Sunday, 3 August 2014

बीएचयू से राजघाट:एक यात्रा




जब कभी बीएचयू की ओर निकल आओ तो पुराने दिन सिनेमा की तरह आँखों में तैर जाते हैं.यूँ बीएचयू के स्टूडेंट हम कभी नही रहे,लेकिन बीएचयू में पढ़ रहे अपने दोस्तों के साथ अपनी दादागिरी के भी क्या दिन थे वे..! जब चंदौली पोलिटेक्निक के अपने हॉस्टल से इधर आते तो दोस्तों की बांछें खिल जातीं और रात-रात भर जागने के प्रोग्राम फिक्स्ड हो जाते.ये ...इलाका बनारस का शिरो-प्रदेश है..इस विशाल परिसर के एक तरफ गंगा है और दूसरी तरफ आबादी..उन दिनों हमलोग गंगा से लेकर गोदौलिया तक दिन रात एक किये रहते थे.आज काफी समय बाद इस तरफ आना हुआ तो वह समय याद आ गया.इधर कम ही आना हो पाता है..कहाँ तो राजघाट..और कहाँ तो बीएचयू..संकटमोचन और दुर्गा-कुंड होते लौट पड़िये..विजया सिनेमा हॉल अब आईपी विजया है..मॉल बना दिया है उसे..गुंजन सिनेमा तो खत्म ही हो गया..पिछले पच्चीस सालों में बदलती हुई दुनिया के साथ बनारस ने भी कदमताल खूब किया है..पंजाबी रेस्तरां लंका से लेकर केरला कफ़े भेलूपुर तक आलम अब भी वैसे ही दीखता है,उम्र वही है,बस चेहरे वे नही हैं..'जनवार्ता' का पुराना ऑफिस इसके बाद ही है,पर सोनारपुरा,मदनपुरा और पाण्डेय हवेली छोड़ के हम काशीराज अपार्टमेंट्स होते हुए रथयात्रा की तरफ चल पड़ते हैं..कितना बदल गया पर कुछ तो वैसा ही अब भी है.जरा बारिश हो जाय कि आधा थल और आधा जल में बनारस लिए कवि केदारनाथ सिंह खड़े हो जाते हैं,शहर अब भी ताल तलैया बन जाता है..हम फिर घूमते हैं कमच्छा और लक्सा होते गदौलिया की ओर..यानी काशी का ह्रदय प्रदेश..इधर का लोक-जीवन आस्था-निमग्न जीवन है.घंटा-घड़ियाल,मन्दिर और गंगा.. और यहीं इधर ही फैला हुआ है बनारस की जगत-प्रसिद्ध गलियों का जाल..गोदौलिया से मैदागिन की इस पैदल यात्रा में मेरे साथ आप भी महसूस कर सकते हैं दो समांतर पटरियां..नागिन-सी बल खाती इस सडक पर बनारस के पुराने बाज़ार हैं..तो साथ-साथ गलियों का झुरमुट भी..एक दूसरे को काटते हुए ये गली-विन्यास ..आप इनमे घुस सकते हैं,भटक सकते हैं..और बाहर भी निकल सकते हैं,लेकिन गारंटी लेता हूँ,भूल नही सकते..कहीं न कहीं निकल ही आयेंगे.इन्ही गलियों का घुमाव आपको शीतला मंदिर की सीढ़ियों पर भी उतार देता है..और महा श्मशान की भभूत भी मल दे सकता है.मणिकर्णिका और सतुआ बाबा आश्रम..एक साथ..एक लय..एक ताल..सदियों से..युगों से..वाह बनारस..!
सतुआ बाबा पीठ-परम्परा की 51वीं पीढ़ी मौजूद है..आद्य सतुआ बाबा का मूल गुजरात में है..काशी की मणिकर्णिका पर महाभूत शंकर ने सतुए का प्रसाद बांटने का आदेश दिया और पीठ स्थापित हो गया..आध्यात्मिक आभा यामुनाचार्य जी की यौगिक चर्याओं से फूटी पड़ती थी.आज आश्रम के गुरु-पीठ में हजारों बटुक हैं..मुमुक्षु पीड़ा के बाद निर्जीव शरीरों की पंक्तिबद्ध आवाजाही से निर्विकार एक जीवन है यहाँ..जलते शवों को देखने सैलानी भी आते हैं.हंगरी की एक युवा माँ अपने 8 साल के बेटे को शव-दाह दिखाना चाहती है..चिताओं के बीच खडी है.मुर्दों की इस दुनिया में खड़ी इस विदेशी माँ के चेहरे पर जलती लाशों का एक खौफ भी है.बच्चे को जो दिखाना चाहती है,उसे खुद देखने की ताब नही.बच्चे की आँखों पर हाथ रखे वापस नीचे को भागती है.वह किसी से बात करना चाहती है..भाषा की दिक्कत महसूस होती है.पर ये बनारस है.यहाँ तो रेडयो भी मिर्ची के नाम से जाना जाता है.हर कोई अंग्रेजी दां है..लकड़ी वाला भी..रिक्शा वाला भी..हर डोम..हर अंत्येष्टि कर्मी..यू सी मैडम..टू हंड्रेड थ्री हंड्रेड बॉडी बर्निंग हियर डेली..बनारस के हर घाट का एक अपना ही नशा है..आगे बढ़ता हूँ..कुरता पाजामा पहने लम्बे बालों वाला गन्दला सा हिप्पी खंजड़ी लिए टहल रहा है.उसके दोस्त के हाथ में माउथ ऑर्गन है..बनारसी किशोर मुंह में पान भरे वहां ऊपर सीढ़ियों पर भोजपुरी तान छेड़े है.....''राधिका जी काहे कइलीं प्यार....किशन कन्हैया से.....!तीनो की आँखें मिलती हैं और साज सज जाते हैं.ऑर्गन भी बजने लगता है,खंजड़ी भी डिमडिमा उठती है..छोकरा नाच-नाच के गाता है.घाट के लडकों का झुण्ड टेरी भरता है...और देशों,भाषाओं की दीवार खंड-खंड हो जाती है.संगीत की इस बोली में तीनों रसिक एक दूसरे तीसरे की तरंग को महसूस करते हैं और यह सामूहिक और अंतर्राष्ट्रीय किस्म का ताल घाट पर घंटे भर का रोमांच बना देता है.
लौट रहा हूँ वापस समांतर सड़क पर.मैदागिन,लोहटिया और 'आज' अख़बार होते कबीर चौरा,पिपलानी,लहुराबीर,जगतगंज...फिर अंधरा पुल...यहाँ आज का बनारस मिलेगा....धूल,गंदगी और धुंएँ में अंटा पड़ा है..ट्रैफिक का शोर,जाम और बेदर्द जिंदगी.सड़क के किनारे बंजारों के आशियाने,कूड़े के ढेर के ढेर लगे हैं.देश पर बोझ बनी ये आबादी पता नही,कहीं कागजों में भी है या नही,लेकिन सड़क पर तो है.इनमे बचपन भी है,जवानी भी है,बुढ़ापा भी है...मौत से बदतर जिंदगियां सड़क पर घिसटने के लिए शापित हैं जैसे.नीचे से पुराना जीटी रोड और ऊपर से नया बना फ्लाई ओवर गुजर रहा है.इस फ्लाई ओवर की भी बड़ी बेवजह सी कहानी है.ट्रैफिक को आसान करने के लिए शहर को तीन फ्लाई ओवर मिले थे.सैकड़ों करोड़ रूपये और सालों की मुश्किलों के बाद जब ये तैयार हुए तो तीनो ही मुसीबत बन गये,ट्रैफिक जाम के अनेक कारणों में से तीन महत्वपूर्ण कारण अब ये ओवर भी हैं,जो फ्लाई करते हैं.शहर का ये हिस्सा किसी विकासशील देश की तरह है,जिसमे केवल एक बात समझ में नही आती कि इसे विकासशील कहते क्यों हैं..इसी फ्लाई ओवर के ऊपर या नीचे,कहीं इधर या उधर,कोने अंतरे में आगे पीछे वे दोनों दिख ही जाते हैं,जो काले कलूटे..धूलि-धूसरित,नंग-धड़ंग कहीं लेटे,कहीं टहलते जैसे एक दूसरे को ही चुनौती देते-से हों--अबे एक ही मोहल्ले में दो नही रह सकते..ये पागल लोग हैं..जिला-प्रशासन को,अखबार वालों को कई बार कहा जागरूक जनों ने कि भइया,ये भी इंसान ही हैं,कुछ करो इनके लिए..लेकिन अफसरों के जिम्मे और भी तो बहुत काम हैं,अखबारों के पास और भी तो ख़बरें हैं.अंधरा पुल से चौकाघाट होते,अलईपुरा और जैतपुरा होते गोलगड्डे तक आइये.इतने हिचकोलों में तो आपकी कमर सीधी हो ही जाएगी.सिटी स्टेशन से गोलगड्डा के बीच अब्दुल बिस्मिल्लाह की ''झीनी-झीनी बीनी चदरिया'' के पात्र मिलेंगे..बुनकरों की आबादी वाला यह इलाका बूचडखाने के चलते असहनीय दुर्गन्ध से बारहों महीने भरा रहता है..और यहीं सड़क किनारे की पटरियों पर है नशेड़ियों का स्वर्ग..एक से एक टक्कर लेते बेजान शरीर..मैले कुचैले कपडे और बजबजाती नालियों के ऊपर रखे पटरों पर बैठी ये बेचैन आत्माएं अपनी देह में सुइयां घोम्पने की तैयारी में तल्लीन हैं..बाज़ दफे ये देख भी सकते हैं आपको,पर सुई ले लेने के बाद तो फिर जमाने भर को देख लेने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं अपने अंदर..हम बनारस के कटि-प्रदेश की यात्रा पर हैं..
कज्जकपुरा पार करके भदऊँ होते हम चढ़ान पर आते हैं..ऊपर है काशी स्टेशन और रेलवे ओवर ब्रिज के नीचे है बनारस का अघोषित शाश्वत बाढ़-क्षेत्र..चार बूँद भी पानी बरसा तो चार दिन की बिपत खड़ी..ये काशी के चरण हैं.हम यहीं,काशी के चरणों में ही रहते हैं.गंगा मइया पद-प्रक्षालन करती है इन चरणों का.भूत भगवान की नगरी इन चरणों में सुवास बसाए है..ये राजघाट है..जहाँ वरुणा अपनी गंगा से और गंगा अपनी वरुण से आ मिलती हैं..आधी ही है,पर ये बनारस के एक ओर से दूसरे छोर तक की यात्रा है...

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