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Sunday, 3 November 2013

दिया-देवारी में...

घंटी, जांता , दिया, धुधुक्का, दिया-देवारी में..
एहिकुल से हमहन खेलीं जा ,दिया-देवारी में..

गाँव-गाँव से अंटकहिया पर जुटे बानरी-सेना,
ले के फरुसा,गैंता,खुरपी,खा के चना-चबेना,
बड़का-बड़का चक्का गहिरे-गहिरे खन्नल जाय,
घरे लिया के पियरी माटी अंगना बीच सनाय,
बांस काट के बडकी-बडकी सीढ़ी सालल जाय,
सीढ़ी चढ़े बंडेरे,घर हफ्तन ले पोतल जाय.
सोन्ह-सोन्ह महकै घर नौका,दिया-देवारी में..
घंटी, जांता , दिया, धुधुक्का, दिया-देवारी में..

बाबा क धोती कचार के टुकड़ा-टुकड़ा फारैं,
मचिया उप्पर बइठ के चाची बाती-बाती पूरैं,
लीप-पोत के चउका पूरैं अम्मा अंगना में,
दीया-बाती रक्खें.आवे तेल भगौना में,
घंटन ले कुल लइकन मिलि के बाती साजल जां,
अम्मा हमके ढेर मिठाई,कहि-कहि नाचल जां.
जरे दिया तब छंटे धुंधलका,दिया-देवारी में..
घंटी,जांता,दिया,धुधुक्का,दिया-देवारी में..

देवकुर में,भुंसवा क घर,अंगना में नीम तरे,
तुलसी-चउरा तर,अम्मा खुद अपने दीप धरें,
ओखरी,जांता,चरनी,चउकठ,ताखा पाटल जाय,
थरिया-थरिया भर-भर दीया घर-घर बाँटल जाय,
जरे दिया क पांत त घर के साथे हँसे सिवान,
बाबा बडकी पगरी बान्हें,मूने दूनो कान.
छुटे फुलझड़ी,फुटे पड़क्का,दिया-देवारी में..
घंटी, जांता , दिया, धुधुक्का, दिया-देवारी में..

इस्सर पइसें,दरिद्दर निकसे,बजे बिहाने सूप,
खेद दलिद्दर सब घर लउटें,उग्गे जबले धूप,
गोधना कूटें अउर सरापें आपन-आपन भाई,
गाँव भरे क लइकी जुट के,आजी,चाची,माई,
लइकन दीया खोज लियावें,टेकुरी छेदे कान,
बान्ह के डोरी बने तरजुई,दिन-भर चले दूकान.
घरिया,ककनी,धूम-धड़क्का,दिया देवारी में..
घंटी, जांता , दिया, धुधुक्का, दिया-देवारी में..

Wednesday, 21 August 2013

मैं तुम्हें समेटना छोड़ देना चाहता हूँ

मैंने तुम्हारी आँखों की नदी में
प्यार की पतवार उतार दी है.
तुम्हारी हथेली पर उगी
मेंहंदी की दहकता पर
अपने होठों के निशान जड़ता हूँ...

तुम्हारें बालों के स्याह जंगल में
अपनी अँगुलियों से रास्ता रचता हूँ
तुम्हारा चेहरा
अपनी हथेली के वृत्त में समेटता हूँ .... किन्तु
साथ-साथ एक रीतापन मुझे
ललकारता है.
पतवार डूब जाती है, रास्ते खो जाते हैं.
अधर चिन्हों को सूरज जला देता है.
और हथेली के वृत्त में पकने लगती है.
एक रिक्त-सी तिक्तता ...

तुम पूछो भी
यही था प्यार ...?
नहीं मेरे प्राण
प्यार की अंकवार तो निस्सीम तक है
... और मैं तुम्हारे साथ उस छोर तक जाना चाहता हूँ...
प्रिय !
मैं तुम्हारे गर्भ-गह्वर में
आरोपित करना चाहता हूँ. प्रेम का बीज-तत्व
और चाहता हूँ.
... कि अंकुरित हो मेरे स्वपन शिशु
कितना अच्छा होता
अगर हम पहले मिले होते
हमारे स्वपन-शिशु
कुछ पहले खिले होते ...

Sunday, 29 April 2012

तुम्हारी आँखों की नदी में

मैंने तुम्हारी आँखों की नदी में
प्यार की पतवार उतार दी है.
तुम्हारी हथेली पर उगी
मेंहंदी की दहकता पर
अपने होठों के निशान जड़ता हूँ
तुम्हारें बालों के स्याह जंगल में
अपनी अँगुलियों से रास्ता रचता हूँ
तुम्हारा चेहरा
अपनी हथेली के वृत्त में समेटता हूँ .... किन्तु
साथ-साथ एक रीतापन मुझे
ललकारता है.
पतवार डूब जाती है, रास्ते खो जाते हैं.
अधर चिन्हों को सूरज जला देता है.
और हथेली के वृत्त में पकने लगती है.
एक रिक्त-सी तिक्तता  ...
मैं तुम्हें समेटना छोड़ देना चाहता हूँ
तुम पूछो भी
यही था प्यार ...?
नहीं मेरे प्राण
प्यार की  अंकवार तो निस्सीम तक है
... और मैं तुम्हारे साथ उस छोर तक जाना चाहता हूँ...
प्रिय !
मैं तुम्हारे गर्भ-गह्वर में
आरोपित करना चाहता हूँ. प्रेम का बीज-तत्व
और चाहता हूँ.
... कि अंकुरित हो मेरे स्वपन शिशु
कितना अच्छा होता
अगर हम पहले मिले होते
हमारे स्वपन-शिशु
कुछ पहले खिले होते ...