Sunday, 3 August 2014

मनुष्य के विलुप्त होने की भूमिका

अपने अपमान से आहत कर्ण को जब कौरव सेना का नेतृत्व करने का अवसर मिला तो वह निर्मम हो उठा.युद्धभूमि में उसका लाघव देखते ही बनता था.वह खुद कम,उसकी प्रचंड वीरता ज्यादा प्रकट,ज्यादा मुखर थी.अर्जुन के साथ द्वैरथ-युद्ध की ललकार लगाता कर्ण कुरुक्षेत्र को अपने शौर्य से रौंद रहा था.गंगानंदन भीष्म के शर-शैय्या पर जाने से कुरुपति बदले की आग में जल रहा था और कर्ण को लगातार उकसा रहा था.सबकुछ भूलकर प्रतिशोध की ज...्वाला को हवा मिलती पाकर कर्ण और भी उन्मत्त हो आया.युद्धभूमि उसके पराक्रम की अपलक गवाह हो रही थी.उसकी हुंकारों से कुरुक्षेत्र फटा जाता था.उसके दुस्साहस को दिनकर जी ने कुंजर की उपमा दी है.उन्होंने लिखा है कि--ऐसे तो नही कमल-वन में भी कुंजर धूम मचाता है.../क्या इन्ही मूलियों में मेरी रण-कला निपट रह जायेगी..,या किसी वीर पर भी वह अपना कौशल दिखलाएगी..? है कहाँ पार्थ..! है कहाँ पार्थ..लो हाथ समेटे लेता हूँ..,सबके समक्ष द्वैरथ-रण की अब उसे चुनौती देता हूँ...और इधर--पर चतुर पार्थ-सारथी आज रथ अलग नचाये फिरते थे..../ पांडव-सेना के नर-मुंडों को गाजर-मूली की तरह काटता हुआ कर्ण भूल ही गया था कि एक शीश उसके धड पर भी है..उन्माद रक्तपात का अपरिहार्य और आवश्यक तत्व होता है.सोचता हूँ यह उन्माद आज मनुष्य को किस पायदान तक ले आया है.अपने उन्माद में मत्त मनुष्य आजतक भूला ही हुआ है कि एक शीश उसके अपने धड पर भी है..निसर्ग का संहार करके विनाशकारी विकास की चहलकदमी पर्यावरण के आकाश को रौंदती हुई आगे बढ़ रही है.ग्लोबल वार्मिंग से लेकर वनों,पंछियों और जीव-जगत के समूल विनाश पर टिकी वर्तमान सभ्यता क्या रक्तपात की किन्ही नई आशंकाओं की पटकथा तैयार कर रही है..?हमारे पर्यावरण से गौरैया लुप्त हो गयी,गिद्ध ख़त्म हो गये..डायनासोर न जाने कब विलुप्त हो गये..मै सोचता हूँ प्रकृति के सीने पर दाल दलता यह मनुष्य भी क्या खुद के विलुप्त होने की भूमिका लिख रहा है...

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