मोर्चे गढ़ने के काम में प्रशांत जी,जे पी के अनन्य सहयात्री रहे.. कभी धर्मयुग जैसी पत्रिका में फीचर सम्पादक के तौर पर धर्मवीर भारती के साथ काम करने वाले प्रशांत जी बाद में भारतीय विद्या भवन कि पत्रिका नवनीत के सम्पादक भी रहे.. गाँधी विचार के ख्यातिलब्ध व्याख्याता के तौर पर देश की बौद्धिक जमात में अपनी व्यापक पहचान रखने वाले प्रशांत जी उडीसा में पोस्को विरोधी आन्दोलन को पिछले कई सालो से दिशा दे रहे है.. उन्होंने २००२ के गुजरात दंगो के दौरान भी पीड़ितों की उल्लेखनीय सेवा की. आजकल वे मुंबई में रहकर अपने रचे राष्ट्रीय युवा संगठन (RYS) को आकार दे रहे है..प्रशांत जी से जो बाते हुईं उनसे पता चला कि प्रशांत जी आजकल बिजावर में क्या कर रहे है.. मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में आने वाले बिजावर विधानसभा क्षेत्र में कोई ढाई सौ गाँव आते है.पिछले दस महीनो में RYS के कार्यकर्ताओं ने घर घर जाकर मतदाताओ के साथ बैठ बैठ कर उनका शिक्षण व संगठन का काम किया.. बिजावर में लोकतंत्र अभियान चल रहा है जिसके तहत करीब दो सौ गावो में मतदाता परिषदों का गठन किया गया है.. हर परिषद् ने दस सदस्यों वाली अपनी एक कार्य समिति और अपने एक ग्राम प्रतिनिधि का चुनाव किया है.. इस तरह कुल २०० ग्राम प्रतिनिधि चुन लिए गये है.. और इन्हें ही बिजावर विधानसभा क्षेत्र का हाईकमान घोषित किया गया है.. मतदात परिषदों ने अपने हाईकमान को निर्देश दिया कि वे एक लोक उम्मीदवार चुने.. संभावित लोक उम्मीदवारों के नाम सभी गावो से आये और सर्वसहमति से यह सूची तमाम काट छांट के बाद ४ नामो तक पहुंची.अंततः तीस वर्षीय निरंजन कुमार तिलक,जो पेशे से शिक्षक हैं और सबकी मदद करने के लिए हर समय तैयार पाए जाते है, को लोक उम्मीदवार चुन लिया गया.. प्रशांत जी ने बताया कि जब 25 नवम्बर को सारा मध्यप्रदेश वोट डालने जाएगा,तब मतदाताओ को मिलेंगे राजनितिक पार्टियों द्वारा थोपे गये उम्मीदवार लेकिन बिजावर के मतदाताओ को मिलेगा एक ऐसा उम्मीदवार जिसको खुद मतदाताओ ने ही टिकट दिया है.. बिजावर में एक नयी स्थिति बनी है जहाँ अन्य पार्टियां अपने ही मतदाताओं के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रही है.इस अभियान की तरफ से सभी पार्टियों को एक पत्र भेजा गया है कि लोकतंत्र का क्षितिज व्यापक करने वाले इस प्रयोग का सम्मान कीजिये और बिजावर से अपनी पार्टी का उम्मीदवार मत खड़ा कीजिये.लेकिन किसी ने भी जवाब देने की जहमत नही उठायी.प्रशांत जी कहते हैं कि राहुल बनाम मोदी जैसी टुच्ची राजनीति में लोकतंत्र को बंधक बना देने वालों को यह समझ में आये या न आये,लेकिन बिजावर ने चुनावी अखाड़े में स्वयं मतदाता को ही ला खड़ा किया है.यह मतदाता ही हमारे पतनशील लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद है.