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Sunday, 3 August 2014

बीएचयू से राजघाट:एक यात्रा




जब कभी बीएचयू की ओर निकल आओ तो पुराने दिन सिनेमा की तरह आँखों में तैर जाते हैं.यूँ बीएचयू के स्टूडेंट हम कभी नही रहे,लेकिन बीएचयू में पढ़ रहे अपने दोस्तों के साथ अपनी दादागिरी के भी क्या दिन थे वे..! जब चंदौली पोलिटेक्निक के अपने हॉस्टल से इधर आते तो दोस्तों की बांछें खिल जातीं और रात-रात भर जागने के प्रोग्राम फिक्स्ड हो जाते.ये ...इलाका बनारस का शिरो-प्रदेश है..इस विशाल परिसर के एक तरफ गंगा है और दूसरी तरफ आबादी..उन दिनों हमलोग गंगा से लेकर गोदौलिया तक दिन रात एक किये रहते थे.आज काफी समय बाद इस तरफ आना हुआ तो वह समय याद आ गया.इधर कम ही आना हो पाता है..कहाँ तो राजघाट..और कहाँ तो बीएचयू..संकटमोचन और दुर्गा-कुंड होते लौट पड़िये..विजया सिनेमा हॉल अब आईपी विजया है..मॉल बना दिया है उसे..गुंजन सिनेमा तो खत्म ही हो गया..पिछले पच्चीस सालों में बदलती हुई दुनिया के साथ बनारस ने भी कदमताल खूब किया है..पंजाबी रेस्तरां लंका से लेकर केरला कफ़े भेलूपुर तक आलम अब भी वैसे ही दीखता है,उम्र वही है,बस चेहरे वे नही हैं..'जनवार्ता' का पुराना ऑफिस इसके बाद ही है,पर सोनारपुरा,मदनपुरा और पाण्डेय हवेली छोड़ के हम काशीराज अपार्टमेंट्स होते हुए रथयात्रा की तरफ चल पड़ते हैं..कितना बदल गया पर कुछ तो वैसा ही अब भी है.जरा बारिश हो जाय कि आधा थल और आधा जल में बनारस लिए कवि केदारनाथ सिंह खड़े हो जाते हैं,शहर अब भी ताल तलैया बन जाता है..हम फिर घूमते हैं कमच्छा और लक्सा होते गदौलिया की ओर..यानी काशी का ह्रदय प्रदेश..इधर का लोक-जीवन आस्था-निमग्न जीवन है.घंटा-घड़ियाल,मन्दिर और गंगा.. और यहीं इधर ही फैला हुआ है बनारस की जगत-प्रसिद्ध गलियों का जाल..गोदौलिया से मैदागिन की इस पैदल यात्रा में मेरे साथ आप भी महसूस कर सकते हैं दो समांतर पटरियां..नागिन-सी बल खाती इस सडक पर बनारस के पुराने बाज़ार हैं..तो साथ-साथ गलियों का झुरमुट भी..एक दूसरे को काटते हुए ये गली-विन्यास ..आप इनमे घुस सकते हैं,भटक सकते हैं..और बाहर भी निकल सकते हैं,लेकिन गारंटी लेता हूँ,भूल नही सकते..कहीं न कहीं निकल ही आयेंगे.इन्ही गलियों का घुमाव आपको शीतला मंदिर की सीढ़ियों पर भी उतार देता है..और महा श्मशान की भभूत भी मल दे सकता है.मणिकर्णिका और सतुआ बाबा आश्रम..एक साथ..एक लय..एक ताल..सदियों से..युगों से..वाह बनारस..!
सतुआ बाबा पीठ-परम्परा की 51वीं पीढ़ी मौजूद है..आद्य सतुआ बाबा का मूल गुजरात में है..काशी की मणिकर्णिका पर महाभूत शंकर ने सतुए का प्रसाद बांटने का आदेश दिया और पीठ स्थापित हो गया..आध्यात्मिक आभा यामुनाचार्य जी की यौगिक चर्याओं से फूटी पड़ती थी.आज आश्रम के गुरु-पीठ में हजारों बटुक हैं..मुमुक्षु पीड़ा के बाद निर्जीव शरीरों की पंक्तिबद्ध आवाजाही से निर्विकार एक जीवन है यहाँ..जलते शवों को देखने सैलानी भी आते हैं.हंगरी की एक युवा माँ अपने 8 साल के बेटे को शव-दाह दिखाना चाहती है..चिताओं के बीच खडी है.मुर्दों की इस दुनिया में खड़ी इस विदेशी माँ के चेहरे पर जलती लाशों का एक खौफ भी है.बच्चे को जो दिखाना चाहती है,उसे खुद देखने की ताब नही.बच्चे की आँखों पर हाथ रखे वापस नीचे को भागती है.वह किसी से बात करना चाहती है..भाषा की दिक्कत महसूस होती है.पर ये बनारस है.यहाँ तो रेडयो भी मिर्ची के नाम से जाना जाता है.हर कोई अंग्रेजी दां है..लकड़ी वाला भी..रिक्शा वाला भी..हर डोम..हर अंत्येष्टि कर्मी..यू सी मैडम..टू हंड्रेड थ्री हंड्रेड बॉडी बर्निंग हियर डेली..बनारस के हर घाट का एक अपना ही नशा है..आगे बढ़ता हूँ..कुरता पाजामा पहने लम्बे बालों वाला गन्दला सा हिप्पी खंजड़ी लिए टहल रहा है.उसके दोस्त के हाथ में माउथ ऑर्गन है..बनारसी किशोर मुंह में पान भरे वहां ऊपर सीढ़ियों पर भोजपुरी तान छेड़े है.....''राधिका जी काहे कइलीं प्यार....किशन कन्हैया से.....!तीनो की आँखें मिलती हैं और साज सज जाते हैं.ऑर्गन भी बजने लगता है,खंजड़ी भी डिमडिमा उठती है..छोकरा नाच-नाच के गाता है.घाट के लडकों का झुण्ड टेरी भरता है...और देशों,भाषाओं की दीवार खंड-खंड हो जाती है.संगीत की इस बोली में तीनों रसिक एक दूसरे तीसरे की तरंग को महसूस करते हैं और यह सामूहिक और अंतर्राष्ट्रीय किस्म का ताल घाट पर घंटे भर का रोमांच बना देता है.
लौट रहा हूँ वापस समांतर सड़क पर.मैदागिन,लोहटिया और 'आज' अख़बार होते कबीर चौरा,पिपलानी,लहुराबीर,जगतगंज...फिर अंधरा पुल...यहाँ आज का बनारस मिलेगा....धूल,गंदगी और धुंएँ में अंटा पड़ा है..ट्रैफिक का शोर,जाम और बेदर्द जिंदगी.सड़क के किनारे बंजारों के आशियाने,कूड़े के ढेर के ढेर लगे हैं.देश पर बोझ बनी ये आबादी पता नही,कहीं कागजों में भी है या नही,लेकिन सड़क पर तो है.इनमे बचपन भी है,जवानी भी है,बुढ़ापा भी है...मौत से बदतर जिंदगियां सड़क पर घिसटने के लिए शापित हैं जैसे.नीचे से पुराना जीटी रोड और ऊपर से नया बना फ्लाई ओवर गुजर रहा है.इस फ्लाई ओवर की भी बड़ी बेवजह सी कहानी है.ट्रैफिक को आसान करने के लिए शहर को तीन फ्लाई ओवर मिले थे.सैकड़ों करोड़ रूपये और सालों की मुश्किलों के बाद जब ये तैयार हुए तो तीनो ही मुसीबत बन गये,ट्रैफिक जाम के अनेक कारणों में से तीन महत्वपूर्ण कारण अब ये ओवर भी हैं,जो फ्लाई करते हैं.शहर का ये हिस्सा किसी विकासशील देश की तरह है,जिसमे केवल एक बात समझ में नही आती कि इसे विकासशील कहते क्यों हैं..इसी फ्लाई ओवर के ऊपर या नीचे,कहीं इधर या उधर,कोने अंतरे में आगे पीछे वे दोनों दिख ही जाते हैं,जो काले कलूटे..धूलि-धूसरित,नंग-धड़ंग कहीं लेटे,कहीं टहलते जैसे एक दूसरे को ही चुनौती देते-से हों--अबे एक ही मोहल्ले में दो नही रह सकते..ये पागल लोग हैं..जिला-प्रशासन को,अखबार वालों को कई बार कहा जागरूक जनों ने कि भइया,ये भी इंसान ही हैं,कुछ करो इनके लिए..लेकिन अफसरों के जिम्मे और भी तो बहुत काम हैं,अखबारों के पास और भी तो ख़बरें हैं.अंधरा पुल से चौकाघाट होते,अलईपुरा और जैतपुरा होते गोलगड्डे तक आइये.इतने हिचकोलों में तो आपकी कमर सीधी हो ही जाएगी.सिटी स्टेशन से गोलगड्डा के बीच अब्दुल बिस्मिल्लाह की ''झीनी-झीनी बीनी चदरिया'' के पात्र मिलेंगे..बुनकरों की आबादी वाला यह इलाका बूचडखाने के चलते असहनीय दुर्गन्ध से बारहों महीने भरा रहता है..और यहीं सड़क किनारे की पटरियों पर है नशेड़ियों का स्वर्ग..एक से एक टक्कर लेते बेजान शरीर..मैले कुचैले कपडे और बजबजाती नालियों के ऊपर रखे पटरों पर बैठी ये बेचैन आत्माएं अपनी देह में सुइयां घोम्पने की तैयारी में तल्लीन हैं..बाज़ दफे ये देख भी सकते हैं आपको,पर सुई ले लेने के बाद तो फिर जमाने भर को देख लेने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं अपने अंदर..हम बनारस के कटि-प्रदेश की यात्रा पर हैं..
कज्जकपुरा पार करके भदऊँ होते हम चढ़ान पर आते हैं..ऊपर है काशी स्टेशन और रेलवे ओवर ब्रिज के नीचे है बनारस का अघोषित शाश्वत बाढ़-क्षेत्र..चार बूँद भी पानी बरसा तो चार दिन की बिपत खड़ी..ये काशी के चरण हैं.हम यहीं,काशी के चरणों में ही रहते हैं.गंगा मइया पद-प्रक्षालन करती है इन चरणों का.भूत भगवान की नगरी इन चरणों में सुवास बसाए है..ये राजघाट है..जहाँ वरुणा अपनी गंगा से और गंगा अपनी वरुण से आ मिलती हैं..आधी ही है,पर ये बनारस के एक ओर से दूसरे छोर तक की यात्रा है...

Monday, 28 April 2014

बनारस:आधा जल में,आधा थल में..

बनारस के घाटों की ओर कैमरे का मुह करके मीडिया चैनल दुनिया को बनारस की घाट-संस्कृति की महत्ता बता रहे हैं.कुछ कैमरे मंदिरों की ओर,कुछ गलियों की ओर और कुछ का रुख बाज़ारों की ओर है.ये चैनल संसार को वही बनारस दिखा रहे हैं,जिसे सब पहले से जानते हैं---शोरूम-बनारस---.बनारस में छोटे-बड़े मंदिरों की संख्या 1,50,000 के आस-पास है.गलियों में,सीढ़ियों पर,दीवारों पर,चबूतरों पर,रेती पर,छज्जों पर,घरों में,घोसलों में...,पेड़ों में,तालाबों में,कहाँ नही है मंदिर.....!इन सभी में घंटा-घड़ियाल बजते ही रहते है,शंखनाद होता ही रहता है,और धार्मिक,सांस्कृतिक गतिविधियाँ चलती ही रहती हैं.इनमे से लगभग आधे मंदिरों को चलाने,संभालने वाले समूहों,समितियों में जैनों,बौद्धों,मुसलमानों,सिक्खों और ईसाईयों के नाम भी शामिल हैं.साल भर चलने वाली काशी की रामलीला के अनेक पात्र अनेक जिलों,अनेक प्रदेशों और अनेक धर्मो से होते हैं.बनारस की गलियां अपनी बनावट में ईंट-पत्थर की ही हैं,लेकिन अपने चरित्र में रबड़ जैसी होती हैं.तीन फुट चौड़ी गली में एक मिनट के अन्दर 5 सांड,10 मोटरसाइकिलें,50 साइकिलें और 500 आदमी एक साथ बड़े आराम से एक दुसरे को क्रॉस कर सकते हैं.गली फैलती हो जैसे....!लेकिन मजाल क्या कि कोई सांड किसी की ओर ताके भी.एकदम गऊ जैसे......विश्वनाथ गली में रामदाना,अक्षत,आदि की बोरियां लादे ट्रालियां भी इस भीड़ के बीच से उतने ही आराम से गुज़र जाती हैं.सांड की निगाह केवल इन्ही बोरियों पर होती है.फूल,माला,रोली,चन्दन आदि की बोरियों की ओर सांड देखता भी नही.लेकिन चावल और रामदाने की बोरी गुजरी नही कि अचामक नन्दी की सींघ बोरी के अन्दर.क्रॉस करते-करते भी दो चार किलो प्रसाद नीचे.नन्दी का काम हो गया.....!बनारस में बाज़ारों की शाम प्रायः सालभर गुलज़ार ही रहती है.इस रौनक में विशुद्ध सांस्कृतिक हलचलें भी शामिल हैं.प्रसिद्द अडियों के अलावा यहाँ मर रही अडियाँ भी हैं,जहाँ कभी बनारस की साहित्यिक रवायतों की नीव डाली जाती थी.भारतेंदु से लेकर प्रेमचंद तक ने जो नीव रखी,उसे काशीनाथ सिंह तक सम्मृद्ध रखने वाले साहित्यकारों की उम्र बढ़ने,सक्रियता घटने और उदासीनता के कारण ऐसी कई अडियाँ अब सुनसान हैं और अपनी विरासत को याद कर रही हैं.प्रेमचंद कम से कम महीने में एक बार लमही से पैदल प्रसाद जी के घर उनसे मिलने आया करते थे.बीस किलोमीटर के इस रास्ते में चार अडियाँ थीं,क्या गुल खिलते रहे होंगे जब कामायनी का कवि और गोदान का सर्जक दोनों एक साथ बैठते होंगे.उच्चतम साहित्यिक मूल्यों की ये बनारसी सांस्कृतिक विरासत किसी चैनल का आकर्षण नही है..गलियों की जीवन-संस्कृति उनका विषय नही है.32 लाख से ऊपर की आबादी जिन गाँवों में बसी हुई है,जिन छोटी बड़ी नदियों से घिरी हुई है,जिन काम-धंधों में लगी हुई है,इन बातों से इन चैनलों को कोई मतलब नही है.इनके लिए बनारस में दिखाने को आठ-दस बड़े मंदिर हैं,बनारस की साडी है,बुनकर है,बीएचयू है और गंगा है..इन्होने अगर पढ़ा होता कि बनारस आधा जल में है,आधा थल में है,आधा मन्त्र में है,आधा शव में है और आधा तो अकेले धूमिल के गाँव में है,तो वे वोट का रुझान जानने इन जगहों पर होते.मेरे मित्र केशव शरण का एक हाइकू बनारस के साहित्यिक गलियारों में खूब चलता है,क्योंकि यह बनारस का चित्र और चरित्र दोनों बनाता है.....कहीं भी रहो......अजान की आवाज.....सुनाई देगी....इसी को कहते हैं गंगा-जमुनी संस्कृति.आजकल यह सवाल सोशल मीडिया पर छाया हुआ है.आदमी की ज़िन्दगी का हर पहलू जैसे कि बाज़ार में ही आ खड़ा हुआ है.इस बाज़ार में,बाजारू संस्कृति के चुनाव-प्रचार के नमूने भी हैं.शहर में पानी की सभी बड़ी टंकियों के ऊपर बीजेपी के झंडे और सभी प्रमुख चौराहों पर उसकी होर्डिंग्स हैं.कांग्रेस,सपा,बसपा के कार्यकर्ता उदास-मन अपने-अपने गाँवों,मुहल्लों में हैं.ऐसे में आम आदमी पार्टी के पक्ष में करीब 5 हज़ार लड़के टोपी लगाए,पैंट पहने और शरीर पर नारे लिखवाये दिन-दिनभर सड़क पर पैदल टहल रहे हैं और मुंह से कुछ नही बोल रहे हैं.ऐसे में हर-हर महादेव की नगरी में हर-हर मोदी का नारा देने वाले दलों का गढ़ बनने से बनारस इनकार करने जा रहा है.सुना है,मोदी के खिलाफ सभी दल अरविन्द के समर्थन में इकठ्ठा हो रहे हैं.भीलों ने लूट लिया वन, राजा को खबर ही नही.

बनारस में मोदी-मिल

बनारस में मोदी-मिल बंद होने जा रही है.अधिकतर वेतनभोगी कर्मचारी सड़क पर हैं.बाकी जो बचे हैं,वो भी छंटनी की मार झेल रहे हैं.एकमुश्त 6 करोड़ से ऊपर का जो सैम्पल मिल ने 24 तारीख को सड़कों पर बाँट दिया,उसका बेहद उल्टा असर मार्केटिंग पर पड़ा है.लोग इस थर्ड क्लास माल की खुल्ली बन्दर-बाँट से भड़क गये हैं.ऐसे में दूसरी कम्पनियों ने भी अपने-अपने शेयर वापस खींच लिये हैं और मोदी-मिल का मार्किट धड़ाम हो गया है.मोदी ...मिल के डाउन टू अर्थ होने की ये कहानी दिलचस्प भी है और आई-ओपनिंग भी.पहले तो इन लोगों ने अपनी चिमनियाँ जमीन पर नही,आसमान में गाड़ दीं.ऊपर-ऊपर इतना काला धुंआ फेंका कि पहले से ही सांस लेना दूभर हो रहे शहर में आँखें खोल के रख पाना भी दुश्वार होने लगा.बनारस के आसमान में गजब का दृश्य बन गया.काली-काली चिमनियों से निकलते काले-काले धुंए के बीच काला-काला मन लिए केशरिया बाने में प्रेतात्माएं विचरण करने लगीं.ये प्रेतात्माएं किसी लहर पर सवार बताई जाती रहीं.अब जो शहर ही आधा जल और आधा थल में खड़ा है,उसके लिए इस जहरीली लहर को बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया.बनारस की पहचान का सवाल ही संकट में पड़ गया.प्रेतात्माओं ने एक तरफ इसे अपना गढ़ मान लिया,दूसरी तरफ आज़ादी के आन्दोलन की धर्म-निरपेक्ष विरासत पर भी हाथ डाल दिया और इसकी मिली-जुली संस्कृति पर किटकिटाते हुए अपने दांत गड़ा दिए.अब इस दर्द से बनारस तिलमिलाया हुआ है.नये-नये ये रईस भूल गए कि काशी करवट भी लेती है.बनारस में छोटे-बड़े हर शिवाले पर मुखर 'हर हर महादेव' का मन्त्र मोदी मिल के चुनौती देते नारों के सामने मद्धिम पड़ता देखकर महादेव की तीसरी आँख पर जोर पड़ने लगा.तीसरी आँख के कंपकंपाते ही इधर मोदी-मिल के मार्किट मैनेजरों की बुद्धि पर ताले पड़ना शुरू हो गये.धकाधक प्रोडक्शन बढ़ता रहा और माल डम्प होता रहा.धुंए से भरे आसमान में नारे छींटकर मोदी-मिल के मालिकों ने सुनामी बुला ली.सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' ने बताया था कि लोहे का स्वाद जानना हो तो उस घोड़े से पूछो,जिसके मुंह में लगाम होती है.आसमान को ही धूमिल किये बैठे इन नव-रईसों ने 'धूमिल' गुरु की बात नही मानी और अपनी सठियाई हुई जंग लगी अक्कल पर ज्यादा भरोसा करने लगे.लोहे का स्वाद जल्दी से जान लेने के चक्कर में इन लोगों ने मिल के गेट का लोहा ही चबाना शुरू कर दिया.अब क्या..?जो होना था,वो शुरू हो गया.महादेव ने त्रिशूल पर थपकी दे दी..काशी करवट हो गयी.सारी चिमनियाँ जमींदोज हो गयीं और प्रेतात्माएं पेड़ों में दुबक गयीं.सुनामी कहर बनकर आकाश-कुसुमों पर गिरी.दिवा-स्वप्न धूल होकर आसमानी धुंए में विलीन हो गये.अब तो बस अपनी-अपनी छातियाँ हैं,अपने-अपने हाथ हैं.पीट मुसाफिर पीट..

Monday, 24 March 2014

बनारस का बुढवा मंगल:एक विहंगम अवलोकन

रास-रंग,राग-भंग,फगुआ-चैती,गुलाल-अबीर,केवडा-गुलाब और दूध-मलाई में डूबी ठंढाई,बीच गंगा में बजडों का बेडा और सारी रात की मस्ती...यह बनारस का बुढवा मंगल है.1730 से लेकर अब तक यानी लगभग 284 वर्ष.. बीच में कई वर्ष छूटे भी,लेकिन इतनी बार आयोजित होकर भी जो अभी जवान है और जिसका नाम लेते ही बच्चे-बूढ़े सब जवान हो जाते हैं , वह है बनारस का अपना बुढवा मंगल. बनारसी रहन सहन , जीवन शैली , अलमस्त फक्कड़शाही और निराले रंग- ढंग की पहचान देता एक प्रतीक उत्सव.. यह जल-उत्सव है. भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक वर्णन देखिये- -गंगा में चहुंओर से,दीपहिं दीप लखात. नावनि सो सुरसरि छिप्यो,जल नही नेकु दिखात. तब नावों से गंगा पट जाती थी और और 'जल नहीं नेकु दिखात' का चित्र चरितार्थ होता था.. वह चित्र इस बार भी उपस्थित था.. जल नही नेकु दिखात--यह नदी की व्यथा-कथा है.. जल- पुरुष राजेन्द्र सिंह कहते हैं.. अब गंगा है ही कहाँ.?? जल नहीं नेकु दिखात.. ..जो दीखता है,वो तो मात्र जल-मल है. 9 अप्रैल 2013 की शाम बनारस के दशास्वमेध घाट पर बुढ़वा मंगल की महफ़िल सजी. यह संस्कृति का सरकारी आयोजन था. बनारस के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों की मेजबानी में ऐतिहासिक विरासत को जिन्दा रखने की इस कोशिश ने काशी के मानस में कई दिनों से उल्लास घोल रक्खा था.

इस पर्व के ऐतिहासिक आख्यानों से गुजरते हुए कई बार लगा कि पहले इस आयोजन की सांस्कृतिक जमीन बहुत समृद्ध थी. कल्पना के उन दृश्यों का आवाहन करें,जब भारतेंदु और महाराज बलवंत सिंह के होते रास-रंग की यह महफ़िल गंगा की गोद में सजा करती थी..तब में और अब में जो सबसे बड़ा फर्क आया है,वो ये की तब गंगा थी,पर अब गंगा नही है.जो गंगा आज काशी के घाटों को छूकर गुजर रही है. तब इन घाटों पर चढ़कर लहराया करती थीं. क्योकि तब वह थी. अब तो वह बह नही रही है,गुजर रही है..बस गुजर रही है. डॉ शुकदेव सिंह की बात बड़ी प्रासंगिक है- "तब बनारस के सभी रईस,जिनमे भारतेंदु हरिश्चंद, शाह घराने के लोग, सुडिया राजघराने के पंडित शिव कुमार शास्त्री के पूर्वज, काशीपुरा के मालिक बाबू प्रभुनारायण सिंह के पुरनिया ,भद्दूमल कोठी वाले रईस , घुघ्ररानी गली वाले केडिया , सितारे हिन्द के परिवार वाले ओसवाल, भेलूपुरा के बच्चा बाबू के पूर्वज , शिवाला के जगन्नाथ दास रत्नाकर के घर वाले , राजा मोतीचंद , बाबू किशोरी रमण , दारागंज वाले अस्थाना कायस्थों के पूर्व पुरुष , गली-गली के मस्त मौले 'बदमाश दर्पण' वाले तेग अली ,बड़े रामदास , छोटे रामदास , जद्दन बाई दालमंडी वाली, हुस्ना बाई , छप्पनछुरी,सकलडीहा वाले नन्हकू सिंह - सभी रंगीन मिजाज वालों के बीच सारी रात गाते-बजाते, गुलाब की पंखुड़ियों से खेलते , इत्र-फुलेल, ठंढाई,कसेरू का शर्बत, भांग-बूटी का गोला-गोली, माज़ूम , बर्फी खाते हुए नाच गाना सुनते थे. कुछ ऐसे बुढ़वे भी होते थे जो आपस में जुड़े हुए बजडों को अलग-थलग करने के लिए गंगा में डुबकी लगाकर रस्सी काट देते थे. रईस एक तरफ,नाचने वाली दूसरी तरफ, तबलची तीसरी तरफ, सारंगी वाले चौथी तरफ घाट-घाट पर बहने लगते थे. इसी को रंग में भंग कहते थे.अब तो यह मुहावरा ही लोगों की समझ में नही आता कि रंग में भंग, भांग है या भेद- विभाजन. अब मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट पर केवल धुआं-धुआं हो रहा है.कैसे पढ़े जांय बुढवा मंगल के आसाद..! कैसे याद करूँ बनारस के वे दिन और ये दुर्दिन..!'' काशी का यह प्राचीन लक्खा उत्सव कब शुरू हुआ,यह शोध का विषय है.शायद गोस्वामी तुलसीदास के समय इसकी शुरुआत हो गयी थी.जेम्स प्रिन्सेप 1830 में 'बनारस इलस्ट्रेटेड' में बुढवा मंगल का चित्र और काशी-खंड का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार के दिन लोग दुर्गा जी का दर्शन करने जाते थे.. दुर्गाकुंड के पास मेला लगता था .. यहाँ भस्म रमाये , मोरपंखी बांधे बहुरूपिये घुमते दिखाई देते थे.. नृत्य होते थे और फ़कीर गाते थे.. शाम को यह मेला गंगा तट पर आ जाता था.. रात के नौ बजे काशी नरेश रामनगर किले से अपनी "सोनमुखी" पर बैठे , हुक्का पीते काशी के घाटों की तरफ आते थे, जहाँ 'हिंगुन' का गाना होता था.. राजा बलवंत सिंह और मीर रुस्तम अली एक ही झरोखे से इसका आनंद उठाते थे.. डॉ मोतीचंद और पंडित कुबेर नाथ शुक्ल के अनुसार बनारसियों ने 1730 में काशी के चकलेदार मीर रुस्तम अली को बिजया (भांग) छनाकर खांटी बनारसी बना दिया था.. तबसे वे सारे त्यौहार बड़े उत्साह से मनाते थे..'बनारस गजेटियर' लिखता है कि रजा बलवंत सिंह को ब्रह्महत्या लगी थी.. उसी के प्रायश्चितस्वरूप उन्होंने गंगा पूजा की और रात्रि में उत्सव किया, जो बाद में बुधवा मंगल बन गया.. महाराजा ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह ने इस उत्सव का रूप निखारा और ,मेले को चरमोत्कर्ष पर पंहुचा दिया.. उनके दरबार में भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसी प्रतिभाएं थीं.. महाराज के अनुसार मेले के संस्थापक्क भारतेंदु के दादा बाबू हरषचंद थे.. इतिहास बताता है कि भारतेंदु युग में मेला जमकर होता था लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के समय मेला शिथिल हो गया.. वैसे तो बनारस में गलियां अभी भी हैं और हैं तो मस्तमौले भी लेकिन वे सभी अब केवल गालियों में ही मडराते हैं..

हाँ तो जब हम अस्सी घाट से नाव से चले तो उस दिन बुढवामंगल की संध्या झुक रही थी.. अपनी छाती पर दो दर्जन से अधिक बजडों के बोझ से बेखबर गंगा अपने टूटते घाटों और सिकुड़ती धारा को हवा के थपेड़ों से सम्हालती आगे बढ़ रही थी.. गंगा के पेटे में एक उमस है, दर्द और दुर्गन्ध का एक भभूका हो जैसे.. पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग के अधिष्ठाता रामानंद तिवारी , उनकी धर्मपत्नी पुष्पा जी और बीएचयू के प्रोफ़ेसर राजा वशिस्ठ त्रिपाठी के साथ हम चले नाव लेकर सत्वर... तो सुमित्रानंदन पन्त याद आ गये और मन में उमड़ उठा उनका वह चित्र-काव्य- "सैकत शय्या पर दुग्ध धवल , तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल. लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल.." हाँ सही तो है.. लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल... पर न तो दुग्ध है, न ही उसकी धवलता.. बस एक गहन श्यामलता है, जो चारो और पसरी हुई है.. गंगा में हमारा नौका-विहार दमघोंटू उमस से भर जाता है... नाव को दिशा देता माझी जनरेटर चालू कर देता है और काले होते वातावरण में घुलता हुआ धुंआ नाव की गति को तेज कर देता है.. घाटों पर लगे बड़े-बड़े हैलोजन बल्बों की रौशनी गंगा की कालिमा को चीरती है.. दूर दशाश्वमेध घाट पर बजडों की महफिल दिखने लगी है.. हम मेले में पीछे से दाखिल हो रहे हैं.. सामने से आने में सुरक्षा का सरकारी घेरा रोकता है... बजडों पर जो हैं, वे इस आयोजन से जुड़े लोग ही हैं.. काशी का साधारण जन घाट पर ही है- दूर से ही मस्ती का आलम देखता हुआ.. मेजबान जिला कलेक्टर और आयुक्त महोदय की अगवानी हो रही है.. मुख्य मंच पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान के जमाई अली अब्बास खान की शहनाई गूँज रही है..हम मुख्य बजड़े पर आते हैं लेकिन ऊपर चढ़ने से हमें रोक दिया जाता है.. बुढवा मंगल की मस्ती का खुमार थोडा उतरता है.. हम बगल वाले बजड़े की ओर लपकते हैं.. उधर पुलिस वाले खड़े हैं.. डीएम साब आ रहे हैं.. मुख्य कार्यक्रम रोक दिया गया है.. कार्यक्रम संचालक की आवाज गूंजती है- हर हर महादेव.... पीछे से कमिश्नर साहब की नाव भी आ रही है.. शहनाई के स्वर रुक गये हैं.. घाटों पर जनता सकुचाई-सी तटस्थ मन से खडी है.. रईसों के बजड़े अलग हैं..- आजकल धन्नासेठों को ही रईस मान लेने का प्रचलन है.. जिनके निमन्त्रण पर हम आये थे, उन डीएम और कमिश्नर महोदय के बजडारोहण के तुरंत बाद मुख्य मंच पर सरगोशियाँ शुरू हो जाती हैं.. शहर के सम्मानित नागरिक और सुप्रसिद्ध कलाविज्ञ राजेश्वर आचार्य ने माइक सम्हाला हुआ है.. जब वे बोलते हैं तो लगता है जैसे साक्षात सरस्वती बोल रही हैं.. उम्मीद जगती है कि जलोत्सव के शबाब का समय शायद आ पहुंचा.. आचार्य राजेश्वर के स्वर हवा में तैरते हैं- "आयुक्त महोदय आज इस कार्यक्रम में संयुक्त होकर नियुक्त हुए हैं." संयुक्त होकर अर्थात सपत्नीक, यह अर्धनारीश्वर भगवान की भूमिका है.आचार्य उसी भाव में आतिथेय का परिचय दे रहे हैं.. संयुक्त आयुक्त को नियुक्त करते हुए आचार्य राजेश्वर की शब्दावली को काशीवासी थोडा असहज भाव से सुन रहे हैं.. आखिर ये सरकारी अधिकारियों की वही फ़ौज है, जो जिस जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए मान पाती है, उसी में खयानत के लिए अदालतों में फटकारी जाती है.. गंगा के बेटे माँ का दर्द कैसे सहें.. और कैसे सुने अपनी नदियों का आर्तनाद!वरुणा के पेटे में आज होटल खड़े हैं,असी नदी का पता ही नही है.रही गंगा,तो उसके लिए करोड़ों खर्च करके भी न हम उसे अविरल कर पाए,न निर्मल कर पाए.गंगा पर आज बुढवा मंगल का बोझ भी भारी है.प्लास्टिक कचरे के साथ-साथ फूल-मालाओं के रूप में हम अपनी श्रद्धा का कचरा भी गंगा को सौंपने आये हैं.मेहमानों का स्वागत करने की परम्परा मेजबानों के स्वागत में चरित्र बदल रही है.इस बार का सांस्कृतिक जलोत्सव सदियों पुराने व्याकरण को तोड़ रहा है.लेकिन रसिक-जन तो फगुआ और चैती के रस में डूबने आये हैं.इन उपालाम्भों से तैरकर बाहर आते लोगों को देर नही लगी.संगीत का नशा बनारस में आम और ख़ास दोनों के सिर सवार ही रहता है.फिर बुढवा मंगल तो मस्ती भरे माहौल का प्रतिनिधित्व करता है.इस सांगीतिक आयोजन ने साल दर साल अपने इतिहास के पन्नों में सुनहरा अध्याय जोड़ा है.अली अब्बास खान साहब ने परम्परागत शैली में चैती और होली की धुनें सुनायीं.उनके बाद आयीं रेवती साकलकर और उनके बाद जब अनुराधा पाल के मंच पर आने की घोषणा हुई तो बजडों और घाटों पर जमा रसिक-समाज सावधान हो गया.देश की एकमात्र महिला तबला-वादक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुकीं अनुराधा पाल ने राग शंकरा और दुर्गा में निबद्ध अनूठी जुगलबंदी पेश की.बनारस,पंजाब,दिल्ली और मेरठ घरानों की वादनशैली प्रस्तुत करते समय उनकी उँगलियों की चपलता देखकर काशीवासियों को पंडित किशन महाराज की याद हो आई.गत और उठान आदि परम्परागत शैलियों के साथ अनुराधा ने अन्त्याक्षरी भी पेश की.इसके बाद जब पंडित महादेव प्रसाद के राग मिश्र खमाज में रचित ठुमरी पर कुमुद दीवान ने तान लिया तो पुरनियों के मन में गिरजा देवी और सिद्धेश्वरी देवी की स्मृतियाँ ताजा हो गयीं.हर हर महादेव के जयघोष के साथ काशी के जन-समाज ने इन सुर-साधिकाओं का अभिनन्दन किया.
काशी में बुढवा मंगल के होने का जहाँ एक गौरवशाली इतिहास है,वहीँ उसके न होने का भी अपना इतिहास है.आज़ादी की लड़ाई के दौरान जब 1919 में जलियांवाला बाग़ में कत्लेआम हुआ,तो काशी उसके गम में डूब गयी.यह आयोजन कई साल स्थगित रहा..इसके पहले 1835 में बुढवा मंगल ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए प्रेरित किया.तत्कालीन काशी नरेश ईश्वरीनारायण सिंह के आमंत्रण पर चरखारी-नरेश रतन सिंह सहित बुंदेलखंड के कई राजा बुढवा मंगल में भाग लेने काशी आये थे.राजाओं में अंग्रेजों के अत्याचार की बात चली.यहाँ हुए फैसले के मुताबिक़ 1836 में बुंदेलखंड में चरखारी के सूपा नामक स्थान पर बुढवा मंगल आयोजित किया गया,जिसमे बुंदेलखंड की 42 रियासतों के राजाओं ने भाग लिया.उल्लेखनीय है कि स्वतन्त्रता का प्रथम राजनैतिक प्रस्ताव 1836 में आयोजित बुढवा मंगल के इसी अवसर पर पारित किया गया था.

Tuesday, 5 November 2013

एक शाम वरूणा को लजाते देखा!


मेरे गांव से चलने वाली बस तब 9 रूपये के किराये में बनारस पहुंचा देती थी, जहां से आने में अब 80 रूपये लगते हैं। यह 1984 की बात है। कम्प्यूटर नाम की किसी नयी मशीन का दुनिया में तब बहुत शोर मचा हुआ था, जो लाखों और करोड़ों के जोड़-घटाने पलक झपकते कर देती थी। दुनिया विकास के नये-नये मानदण्ड स्थापित कर रही थी। हमारा देश भी विकसित होने लगा था। अपने गांव के देहाती वातावरण से निकलकर जब हम बनारस पहुंचते थे, तो शहर का चमत्कार और विकास की रफ्तार देखकर चमत्कृत रह जाते थे। बनारस में महमूरगंज नाम की कोई जगह है, ये देहात से आने वाला हर व्यक्ति जानता था, क्योंकि वह रेडियो सुनता था और बनारस का रेडियो स्टेशन महमूरगंज में था। सारनाथ में रेडियो का टॉवर है, यह जान लेने के बाद हम ट्रेन या बस में से ही उसे देख लिया करते थे। बड़े-बड़े, पक्के-पक्के मकान, चारों ओर सड़कें, टैम्पो, रिक्शे... सब अजीब लगता था। पाण्डेयपुर, कचहरी से होते हुए जब हमारी बस वरुणा के पुराने पुल पर पहुंचती थी, तो कोर्स में पढ़ी हुई जयशंकर प्रसाद की कविता-अरी! वरुणा की शान्त कछार, तपस्वी के विराग की प्यार... सहज ही कानों में गूंजने लगती थी। मन वरुणा जल की कल-कल सुनकर शहर में घुसते ही हरिया उठता था। मुख्य शहर शुरू होने से पहले, इसी पुल पर हमें हमारे देहात का अंतिम वातावरण मिलता था। नीचे वरुणा की किल्लोलें... कल-कल, छल-छल... और दूर-दूर तक दिखते हरी नदी के हरे पाट। स्वच्छता और हरियाली की चादर-सी बिछी दिखती थी। मेरा गांव मुझे इसी जगह छोड़कर वापस चला जाता था। इतने में बस आगे बढ़ जाती और शहर-शहर होते हुए हम गंगा के किनारे राजघाट पहुंच जाते थे। तब हमारे मन में गांव और नदी दोनों साथ-साथ रहते थे। फिर धीरे-धीरे हम भी विकसित होने लगे। गंगा, वरुणा, प्रसाद, कविता... सब विकास का शिकार हो गये।
कल काफी समय बाद मैं अपने मित्र और वरिष्ठ हिन्दी कवि केशव शरण के साथ वरुणा के उसी पुराने पुल पर खड़ा था। दोनों पुलों के बीच वरुणा के किनारे शास्त्री घाट का सरकार ने कायाकल्प कर दिया है। सुंदर सीढ़ियां ऊंची होती हुई दूर सड़क तक दिखायी देती हैं। एक मंच भी बना है 'ओपेन एयर थियेटर' जैसा। केशव शरण बता रहे थे कि यहां हर साल एक या दो बार कोई बड़ा कार्यक्रम होता है और काफी भीड़ जुटती है। लेकिन यह भीड़ अपनी संस्कृति का केचुल घाट पर ही छोड़कर वापस चली जाती है। हम दो घंटे से ज्यादा समय तक वहीं खड़े रहे। वरुणा काशी की निजी धरोहर है, भौगोलिक रूप से ही नहीं, सांस्कृतिक और पौराणिक रूप से भी। प्रसाद जी की कविता अचानक मन में सिर उठाने लगी। विराग के प्यार की ध्वनि और शांत कछार की बदबू एक साथ मन से टकराये। विषैले हो चुके पानी को अपने गर्भ में समेटे वरुणा के पेट से दुर्गंध आ रही थी। काशी ने अपने मिजाज के हिसाब से कई सारी निजी संस्कृतियां भी विकसित की हैं, बहुत कुछ उसे प्रकृति से भी मिला है। न जाने कितनी संस्कृतियों की गवाह दक्षिणवाहिनी गंगा जब बनारस पहुंचती है तो उत्तरवाहिनी हो जाती है और काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक छटा में एक हार की तरह टंग जाती है। लेकिन वरुणा तो काशी की अपनी नदी है, क्योंकि इसका उदय-अस्त दोनों काशी और प्रयाग के बीच ही है। यह सत्य बड़ा भयानक है कि तिल-तिल कर मरती वरुणा बहुत कष्ट में है। वह अपनी झुर्रियायी हथेलियों से अपने माथे पर भिनभिनाती हुई मक्खियों को हटाती है तो दुर्गंध का एक भभूका-सा उठता है। वरुणा दर्द में है, उसके घाव रिस रहे हैं। लेकिन काशी अपनी ही रौ में विकास के रास्ते पर बेतहाशा दौड़ रही है। वरुणा और अस्सी के बीच बसी काशी अपने तटबंध तोड़कर अनियंत्रित फैल रही है। सड़कों पर विकास का सैलाब आया है, लेकिन गंगा और वरुणा की धारा में अब सैलाब नहीं आता। लोग भ्रम में हैं कि नदी कल-कल कर रही है, वह तो त्राहि-त्राहि कर रही है। लोग भ्रम में हैं कि नदी बह रही है, वह तो ठहरी हुई है। लोग भ्रम में हैं कि काशी में गंगा भी है, वरुणा भी है, यह तो नदी की देह भर बची है, जो अब शव होने ही वाली है।
समाज की संस्कृति समाज के लोगों से ही बनती है-गरीब हो या अमीर, छोटा हो या बड़ा, खुद समाज हो या सरकार। समाज के विकास के लिए सरकार ने जो दिशा पकड़ी, उसने समाज को अमीर और गरीब में बांट कर रख दिया। धीरे-धीरे गरीब आदमी आम आदमी में और अमीर आदमी पूंजीपति में बदल गया। पूंजीपति कारखाने चलाता है, मुनाफा कमाता है और अपने कारखानों का कचरा नदी में फेंकता है। पूंजपति आम आदमी का शोषण करता है। वह नदी का भी शोषण करता है। पूंजीपति नदियों के पेटे में होटल भी चलाता है और इस तरह नदी की जमीन पर कब्जा करता है। आम आदमी नदी के पेटे में हल चलाता है और नदी के साथ ही जीता-मरता है। नदी की भी अपनी जमीन होती है। मूल धारा से पांच सौ मीटर की दूरी तक दोनों तरफ की जमीन नदी की होती है। यह जमीन नदी को समाज या सरकार नहीं, प्रकृति देती है। लेकिन वरुणा की अपनी कोई जमीन नहीं है। काशी में तो इतनी जमीन गंगा को भी नसीब नहीं है, वरुणा को तो इसकी आधी भी नहीं। यह संस्कृति के विकास की कहानी है। यह काशी की विकासशील नयी संस्कृति है।
हम देख रहे थे वरुणा का पैâलाव, उसके शहरी हो चुके झुकाव, उसका विस्तार और दोनों पाटों पर सिकुड़ती हुई उसकी सीमाएं। वरुणा के घावों को छूने की हमारी कोशिश, उस पार पड़े वूâड़े के ढेर और वरुणा-जल को मल बनाते पॉलीथीनों के पहाड़ में बिला जाती है। वरुणा की स्वच्छता में कभी हरियाली समाहित थी, तब वरुणा हंसती थी, इठलाती थी और गंगा से मिलने के लिए दौड़ती हुई जाती थी। आज वह अपने दु:ख पर रोये भी तो आंसू बहाने को पानी नहीं है उसके पास। इस घाट से संगम के बीच वरुणा रेंगते हुए चलती है। उसके किनारों पर विकास की दहाड़ गूंजती है। बीच में आते हैं किला कोहना के जंगल। राजघाट की इन जंगली वादियों तक आते-आते कारखानों के रसायनों से मिलकर वरुणा झाग-झाग हो उठती है। अपना बचा-खुचा न और संवरा चुके पानी की एक क्षीण-सी नाली, गंगा को सौंप कर वरुणा अपना मुंह जंगलों की ओर फेरकर लजाती है। नाली बन चुकी वरुणा, नाला बन चुकी गंगा को भींचकर जब रोती है, तो संगम की चटखदार दुपहरिया भी काली हो जाती है। वरुणा के घाट पर खड़ा मैं संगम तक की इस यात्रा में वरुणा के दर्द को महसूस करना चाहता हूं। आज काशी अपनी नदियों का पानी नहीं पी सकती। उधर गंगा लजाती है, इधर वरुणा लजाती है। अपनी नदी की मौत पर काशी को रूदन ठानना चाहिए, पर लगता है गंगा और वरुणा के साथ-साथ काशी की आंखों का पानी भी मर चुका है। अब जाना कि विकास के लिए नदी और पहाड़ की नहीं, अंधी दौड़ की जरूरत होती है। हम और केशव शरण शास्त्री घाट की मनोरम सीढ़ियां फलांग आये और इस दौड़ में शामिल हो लिये।