''अरे,तू शादी क्यों नही कर लेती मानसी..23 की तो हुई...अभी क्या इरादा है तेरा...आखिर कैसा लड़का चाहिए तुझे..हुंह...?'' बेहद झुंझलाए हुए स्वर में जब पड़ोस की सुनीता आंटी ने पूछा तो पूरी बेहयाई से जवाब दिया मानसी ने--''चाहिए तो मुझे देवेन्द्र अंकल ही थे आंटी,लेकिन उनको तो आप ले उड़ीं बीस साल पहले ही,वरना...''कहकर मानसी ने एक छुट्टा-सा कहकहा लगाया और सुनीता का मुंह भक्क रह गया..
ये उस सुरमई दिन की सुबह थ...ी,जिसकी शाम मानसी बाज़ार में थी..हाथ में झोला लिए बाज़ार की तरफ से लौटते देवेन्द्र अंकल पर आँख ठहरी तो मानसी ने आवाज़ दी और दौड़ते हुए करीब पहुंची.हाथ का अखबार उनकी आँखों पर लहराया और ख़ुशी से लगभग चीखते हुए बोली-''आपका आर्टिकल आया है आज.देखा आपने..?मैंने तो पूरा पढ़ लिया..अभी रास्ते में ही..कैसा गजब लिखते हैं अंकल आप..हम तो दीवाने हो गये हैं बिलकुल..''और भरे बाज़ार,ठीक नाके पर मानसी पंजों पर उचकी और देवेन्द्र को गर्दन से झुकाकर पेशानी चूम ली..अवाक् भद्र समाज लबे सड़क एक पढ़ी लिखी लड़की की ढिठाई देख रहा था और देवेन्द्र....?देवेन्द्र तो हतप्रभ थे..ठगे से खड़े रह गये वे हक्का बक्का..कि जैसे इज्ज़त ही उतार ली हो लड़की ने..''तुम फिदाए लेखनी हो,हम फिदाए जान हैं...''कहती हुई मानसी बाज़ार में गुम हो गयी..
दो साल होने को आये.शहर के प्रतिष्ठित पत्रकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रवक्ता देवेन्द्र गुलाटी का चैनो सुकून मानसी नाम की इस उत्तर आधुनिका नवयौवना के हाथ गिरवी जा चुका था.न जाने क्या बात थी.देवेन्द्र न खुद को रोक पा रहे थे न मानसी को..उस दिन कॉफ़ी हाउस में मिलने का कहकर मानसी गायब थी.लगभग दो घंटे से इंतजार करते देवेन्द्र खीझ चले थे.एक तरफ कोल्ड ड्रिंक और दूसरी तरफ हॉट कॉफी के मग पर नजर जमाये एक चम्मच इसमें से एक चम्मच उसमे से निकालते,प्लेट में डालते और कॉकटेल बनाकर सुडक जाते..ये मनोदशा थी कोफ़्त की.सोचते जाते.अपनी 45 साल की उम्र आज महसूस हो रही थी शिद्दत से.क्या है ये--''दीवानों की तरह एक छोकरी का इंतज़ार कर रहा हूँ..क्या हो गया है मुझे..कहाँ जा रहा हूँ मै.बढती जाती खिसियाहट ने अचानक रंग बदले.सामने मानसी खड़ी थी-''सॉरी,लेट हो गया.''उसी बौखलाहट में पूछा देवेन्द्र ने--''क्या लगता हूँ मै तुम्हारा..??''मानसी ठहरी..थोडा सोचा,फिर जवाब दिया--''आप....आप मेरे ....फ्रेंड,फिलोसोफर एंड गाइड...!!!!''हकबकाए हुए थे देवेन्द्र.पूछा--''तो मेरी फीस दो..?''अब चौंकी मानसी-''फीस...?'' दो पल को ठिठकी,थोडा घूमी..और लहराकर बोली--उठिए..''देवेन्द्र कुछ समझ पाते,इसके पहले ही गेट से गुजरते हुए ऑटो को रोक लिया था मानसी ने..देवेन्द्र का हाथ पकडकर लगभग खींचते हुए चली और उनको लिए दिए ऑटो में ठूंस गयी--''शांति-वन चलो..''ऑटो ने रफ़्तार पकड़ ली.निष्प्रभ थे देवेन्द्र और हतप्रभ भी.क्या करना चाहती है मानसी..!कहाँ ले जा रही है..!लेकिन चुप बैठे रहे.दिल्ली की सड़कों पर आधा घंटा दौड़ने के बाद ऑटो शान्ति वन की एक अधित्यका पर रुका.हाथ पकड़कर देवेन्द्र को खींचते हुए झुरमुटों की और ले चली मानसी.अनिश्चित मन ठिठराये हुए चले जाते थे देवेन्द्र पीछे पीछे..बड़े पेड़ों और घनी झाड़ियों की आड़ में पहुंचकर मानसी ने हाथ छोड़ा और एक एक कर अपने कपडे उतार डाले....''लो,अपनी फीस लो..''फटी हुई आँखों से यह मंजर देखते हुए देवेन्द्र चेतनाशून्य होने को आये.झुरमुटों का सन्नाटा और पंछियों का कोलाहल दोनों के मन को एक साथ पकड़े हुए था.एक तरफ खड़ी थी वस्त्रविहीना चिनगारियां फेंकती 24 साल की मानसी और दूसरी तरफ थे पेड़ों की जड़ों में लुढके पड़े बर्फ की मानिंद देवेन्द्र कि जैसे घड़ी की टिक-टिक शून्य बजा रही हो और आगे बढती ही न हो...देवेन्द्र अक्षम हो चुके थे और रोंगटे मसों में वापस समाने लगे थे.वे उठे.लहराए..कपडे उठाये,उसे पहनाये और जंगलों से बाहर आये..दोनों ने दोनों से एक शब्द नही कहा.
देर रात अपनी ऊंची अटारी से एक लड़की ने देखा कि नीचे नालियों में कोई शराबी गिरा पड़ा है..पहचाना तो अपना सिर पीछे भीत में मारा..कभी देवेन्द्र के मुंह से निकला एक वाक्य मानसी की आँखों के आगे से रेंग गया-हमारी सडांधों को सहना और हमारी मवादों को साफ़ करना सुनीताओं के ही बस की बात होती है .....मानसियों के बस की नही.....और अगली सुबह की ट्रेन जब मुंबई को चली तो शहर एक पढ़ी लिखी लड़की से खाली हो चुका था...
(कभी कहीं कुछ पढ़ा था ऐसा ही..)
ये उस सुरमई दिन की सुबह थ...ी,जिसकी शाम मानसी बाज़ार में थी..हाथ में झोला लिए बाज़ार की तरफ से लौटते देवेन्द्र अंकल पर आँख ठहरी तो मानसी ने आवाज़ दी और दौड़ते हुए करीब पहुंची.हाथ का अखबार उनकी आँखों पर लहराया और ख़ुशी से लगभग चीखते हुए बोली-''आपका आर्टिकल आया है आज.देखा आपने..?मैंने तो पूरा पढ़ लिया..अभी रास्ते में ही..कैसा गजब लिखते हैं अंकल आप..हम तो दीवाने हो गये हैं बिलकुल..''और भरे बाज़ार,ठीक नाके पर मानसी पंजों पर उचकी और देवेन्द्र को गर्दन से झुकाकर पेशानी चूम ली..अवाक् भद्र समाज लबे सड़क एक पढ़ी लिखी लड़की की ढिठाई देख रहा था और देवेन्द्र....?देवेन्द्र तो हतप्रभ थे..ठगे से खड़े रह गये वे हक्का बक्का..कि जैसे इज्ज़त ही उतार ली हो लड़की ने..''तुम फिदाए लेखनी हो,हम फिदाए जान हैं...''कहती हुई मानसी बाज़ार में गुम हो गयी..
दो साल होने को आये.शहर के प्रतिष्ठित पत्रकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रवक्ता देवेन्द्र गुलाटी का चैनो सुकून मानसी नाम की इस उत्तर आधुनिका नवयौवना के हाथ गिरवी जा चुका था.न जाने क्या बात थी.देवेन्द्र न खुद को रोक पा रहे थे न मानसी को..उस दिन कॉफ़ी हाउस में मिलने का कहकर मानसी गायब थी.लगभग दो घंटे से इंतजार करते देवेन्द्र खीझ चले थे.एक तरफ कोल्ड ड्रिंक और दूसरी तरफ हॉट कॉफी के मग पर नजर जमाये एक चम्मच इसमें से एक चम्मच उसमे से निकालते,प्लेट में डालते और कॉकटेल बनाकर सुडक जाते..ये मनोदशा थी कोफ़्त की.सोचते जाते.अपनी 45 साल की उम्र आज महसूस हो रही थी शिद्दत से.क्या है ये--''दीवानों की तरह एक छोकरी का इंतज़ार कर रहा हूँ..क्या हो गया है मुझे..कहाँ जा रहा हूँ मै.बढती जाती खिसियाहट ने अचानक रंग बदले.सामने मानसी खड़ी थी-''सॉरी,लेट हो गया.''उसी बौखलाहट में पूछा देवेन्द्र ने--''क्या लगता हूँ मै तुम्हारा..??''मानसी ठहरी..थोडा सोचा,फिर जवाब दिया--''आप....आप मेरे ....फ्रेंड,फिलोसोफर एंड गाइड...!!!!''हकबकाए हुए थे देवेन्द्र.पूछा--''तो मेरी फीस दो..?''अब चौंकी मानसी-''फीस...?'' दो पल को ठिठकी,थोडा घूमी..और लहराकर बोली--उठिए..''देवेन्द्र कुछ समझ पाते,इसके पहले ही गेट से गुजरते हुए ऑटो को रोक लिया था मानसी ने..देवेन्द्र का हाथ पकडकर लगभग खींचते हुए चली और उनको लिए दिए ऑटो में ठूंस गयी--''शांति-वन चलो..''ऑटो ने रफ़्तार पकड़ ली.निष्प्रभ थे देवेन्द्र और हतप्रभ भी.क्या करना चाहती है मानसी..!कहाँ ले जा रही है..!लेकिन चुप बैठे रहे.दिल्ली की सड़कों पर आधा घंटा दौड़ने के बाद ऑटो शान्ति वन की एक अधित्यका पर रुका.हाथ पकड़कर देवेन्द्र को खींचते हुए झुरमुटों की और ले चली मानसी.अनिश्चित मन ठिठराये हुए चले जाते थे देवेन्द्र पीछे पीछे..बड़े पेड़ों और घनी झाड़ियों की आड़ में पहुंचकर मानसी ने हाथ छोड़ा और एक एक कर अपने कपडे उतार डाले....''लो,अपनी फीस लो..''फटी हुई आँखों से यह मंजर देखते हुए देवेन्द्र चेतनाशून्य होने को आये.झुरमुटों का सन्नाटा और पंछियों का कोलाहल दोनों के मन को एक साथ पकड़े हुए था.एक तरफ खड़ी थी वस्त्रविहीना चिनगारियां फेंकती 24 साल की मानसी और दूसरी तरफ थे पेड़ों की जड़ों में लुढके पड़े बर्फ की मानिंद देवेन्द्र कि जैसे घड़ी की टिक-टिक शून्य बजा रही हो और आगे बढती ही न हो...देवेन्द्र अक्षम हो चुके थे और रोंगटे मसों में वापस समाने लगे थे.वे उठे.लहराए..कपडे उठाये,उसे पहनाये और जंगलों से बाहर आये..दोनों ने दोनों से एक शब्द नही कहा.
देर रात अपनी ऊंची अटारी से एक लड़की ने देखा कि नीचे नालियों में कोई शराबी गिरा पड़ा है..पहचाना तो अपना सिर पीछे भीत में मारा..कभी देवेन्द्र के मुंह से निकला एक वाक्य मानसी की आँखों के आगे से रेंग गया-हमारी सडांधों को सहना और हमारी मवादों को साफ़ करना सुनीताओं के ही बस की बात होती है .....मानसियों के बस की नही.....और अगली सुबह की ट्रेन जब मुंबई को चली तो शहर एक पढ़ी लिखी लड़की से खाली हो चुका था...
(कभी कहीं कुछ पढ़ा था ऐसा ही..)
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