Sunday, 9 February 2014

ये हठधर्मी लोग..

 

ऐसा लगता है कि जैसे गंगा अपने तटबंध तोड़कर दिल्ली एनसीआर में उतर आई हो,जिसे देखो वही एक डुबकी लगाकर पवित्र हो लेना चाहता है.''आप

''वालों ने अपनी तुरही की नाद पर दिल्ली का आसमान जीत लिया ,तो देश एकबारगी भौंचक रह गया.इस सुखद आश्चर्य का अभी पहला ही अध्याय लिखने-पढने में जुटे देश की खुमारी अभी उतरी भी नही थी कि पटकथा के पृष्ठ जल्दी-जल्दी बदलने लगे.स्क्रीन पर बड़े-बड़े अक्षरों में सवाल आया कि अपने पद और कद से बड़े लोगों की उम्मीद करता देश क्या फिर छला गया है..?पिछले बीस दिनों में हमने देखा कि ''आप''के संस्थापक सदस्यों में से कई,अपना राजनैतिक बौनापन छुपा नही पा रहे हैं और स्थिति यह बन गयी है कि अगर कुछ समझदारी और संवेदना की बात सुननी हो ,तो अरविन्द केजरीवाल या मनीष सिसौदिया के अलावा कोई नही दिखता...
हम अपनी राजनीति के अजीबोगरीब दौर में आ खड़े हुए हैं.मुझे लगता है कि पिछले बीस दिन में

अरविन्द केजरीवाल की सरकार और पार्टी ने एक साथ अपनी अपरिपक्वता और गंभीरता दोनों का परिचय दिया है.लेकिन इसके बावजूद मुझे कहना है कि 'आप' को वक्त की नजाकत समझनी होगी.उन्हें बहुत तेज़ गति से बहुत बड़ा होने और आगे बढ़ते जाना की ज़रुरत है ,वरना उसे हलाल करने वाली ताकतें अपनी पूरी आक्रमणशक्ति के साथ अपनी तलवारों को धार दे रही हैं.आम आदमी कुर्सी तक तो पहुंचा सकता है ,लेकिन कुर्सी पर बैठने और उसे संभालने की सलाहियत तो उन्हें खुद पैदा करनी पड़ेगी.पिछले बीस दिनों में आप और आप की सरकार ने जो कुछ किया है उससे कुछ उम्मीदें टूटती भी हैं.कुछ बंधती भी हैं.'आप' सरकार ने जहाँ कार्य-संस्कृति की नीव डालने के कई एक मौके इन बीस दिनों में गँवाये हैं वहीँ इन्ही बीस दिनों में यह भी लगने लगा है की दिल्ली में एक ऐसी सरकार बन गयी है जो नाम से तो आम है ही,अपने नजरिये से भी आम आदमी जैसी ही है.. कम से कम इतना भरोसा तो बन ही गया है कि और कुछ हो न हो , सुनवाई तो होगी ही, सवालों के जवाब तो आयेंगे ही.कार्य संस्कृति के अभाव की झलक उस घटना के बाद दिखी जब एक नवजात बच्ची का शव कूड़े के ट्रक में फेंका पाया गया.. आम आदमी के प्रति आम हिकारत का यह भाव अब हमारा रास्ट्रीय चरित्र है.. दिल्ली में आम आदमी की सरकार होंबे के बावजूद हवा बदलती नहीं दिखी.. वही तौर तरीके,वैसे ही बयान , वैसी ही राजनीति और वैसी ही वितृष्णा. सिर्फ इतना हुआ होता कि सरकार के मंत्री उस अभागे पिता को अपनी गाडी में लेकर अस्पताल की तरफ भागते दिखाई देते तो समस्या से जूझने का एक सकारात्म्क सन्देश निकलता.. बच्ची के शव का सच जब खुलता तब खुलता, कम से कम पहली जकडन तो टूटती.. सरकार के मंत्री आम आदमी के साथ खड़े तो दिखाई देते.जैसा दुसरे मामले में दीखता है.मंत्रियों के रात्रिभ्रमण,नाईजीरियाई लड़कियों के गाड़ी रोकने और पुलिस को छपा मारने का आदेश देते मंत्रियों के आचरण को लेकर देश में घमासान मचा हुआ है. तो इसलिए कि आप सरकार के मंत्री का यह कदम उसी जकडन को तोड़ने वाला कदम है.. बेशक दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए.. अगर ऐसा होता,तो अपराधियों के रैकेट के साथ पुलिस की मिलनमारी की जकड़न भी टूटती.. तब सिस्टम की ढकोसलेबाज आवाजें भी नहीं सुनाई पड़ती.यह बेहद जेनुइन मामला था,जिसे राजनीतिक और प्रशासनिक जड़ता की भेंट चढ़ा दिया गया.इस जड़ता का जवाब देने के लिए धरने पर जाने का दिल्ली सरकार का निर्णय बेहद लोकतांत्रिक,बहुत नया और मठाधीश राजनीतिज्ञों को नया राजनैतिक सबक सिखाने वाला कदम साबित होगा.अपनी-अपनी तलवारों पर सान चढ़ा रहे समूह पूछ रहे हैं कि सरकार और उसके मंत्री यही सब करते रहेंगे तो दूसरे जरूरी काम कब करेंगे.ऐसे सवालों का सिर्फ एक जवाब है कि पिछले 67 सालों में कितनी ही तो सरकारें बनी और सब के सब दूसरे ही काम करते रहे.लेकिन आदमी नहीं बने.कम से कम इस सरकार के लोग आदमी तो बने रहें..
दिल्ली के कानून मंत्री ने न्यायाधीशों की जुटान की बात कही, तो लगा जैसे बर्र का छत्ता छेड़ दिया हो किसी ने, लेकिन इसमें ग़लत कुछ भी नही था.अगर कोई मंत्रिमंडल, सरकार की बदली हुई प्राथमिकताओ से न्यायपालिका को अवगत कराना चाहता है, तो यह किसी भी ओर से आलोचना का विषय नहीं होना चाहिए.यह तो स्वागत योग्य कदम है क्युकी न्यायपालिका की प्रतिबद्धता का एक जरूरी अर्थ शीघ्र और सस्ता न्याय होता है.यह कडवी सच्चाई है कि भारत में न्याय के प्रति प्रतिबद्धता इस अर्थ में

अपनी बुनियादी कसौटियों से भटक गयी है लेकिन बेहतर होता अगर इसकी पहल स्वयं मुख्यमंत्री की तरफ से होती.दिल्ली के कानूनमंत्री के स्तर से जब ऐसी पहल होती है, तो इसमें न्याय-विवेक की कमी दिखाई पड़ती है.नयी सरकार को इस विवेक की जरूरत आगे भी पड़ती रहेगी.कश्मीर का मामला बेहद नाजुक है.न्याय-विवेक की तरह ही यहाँ परिस्थिति-विवेक की जरूरत है.प्रशांत भूषण अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसी या वैसी बयानबाजियों से कश्मीर जैसी बुरी तरह उलझी हुई समस्याएं सुलझने के रास्ते पर नहीं जाती.प्रशांत भूषण जो बोल रहे हैं, अगर वे मानते है कि वही सही है, तो यह जिम्मेदारी भी उन्ही की बनती है कि वे पूरे देश को भी उसी मनोभूमिका में ले आयें.यह बहुत कठिन काम है.इसलिए यहाँ परिस्थिति-विवेक की जिम्मेदारी प्रशांत भूषण की ज्यादा है.कश्मीर कोई साधारण समस्या नहीं, बल्कि अब एक नासूर बन चुका है और इतिहास के ऐसे नासूर बयानों से ठीक नहीं होते.. यह बिलकुल संभव है कि मई २०१४ के बाद कश्मीर और प्रशांत भूषण बिलकुल आमने-सामने खड़े हों, तब देखेंगे उनकी बयानबाजियां किस करवट बैठती हैं..
अब ये अरविन्द केजरीवाल के ऊपर है कि वे अपनी ईमानदारी को कबतक बनाये रख पाते हैं क्योंकि यही उनकी पूँजी है

.सारा जनाधार केवल इसी कारण उनके साथ है.आज लाखों की संख्या में लोग 'आप' की सदस्यता ले रहे हैं.अरविन्द और उनके आन्दोलन की ईमानदारी और उद्देश्य की ऊंचाई जबतक बनी रहेगी,तबतक लोग उनके साथ रहेंगे.हमे याद रखना चाहिए कि 'आप' का राजनातिक उदय कांग्रेस की हठधर्मिता और बीजेपी की अकर्मण्यता का परिणाम है.

No comments:

Post a Comment