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Monday, 4 August 2014

भूदान-गंगोत्री

15 अप्रैल 1951.....पदयात्रा पर निकले विनोबा जी हैदराबाद के नज़दीक पोचमपल्ली गाँव पहुंचे.निर्मला देशपाण्डे सहित अनुयायियों की भारी भीड़ भी संत के साथ थी.धनाढ्यों का गाँव था.सबने दिल खोल कर स्वागत किया.विनोबा जी के संतत्व की सुकीर्ति दिग्दिगंत में फैलती हुई देशो की सीमाएं पार कर गयी.यह वही विनोबा थे जिन्हें 1911 में गांधीजी ने दुनिया का पहला सत्याग्रही घोषित किया था.यह संतत्व का तत्व विनोबाजी की ज़िन्दगी में बचपन से ही घुला मिला था.गांधीजी के योग्यतम शिष्यों में से पहले और एकमात्र विनोबा जी ही थे.मेरे गुरुजी आदरणीय रामप्रवेश शास्त्री कहते हैं कि गांधी महामैगनेट था,इसलिए उसके सीधे संपर्क में आने वाले लोगों में मैगनेट कुछ ज्यादा ही घुल कर समाया.यूँ तो दूर-दूर तक संपर्क में आने वाले साधारण लोहे के टुकड़े भी अच्छे-खासे चुम्बक हो गये.इसीलिए ये वो दौर था जबके इतिहास के पन्ने महापुरुषों की भीड़ से खचाखच भरे हुई मिलते हैं.यह चुम्बकत्व विनोबा में कुछ ज्यादा ही घनीभूत होकर समा गया था.इसलिए वे गाँधी के एकमात्र आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बने.इस सत्व को वहन करने योग्य कोई दूसरा था भी नही.गांधी जी लिखकर गये कि जब मै ना रहूँ तो मुझे मरा हुआ मत समझ लेना.मै अपनी कब्र में से भी बोलूँगा.समय ने सिद्ध किया कि यह बात गांधीजी नही,उनकी विभूति लिख रही थी.दुनिया ने देखा कि गांधी के जाते ही विनोबा बड़े रिदम में बोल उठे थे.दुनिया ने यह भी देखा कि विनोबा के हाथों वह अजूबा घटित हुआ,जिसकी कोई दूसरी मिसाल दुनिया के किसी भी देश के इतिहास में नही मिलती.

पोचमपल्ली में स्वागत और भोजन के बाद आस-पास के 10-20 गाँवों के लोग जुटे और एक विशाल सभा जुड़ी.गांधी के बाद गांधी का सन्देश लेकर विनोबा पैदल देशाटन पर निकले थे.हर गाँव में सभा होती.उनके साधु गुणधर्म के कारण लोग खिंचे चले आते थे.किसी दो हज़ार आबादी वाले गाँव की सभा में 10-10 हज़ार तक लोग जुट जाते थे.यह भी वैसी ही बड़ी सभा थी.चर्चा शुरू हुई.....देश,काल,और परिस्थितियों पर चर्चा के बाद बात आध्यात्म की ओर मुड़ी.इहलोक-उहलोक की चिंताओं,चर्चाओं की स्थिति यह थी कि लोग सवालों की झड़ी लगा देते थे और विनोबा जी शास्त्र-सम्मत,विचार-सम्मत और संवेदना-सम्मत शब्दों से समाधान करते थे.शब्द को ब्रह्म मानते थे वे.चर्चा की दिशा जातिगत और सामाजिक भेद-भाव,असमानता और समाज में बढती ऊंच-नीच की खाई की ओर मुड़ी....भूमिहीनों और भूमिवानो की बात चली तो विनोबा जी ने लोगों से सवाल नही,एक बात पूछी-----आपमें से कितने ही ऐसे हैं जिनके पास हज़ारों बीघे ज़मीन है और आपमें से ही कितने ऐसे भी हैं जो आपके खेतों में मजदूरी करते हैं.आपमें से कौन ऐसा है जो अपने हज़ार बीघे में से अपने भूमिहीन भाई को दो-चार बीघे ज़मीन दे सके..?बात एक प्रवाह में पूछी थी विनोबा ने,आगे बढे ही थे कि पोचमपल्ली के बड़े ज़मींदार रामचंद्र रेड्डी उठ खड़े हुए,विनोबा जी के पैर छू के बोले -बाबा 80 एकड़ देता हूँ....विनोबा जी हठात चुप हो गये.यकबयक सभा भर में सन्नाटा छा गया.लोगों में घोर आश्चर्य छा गया.ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज़मींदार जिन्दगी भर सूद ही वसूलते रहे....गुलामों की जिंदगी नाप ली और मूल कभी पूरा ही नही हुआ,जो जमींदार किसी को एक धेला ना दे,उनमे से कोई एक 80 एकड़ ज़मीन दान कर दे..लेकिन 'कोई एक' तो केवल कहने की बात है.ज़मीन देने वालो की संख्या दो,तीन,चार,पांच तक पहुँच गयी....विनोबा जी भी साश्चर्य इस 'घटना' को देख रहे थे.जी हाँ ,यह घटना,घटना इस सन्दर्भ में थी कि तब की दुनियां में यह बिलकुल नई बात हो रही थी.नई बात तो यह आज की दुनिया में भी है,लेकिन तब ज़मींदारी का कुचक्र था.जिसमे गरीब किसान मजदूर पिस चुके थे.ज़मीन का खेल तब आज की तरह गन्दा ही नही था,हत्यारा भी था.आज का तो किसान भी आत्महत्या करता है लेकिन तब का मजदूर भी ज़मींदारों के ज़ुल्म से संघर्ष करके जीता था.

विनोबा जी ने उस पल को बड़ी गहराई से महसूस किया.उन्हें लगा कि गांधी के बाद भी गांधी का काम हो सकता है.पोचमपल्ली में ज़मीन पाकर विनोबा की जैसे युवावस्था लौट आई हो.उन्हें एक असंभव सा सपना सच होते दिखने लगा.उन्हें लगा कि देश के गरीब भूमिहीनों को भी ज़मीन दी जा सकती है....भूपतियों से ज़मीन ली जा सकती है......और कहीं अंतर्गुहा में प्रवेश करते हुए विनोबा ने वहीँ बैठे-बैठे भूदान के लिए आन्दोलन चलाने का संकल्प ले लिया.उसके बाद तो फिर क्या भूदान हुआ......! विनोबाजी ने तेरह हज़ार कि.मी.से ज्यादा रास्ता पैदल चलकर नापा और सालभर में 45 लाख एकड़ ज़मीन इकठ्ठा कर ली..जंगल में आग की तरह यह प्रेरणा पूरे समाज में बही...यह विनोबा का प्रभामंडल ही था कि लोगों में ज़मीन देने की होड़ लग गयी..लोग उन्हें सन्देश भेज-भेजकर बुलवाते थे और जमीन देते थे..कितनी ही ग्राम सभाओं और जमीदारों ने तो प्रस्ताव पास करके विनोबा जी के नाम ग्रामदान ही कर दिया..यहाँ तक कि बिहार ने तो पूरा प्रदेश ही दान कर दिया..बिहार ने ही सबसे ज्यादा भूदान भी किया.दुनिया के किसी मुल्क में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता,जहाँ लोगों ने 45 लाख एकड़ जमीन केवल मांगकर पा ली हो..दुनिया आँख फाड़ के देख रही थी इस गतिविधि को..सरकार के जिम्मे ये एक नया काम आ पड़ा--मिली हुई जमीन को बांटने का..और वह जमीन आजतक बंट रही है दोस्तों..भूमिहीनों को जमीन बांटने की कवायद आज 62 सालों से चल रही है..आजतक केवल 20 लाख एकड़ जमीन ही बांटी जा सकी है,वो भी केवल कागजों में.मौके पर कुछ और ही हालात हैं...बाकी जमीन का तो पता भी नही है..जमीनें लापता हो गयी..ये हम हैं..विश्व-गुरु कहलाते नही अघाते..एक आध्यात्मिक चेतना के बल पर घटित हुए एक चमत्कारी आन्दोलन का परिपाक धूल खा रहा है..और दबंगों ने जगह जगह भूदान की जमीनें दबा रखी हैं.नाजायज कब्जे कर रखे हैं..यहाँ तक कि फ़कीर द्वारा मांगी गयी जमीनें कितनी तो बिक भी गयीं.दुनिया के सामने उपस्थित हुई रक्त-विहीन क्रान्ति की यह पहली,एकमात्र और अनूठी घटना अपना सिर धुन रही है..जमीन का सवाल अगर इस रास्ते हल हो गया होता तो आज का भारत वैसा नही होता,जैसा आज वह है..तस्वीर कुछ और ही होती..अफसोस.............................

Sunday, 3 August 2014

बीएचयू से राजघाट:एक यात्रा




जब कभी बीएचयू की ओर निकल आओ तो पुराने दिन सिनेमा की तरह आँखों में तैर जाते हैं.यूँ बीएचयू के स्टूडेंट हम कभी नही रहे,लेकिन बीएचयू में पढ़ रहे अपने दोस्तों के साथ अपनी दादागिरी के भी क्या दिन थे वे..! जब चंदौली पोलिटेक्निक के अपने हॉस्टल से इधर आते तो दोस्तों की बांछें खिल जातीं और रात-रात भर जागने के प्रोग्राम फिक्स्ड हो जाते.ये ...इलाका बनारस का शिरो-प्रदेश है..इस विशाल परिसर के एक तरफ गंगा है और दूसरी तरफ आबादी..उन दिनों हमलोग गंगा से लेकर गोदौलिया तक दिन रात एक किये रहते थे.आज काफी समय बाद इस तरफ आना हुआ तो वह समय याद आ गया.इधर कम ही आना हो पाता है..कहाँ तो राजघाट..और कहाँ तो बीएचयू..संकटमोचन और दुर्गा-कुंड होते लौट पड़िये..विजया सिनेमा हॉल अब आईपी विजया है..मॉल बना दिया है उसे..गुंजन सिनेमा तो खत्म ही हो गया..पिछले पच्चीस सालों में बदलती हुई दुनिया के साथ बनारस ने भी कदमताल खूब किया है..पंजाबी रेस्तरां लंका से लेकर केरला कफ़े भेलूपुर तक आलम अब भी वैसे ही दीखता है,उम्र वही है,बस चेहरे वे नही हैं..'जनवार्ता' का पुराना ऑफिस इसके बाद ही है,पर सोनारपुरा,मदनपुरा और पाण्डेय हवेली छोड़ के हम काशीराज अपार्टमेंट्स होते हुए रथयात्रा की तरफ चल पड़ते हैं..कितना बदल गया पर कुछ तो वैसा ही अब भी है.जरा बारिश हो जाय कि आधा थल और आधा जल में बनारस लिए कवि केदारनाथ सिंह खड़े हो जाते हैं,शहर अब भी ताल तलैया बन जाता है..हम फिर घूमते हैं कमच्छा और लक्सा होते गदौलिया की ओर..यानी काशी का ह्रदय प्रदेश..इधर का लोक-जीवन आस्था-निमग्न जीवन है.घंटा-घड़ियाल,मन्दिर और गंगा.. और यहीं इधर ही फैला हुआ है बनारस की जगत-प्रसिद्ध गलियों का जाल..गोदौलिया से मैदागिन की इस पैदल यात्रा में मेरे साथ आप भी महसूस कर सकते हैं दो समांतर पटरियां..नागिन-सी बल खाती इस सडक पर बनारस के पुराने बाज़ार हैं..तो साथ-साथ गलियों का झुरमुट भी..एक दूसरे को काटते हुए ये गली-विन्यास ..आप इनमे घुस सकते हैं,भटक सकते हैं..और बाहर भी निकल सकते हैं,लेकिन गारंटी लेता हूँ,भूल नही सकते..कहीं न कहीं निकल ही आयेंगे.इन्ही गलियों का घुमाव आपको शीतला मंदिर की सीढ़ियों पर भी उतार देता है..और महा श्मशान की भभूत भी मल दे सकता है.मणिकर्णिका और सतुआ बाबा आश्रम..एक साथ..एक लय..एक ताल..सदियों से..युगों से..वाह बनारस..!
सतुआ बाबा पीठ-परम्परा की 51वीं पीढ़ी मौजूद है..आद्य सतुआ बाबा का मूल गुजरात में है..काशी की मणिकर्णिका पर महाभूत शंकर ने सतुए का प्रसाद बांटने का आदेश दिया और पीठ स्थापित हो गया..आध्यात्मिक आभा यामुनाचार्य जी की यौगिक चर्याओं से फूटी पड़ती थी.आज आश्रम के गुरु-पीठ में हजारों बटुक हैं..मुमुक्षु पीड़ा के बाद निर्जीव शरीरों की पंक्तिबद्ध आवाजाही से निर्विकार एक जीवन है यहाँ..जलते शवों को देखने सैलानी भी आते हैं.हंगरी की एक युवा माँ अपने 8 साल के बेटे को शव-दाह दिखाना चाहती है..चिताओं के बीच खडी है.मुर्दों की इस दुनिया में खड़ी इस विदेशी माँ के चेहरे पर जलती लाशों का एक खौफ भी है.बच्चे को जो दिखाना चाहती है,उसे खुद देखने की ताब नही.बच्चे की आँखों पर हाथ रखे वापस नीचे को भागती है.वह किसी से बात करना चाहती है..भाषा की दिक्कत महसूस होती है.पर ये बनारस है.यहाँ तो रेडयो भी मिर्ची के नाम से जाना जाता है.हर कोई अंग्रेजी दां है..लकड़ी वाला भी..रिक्शा वाला भी..हर डोम..हर अंत्येष्टि कर्मी..यू सी मैडम..टू हंड्रेड थ्री हंड्रेड बॉडी बर्निंग हियर डेली..बनारस के हर घाट का एक अपना ही नशा है..आगे बढ़ता हूँ..कुरता पाजामा पहने लम्बे बालों वाला गन्दला सा हिप्पी खंजड़ी लिए टहल रहा है.उसके दोस्त के हाथ में माउथ ऑर्गन है..बनारसी किशोर मुंह में पान भरे वहां ऊपर सीढ़ियों पर भोजपुरी तान छेड़े है.....''राधिका जी काहे कइलीं प्यार....किशन कन्हैया से.....!तीनो की आँखें मिलती हैं और साज सज जाते हैं.ऑर्गन भी बजने लगता है,खंजड़ी भी डिमडिमा उठती है..छोकरा नाच-नाच के गाता है.घाट के लडकों का झुण्ड टेरी भरता है...और देशों,भाषाओं की दीवार खंड-खंड हो जाती है.संगीत की इस बोली में तीनों रसिक एक दूसरे तीसरे की तरंग को महसूस करते हैं और यह सामूहिक और अंतर्राष्ट्रीय किस्म का ताल घाट पर घंटे भर का रोमांच बना देता है.
लौट रहा हूँ वापस समांतर सड़क पर.मैदागिन,लोहटिया और 'आज' अख़बार होते कबीर चौरा,पिपलानी,लहुराबीर,जगतगंज...फिर अंधरा पुल...यहाँ आज का बनारस मिलेगा....धूल,गंदगी और धुंएँ में अंटा पड़ा है..ट्रैफिक का शोर,जाम और बेदर्द जिंदगी.सड़क के किनारे बंजारों के आशियाने,कूड़े के ढेर के ढेर लगे हैं.देश पर बोझ बनी ये आबादी पता नही,कहीं कागजों में भी है या नही,लेकिन सड़क पर तो है.इनमे बचपन भी है,जवानी भी है,बुढ़ापा भी है...मौत से बदतर जिंदगियां सड़क पर घिसटने के लिए शापित हैं जैसे.नीचे से पुराना जीटी रोड और ऊपर से नया बना फ्लाई ओवर गुजर रहा है.इस फ्लाई ओवर की भी बड़ी बेवजह सी कहानी है.ट्रैफिक को आसान करने के लिए शहर को तीन फ्लाई ओवर मिले थे.सैकड़ों करोड़ रूपये और सालों की मुश्किलों के बाद जब ये तैयार हुए तो तीनो ही मुसीबत बन गये,ट्रैफिक जाम के अनेक कारणों में से तीन महत्वपूर्ण कारण अब ये ओवर भी हैं,जो फ्लाई करते हैं.शहर का ये हिस्सा किसी विकासशील देश की तरह है,जिसमे केवल एक बात समझ में नही आती कि इसे विकासशील कहते क्यों हैं..इसी फ्लाई ओवर के ऊपर या नीचे,कहीं इधर या उधर,कोने अंतरे में आगे पीछे वे दोनों दिख ही जाते हैं,जो काले कलूटे..धूलि-धूसरित,नंग-धड़ंग कहीं लेटे,कहीं टहलते जैसे एक दूसरे को ही चुनौती देते-से हों--अबे एक ही मोहल्ले में दो नही रह सकते..ये पागल लोग हैं..जिला-प्रशासन को,अखबार वालों को कई बार कहा जागरूक जनों ने कि भइया,ये भी इंसान ही हैं,कुछ करो इनके लिए..लेकिन अफसरों के जिम्मे और भी तो बहुत काम हैं,अखबारों के पास और भी तो ख़बरें हैं.अंधरा पुल से चौकाघाट होते,अलईपुरा और जैतपुरा होते गोलगड्डे तक आइये.इतने हिचकोलों में तो आपकी कमर सीधी हो ही जाएगी.सिटी स्टेशन से गोलगड्डा के बीच अब्दुल बिस्मिल्लाह की ''झीनी-झीनी बीनी चदरिया'' के पात्र मिलेंगे..बुनकरों की आबादी वाला यह इलाका बूचडखाने के चलते असहनीय दुर्गन्ध से बारहों महीने भरा रहता है..और यहीं सड़क किनारे की पटरियों पर है नशेड़ियों का स्वर्ग..एक से एक टक्कर लेते बेजान शरीर..मैले कुचैले कपडे और बजबजाती नालियों के ऊपर रखे पटरों पर बैठी ये बेचैन आत्माएं अपनी देह में सुइयां घोम्पने की तैयारी में तल्लीन हैं..बाज़ दफे ये देख भी सकते हैं आपको,पर सुई ले लेने के बाद तो फिर जमाने भर को देख लेने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं अपने अंदर..हम बनारस के कटि-प्रदेश की यात्रा पर हैं..
कज्जकपुरा पार करके भदऊँ होते हम चढ़ान पर आते हैं..ऊपर है काशी स्टेशन और रेलवे ओवर ब्रिज के नीचे है बनारस का अघोषित शाश्वत बाढ़-क्षेत्र..चार बूँद भी पानी बरसा तो चार दिन की बिपत खड़ी..ये काशी के चरण हैं.हम यहीं,काशी के चरणों में ही रहते हैं.गंगा मइया पद-प्रक्षालन करती है इन चरणों का.भूत भगवान की नगरी इन चरणों में सुवास बसाए है..ये राजघाट है..जहाँ वरुणा अपनी गंगा से और गंगा अपनी वरुण से आ मिलती हैं..आधी ही है,पर ये बनारस के एक ओर से दूसरे छोर तक की यात्रा है...