जब कभी मुझे लगता है कि दुनिया में रंजोगम के सिवा कुछ बचा ही नही,तो अक्सर शान्ति कुटीर चला जाता हूँ,मेरे घर से बस पन्द्रह कदम दूर....और जोड़े में नाचते मोरों को देर तक देखता रहता हूँ,सुखद लगता है.यह विनोबा जी का कुटीर है,वरुणा के अरार पर सघन ...अमराइयों से घिरे इस ऊंचे टीले पर खपरैलों की छत वाला दो कमरों का यह घर एक आध्यात्मिक-सी सुवास से आज भी महकता है.यही वो जगह है,जहाँ नाचने के लिए मोर सावन का इंतज़ार नही करते.बाबा ने इन सबको इतना परचा रक्खा था कि आज तक उन मोर-वंशों के ये नचवइये उनकी कुटीर तक बेख़ौफ़ चले आते हैं.इसी तरह जब मुझे ट्रैफिक की कर्कश ध्वनि,शहर के आसमान पर धुंए का गुबार और दिन-पर-दिन छोटी होती जाती ज़िन्दगी के शोर परेशान करते हैं,तो मै पिपलानी कटरा चला जाता हूँ.कबीर मठ के बिलकुल बगल में यहाँ बनारस का सबसे पुराना थिएटर हाउस है.श्री नागरी नाटक मंडली का इतिहास देश की आज़ादी जितना ही पुराना है.यानी करीब 6 दशक से ज्यादा.लगभग हर महीने यहाँ कोई न कोई थिएटर ग्रुप इसे इसकी शुरुआत से ही जिंदा रक्खे हुए है.इसकी प्रतिष्ठा इसके काम से है.हर साल गर्मियों में बिलकुल छोटे 4-5 साल से लेकर 17-18 साल तक के बच्चों का 40 दिनी नाट्य प्रशिक्षण इसकी अनिवार्य गतिविधि है.जोहरा सहगल से लेकर गिरीश कर्नाड तक,नसीरुद्दीन शाह से लेकर अनंत महादेवन तक,नादिरा बब्बर से लेकर उषा गांगुली तक,इस मंच ने थिएटर का ऐसा कोई बड़ा नाम नही है,जिसे अपनी ओर न खींचा हो.आज भी यह उसी मनोयोग से प्रतिभा की तलाश करने,उसे मौका और आकार देने तथा उसे थिएटर व फिल्मी दुनिया को सौंपने के काम में उसी मनोयोग और उसी निष्ठा से लगा हुआ है.22 और 23 की मेरी शाम शहर के थिएटरप्रेमियों के साथ नागरी नाटक मंडली में बीती.सोच रहा हूँ किन शब्दों में प्रशंसा करूँ उन शरारती बच्चों की जो अगर छुट्टियाँ हों तो घर वालों को अपनी बदमाशियों से हलकान किये रहते हैं.कल और परसों के मंच पर वही तो हीरो थे.एनएसडी के अलावा कई नाट्य संस्थानों में प्रोफेसर श्रीमती अश्विनी गिरी ने इन्हें अभिनय के सांचे में ऐसा ढाला कि 8 साल के बच्चों ने बड़े बडो के कान काटे.सुचरिता दास ने जो संगीत और नृत्य की ट्रेनिंग दी तो महज़ चार साल की...जी हाँ,आपको यकीन हो न हो,मैंने आँखिन देखी...चार साल की बच्चियों ने कत्थक और ओडिसी की तालबंदियों पर कैसा समां बाँध दिया कि करीब पांच सौ लोगों से भरे हॉल में सुई गिरने की आवाज़ भी झन्न से सुनाई दे.जी हाँ,आश्चर्य की कोई बात नही.थियेटर को देखने और जीने आने वालों की संख्या खोजनी नही पड़ती आज भी इस मंच को..और कव्वाली..!सत्तर के दशक में बनारस के मशहूर कव्वाल चाँद पुतली साहब की बेमिसाल कव्वाली जब बच्चों ने पेश की तो...गुलरी के फुलवा,बलम हाये....तुम तो होई गये....की धुन पर पूरा मंच ही थिरक उठा हो जैसे..कथक उत्तर भारत का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य है और इसके तीन घराने हैं.लखनऊ घराने का का लास्य,जयपुर घराने का वीर और बनारस घराने का नटवरी अंग विख्यात है.इन चालीस दिनों में बच्चों ने उठान,सलामी,तोड़ा,टुकड़ा,तिहाई,गत और निकास की बारीकियां सीखीं और पेश कीं.और अंत में ओडिसी में 'मोक्ष' नृत्यकथा सीताहरण की सजीव प्रस्तुति ने तो आँखों में जो जलजला पैदा किया,उसे आँखों ही आँखों में समेटे हम घर वापस तो आ गये लेकिन बच्चों की तस्वीर अभी जेहन में वैसे ही तारीं है.नागरी नाटक मंडली और एनएसडी की संयुक्त टीमें इस सालाना श्रमसाध्य आयोजन के लिए हम सबकी बधाई के पात्र हैं.....निस्संदेह आपकी बधाई भी उन्हें चाहिए.. See More
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