Friday, 5 December 2014

इमली का पेड़


बिसुनिया मुसहर ने अपनी सुअरों से सारा खेत धंगवा दिया है.सारी फसल चौपट कर दी है और नही तो इन मनबढों ने धान की बालियाँ भी पांग ली ह...ैं और अनाज घर ले गये...खबर पंडितान में पहुंची तो भैरो पांडे के हाथ में लाठी चमक उठी.कहते हैं उनकी लाठी में दुर्गा बसती थीं.जैसे कि ये कोई साधारण खबर नही हो,सीधा-सीधा विद्रोह हुआ ये तो.बिसुनिया की इतनी हिम्मत..! मुसहरों का मन इतना बढ़ गया...! खबर तो फैलते-फैलते फैली,लेकिन चिनगारी पहले ही धधक उठी थी.एक लाठी निकली तो घर के घर से लाठियां निकल पड़ीं.मारो स्स्साले मुसहरों को...की ललकार लगाते शेर निकल पड़े गाँव से बाहर.आगे-आगे भैरो पांडे और पीछे-पीछे पंडितान के 'मर्द'...लेकिन रास्ता खेतों की ओर नही,मुसहरिया की ओर...सीधे बिसुनिया के घर.बाभनों की लाठियों से लैस टोली देखकर बिसुनिया अचानक से घबरा उठा.सांझ का बखत.दिनभर सुअरें चरा के लौटा थकान से निढाल बूढा शरीर अभी खटिया पर गिरा ही था कि आँखों से आग बरसाते भैरो और उनके लोग उसे घेर के खड़े हो गये.बिसुनिया ने उठना चाहा लेकिन दबोच लिया गया उसे.अपने-अपने घरों से झाँक-झाँककर सारे मुसहर परिवार यह दृश्य देख रहे थे,लेकिन सामने आने की हिम्मत किसी में नही थी.दस बीस लात तो वहीँ बरस गये उसपर और जब दम बेदम हो गया तो बाँध ले चले बाभन टोले की ओर.गाँव में हलचल थी.अहिरान भी थहराया हुआ टुकुर-टुकुर ताक रहा था.बच्चों में सुगबुगाहट थी,महिलायें दरवाजों की ओट से घूँघट दांतों में दाबे धडकनों पर काबू पाने की कोशिश कर रही थीं-क्या होगा राम,आज इस बेचारे का...मर्दों की टोली ने बिसुनिया को बरही से कोल्हू में बाँधा और भैरो पांडे ने सबको ज़ोर की ताकीद की...कोई बीच में नही आएगा.पंडितान के मर्द बिसुनियाँ को घेरकर खड़े हो गये.
उधर मुसहर बस्ती में सन्नाटा था,इधर बिसुनियाँ की देह पर लाठियां ठांय-ठांय बरसती थीं...बिसुनियाँ के मुंह से निकलती महिबप्पा की चीत्कार से आसमान सहम उठा.बाभनों की जुबान पर गालियाँ थीं और घोर नफरत के भाव ऐसे कि कहीं छू न जाये बिसुनियाँ किसी बाभन के हाथ से..फिर से नहाना पड़ेगा..चोर,साला,डांकू हिम्मत तो देखो जरा इसकी...अब समझ में आएगा बेटा तुमको--भीड़ भुनभुना रही थी.भैरो पांडे मारते-मारते थक गये थे..बिसुनियाँ लहूलुहान था..जब थक गये तो भैरो डपट कर बोले--कोई खोलना मत इसे,खेत से होकर आता हूँ..एक-एक दाना धान वसूलूँगा साले से..पूरे गाँव में जैसे सियापा फ़ैल गया था.भैरो पांडे मझोले कद के आदमी,दुबला पतला शरीर,भक-भक गोरा रंग,छोटी-छोटी आँखें,और चीते जैसी फुर्ती,गाँव-गिरांव के चौधरी थे.सच बोलने में कभी नही डरे.क्रोध ऐसा कि जैसे साक्षात दुर्वासा प्रकट हुए हों..प्रजा थे ज़मींदारों के और राजा थे मुसहरों के.सिर झुकाने के लिए केवल दो जगहें...या तो भगवान का मंदिर या फिर खुद ज़मींदार जालिम सिंह.यों उस जमाने में ज़मींदार के कारिंदों का भी खौफ कोई कम नही होता था.लेकिन भैरो पांडे की पंडिताई की धाक और उनके क्रोध से सभी डरते थे..लट्ठ भांजते हुए जब भैरो खेतों की ओर चले तो रात सिवान में उतरने लगी थी...लेकिन ये क्या.....! धुंधलाती हुई रौशनी में भैरो पांडे ने अपनी छोटी-छोटी आँखों को फाड़-फाड़कर देखा..पूरे सिवान में वैसा कुछ भी नही दिखा,जैसा उनको सुनने को मिला था.सारी फसल वैसे ही खडी थी जस की तस..एक दाना भी इधर का उधर नही.ऐसा भी नही था कि कोई सुअर यूँ ही घुस गयी हो और धान के दस-बीस पौधे भी ज़मीन पर आ लोटे हों..यह दृश्य और सलामत फसल देखकर शायद किसी और समय वे बहुत खुश होते लेकिन इस वक़्त तो उनके चेहरे पर मुर्दनी और मातम छा उठा.खेत की मेड पर भैरो पांडे ठगे-से खड़े रह गये.उन्होंने दूर दूर तक निगाह उलाट-उलाट कर देखा.खेत की चौहद्दी में घूम-घूम कर देखा,कहीं तो कोई एक दाना ही सही,नुकसान हुआ मिल जाए..लेकिन जो हुआ ही नही था,वो कैसे दिखता..ओओओओओओओहहहहहहहहह...ये कैसी खबर थी..तो इसका मतलब बिसुनियाँ निर्दोष था..! फिर किसने फैलाई ये अफवाह...! भैरो पांडे का दोष एक ही था,लेकिन बहुत भयानक दोष था.वे क्रोधी थे और जबरदस्त क्रोधी थे..लेकिन उनमे इंसानियत भी थी,जो की जा चुकी गलती पर उन्हें खुद धूल नही डालने देती थी,वे अपनी गलतियों पर खुद को भी सजा देना जानते थे..और ये उनके भीतर जिन्दा इंसानियत ही थी कि खेत की मेड पर खड़े-खड़े भैरो बिसुनियाँ का चेहरा याद करके कांप उठे--ये तो बड़ा पाप हो गया..ये तो बड़ा अपराध हो गया..निरीह,निर्दोष को लाठी मारी है.इस लाठी को तो आग लगे..वे याद करने लगे किसने कही थी मुझसे ये बात..लेकिन कोई चेहरा इस उद्विग्नता में याद नही आया..वे उलटे पाँव लगभग दौड़ पड़े.उनका माथा भन्ना उठा.पश्चाताप की आग में जलकर भस्म हो रहे थे भैरो पांडे..और क्रोध था कि दोगुना हुआ जाता था.लेकिन अब उसकी दिशा बदल गयी थी..उनमे बस एक ही कमी थी..अपने क्रोध पर नियंत्रण नही कर पाते थे..गाँव में घुसे तो पंडितान के सारे मर्द गलचौर कर रहे थे.एकबारगी सबको देखा तो भैरो के आग ही लग गयी..और मन का सारा गुस्सा गालियाँ बन कर बरस पड़ा...-अरे कौन बोला था रे बिसुनिया खेत धंगवाया...जोइला-साले..ख़तम हो जाओगे एक दिन सब के सब यही हाल रहा तो....अपने पाप में डूब के मरोगे कुत्तों....मन का चैन और दिमाग का संतुलन खो चुके थे भैरो पांडे..कुछ लोग जो कुछ नही जान पाये थे,वे साथ आ खड़े हुए और जिन लोगों ने ये बदमाशी की थी,वे इस तरह अनजान होकर आपस में सबके साथ घुल-मिल गये कि भैरो के गुस्से को सही जगह नही मिली...कोई एक मिल जाता तो शामत उसकी तय थी..लेकिन अब तो भैरो को जल्दी थी बिसुनियाँ के पास पहुँचने की..वे भागे-भागे घर पहुंचे..बिसुनियाँ वैसे ही बंधा-बंधाया ज़मीन पर पड़ा था...दो चार बच्चे आस-पास सहमे से खड़े थे..और भैरो की पंडिताइन हल्दी गुड लेकर बिसुनियाँ को चोरी-चोरी राहत पहुंचाने में लगी थीं..वे इधर-उधर देखती भी जाती थीं कि कोई पांडे को बता तो नही देगा..कि तभी भैरो को अचानक सामने खड़े देखकर पंडिताइन सनाका खा गयीं..वे भागने के लिए हल्दी गुड लिये दिये हडबडा के जो उठीं तो वहीँ लुढ़क गयीं.अब उन्होंने मान लिया कि लात और हाथ बरसने ही वाले हैं.पंडितान की व्यवस्था भंग की थी.पति का हुक्म तोड़ा था...और सबसे बड़ी बात ये कि पंडिताइन होकर मुसहर को अपने हाथों से छुआ था..कोई और दिन होता तो भैरो पांडे आज उनकी जान ही ले लेते..लेकिन आज तो वे जिस आग में जल रहे थे..उसकी तपिश से खुद ही नही निकल पा रहे थे..उन्होंने भागती हुई पंडिताइन को आवाज़ दी--अहरा जिन्दा है या बुझ गया...? पंडिताइन को कुछ समझ में नही आया....भैरो बोले--कंहतरी ले आओ..पंडिताइन को जो सुनाई पड़ा,उस पर यकीन करने के लिए उन्होंने पीछे ताका...भैरो पांडे ने दुहराया--कंहतरी का दूध ले आओ...! पंडिताइन अचकचाई-सी खड़ी रह गयीं..क्योंकि पीछे का दृश्य विश्वास करने लायक नही था.भैरो पांडे ज़मीन पर बैठ चुके थे.कोल्हू का रस्सी बरहा खोलकर उन्होंने बिसुनियाँ को गोंद में लिटा लिया था.और पगड़ी उतार कर उसका घाव पोछ रहे थे.किसी लड़के ने पानी दिया...उन्होंने बिसुनियाँ का मुंह धोया और नीची नज़रों से ऊपर देखा.पंडिताइन औंटे हुए दूध की कंहतरी लिए खडी थीं.बिसुनियाँ को होश में लाकर भैरो पांडे ने भावातिरेक में कंहतरी का दूध उसके मुंह से लगा दिया...न जाने किस जमाने की भूख थी और न जाने किस युग की प्यास...लगभग आधा किलो मलाई और करीब दो किलो औंटा हुआ दूध बिसुनियाँ गटागट पी गया..दूध पीकर उसकी आँखे खुल आयीं..वह कराहते हुए उठ बैठा.लेकिन भैरो अभी पगलाए हुए थे..उन्होंने पंडिताइन से जजमानी में पाया हुआ अपना नया नवेला धोती कुरता मंगवाया,आँगन के हैण्डपम्प से पानी चलाकर अपने हाथ से बिसुनियाँ को नहलाया,पंडिताइन हुकुम पूरा करने में लगी थीं.सरसों के तेल में प्याज और हल्दी भूनकर उसके घाव पर बाँधा.और बिसुनियाँ को लेकर मुसहर बस्ती की ओर चले.मुसहर बस्ती में मातम का-सा सन्नाटा छाया हुआ था..रात हो चली थी उन्होंने बिसुनियाँ बो को आवाज़ दी.वो कांपती हुई सामने आ खड़ी हुई.भैरो ने बिसुनियाँ को खाट पर लिटाया और धोती कुरते के साथ दस रुपये का नोट बिसुनियाँ बो को थमाते हुए कहा--इसका ख़याल रखना..आज बहुत बड़ी गलती हो गयी...आशंकाओं से अलग ये नई धुन सुनकर मुसहरों की जान में जान आ गयी.खौफ खाये मुसहर अपनी झोपड़ियों से बाहर निकल आये..और भैरो बाबा की पैलगी होने लगी.लेकिन आज बाबा के कंठ से आशीर्वाद नही फूटते थे.किसी हारे हुए जुआरी की तरह भैरो जब पंडितान की ओर चले तो सारा माजरा समझ कर सारे मुसहरों ने प्रशंसा के भाव से उनको देखा..-बाबा बड़े अच्छे हैं..तनी किरोधी हैं तो का हुआ..दयालू भी बहुत हैं.इधर मुसहर बिसुनियाँ को घेरकर खड़े हुए और उधर भैरो पांडे घर पहुंचे.
बाभनों में चर्चा थी..छिः भैरो ने बाभनों के कुल को दाग लगा दी..मुसहर जात को हाथ से छुआ और नहीं तो कंहतरी भी अशुद्ध कर दी.पंडिताइन का तो और न पूछो...वो तो और बड़ी भक्तिन हैं.पहिलहीं से लगी थीं सेवा में..घर आकर भैरो पांडे ने उसी रात में नहाया..कपडे बदले,एक लोटा पानी पिया और सांध्य पूजन के लिए मंदिर चले..भैरो पांडे ज़ालिम सिंह के मंदिर के स्थायी पुजारी थे.घर से बाहर निकले तो रात गहराने लगी थी.उनकी उदास निगाहें उपर उठीं और दरवाजे पर खड़े इमली के विशालकाय पेड़ की मोटी और घनी डालियों में उलझ गयीं.इमली का ये पुराना पेड़ भैरो पांडे के घर का अँधेरा और घना कर देता था.कभी उनकी आजी ने लगाया था यह पेड़ जो अब उनका नही,जमीदारी की सल्तनत का हिस्सा था .क्या मजाल कि वो चाहे कोई भी हो,इमली का एक तिनका भी उठा ले.भैरो पांडे के दरवाजे पर खड़े पेड़ की एक इमली तो खुद पांडे का परिवार भी नही छू सकता था,जमीदार भारत के लोग दहशतों में जीते थे.चिंघाडती हुई-सी डालियाँ खपरैल वाला उनका दालान पार करते हुए अन्दर आँगन तक लटकी रहती थी..पेड़ था तो यों उनके दरवाजे पर ही,लेकिन अब ये प्रॉपर्टी थी ज़ालिम सिंह की.इस पेड़ के होने का एक बड़ा नुकसान ये था कि रोज कोई न कोई छोटी-मोटी डाल टूट के गिरती ही रहती थी और खपरैल टूट फूट जाती थी...हर दो चार महीने पर घर की मरम्मत करवाने में कोई तीस-चालीस रूपये लग जाते थे..1930-35 के आसपास के उस दौर में हर दो चार महीने पर तीस चालीस रुपये घर की मरम्मत पर खर्च करना पूजापाठी बाभनों के लिए कोई हंसी खेल नही था..अंग्रेजों का राज़ था और अफीम की खेती खूब होती थी..कोई घर शायद ही बचा हो लेकिन ऐसा कोई गाँव नही बचा था जहाँ दो तीन अफीम के नशेडी न हो गये हों..भैरो के पिता भागवत पांडे अफीम के एडिक्ट थे.दालान के बाहर मड़ई में लेटे रहते और खांसते रहते थे..उनकी अफीम की लत का असर ऐसा कि कहते हैं एक बार उनको गेहुअन ने काट लिया..लोगबाग़ जब घबरा के दौड़े और किसी झाड-फूँक वाले के चक्कर में पड़े तो भागवत बाबा बड़े शांति से बोले--अरे कुछ नही होगा हमको,अफीम खाते हैं हम.थोड़ी देर बाद लोगों ने देखा दरवाजे के पार खेत की नाली में गेहुअन ऐंठ-ऐंठ के मर गया..इमली के पेड़ के होने का एक नुक्सान ये भी था कि आसपास झाड-झंखाड़ उगी ही रहती थी और ज़हरीले जानवरों का आना जाना भी बना ही रहता था.भैरो पांडे आगे बढे और निचाट रस्ते पर इन्ही ख्यालों में गुम मन्दिर की ओर चले.ज़मींदार के पुजारी थे सो दरबार में इज्जत बहुत थी.ज़मींदार के कारिंदे बड़ी कड़ाई से लगान वसूलते थे.लेकिन वैसा कठोर व्यवहार भैरो पांडे के साथ नही करते थे और नही तो पुजारी का पूरा खर्च ज़मींदार के घर से ही आता था.
ज़मींदार ज़ालिम सिंह अपने नाम के मुताबिक ही क्रूरता की आखिरी हद तक जालिम था.उस जमाने में,जब लाल पगड़ी पहने थाने के चौकीदार को देखकर गाँव का गांव हिल जाता था,तब कहते हैं कि किसी बात पर नाराज़ होकर जमींदार जालिम सिंह ने खटियाबाबा के मेले में थाने के दारोगा को दौड़ा-दौड़ा कर कोड़ो से पीटा था और कोई कुछ नही बिगाड़ पाया था.वैसे इसकी शिकायत अंग्रेज कलेक्टर तक पहुंची थी और कलेक्टर मौके पर आया भी था.लेकिन सुना है दूध पीकर चला गया था..ज़मींदार ज़ालिम सिंह के पेशाब से उनकी ज़मींदारी में चिराग जला करते थे.भैरो पांडे कई बार ज़मींदार के सामने हाथ जोड़ चुके थे-बाऊ साहब,ऊ इमिलिया के पेड़वा से बहुत दिक्कत है..इतना सुनते ही ज़मींदार भड़क उठता था..एक बार ऐसे ही एक मौके पर उसने भैरो पांडे की सारी इज्जत एक तरफ रखते हुए गरज कर कहा था---हे पांडे......खबरदार,जो फिर कभी नाम लिया इमली का..उसकी पत्ती भी मत छूना.लकड़ी तो बहुत दूर की बात है.उस दिन ज़मींदार का रुख देखकर भैरो पांडे सहम उठे थे.लेकिन आज बिसुनियाँ की मार और बाकी गाँव के मुकाबले अपने घर पर छाये अन्धकार का घनेरापन उनके अंतस में गहन उदासी बनकर उतर आये थे..आज वे फिर संकल्पित हो रहे थे कि ज़ालिम से फिर मिन्नत करूँगा.मंदिर पहुँचकर दरवाजा खोला तो कुण्डी की खडखडाहट से ही दो सौ मीटर दूर कोठी के बाहर बैठा ज़मींदार अकन गया कि भैरो पांडे आ गये हैं..ज़मींदार के कान चौबीस घंटे खड़े ही रहते थे.अब इतना भी सावधान न हो तो अंग्रेजो के ज़माने में ज़ालिम सिंह होना कोई आसान बात नही थी,ज़मींदार क्या कोई ख़ाक होता...! आवाज इतनी भारी कि कहते हैं सवेरे चार बजे ही उठकर घर के बाहर निकलकर जोर से खांसते थे और आसपास की बस्तियों से मजदूर चल पड़ते थे.पूजा के बाद भैरो पांडे जमीदार के हुजूर में पहुंचे,लेकिन घनी मूंछो के अन्दर ज़मींदार का रुआब देखकर मन की बात नही कह पाये,अलबत्ता अन्दर ही अन्दर सहम-से आये..ज़ालिम ने तंज किया--सुना आज बिसुनियाँ की बड़ी सेवा हुई पांडे...! पीठ पीछे मुंह किये किये ही भैरो पांडे ने जवाब दिया--अब गलती हो गयी थी बाऊ साहब,तो का करते.इतनी तो आदमीयत रहनी ही चाहिए.....बड़े आदमी हो गये हो पांडे..ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन उलट के पानी भर देंगे ये साले मुसहर..मुसहरों को दूध पिला के पंडिताई भले चलती हो,ठकुराई नही चलती...और ज़मींदारी तो बिलकुल नही चलती.भैरो पांडे उदास तो थे ही, ज़ालिम सिंह की बातें सुनकर अन्दर ही अन्दर तिलमिला उठे.लेकिन जवाब कुछ नही दे सके...ज़मींदार अगर अपने कर्जों का हिसाब ही मांग बैठे तो पूरी वल्दियत नप जायेगी,इस बात का एहसास था उन्हें..रात गहरा रही थी.मन मसोसकर भैरो घर लौट आये.कहते हैं उस रात भैरो पांडे को नींद नही आई..सारी रात करवट बदलते रहे.कभी बिसुनिया और कभी ज़ालिम सिंह दिमाग में नाचते रहे...भैरो पांडे रात भर छटपटाते रहे.एक तरफ ज़ालिम ज़मींदार का प्रतापी प्रकोप और दूसरी तरफ निरीह और निर्दोष मुसहर के साथ हुआ अत्याचारी अन्याय..रातभर मन में युद्ध ही चलता रहा और रात अपने आखिरी पड़ाव तक आ पहुंची..उधर ज़मींदार अपने घर पर खांसा और इधर चार बजे भोर में ही भैरो पांडे उठ बैठे और भगवदभजन में लग गये.
ये वो ज़माना था जब पेड़ काटना गुनाह नही था.क्योंकि जहाँ देखो वहां पेड़ ही दीखते थे.जंगलों की भरमार थी.आदमी ने विकास की रफ़्तार नही पकड़ी थी..कंकडों के शहर नही बने थे.तब जितने लोग होते थे उससे कई गुना ज्यादा पेड़ होते थे.एक गाँव में एक बगीचा हो सो बात नही,कई कई बगीचों में एक एक गाँव होते थे.लोगबाग पेड़,प्रकृति और पर्यावरण के साथ ही तो जीते थे.गाँवों की औरतें,बच्चे,बूढ़े,बुज़ुर्ग पेड़ लगाने के सहज आदती थे.आम,अमरुद,इमली,जामुन,केला बडहर,कटहल....इस्तेमाल के बाद शायद ही कोई होता हो जो इनके बीज धरती में न गाड़ देता हो..आम चूसना अगर ज़रूरी काम था तो उसकी कोइली ज़मीन में गाड़ देना उससे ज्यादा ज़रूरी काम था.अगर महुए का लाटा स्वादिष्ट लगता था तो उसका कोइना ज़मीन में गाड़ देना उससे ज्यादा आनन्द का काम लगता था.ग्राम्य और वन्य जीवन की सहज समरसता का जितना सुन्दर सुमेल उन दिनों होता था,उस छटा को शब्दों में उतार लाने में मेरी कलम उतनी समर्थ नही है...तब आदमी पेड़ का व्यापार नही करता था.उसे अपने परिवार का हिस्सा समझता था,इसलिए पेड़ काटना किसी की ज़रूरत ही हो सकती थी,कोई गुनाह नही..जब धुंधलका फूटा तो घर के बाहर कुछ हलचल सी महसूस कर के भैरो पांडे बाहर निकले. देखा तो ज़मींदार के दो कारिंदे उनके पिताजी से उलझे हुए थे.पता चला कि इमली का एक बड़ा-सा गुच्छा टूट कर गिरा और भागवत पांडे ने उसे उठा लिया..कारिंदे वही इमली का गुच्छा मांग रहे थे.भागवत पांडे कह रहे थे कि इमली हमारे दरवाजे पर है तो इतना हक़ तो हमारा भी है.इसके सौ नुकसान हम सहते हैं तो एक ज़रा सी इमली नही ले सकते.कारिंदों ने कहा-इस पेड़ का पत्ता-पत्ता ज़मींदार का है.ज़मींदार के कारिंदों की भाषा सुनते हुए और पिता का अपमान होते देखते हुए भैरो पांडे कुछ देर चुप-चाप खड़े रहे.अचानक से वे जोर से तडपे--भाग साले........! जा के बोल दे अपने बाप से कि इमली उसके बाप की नही है.इमली मेरे पुरखों ने लगाईं थी और आज इसको कटवा के छोडूंगा.......! बाप रे बाप......! गजब हो गया.अंग्रेजों के राज में क्रूर ज़मींदार के खिलाफ इतनी ऊंची आवाज़...कारिंदों को लगा कोई सपना देख रहे हैं.जो कोई सोच भी नही सकता था,वो प्रत्यक्ष घटित हो रहा था.घरों की महिलायें दरवाजों तक दौड़ आयीं.आस-पड़ोस के लोग जुटने लगे..और कारिंदे इस अघटनीय की सूचना देने ज़मींदार के घर की ओर भागे.रात भर की उदासी पूरी तरह विद्रोह की भावना में ढल गयी.भैरो पांडे ने आवाज़ दी--बुलाओ मुसहरों को.......! एक घडी बीती कि दो घडी,किसी को नही मालूम लेकिन तीसरी घडी में देखने वालों ने देखा---बिसुनियाँ 8-10 मुसहरों के साथ लम्बे-लम्बे डग भरता चला आ रहा है...और क्षण नही बीते, जब भैरो पांडे ने ललकारा और 8-8 किलो लोहे से बनी 8-10 कुल्हाड़ियाँ एक साथ इमली के पेड़ पर बरस पड़ीं.
ज़मींदार को खबर मिली होगी.लेकिन शायद वो भी कुछ देर को सहमा होगा.क्योंकि तुरंत कुछ हलचल नही हुई.शायद फिरंगी सत्ता के खिलाफ बन रहे देशव्यापी माहौल की तपिश देश के हर कोने में महसूस की जाने लगी थी.बहुत संभव है कि ज़ालिम सिंह ने भी बदलाव की चिंगारी को महसूस किया हो..कारिंदों के लौटने में कुछ वक्त लगा,लेकिन इतना वक्त किसी क्रांति के लिए तो बहुत होता है.एक घंटा बीतते-बीतते इमली का तना आधा तो कट गया.कुल्हाड़ियाँ धडाधड बज रही थीं.इमली का कट जाना आज बाभन टोले की नाक का सवाल बन गया था.लेकिन इमली का कट जाना ज़ालिम सिंह के प्रभुत्व का खत्म हो जाना भी तो था.कारिंदे नही लौटे,प्रजा के विद्रोह की इस आग से लोहा लेने ज़मींदार ज़ालिम सिंह स्वयं आ पहुंचे और पूरी आवाज में गरजे---ख़बरदार पांडे....आज अनर्थ हो जाएगा.भैरो पांडे भी लगभग साथ-साथ चिल्लाये--अनर्थ तो हो चुका बाऊ साहब,आज दिमाग बहुत खराब है.जितनी जल्दी हो सके,उतनी जल्दी गाँव छोड़ दीजिये वरना सहेजा होगा,सहेजा...! ज़मींदार ठिठका,और सामने बदल रहे दृश्य पर यकीन नही कर पाया.मुसहर कुल्हाड़ियाँ लेकर और बाभन लाठी लेकर एक साथ दौड़े..ज़मींदार को उलटे पाँव पूरी जान लगाकर भागना पड़ा और अगले एक घंटे में मोटे-मोटे रस्से बाँधकर सैकड़ों लोगों ने खींचकर पेड़ को सामने के खेतों में गिरा दिया....! भैरों पांडे के कलेजे में बरसों से धधकती हुई आग पर पानी पड़ा.इमली का वो पेड़ क्या गिरा,मुझे तो ऐसा लगता है कि यह वही समय था,जब भारत में आज़ादी की सुबह झिलमिलाने लगी थी.सदियों से दबे कुचले लोगों,वो चाहे मुसहर रहे हों ,दलित रहे हों या शोषित प्रजा का कोई भी हिस्सा रहा हो,उसके अंदर का गुबार फूटने लगा था,लोगों में जकड़न तोड़ने का हौसला आने लगा था.सोते-सोते लोग कसमसाने लगे थे.गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे थे.फिरंगी सत्ता का प्रभामंडल बिखर रहा था.मन के आक्रोश शब्दों में ढलने लगे थे.शोषित दलित वंचित लोग घरों से निकलने लगे थे.शहरों और प्रशासनिक केन्द्रों से दूर...सुदूर ग्रामीड अंचलों में जनभावनाएं अंगडाई ले रही थीं.जिस देश में हर मजबूत आदमी अपने से कमज़ोर आदमी पर शासक था,उस देश की हवाओं में उठ रहे इस जनज्वार को ताक़त देने हर कमज़ोर और शोषित आदमी अपने से मज़बूत शोषक के साथ खड़ा हो रहा था.
इमली का पेड़ नही,ज़मींदार ज़ालिम सिंह की नाक कट गयी थी.ज़मींदारी के साम्राज्य पर उस रात मानो तुषार बरस गया था.दिन भर लोगों का तांता लगा रहा.उस सीढ़ीदार व्यवस्था के सभी मज़बूत शोषक ज़मींदार की मिजाजपुर्सी और ठकुरसुहाती में पूरे दिन लगे रहे.दिन तो मूंछे ऐंठते बीत गया.लेकिन जब रात हुई.तो बिलकुल वैसी ही,जैसी भैरो पांडे की पिछली रात थी.पिछली रात भैरो पांडे पश्चाताप की आग में जल रहे थे और एक घनघोर उदास मनोदशा की गहन गिरफ्त में थे,सो पूरी रात जागते बीती.आज की रात जालिम सिंह प्रतिशोध की आग में जल रहे थे और एक घनघोर निराशा की गहन गिरफ्त में थे,सो उनकी भी रात जागते ही बीती.एक के बाद एक आयी इन दो रातों ने रजा और प्रजा को अलग-अलग अपना अस्तित्व बचा पाने के संघर्ष में जहाँ एक तरफ बड़ी बेरहमी से झोंक दिया था,वहीँ दूसरी ओर ग्राम्यांचल के सूने आसमान में जैसे कुछ रंग भी भर दिये थे.सबेरा हुआ तो भैरो पांडे मुसहरों को उनकी मजूरी देने मुसहर बस्ती की ओर चले और जालिम सिंह भैरो पांडे को उनकी औकात बताने अदालत चले.जिस समय जमींदार की संपत्ति पर दिन दहाड़े डाका डालने का मुकद्दमा भैरो पांडे पर दर्ज हो रहा था,उस समय वे मुसहरों से उनकी बस्ती में जाकर माफ़ी मांग रहे थे.मुकद्दमा कुछ साल चला.दोनों अपने-अपने मुकद्दमों की पैरवी करने शहर जाते रहे.कोर्ट में मिलते रहे और एक दूसरे के दुश्मन बने रहे.इसी दरम्यान निजाम बदल गया और देश आज़ाद हो गया.इस कहानी में अब बस एक लाइन की बात और बची और वो ये कि एक दिन मुकद्दमे की किसी तारीख पर भैरो पांडे के हाजिर न होने से अगली तारीख पड़ गयी और जिले तक जाकर तथा हाकिम का हुकुम सुनकर जालिम सिंह गाँव लौट रहे थे.सिवान से लौटते हुए भैरो पांडे से अचानक आमना सामना हो गया.दोनों एक दूसरे से कतरा के निकलना ही चाहते थे कि अचानक लगा जैसे जालिम सिंह लहराये हों...जैसे गश आ गया हो उन्हें..उनको पीछे की ओर ढहता देख भैरो पांडे जरा देर को ठिठके..और पीछे को लौटे..और अगले ही पल ज़ालिम सिंह भैरो पांडे की गोंद में थे.खेत की उस मेड पर,जहाँ भैरो पांडे की गोद में लेटे जालिम सिंह हांफ रहे थे,वहां आने वाले देश की,आज़ाद समाज की कितनी ही रवायतें लिखी गयी,मनों के कितने ही अंतर्बंध टूटे,उन्हें लिखने के लिए कोई अलग कहानी लिखनी होगी..सिवान में उस समय सिर्फ दो ही शब्द सुनाई पड़ते थे.....बाऊ साहब....! पांडे....! बाऊ साहब....! पांडे....बाबू साहब....! पांडे...! भैरो पांडे ने जालिम सिंह को सहारा देकर उन्हें उनके घर पहुँचाया..कुछ दिन दवा,इलाज हुआ लेकिन जालिम सिंह ज्यादा नही जिए.खेत में गिरने के बाद एक महीने के अन्दर ही उनकी मृत्यु हो गयी..लेकिन इमली के पेड़ की ये कहानी अमर हो गयी.एक बात ये भी कि सुना है आज भी भैरो पांडे के वंशज अपने मुसहरों के लिए जान लड़ा देते हैं.

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  1. अतीत से एक और बेहतरीन कहानी। ऐसी कथाएँ ही रही होंगी जिन्हों ने देश की आजादी की फिजाँ को रवानी दी होगी।

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