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Sunday, 3 August 2014

चानमनी दी

चानमनी दी जब भी मिलती है,दौड़ के मिलती है,हउहा के मिलती है.मौसी की लड़की है,साल-दो-साल बड़ी.पिछले साल बेटे की शादी करके बहू ले आई है.इस बार भी मिली तो देखते ही दौड़ पड़ी,भर अंकवार धर लिया और नही तो बउअहट में पैर भी छूने लगी.मैंने हाथ पकड़कर कहा, पागल हो गयी हो क्या दीदी..वो बोली हां रे, तुमको देखते हैं तो पागल ही हो जाते हैं.अब तुम आ गये हो तो देखो न घर कैसा गढू हो गया है.लगता है जैसे चारो ओर एक शक्ति स...मा गयी है.कितने साल बाद मिले....?दोनों भाई बहन वहीँ खड़े-खड़े उँगलियों पर जोड़ते रहे कितने साल ...कितने साल...हम दोनो एक साथ ही बोले..मै बोला 6 साल तो हुए.वो भी बोली 6 स्साल हो गये.जब माहौल में ख़ुशी हो, शादी ब्याह के ऐसे ही मौकों पे अब मिलना हो पाता है.वरना तो किसके पास फुर्सत है अब.अगर ऐसे किसी मौके पे चानमनी दी है,तो समझिये वहां नाच है,गाना है,ख़ुशी है,हंसी है,रंग है,तरंग है,वहां एक चीज नही हो सकती..उदासी नही फटक सकती.अगर उसको एक घंटे का समय दीजिये और कहिये कि अपना पसंदीदा काम कर लो तो गाँव भर हल्ला मचा के रख देगी..खाली हँसेगी और हंसाएगी..एक घटना नही भूलती. छठ की पूजा में जब सुबह का अर्घ्य हो जाता है तो हर बेदी पर हवन होता है.. उस समय पंडितों का अभाव होने लगता है..जितना बड़ा घाट हो,उतनी ज्यादा जरूरत..लगभग हर बेदी पर एक साथ हवन करने वाले पंडितों की जरूरत पड़ती है..कुछ महिलाओं ने इसको पकड़ लिया..ई तो लड़की है..ई तो ब्राह्मण की ब्राह्मण है..ई तो कर देगी हवन..बेचारी बुरी फंसी..औरों ने भी ललकारा-हाँ हाँ कर देगी...क्यों नही कर देगी..चानमनी दी पहुंची हवन करने..बेचारी को कुछ आता तो था नही.इसी बीच व्रती महिला ने कहा-बहिनी,तनी सबके मनाय दीहा....तनी घर दुआर ....तनी गोरू-बछरू...तनी तनी सबके... बस बस...चानमनी दी को लाइन मिल गयी थी...वो शुरू हो गयी....इनकर घर दुआर कुल स्वाहा....इनकर गोरू बछरू कुल स्वाहा...इनकर खेत खरिहान कुल स्वाहा...घाट पर ठहाके लग रहे थे...चानमनी दी बड़े भक्ति भाव से हवन करने में लीन थी..इस बार मिली तो यही किस्सा कह-कह के तीन दिन हँसते रहे हम..

Sunday, 3 November 2013

सारे खतरे हमारे इसी आचरण में है..

लता मंगेशकर ने अपनी पसंद का इज़हार किया है बस... और कल तक उनके प्रति श्रद्धा-भाव रखने वाला देश आज फेसबुक पर कई फाड़ हो गया है.. फेसबुक पर देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है.. इसलिए यहाँ कही-सुनी जा रही बातो को नज़रअंदाज किया जाना संभव नहीं... आज लता जी मोदी विरोधियो और कांग्रेस समर्थकों के निशाने पर है.. अभी ज्यादा वक्त नही बीता, जब अमर्त्य सेन ने अपनी नापसंद का इजहार किया था, तब इसी तरह मोदी समर...्थको और कांग्रेस विरोधियो ने उन्हें,उनकी बेटी सहित निशाने पर ले लिया था.. वर्तमान राजनितिक चरित्र का ही विरोधी होने के कारण मै मोदी और कांग्रेस का भी विरोधी हूँ...लेकिन फिर भी मै लता मंगेशकर और अमर्त्य सेन द्वारा अपनी पसंद,नापसंद जाहिर करने के उनके लोकतांत्रिक अधिकार के समर्थन में खड़ा हूँ....मै लानत भेजता हूँ उस सोच पर,जो किसी के अपना मत जाहिर करने मात्र से, उसे अपने विपक्ष में पाकर इस हद तक बौखला जाती है कि उसका व्यक्तिगत चरित्र-हनन करती है और रास्ट्रीय जीवन में उसके कालातीत योगदान को खुद अपने सिर के बल खड़े होकर देखती व खारिज करती है.यह और चाहे कुछ भी हो...,लोकतांत्रिक मिजाज नहीं हो सकता... और अगर हमारे अन्दर पिछले ६६ सालो में इतना भी लोकतंत्र दाखिल नहीं हो सका है, तो हम उन नेताओं और सरकारों से कहीं अधिक करप्ट और अलोकतांत्रिक लोग है, जिन्हें रोज फेसबुक पर बैठकर खाना खा-खा के और पानी पी-पी के कोसते है.लता मंगेशकर की सामाजिक प्रतिष्ठा, हालांकि हम जैसे चोचलेबाजो के प्रमाणपत्र पर नही टिकी है ,लेकिन बावजूद उसके हमारा निहायत नैष्ठिक सरोकार होना चाहिए कि उनके असम्मान में एक भी शब्द न सोचा जाये,न कहा जाये,न लिखा जाये...इस बात से किसे इंकार है कि हमारी पीछे की तीन पीढियों से लेकर अबतक का हमारा सामाजिक जीवन लता मंगेशकर की अखंड संगीत-साधना के साथ-साथ धडकता रहा है.. उनके बारे में कुछ भी कमतर कहके,हम अपना ही वजूद खोयेंगे,बिलकुल उसी तरह जैसे अमर्त्य सेन के साथ किये गये बर्ताव के कारण हम खुद अपनी ही नजरो में पहले गिरे..लोकतंत्र क्या ख़ाक परिपक्व हुआ है..?? सरकारों से नहीं...,हमसे और आप से बनता है लोकतंत्र. कैसा विद्रूप है कि हमने जो लोकतंत्र पकाया है,वह किसी के अपनी पसंद-नापसंद जाहिर करने भर से उसके प्रति अपनी निष्ठाएं बाँट लेता है.. बहुत ऊँची आवाज मे कहना चाहता हूँ कि इस बात में नहीं कि कल मोदी प्रधानमंत्रीहोंगे......या राहुल......या कोई और.......!!