दुर्गादास राठौर मारवाडाधिपति महाराज जसवंत सिंह के धीर-वीर-गंभीर और शेरदिल सेनापति;अनन्य सेनानी थे.लहू की गरमी भुजाओं में फड़कती और व्यक्तित्व का रुआब मूंछों में झलकता.औरंगजेब के दांत खट्टे कर देने वाला वीरप्रसूता भारत-भूमि का गर्वीला लड़ाका.मारवाड़ की सरजमीं जिसके सदके जाती है और भारत भूमि जिसकी आज भी कर्जदार है,दुर्गादास मारवाड़ के प्रसिद्ध राठौर सरदार थे.. वे जोधपुर रियासत के मंत्री असिकर्ण के पुत्र... थे.औरंगजेब की ओर से तब राजा जसवंत सिंह काबुल अभियान पर थे,जब दस दिसम्बर 1678 को उनकी मृत्यु हो गई.उस समय उनकी दो रानियाँ गर्भवती थीं.एक बच्चा तो नही बचाया जा सका लेकिन दूसरी रानी का बच्चा जब पैदा हुआ,तब राज-परिवार औरंगजेब के नियन्त्रण में था.उसने रानी और नवजात अजित सिंह को कब्जे में लेकर उन्हें मार डालने की साजिश रची.मारवाड़ को मुगलिया सल्तनत का हिस्सा बनाने का इससे ज्यादा उपयुक्त अवसर उसे नही मिलने वाला था,क्योंकि एक तरफ तो वो मराठों की ताक़त से जूझ ही रहा था,इधर राठौरों ने भी उसे नाकों चने चबवा दिए थे.साम्राज्य और शाही सेना के कब्जे से मारवाड़-वंश के आखिरी चिराग को निकाल लाने की चुनौती वीरवर दुर्गादास के सामने पहाड़ की तरह खड़ी हो गयी.मारवाड़ संकट में था.राजपूत बौखलाए हुए थे और उनकी सारी उम्मीदें एकमात्र दुर्गादास जी की स्वामिभक्ति में सहारा ढूंढ रही थीं..ये उस योद्धा के पुरुषार्थ की पहली आग थी,जो दिल्ली में फट पड़ी.राठौर सरदारों ने औरंगजेब से आग्रह किया कि वे अजीतसिंह को मारवाड़ की गद्दी का उत्तराधिकारी स्वीकार करें। लेकिन औरंगज़ेब ने यह शर्त रखी कि अजीतसिंह मुसलमान हो जाए तो उसे मारवाड़ की गद्दी का उत्तराधिकारी माना जा सकता है। औरंगज़ेब ने अजीतसिंह और उनकी विधवा माँ को पकड़ने के लिए मुग़ल सैनिक भेजे, किन्तु चतुर वीर दुर्गादास ने औरंगज़ेब की यह चाल विफल कर दी। उन्होंने कुछ राठौर सैनिकों को मुग़ल सैनिकों का सामना करने के लिए भेज दिया.उस रण-कौशल,उस देशभक्ति और उस जूनून को आहत भाव से देखता रह गया औरंगजेब और दुर्गादास रानी और राजकुमार को मुगल सेना को चीरते हुए ले उड़े.एक बलिदान यहाँ भी हुआ था.एक मारवाड़ सैनिक की पत्नी ने युवराज की जगह सुलाकर अपना बच्चा यहाँ भी कुर्बान किया था,जिसका जिक्र इतिहास में प्रायः नही होता है.औरंगज़ेब को धोखा हुआ तो उसने जोधपुर पर क़ब्ज़ा करने के लिए विशाल मुग़ल सेना भेजी। 1680 ई. में जो युद्ध हुआ, उसमें राठौरों का नेतृत्व दुर्गादास ने बड़ी ही बहादुरी से किया। औरंगज़ेब का चौथा पुत्र अकबर(द्वितीय) अपनी वंश-परम्परा के मुताबिक पिता से विद्रोह कर चुका था.वह राठौरों से जा मिला.इस घटना से औरंगजेब सनाका खा गया.लेकिन उसने अपनी चाल चल दी.अपने विद्रोही बेटे अकबर के नाम उसने युद्धभूमि में एक पत्र भिजवाया,जिसमे लिखा था कि तुमने राठौरों के साथ मिलकर उनकी जासूसी करने का काम जिस खूबी से अंजाम दिया है,हम उससे बहुत खुश हैं.योजनानुसार पत्र राठौर सरदार तक पहुंचा दिया गया और इस खेल को न समझ पाने के कारण राठौर भडक उठे.इस छल नीति के चलते औरंगजेब अपना तख़्त बचा ले गया,वरना ये वो समय था जब राजपूत और अकबर मिलकर तख्त पलट सकते थे.एक ये दिन था कि उसके बाद कभी औरंगजेब दुर्गादास से गाफिल नही रहा और जीवनभर उन्हें नीचा दिखाने की जुगतें खोजता रहा.जब दुर्गादास को वास्तविकता का पता लगा तो वे अकबर को ख़ानदेश बगलाना होते हुए मराठा राजा शंभूजी के दरबार में ले गये. दुर्गादास ने बहुत प्रयत्न किया कि राजपूत, मराठा और अकबर की फ़ौजें मिलकर औरंगज़ेब से युद्ध करें, लेकिन आलसी शम्भूजी इसके लिए तैयार नहीं हुआ। दुर्गादास 1687 ई. में मारवाड़ वापस लौट आये. यद्यपि मेवाड़ ने औरंगज़ेब से संधि कर ली थी, तथापि मारवाड़ की ओर से दुर्गादास लगातार 20 वर्ष तक औरंगज़ेब के विरुद्ध युद्ध करता रहे.1707 ई. में जब औरंगज़ेब की मृत्यु हुई,उसके बाद ही नये मुग़ल बादशाह ने अजीतसिंह को मारवाड़ का महाराज स्वीकार किया.
इस घटना के बाद अकबर ने देश छोड़ दिया और ईरान चला गया.अबतक की कहानी का इतिहास तो सर्वज्ञात है,लेकिन इसके बाद की कहानी में वीरता के अलावा जो धीरता है,शत्रुता के अलावा जो मनुष्यता है,मुझे उसकी कहानी कहनी है.अकबर(द्वितीय) के दो बच्चे थे.शाहजादा बुलंद अख्तर और शाहजादी सफीयत.फारस की और प्रस्थान करते हुए अकबर को अपने बच्चों की फ़िक्र थी.कहाँ रखे,किसे सौंपे..!इस कथानक का जब आज भी स्मरण करता हूँ तो ह्रदय उमड़ आता है.इस भरी दुनिया में अकबर अपने बच्चे सौंप सके,ऐसा विश्वसनीय कोई था ही नही,मारवाड़ सेनापति दुर्गादास को छोडकर.ये मनुष्यता के चरम उत्कर्ष की कहानी है,जब सबसे बड़े दुश्मन के घर की इज्ज़त और भविष्य दोनों एक साथ दुश्मन के घर आ पड़े.अपने बच्चे दुर्गादास को देकर अकबर ने निश्चिन्त मन ईरान की राह ली..दुर्गादास पर तिहरी जिम्मेदारी आन पड़ी.मारवाड़ के भविष्य युवराज अजित सिंह और औरंगजेब-वंश के नौनिहालों को एक साथ पालने और मारवाड़ को उसका उत्तराधिकारी मिल जाने तक मारवाड़ की सुरक्षा करना उनका धर्म था.मै दुहराता हूँ..जी हाँ,यही उनका 'धर्म' था..लेकिन इस पाठ की असल कहानी तब शुरू होती है,जब अजित सिंह और सफीयत एक साथ ही जवान हुए.दुर्गादास जी बूढ़े हो चले थे.मारवाड़ की गद्दी पर राज-वंश का खडाऊं रखकर दुर्गादास जी निर्लिप्त मन राज्य को जुगाये चल रहे थे.इसी बीच नौजवान अजित सिंह और सफीयत एकदूसरे के प्रेमाकर्षण में पड़ गये.अजित सिंह उतावले हो रहे थे.वे सफीयत की असीम सुन्दरता पर मुग्ध थे और सफीयत प्यार के वशीभूत तो थी लेकिन अभी भी उसके जज्बात पर उसके दिमाग का नियंत्रण बना हुआ था.उसने अजित को समझाया-महाराज,आपका राज्य संकट में है.उसे आपकी जरूरत है और राजपूत सरदार या प्रजा मुसलमान महारानी स्वीकार नही करेंगे.लेकिन अजित को तब सफीयत के अलावा और कुछ सूझता ही नही था और इसी आवेग में वे वो बात कह गये,जिसपर सफीयत फट पड़ी..''नहीं चाहिए मुझे राज्य..और नही चाहिये मुझे प्रजा..मुझे सिर्फ और सिर्फ सफीयत चाहिए..''सफीयत ने फटकारा..''किसी क्षणिक आवेग के वशीभूत अपने कर्तव्य पथ से विचलित होने वाला पुरुष नारी शक्ति का समर्थन कभी नही पा सकता.''अजित इस जवाब से व्यथित हो उठे.उन्होंने दिल खोलकर रख दिया और पूछा कि सफीयत,तुम मुझसे दूर क्यों भाग रही हो..?सफीयत ने जज्बात का मान रखा और कहा कि जब दिल किसी को प्यार करने लगे किन्तु प्यार करने के लिए स्वतंत्र न हो,तो उससे दूर ही भागता है.दो मनों में पल रहे इस जज्बे से अनजान दुर्गादास राज-काज में व्यस्त थे..लेकिन एक शख्स था,जिसके अंदर का शैतान धीरे-धीरे दम तोड़ रहा था और उसकी जगह कहीं मोह माया,अपना पराया के लरजते भाव जन्म ले रहे थे.औरंगजेब को अब सफीयत और बुलंद की याद सताने लगी थी.उसने दुर्गादास को बुलवा भेजा.हरकारे थे औरंगजेब के विश्वसनीय ईश्वरदास जो दुर्गादास की वीरता के कायल थे.उन्होंने वचन दिया कि मैंने औरंगजेब की आँखों में पश्चाताप के आंसू देखे हैं.आप चलिए,कोई धोखा नही होगा.कूटनीतिक तैयारियों के साथ दुर्गादास जी औरंगजेब के दरबार में हाज़िर हुए.मिलते ही बूढ़े बादशाह ने धमकी दी-इस्लामपुरी तक आ तो गये हो दुर्गादास,वापस नही जा पाओगे.इतना सुनते ही ईश्वरदास के हाथ अपनी तलवार की मूठ पर जा लगे.दुर्गादास ने कहा-शांत रहिये ईश्वरदास जी,आज औरंगजेब की तलवार मेरी गर्दन नही छू सकती.फिर औरंगजेब से बोले-जहाँपनाह..आपने दुर्गादास का नाम भी दौलतबेग रख लिया हो तो आपकी मर्जी.मै तो ब्रह्मपुर को ही जानता हूँ,इस्लामपुरी को नही..औरंगजेब ने कहा-मेरा तुमसे ठिठोली का भी नाता है दुर्गादास..लेकिन क्या तुम्हे सच में डर नही लगता मुझसे..?दुर्गादास ने कहा-मै जनता हूँ औरंगजेब पक्का हिसाबी है.ज़िन्दपीर से वो डरे जहाँपनाह,जिसके पास सफीयत और बुलंद अख्तर न हों.मै जानता हूँ जबतक मेरे दोस्त के बच्चे मेरे पास हैं,आपकी तलवार दुर्गादास को छू भी नही सकती.औरंगजेब हारी हुई हंसी हंसा और असल बात पर आया-मेरे बच्चे मुझे दे दो दुर्गादास...राठौर बोला-वे वहां सुरक्षित हैं....''अब क्या बुढ़ापे में बदला लोगे हमसे...?ये तो सोचो,अब अजित सिंह भी जवान हो रहे हैं.''.....''नही नही,मै कौन होता हूँ हुज़ूर,लेकिन मुझे महारानी से इजाज़त लेनी होगी.बच्चे राज्य के संरक्षण में हैं.ठहाका लगा के हंसा औरंगजेब..किसे बेवकूफ बना रहे हो दुर्गादास..क्या मुझे मालूम नही कि दुर्गादास की मर्जी के बिना मारवाड़ में एक पत्ता भी नही हिलता...?....''लेकिन महारानी पत्ता नही हैं जहाँपनाह...वे पूर्ण सत्ता प्राप्त महारानी हैं.''....ओह्ह्हह्ह्ह्ह...तलवा र हाथों से दूर जा गिरी और नर-पिशाच घुटनों पर हो आया..दुर्गादास ने पासा फेंका-अगर जहाँपनाह युवराज अजित सिंह को मारवाड़ नरेश स्वीकार कर लें तो महारानी से बात की जा सकती है..घायल तड़प उठा,लेकिन उम्र साथ छोड़ चुकी थी.फिर भी उसका अहंकार उसके साथ था.उसने जवाबी पासा फेंका-तुम चाहो तो मै तुम्हे महाराज घोषित कर सकता हूँ.दुर्गादास बोले-राजपूत को गाली मत दो जहाँपनाह.इन बूढी हड्डियों में रक्त की गर्मी अभी बहुत बाकी है.राजपूत कुछ भी कर सकता है,अपनी वफादारी का सौदा नही कर सकता.आपको सफीयत चाहिए तो मुझे पूर्ण राज्य चाहिए.औरंगजेब की आँखों में आंसू तैर आये देखकर पिघले दुर्गादास और कहा-जहाँपनाह,राजपूत निजी रिश्तों का मान करना जानता है.मै भी ठिठोली ही कर रहा था.मैंने आपके आंसू देखे.आपके बच्चे आपको मिल जायेंगे..इतना सुनना था कि हहाकर दौड़ा औरंगजेब और दुर्गादास को बाहों में भर लिया..''मै जानता था तुम क्रूर नही हो सकते..
लौट आये दुर्गादास तो सफीयत ने पूछा-बाबा,आप हमे राजनीति की बिसात पर हार आये..?टूटकर रोये दुर्गादास-नही मेरी बच्ची,ऐसा कभी मत सोचना.तेरे दादाजान बहुत बूढ़े हो गये हैं,उन्हें सच में तुम्हारी याद आती है.मैंने उन्हें रोते देखा..सफीयत चौंकी-क्या...क्या कहा आपने..?आलीजाह रोते हैं....?उनके आंसू छूकर देखे आपने...?लाल तो नही थे..?...नही बेटी,अब वे सचमुच पश्चाताप कर रहे हैं...ये अचानक ज़िन्दपीर के लिए बाबा के मन में उमड़ता प्यार देखकर सफीयत को संशय हो आया..बात क्या है आखिर..! लेकिन उसे पता कैसे लग सकता था कि सयानी होती बेटियों के पिता इतने निश्चिन्त और अनजान नही होते.उन्हें युवराज के विचलन की खबर थी.अचानक अजित सिंह उधर आ ही निकले और सफीयत के जाने की बात सुनी तो ज़ारा रुआब खा गये.बोले-आप कौन होते हैं ये फैसला करने वाले..युवराज मै हूँ और मेरे होते सफीयत को कोई नही ले जा सकता.दुर्गादास जी ने विनम्रता से कहा-मेरा सिर महाराज की शान में झुकता है,लेकिन ये बेटी तो अपने बाप की अमानत है मेरे पास और ये कोई राज्य की संपदा नही है.इसके बारे में अंतिम फैसला मै ही करूँगा.हाँ,उसमे महारानी मां की सहमति भी जरूर होगी.बौखला उठे युवराज और बोले-''इसीलिए तो आपने मुझे अभीतक बच्चा बना के रखा है.इस तरह तो राज्य पर ही नजर गडाए बैठे हैं आप.''आत्मा चीत्कार कर उठी दुर्गादास की और चिल्ला पड़े मुकुंद दस खीची,जो वहीँ खड़े थे.वही मुकुंद दास खीची,जिनका बच्चा आततायी की तलवार के नीचे रखकर बचाए गये थे अजित सिंह.चिल्ला पड़े मुकुंददास-उडो महाराज..खूब उड़ो...लेकिन इस बूढ़े पंछी के डैनों का अपमान करोगे तो जो तलवार तुम्हे अबतक बचाने के लिए लहू पीती आई है,उसे अपना धर्म ज्ञात है.किसी से पूछने नही जाना होगा मुझे..यहीं फैसला हो जाएगा.''शांत होइए मुकुंद दास जी..दुर्गादास जी बोले...''शिविका का प्रबंध कीजिये.मुझे बेटी विदा करनी है.''अजित सिंह ने तलवार निकाल ली तो सफीयत ने धिक्कारा..ये अपमान सहन नही होगा महाराज..इतना याद करके खुश रहिये कि सफीयत आपकी मुहब्बत दिल में लिए जा रही है..मुकुंद दास और दो अन्य कहारों के साथ मिलकर दुर्गादास जी ने बेटी की शिविका को कन्धा लगाया तो शेर की आँखों से दो बूँद लहू चूकर मारवाड़ की मिटटी में विलीन हो गये........................... ...................
.............................. ......................इसके बाद की कहानी इतिहास है मित्रों.अजित सिंह ने बौखलाकर कहा था-मै तुम्हे देशनिकाला देता हूँ दुर्गादास....और डोली आगे बढ़ गयी..रोते जाते थे और चलते जाते थे दुर्गादास जी..सीमा पर रुके और अपनी कांवर बुलंद अख्तर को सौंपी..''दादाजान को ये कुरआन देना बेटी..कहकर छिछियाकर रोये दुर्गादास..रो पड़ी सफीयत भी.दोनों भाई बहन दादा के घर पहुंचे...तो बस एक दृश्य बाकी रह गया,जिसका ज़िक्र भाई द्रिग्विंदुमणि सिंह ने अपने कमेन्ट में किया था.औरंगजेब बहुत खुश था.उसने सफीयत और बुलंद अख्तर को कुरआन पढाने के लिए मौलवी बुलाया तो सफीयत को याद आया-''बाबाजान,बाबा ने आपके लिए कुरआन पाक भेजी है..''...कुरआन पाक....?दुर्गादास ने...?ठिठोली करता है वो,चलो तुम्हे सीखने के काम आएगी....''लेकिन मुझे तो कुरआन पूरी याद है..बाबा ने इस्लामी रवायत की पूरी तालीम दिलाई है हमे..''...कहकर सफीयत कुरआन की आयतें उच्चारने लगी..औरंगजेब का मुंह खुला का खुला रह गया..वह अवाक था मित्रों और इतिहास में दर्ज है कि औरंगजेब का मन दुर्गादास के लिए श्रद्धा से भर उठा.ये अलग बात है कि उसने मारवाड़ की गद्दी पर अजित सिंह को मान्यता फिर भी नही दी...और ये काम उसके इंतकाल के बाद ही हुआ.पूरी तरह स्वतंत्र और संप्रभु मारवाड़ अजित सिंह को सौंपकर दुर्गादास राठौर ने सन 1720 में इस संसार से विदा ली..
इस घटना के बाद अकबर ने देश छोड़ दिया और ईरान चला गया.अबतक की कहानी का इतिहास तो सर्वज्ञात है,लेकिन इसके बाद की कहानी में वीरता के अलावा जो धीरता है,शत्रुता के अलावा जो मनुष्यता है,मुझे उसकी कहानी कहनी है.अकबर(द्वितीय) के दो बच्चे थे.शाहजादा बुलंद अख्तर और शाहजादी सफीयत.फारस की और प्रस्थान करते हुए अकबर को अपने बच्चों की फ़िक्र थी.कहाँ रखे,किसे सौंपे..!इस कथानक का जब आज भी स्मरण करता हूँ तो ह्रदय उमड़ आता है.इस भरी दुनिया में अकबर अपने बच्चे सौंप सके,ऐसा विश्वसनीय कोई था ही नही,मारवाड़ सेनापति दुर्गादास को छोडकर.ये मनुष्यता के चरम उत्कर्ष की कहानी है,जब सबसे बड़े दुश्मन के घर की इज्ज़त और भविष्य दोनों एक साथ दुश्मन के घर आ पड़े.अपने बच्चे दुर्गादास को देकर अकबर ने निश्चिन्त मन ईरान की राह ली..दुर्गादास पर तिहरी जिम्मेदारी आन पड़ी.मारवाड़ के भविष्य युवराज अजित सिंह और औरंगजेब-वंश के नौनिहालों को एक साथ पालने और मारवाड़ को उसका उत्तराधिकारी मिल जाने तक मारवाड़ की सुरक्षा करना उनका धर्म था.मै दुहराता हूँ..जी हाँ,यही उनका 'धर्म' था..लेकिन इस पाठ की असल कहानी तब शुरू होती है,जब अजित सिंह और सफीयत एक साथ ही जवान हुए.दुर्गादास जी बूढ़े हो चले थे.मारवाड़ की गद्दी पर राज-वंश का खडाऊं रखकर दुर्गादास जी निर्लिप्त मन राज्य को जुगाये चल रहे थे.इसी बीच नौजवान अजित सिंह और सफीयत एकदूसरे के प्रेमाकर्षण में पड़ गये.अजित सिंह उतावले हो रहे थे.वे सफीयत की असीम सुन्दरता पर मुग्ध थे और सफीयत प्यार के वशीभूत तो थी लेकिन अभी भी उसके जज्बात पर उसके दिमाग का नियंत्रण बना हुआ था.उसने अजित को समझाया-महाराज,आपका राज्य संकट में है.उसे आपकी जरूरत है और राजपूत सरदार या प्रजा मुसलमान महारानी स्वीकार नही करेंगे.लेकिन अजित को तब सफीयत के अलावा और कुछ सूझता ही नही था और इसी आवेग में वे वो बात कह गये,जिसपर सफीयत फट पड़ी..''नहीं चाहिए मुझे राज्य..और नही चाहिये मुझे प्रजा..मुझे सिर्फ और सिर्फ सफीयत चाहिए..''सफीयत ने फटकारा..''किसी क्षणिक आवेग के वशीभूत अपने कर्तव्य पथ से विचलित होने वाला पुरुष नारी शक्ति का समर्थन कभी नही पा सकता.''अजित इस जवाब से व्यथित हो उठे.उन्होंने दिल खोलकर रख दिया और पूछा कि सफीयत,तुम मुझसे दूर क्यों भाग रही हो..?सफीयत ने जज्बात का मान रखा और कहा कि जब दिल किसी को प्यार करने लगे किन्तु प्यार करने के लिए स्वतंत्र न हो,तो उससे दूर ही भागता है.दो मनों में पल रहे इस जज्बे से अनजान दुर्गादास राज-काज में व्यस्त थे..लेकिन एक शख्स था,जिसके अंदर का शैतान धीरे-धीरे दम तोड़ रहा था और उसकी जगह कहीं मोह माया,अपना पराया के लरजते भाव जन्म ले रहे थे.औरंगजेब को अब सफीयत और बुलंद की याद सताने लगी थी.उसने दुर्गादास को बुलवा भेजा.हरकारे थे औरंगजेब के विश्वसनीय ईश्वरदास जो दुर्गादास की वीरता के कायल थे.उन्होंने वचन दिया कि मैंने औरंगजेब की आँखों में पश्चाताप के आंसू देखे हैं.आप चलिए,कोई धोखा नही होगा.कूटनीतिक तैयारियों के साथ दुर्गादास जी औरंगजेब के दरबार में हाज़िर हुए.मिलते ही बूढ़े बादशाह ने धमकी दी-इस्लामपुरी तक आ तो गये हो दुर्गादास,वापस नही जा पाओगे.इतना सुनते ही ईश्वरदास के हाथ अपनी तलवार की मूठ पर जा लगे.दुर्गादास ने कहा-शांत रहिये ईश्वरदास जी,आज औरंगजेब की तलवार मेरी गर्दन नही छू सकती.फिर औरंगजेब से बोले-जहाँपनाह..आपने दुर्गादास का नाम भी दौलतबेग रख लिया हो तो आपकी मर्जी.मै तो ब्रह्मपुर को ही जानता हूँ,इस्लामपुरी को नही..औरंगजेब ने कहा-मेरा तुमसे ठिठोली का भी नाता है दुर्गादास..लेकिन क्या तुम्हे सच में डर नही लगता मुझसे..?दुर्गादास ने कहा-मै जनता हूँ औरंगजेब पक्का हिसाबी है.ज़िन्दपीर से वो डरे जहाँपनाह,जिसके पास सफीयत और बुलंद अख्तर न हों.मै जानता हूँ जबतक मेरे दोस्त के बच्चे मेरे पास हैं,आपकी तलवार दुर्गादास को छू भी नही सकती.औरंगजेब हारी हुई हंसी हंसा और असल बात पर आया-मेरे बच्चे मुझे दे दो दुर्गादास...राठौर बोला-वे वहां सुरक्षित हैं....''अब क्या बुढ़ापे में बदला लोगे हमसे...?ये तो सोचो,अब अजित सिंह भी जवान हो रहे हैं.''.....''नही नही,मै कौन होता हूँ हुज़ूर,लेकिन मुझे महारानी से इजाज़त लेनी होगी.बच्चे राज्य के संरक्षण में हैं.ठहाका लगा के हंसा औरंगजेब..किसे बेवकूफ बना रहे हो दुर्गादास..क्या मुझे मालूम नही कि दुर्गादास की मर्जी के बिना मारवाड़ में एक पत्ता भी नही हिलता...?....''लेकिन महारानी पत्ता नही हैं जहाँपनाह...वे पूर्ण सत्ता प्राप्त महारानी हैं.''....ओह्ह्हह्ह्ह्ह...तलवा
लौट आये दुर्गादास तो सफीयत ने पूछा-बाबा,आप हमे राजनीति की बिसात पर हार आये..?टूटकर रोये दुर्गादास-नही मेरी बच्ची,ऐसा कभी मत सोचना.तेरे दादाजान बहुत बूढ़े हो गये हैं,उन्हें सच में तुम्हारी याद आती है.मैंने उन्हें रोते देखा..सफीयत चौंकी-क्या...क्या कहा आपने..?आलीजाह रोते हैं....?उनके आंसू छूकर देखे आपने...?लाल तो नही थे..?...नही बेटी,अब वे सचमुच पश्चाताप कर रहे हैं...ये अचानक ज़िन्दपीर के लिए बाबा के मन में उमड़ता प्यार देखकर सफीयत को संशय हो आया..बात क्या है आखिर..! लेकिन उसे पता कैसे लग सकता था कि सयानी होती बेटियों के पिता इतने निश्चिन्त और अनजान नही होते.उन्हें युवराज के विचलन की खबर थी.अचानक अजित सिंह उधर आ ही निकले और सफीयत के जाने की बात सुनी तो ज़ारा रुआब खा गये.बोले-आप कौन होते हैं ये फैसला करने वाले..युवराज मै हूँ और मेरे होते सफीयत को कोई नही ले जा सकता.दुर्गादास जी ने विनम्रता से कहा-मेरा सिर महाराज की शान में झुकता है,लेकिन ये बेटी तो अपने बाप की अमानत है मेरे पास और ये कोई राज्य की संपदा नही है.इसके बारे में अंतिम फैसला मै ही करूँगा.हाँ,उसमे महारानी मां की सहमति भी जरूर होगी.बौखला उठे युवराज और बोले-''इसीलिए तो आपने मुझे अभीतक बच्चा बना के रखा है.इस तरह तो राज्य पर ही नजर गडाए बैठे हैं आप.''आत्मा चीत्कार कर उठी दुर्गादास की और चिल्ला पड़े मुकुंद दस खीची,जो वहीँ खड़े थे.वही मुकुंद दास खीची,जिनका बच्चा आततायी की तलवार के नीचे रखकर बचाए गये थे अजित सिंह.चिल्ला पड़े मुकुंददास-उडो महाराज..खूब उड़ो...लेकिन इस बूढ़े पंछी के डैनों का अपमान करोगे तो जो तलवार तुम्हे अबतक बचाने के लिए लहू पीती आई है,उसे अपना धर्म ज्ञात है.किसी से पूछने नही जाना होगा मुझे..यहीं फैसला हो जाएगा.''शांत होइए मुकुंद दास जी..दुर्गादास जी बोले...''शिविका का प्रबंध कीजिये.मुझे बेटी विदा करनी है.''अजित सिंह ने तलवार निकाल ली तो सफीयत ने धिक्कारा..ये अपमान सहन नही होगा महाराज..इतना याद करके खुश रहिये कि सफीयत आपकी मुहब्बत दिल में लिए जा रही है..मुकुंद दास और दो अन्य कहारों के साथ मिलकर दुर्गादास जी ने बेटी की शिविका को कन्धा लगाया तो शेर की आँखों से दो बूँद लहू चूकर मारवाड़ की मिटटी में विलीन हो गये...........................
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