15 अप्रैल 1951.....पदयात्रा पर निकले विनोबा जी हैदराबाद के नज़दीक पोचमपल्ली गाँव पहुंचे.निर्मला देशपाण्डे सहित अनुयायियों की भारी भीड़ भी संत के साथ थी.धनाढ्यों का गाँव था.सबने दिल खोल कर स्वागत किया.विनोबा जी के संतत्व की सुकीर्ति दिग्दिगंत में फैलती हुई देशो की सीमाएं पार कर गयी.यह वही विनोबा थे जिन्हें 1911 में गांधीजी ने दुनिया का पहला सत्याग्रही घोषित किया था.यह संतत्व का तत्व विनोबाजी की ज़िन्दगी में बचपन से ही घुला मिला था.गांधीजी के योग्यतम शिष्यों में से पहले और एकमात्र विनोबा जी ही थे.मेरे गुरुजी आदरणीय रामप्रवेश शास्त्री कहते हैं कि गांधी महामैगनेट था,इसलिए उसके सीधे संपर्क में आने वाले लोगों में मैगनेट कुछ ज्यादा ही घुल कर समाया.यूँ तो दूर-दूर तक संपर्क में आने वाले साधारण लोहे के टुकड़े भी अच्छे-खासे चुम्बक हो गये.इसीलिए ये वो दौर था जबके इतिहास के पन्ने महापुरुषों की भीड़ से खचाखच भरे हुई मिलते हैं.यह चुम्बकत्व विनोबा में कुछ ज्यादा ही घनीभूत होकर समा गया था.इसलिए वे गाँधी के एकमात्र आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बने.इस सत्व को वहन करने योग्य कोई दूसरा था भी नही.गांधी जी लिखकर गये कि जब मै ना रहूँ तो मुझे मरा हुआ मत समझ लेना.मै अपनी कब्र में से भी बोलूँगा.समय ने सिद्ध किया कि यह बात गांधीजी नही,उनकी विभूति लिख रही थी.दुनिया ने देखा कि गांधी के जाते ही विनोबा बड़े रिदम में बोल उठे थे.दुनिया ने यह भी देखा कि विनोबा के हाथों वह अजूबा घटित हुआ,जिसकी कोई दूसरी मिसाल दुनिया के किसी भी देश के इतिहास में नही मिलती.
पोचमपल्ली में स्वागत और भोजन के बाद आस-पास के 10-20 गाँवों के लोग जुटे और एक विशाल सभा जुड़ी.गांधी के बाद गांधी का सन्देश लेकर विनोबा पैदल देशाटन पर निकले थे.हर गाँव में सभा होती.उनके साधु गुणधर्म के कारण लोग खिंचे चले आते थे.किसी दो हज़ार आबादी वाले गाँव की सभा में 10-10 हज़ार तक लोग जुट जाते थे.यह भी वैसी ही बड़ी सभा थी.चर्चा शुरू हुई.....देश,काल,और परिस्थितियों पर चर्चा के बाद बात आध्यात्म की ओर मुड़ी.इहलोक-उहलोक की चिंताओं,चर्चाओं की स्थिति यह थी कि लोग सवालों की झड़ी लगा देते थे और विनोबा जी शास्त्र-सम्मत,विचार-सम्मत और संवेदना-सम्मत शब्दों से समाधान करते थे.शब्द को ब्रह्म मानते थे वे.चर्चा की दिशा जातिगत और सामाजिक भेद-भाव,असमानता और समाज में बढती ऊंच-नीच की खाई की ओर मुड़ी....भूमिहीनों और भूमिवानो की बात चली तो विनोबा जी ने लोगों से सवाल नही,एक बात पूछी-----आपमें से कितने ही ऐसे हैं जिनके पास हज़ारों बीघे ज़मीन है और आपमें से ही कितने ऐसे भी हैं जो आपके खेतों में मजदूरी करते हैं.आपमें से कौन ऐसा है जो अपने हज़ार बीघे में से अपने भूमिहीन भाई को दो-चार बीघे ज़मीन दे सके..?बात एक प्रवाह में पूछी थी विनोबा ने,आगे बढे ही थे कि पोचमपल्ली के बड़े ज़मींदार रामचंद्र रेड्डी उठ खड़े हुए,विनोबा जी के पैर छू के बोले -बाबा 80 एकड़ देता हूँ....विनोबा जी हठात चुप हो गये.यकबयक सभा भर में सन्नाटा छा गया.लोगों में घोर आश्चर्य छा गया.ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज़मींदार जिन्दगी भर सूद ही वसूलते रहे....गुलामों की जिंदगी नाप ली और मूल कभी पूरा ही नही हुआ,जो जमींदार किसी को एक धेला ना दे,उनमे से कोई एक 80 एकड़ ज़मीन दान कर दे..लेकिन 'कोई एक' तो केवल कहने की बात है.ज़मीन देने वालो की संख्या दो,तीन,चार,पांच तक पहुँच गयी....विनोबा जी भी साश्चर्य इस 'घटना' को देख रहे थे.जी हाँ ,यह घटना,घटना इस सन्दर्भ में थी कि तब की दुनियां में यह बिलकुल नई बात हो रही थी.नई बात तो यह आज की दुनिया में भी है,लेकिन तब ज़मींदारी का कुचक्र था.जिसमे गरीब किसान मजदूर पिस चुके थे.ज़मीन का खेल तब आज की तरह गन्दा ही नही था,हत्यारा भी था.आज का तो किसान भी आत्महत्या करता है लेकिन तब का मजदूर भी ज़मींदारों के ज़ुल्म से संघर्ष करके जीता था.
विनोबा जी ने उस पल को बड़ी गहराई से महसूस किया.उन्हें लगा कि गांधी के बाद भी गांधी का काम हो सकता है.पोचमपल्ली में ज़मीन पाकर विनोबा की जैसे युवावस्था लौट आई हो.उन्हें एक असंभव सा सपना सच होते दिखने लगा.उन्हें लगा कि देश के गरीब भूमिहीनों को भी ज़मीन दी जा सकती है....भूपतियों से ज़मीन ली जा सकती है......और कहीं अंतर्गुहा में प्रवेश करते हुए विनोबा ने वहीँ बैठे-बैठे भूदान के लिए आन्दोलन चलाने का संकल्प ले लिया.उसके बाद तो फिर क्या भूदान हुआ......! विनोबाजी ने तेरह हज़ार कि.मी.से ज्यादा रास्ता पैदल चलकर नापा और सालभर में 45 लाख एकड़ ज़मीन इकठ्ठा कर ली..जंगल में आग की तरह यह प्रेरणा पूरे समाज में बही...यह विनोबा का प्रभामंडल ही था कि लोगों में ज़मीन देने की होड़ लग गयी..लोग उन्हें सन्देश भेज-भेजकर बुलवाते थे और जमीन देते थे..कितनी ही ग्राम सभाओं और जमीदारों ने तो प्रस्ताव पास करके विनोबा जी के नाम ग्रामदान ही कर दिया..यहाँ तक कि बिहार ने तो पूरा प्रदेश ही दान कर दिया..बिहार ने ही सबसे ज्यादा भूदान भी किया.दुनिया के किसी मुल्क में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता,जहाँ लोगों ने 45 लाख एकड़ जमीन केवल मांगकर पा ली हो..दुनिया आँख फाड़ के देख रही थी इस गतिविधि को..सरकार के जिम्मे ये एक नया काम आ पड़ा--मिली हुई जमीन को बांटने का..और वह जमीन आजतक बंट रही है दोस्तों..भूमिहीनों को जमीन बांटने की कवायद आज 62 सालों से चल रही है..आजतक केवल 20 लाख एकड़ जमीन ही बांटी जा सकी है,वो भी केवल कागजों में.मौके पर कुछ और ही हालात हैं...बाकी जमीन का तो पता भी नही है..जमीनें लापता हो गयी..ये हम हैं..विश्व-गुरु कहलाते नही अघाते..एक आध्यात्मिक चेतना के बल पर घटित हुए एक चमत्कारी आन्दोलन का परिपाक धूल खा रहा है..और दबंगों ने जगह जगह भूदान की जमीनें दबा रखी हैं.नाजायज कब्जे कर रखे हैं..यहाँ तक कि फ़कीर द्वारा मांगी गयी जमीनें कितनी तो बिक भी गयीं.दुनिया के सामने उपस्थित हुई रक्त-विहीन क्रान्ति की यह पहली,एकमात्र और अनूठी घटना अपना सिर धुन रही है..जमीन का सवाल अगर इस रास्ते हल हो गया होता तो आज का भारत वैसा नही होता,जैसा आज वह है..तस्वीर कुछ और ही होती..अफसोस.............................
पोचमपल्ली में स्वागत और भोजन के बाद आस-पास के 10-20 गाँवों के लोग जुटे और एक विशाल सभा जुड़ी.गांधी के बाद गांधी का सन्देश लेकर विनोबा पैदल देशाटन पर निकले थे.हर गाँव में सभा होती.उनके साधु गुणधर्म के कारण लोग खिंचे चले आते थे.किसी दो हज़ार आबादी वाले गाँव की सभा में 10-10 हज़ार तक लोग जुट जाते थे.यह भी वैसी ही बड़ी सभा थी.चर्चा शुरू हुई.....देश,काल,और परिस्थितियों पर चर्चा के बाद बात आध्यात्म की ओर मुड़ी.इहलोक-उहलोक की चिंताओं,चर्चाओं की स्थिति यह थी कि लोग सवालों की झड़ी लगा देते थे और विनोबा जी शास्त्र-सम्मत,विचार-सम्मत और संवेदना-सम्मत शब्दों से समाधान करते थे.शब्द को ब्रह्म मानते थे वे.चर्चा की दिशा जातिगत और सामाजिक भेद-भाव,असमानता और समाज में बढती ऊंच-नीच की खाई की ओर मुड़ी....भूमिहीनों और भूमिवानो की बात चली तो विनोबा जी ने लोगों से सवाल नही,एक बात पूछी-----आपमें से कितने ही ऐसे हैं जिनके पास हज़ारों बीघे ज़मीन है और आपमें से ही कितने ऐसे भी हैं जो आपके खेतों में मजदूरी करते हैं.आपमें से कौन ऐसा है जो अपने हज़ार बीघे में से अपने भूमिहीन भाई को दो-चार बीघे ज़मीन दे सके..?बात एक प्रवाह में पूछी थी विनोबा ने,आगे बढे ही थे कि पोचमपल्ली के बड़े ज़मींदार रामचंद्र रेड्डी उठ खड़े हुए,विनोबा जी के पैर छू के बोले -बाबा 80 एकड़ देता हूँ....विनोबा जी हठात चुप हो गये.यकबयक सभा भर में सन्नाटा छा गया.लोगों में घोर आश्चर्य छा गया.ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज़मींदार जिन्दगी भर सूद ही वसूलते रहे....गुलामों की जिंदगी नाप ली और मूल कभी पूरा ही नही हुआ,जो जमींदार किसी को एक धेला ना दे,उनमे से कोई एक 80 एकड़ ज़मीन दान कर दे..लेकिन 'कोई एक' तो केवल कहने की बात है.ज़मीन देने वालो की संख्या दो,तीन,चार,पांच तक पहुँच गयी....विनोबा जी भी साश्चर्य इस 'घटना' को देख रहे थे.जी हाँ ,यह घटना,घटना इस सन्दर्भ में थी कि तब की दुनियां में यह बिलकुल नई बात हो रही थी.नई बात तो यह आज की दुनिया में भी है,लेकिन तब ज़मींदारी का कुचक्र था.जिसमे गरीब किसान मजदूर पिस चुके थे.ज़मीन का खेल तब आज की तरह गन्दा ही नही था,हत्यारा भी था.आज का तो किसान भी आत्महत्या करता है लेकिन तब का मजदूर भी ज़मींदारों के ज़ुल्म से संघर्ष करके जीता था.
विनोबा जी ने उस पल को बड़ी गहराई से महसूस किया.उन्हें लगा कि गांधी के बाद भी गांधी का काम हो सकता है.पोचमपल्ली में ज़मीन पाकर विनोबा की जैसे युवावस्था लौट आई हो.उन्हें एक असंभव सा सपना सच होते दिखने लगा.उन्हें लगा कि देश के गरीब भूमिहीनों को भी ज़मीन दी जा सकती है....भूपतियों से ज़मीन ली जा सकती है......और कहीं अंतर्गुहा में प्रवेश करते हुए विनोबा ने वहीँ बैठे-बैठे भूदान के लिए आन्दोलन चलाने का संकल्प ले लिया.उसके बाद तो फिर क्या भूदान हुआ......! विनोबाजी ने तेरह हज़ार कि.मी.से ज्यादा रास्ता पैदल चलकर नापा और सालभर में 45 लाख एकड़ ज़मीन इकठ्ठा कर ली..जंगल में आग की तरह यह प्रेरणा पूरे समाज में बही...यह विनोबा का प्रभामंडल ही था कि लोगों में ज़मीन देने की होड़ लग गयी..लोग उन्हें सन्देश भेज-भेजकर बुलवाते थे और जमीन देते थे..कितनी ही ग्राम सभाओं और जमीदारों ने तो प्रस्ताव पास करके विनोबा जी के नाम ग्रामदान ही कर दिया..यहाँ तक कि बिहार ने तो पूरा प्रदेश ही दान कर दिया..बिहार ने ही सबसे ज्यादा भूदान भी किया.दुनिया के किसी मुल्क में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता,जहाँ लोगों ने 45 लाख एकड़ जमीन केवल मांगकर पा ली हो..दुनिया आँख फाड़ के देख रही थी इस गतिविधि को..सरकार के जिम्मे ये एक नया काम आ पड़ा--मिली हुई जमीन को बांटने का..और वह जमीन आजतक बंट रही है दोस्तों..भूमिहीनों को जमीन बांटने की कवायद आज 62 सालों से चल रही है..आजतक केवल 20 लाख एकड़ जमीन ही बांटी जा सकी है,वो भी केवल कागजों में.मौके पर कुछ और ही हालात हैं...बाकी जमीन का तो पता भी नही है..जमीनें लापता हो गयी..ये हम हैं..विश्व-गुरु कहलाते नही अघाते..एक आध्यात्मिक चेतना के बल पर घटित हुए एक चमत्कारी आन्दोलन का परिपाक धूल खा रहा है..और दबंगों ने जगह जगह भूदान की जमीनें दबा रखी हैं.नाजायज कब्जे कर रखे हैं..यहाँ तक कि फ़कीर द्वारा मांगी गयी जमीनें कितनी तो बिक भी गयीं.दुनिया के सामने उपस्थित हुई रक्त-विहीन क्रान्ति की यह पहली,एकमात्र और अनूठी घटना अपना सिर धुन रही है..जमीन का सवाल अगर इस रास्ते हल हो गया होता तो आज का भारत वैसा नही होता,जैसा आज वह है..तस्वीर कुछ और ही होती..अफसोस.............................
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