चानमनी दी जब भी मिलती है,दौड़ के मिलती है,हउहा के मिलती है.मौसी की लड़की है,साल-दो-साल बड़ी.पिछले साल बेटे की शादी करके बहू ले आई है.इस बार भी मिली तो देखते ही दौड़ पड़ी,भर अंकवार धर लिया और नही तो बउअहट में पैर भी छूने लगी.मैंने हाथ पकड़कर कहा, पागल हो गयी हो क्या दीदी..वो बोली हां रे, तुमको देखते हैं तो पागल ही हो जाते हैं.अब तुम आ गये हो तो देखो न घर कैसा गढू हो गया है.लगता है जैसे चारो ओर एक शक्ति स...मा गयी है.कितने साल बाद मिले....?दोनों भाई बहन वहीँ खड़े-खड़े उँगलियों पर जोड़ते रहे कितने साल ...कितने साल...हम दोनो एक साथ ही बोले..मै बोला 6 साल तो हुए.वो भी बोली 6 स्साल हो गये.जब माहौल में ख़ुशी हो, शादी ब्याह के ऐसे ही मौकों पे अब मिलना हो पाता है.वरना तो किसके पास फुर्सत है अब.अगर ऐसे किसी मौके पे चानमनी दी है,तो समझिये वहां नाच है,गाना है,ख़ुशी है,हंसी है,रंग है,तरंग है,वहां एक चीज नही हो सकती..उदासी नही फटक सकती.अगर उसको एक घंटे का समय दीजिये और कहिये कि अपना पसंदीदा काम कर लो तो गाँव भर हल्ला मचा के रख देगी..खाली हँसेगी और हंसाएगी..एक घटना नही भूलती. छठ की पूजा में जब सुबह का अर्घ्य हो जाता है तो हर बेदी पर हवन होता है.. उस समय पंडितों का अभाव होने लगता है..जितना बड़ा घाट हो,उतनी ज्यादा जरूरत..लगभग हर बेदी पर एक साथ हवन करने वाले पंडितों की जरूरत पड़ती है..कुछ महिलाओं ने इसको पकड़ लिया..ई तो लड़की है..ई तो ब्राह्मण की ब्राह्मण है..ई तो कर देगी हवन..बेचारी बुरी फंसी..औरों ने भी ललकारा-हाँ हाँ कर देगी...क्यों नही कर देगी..चानमनी दी पहुंची हवन करने..बेचारी को कुछ आता तो था नही.इसी बीच व्रती महिला ने कहा-बहिनी,तनी सबके मनाय दीहा....तनी घर दुआर ....तनी गोरू-बछरू...तनी तनी सबके... बस बस...चानमनी दी को लाइन मिल गयी थी...वो शुरू हो गयी....इनकर घर दुआर कुल स्वाहा....इनकर गोरू बछरू कुल स्वाहा...इनकर खेत खरिहान कुल स्वाहा...घाट पर ठहाके लग रहे थे...चानमनी दी बड़े भक्ति भाव से हवन करने में लीन थी..इस बार मिली तो यही किस्सा कह-कह के तीन दिन हँसते रहे हम..
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