Wednesday, 21 August 2013

मैं तुम्हें समेटना छोड़ देना चाहता हूँ

मैंने तुम्हारी आँखों की नदी में
प्यार की पतवार उतार दी है.
तुम्हारी हथेली पर उगी
मेंहंदी की दहकता पर
अपने होठों के निशान जड़ता हूँ...

तुम्हारें बालों के स्याह जंगल में
अपनी अँगुलियों से रास्ता रचता हूँ
तुम्हारा चेहरा
अपनी हथेली के वृत्त में समेटता हूँ .... किन्तु
साथ-साथ एक रीतापन मुझे
ललकारता है.
पतवार डूब जाती है, रास्ते खो जाते हैं.
अधर चिन्हों को सूरज जला देता है.
और हथेली के वृत्त में पकने लगती है.
एक रिक्त-सी तिक्तता ...

तुम पूछो भी
यही था प्यार ...?
नहीं मेरे प्राण
प्यार की अंकवार तो निस्सीम तक है
... और मैं तुम्हारे साथ उस छोर तक जाना चाहता हूँ...
प्रिय !
मैं तुम्हारे गर्भ-गह्वर में
आरोपित करना चाहता हूँ. प्रेम का बीज-तत्व
और चाहता हूँ.
... कि अंकुरित हो मेरे स्वपन शिशु
कितना अच्छा होता
अगर हम पहले मिले होते
हमारे स्वपन-शिशु
कुछ पहले खिले होते ...

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