Sunday, 3 August 2014

बादल गजलों के गाँव गये हैं

जी हाँ,मै जानता हूँ
कि सारे बादल ग़ज़लों के गाँव गये हैं
इसीलिए अभी बरस नही रहे...
वहां से लेकर लौटेंगे वे
कुछ रदीफ़ और काफिये,
कुछ ल्ररकते हुए लफ्ज़ और लरजते हुए भाव..
''जै दिन जेठ चले पुरवाई I
तै दिन सावन धुरि उड़ाई II''
अब मुझे यकीन है कि
इस साल ...
भादों में बरसेगा सावन,
तभी
पेड़ों की पत्तियों से टकरायेंगे शब्द-विन्यास
और
धूल में चुयेंगे
लरजते हुए विगलित निर्झर..
इस साल आषाढ़ में
इन पेड़ों पर बरस रही है जो आग,
वह भादों में टेघरेगी..
और भींगेंगे पेड़:रेशा-रेशा
काव्य-शास्त्र और अदब के पन्नों से निकलकर
कविता
पहली बार नाचेगी मेरे दरवाजे
और सावन पेड़ों से उतरकर
छाएगा धीरे-धीरे..
अबकी भादों किसी सावन से दुब्बर नही होगा..
मै जानता हूँ,
बादल गजलों के गाँव गये हैं.

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