चुनाव के बाद करीब बीस दिन बनारस से बाहर ही बीते.कल बहुत दिन बाद पत्नी और बच्चों को लेकर शहर में निकला. भीड़-भाड़ वाले इलाके विश्वेश्वरगंज से आगे बढे तो पत्नी ने ध्यान दिलाया-ये इतने पुलिस वाले क्यों दिखाई डे रहे हैं..?मैंने कहा होगा कुछ,ध्यान नही दिया.मैदागिन पहुंचे तो उन्होंने फिर टोका-अरे देखिये,ये तो पैरामिलिट्री फ़ोर्स भी है.मैंने कहा छोड़ो यार,होगा कुछ,ऐसे ही चलता है.लेकिन फिर मेरा ध्यान इस बात प...े अटक गया.मैंने ध्यान से देखा..हर नाके पर,हर बाजार में,हर चौराहे पर सिक्यूरिटी भारी मात्रा में मौजूद थी.करीब-करीब हर दस आदमी पर एक सिक्यूरिटी.किसी ने कहा-अरे,मंत्री जी हैं शहर में....अरे हाँ,मनोज सिन्हा आये तो हैं सही....लेकिन उससे क्या,दो महीना पहले तो वे रोज ही रहते थे शहर में.यहीं घर ही है उनका....तो क्या उनके होने से है ये सिक्यूरिटी...?क्या मंत्री शहर पे हमला करने आया है...?याकि ये शहर मंत्री को मार डालेगा...?नही जी,ऐसा कुछ भी नही है.ये तो रोज़मर्रा की भीड़ है,और रोज़मर्रा की सिक्यूरिटी.असल में प्रगतिवादी समाज में शहरों की शक्ल बदल गयी है.जहाँ भीड़ है,वहां भीड़ के गुणधर्म भी हैं.समाज या समूह का कोई अनुशासन अगर भीड़ में खोजेंगे तो इन मूल्यों के नाम पर वहां सन्नाटा ही मिलेगा.इसी सन्नाटे को चीरने के लिए इन बड़े शहरों का मिजाज़ अब सुरक्षा बलों के हवाले है.मानो-न-मानो इस सन्नाटे के पीछे हमारा 67 सालों का इतिहास और विशुद्ध रूप से भौतिकतावादी विकास खड़ा है.ऐसा नही कि यह बात कहने वाला मै कोई पहला व्यक्ति हूँ.इन 67 सालों में इस बड़े होते सन्नाटे की ओर बड़े-बड़े मनीषियों और बड़े-बड़े मनस्वियों ने संकेत किये हैं.मै तो उनकी ही कही बातों का एक छोर पकड़कर अपनी दिशा में आगे बढ़ रहा हूँ.आदमजात की ज़िन्दगी को आसान करे,ऐसी हर सुविधा शहरों में समेट दी गयी है.अच्छे स्कूल,अच्छे अस्पताल,और अच्छी नीतियाँ.सब केवल शहरों के लिए है.गाँव वनस्थली हो गये है क्योंकि गाँव वालों को भी अच्छी सुविधाएं तो चाहिए ही.वास्तव में ये सारा कुछ जो अच्छा है,इनका जुगाड़ गाँवों में हुआ होता तो जनजीवन में एक संतुलन होता.बंजर हुए गाँवों की आबादी का हमारे शहरों में ये जो विस्फोट हुआ है उसने बाज़ार में भीड़ का घनत्व अनियंत्रित कर दिया.भीड़ का कोई स्वानुशासन या आत्मनियंत्रण तो होता नही.इसलिए इस भीड़ का नियमन करने के लिए प्रशिक्षित और हथियारबंद सुरक्षाबलों की जरूरत बढती जा रही है.लेकिन अभी गिनती के कुछ साल पहले तक ऐसी स्थिति नही थी.तो अचानक इस तब्दीली की वजह..?मै सोचता रहा और देखता रहा.देखता रहा कि इस भीड़ में बूढ़े प्रायः कम हैं.मै चौंका..दूर तक देखता गया और हाल फिलहाल तमाम बाजारों में देखी हुई भीड़ के रंग याद करता रहा..समझ में आता है कि लोग बूढ़े तो हो ही नही पा रहे हैं,क्यों..?क्योंकि ये अच्छी सुविधाएं लोगों को बूढा होकर जीने का मौका अब कम दे रही हैं.अच्छे डॉक्टर और अच्छे अस्पताल जितने ही बढ़ते गये,रोग,बीमारियाँ और जीवन अनुशासन की जरूरतें भी उतनी ही बढती गयीं..नतीजा ये कि असमय मृत्यु के मामले निरंतर बढ़े और लोगों से बूढ़े होने के ज्यादातर मौके छिन गये.वो भीड़ या वो समाज रीढ़विहीन हो जाता है दोस्तों,जिसमे बूढों की संख्या कम हो जाती है,समझ में आता है कि विकास के हमारे दर्शन ने हमसे हमारे बच्चे और महिलाएं ही नही,हमारे बूढ़े भी हमसे छीने हैं..और इसके पीछे ये शहर नाम का फोड़ा भी समझ में आता है.कोई सर्वे करवा के देखें तो मेरा सुनिश्चित मत है कि गाँव के आदमी की औसत उम्र एक शहरी की औसत उम्र से ज्यादा निकलेगी..इसलिए मेरा निजी मत है कि शहरों पर फोकस विकास की दिशा ग्रामोन्मुख होती तो तस्वीर इसके उलट होती..इसलिए मेरा विरोध हर उस सरकारी नीति से है जो बेहद प्रभावी ढंग से जन जीवन की दिशा और दशा बिगाड़ रही है.मुझे मेरे गाँवों का वैसा विकास चाहिए,जो प्रकृति का वर्चस्व स्वीकार करता हो,इसीलिए मुझे शहर और उसमे भी अमीर आदमी के विकास के लिए चल रही सारी कवायदों को विकास कहने पर घोर आपत्ति है.इसी तथाकथित विकास ने बनारस का रस भी निचोड़ लिया लगता है..
No comments:
Post a Comment