Monday, 28 April 2014

बनारस में मोदी-मिल

बनारस में मोदी-मिल बंद होने जा रही है.अधिकतर वेतनभोगी कर्मचारी सड़क पर हैं.बाकी जो बचे हैं,वो भी छंटनी की मार झेल रहे हैं.एकमुश्त 6 करोड़ से ऊपर का जो सैम्पल मिल ने 24 तारीख को सड़कों पर बाँट दिया,उसका बेहद उल्टा असर मार्केटिंग पर पड़ा है.लोग इस थर्ड क्लास माल की खुल्ली बन्दर-बाँट से भड़क गये हैं.ऐसे में दूसरी कम्पनियों ने भी अपने-अपने शेयर वापस खींच लिये हैं और मोदी-मिल का मार्किट धड़ाम हो गया है.मोदी ...मिल के डाउन टू अर्थ होने की ये कहानी दिलचस्प भी है और आई-ओपनिंग भी.पहले तो इन लोगों ने अपनी चिमनियाँ जमीन पर नही,आसमान में गाड़ दीं.ऊपर-ऊपर इतना काला धुंआ फेंका कि पहले से ही सांस लेना दूभर हो रहे शहर में आँखें खोल के रख पाना भी दुश्वार होने लगा.बनारस के आसमान में गजब का दृश्य बन गया.काली-काली चिमनियों से निकलते काले-काले धुंए के बीच काला-काला मन लिए केशरिया बाने में प्रेतात्माएं विचरण करने लगीं.ये प्रेतात्माएं किसी लहर पर सवार बताई जाती रहीं.अब जो शहर ही आधा जल और आधा थल में खड़ा है,उसके लिए इस जहरीली लहर को बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया.बनारस की पहचान का सवाल ही संकट में पड़ गया.प्रेतात्माओं ने एक तरफ इसे अपना गढ़ मान लिया,दूसरी तरफ आज़ादी के आन्दोलन की धर्म-निरपेक्ष विरासत पर भी हाथ डाल दिया और इसकी मिली-जुली संस्कृति पर किटकिटाते हुए अपने दांत गड़ा दिए.अब इस दर्द से बनारस तिलमिलाया हुआ है.नये-नये ये रईस भूल गए कि काशी करवट भी लेती है.बनारस में छोटे-बड़े हर शिवाले पर मुखर 'हर हर महादेव' का मन्त्र मोदी मिल के चुनौती देते नारों के सामने मद्धिम पड़ता देखकर महादेव की तीसरी आँख पर जोर पड़ने लगा.तीसरी आँख के कंपकंपाते ही इधर मोदी-मिल के मार्किट मैनेजरों की बुद्धि पर ताले पड़ना शुरू हो गये.धकाधक प्रोडक्शन बढ़ता रहा और माल डम्प होता रहा.धुंए से भरे आसमान में नारे छींटकर मोदी-मिल के मालिकों ने सुनामी बुला ली.सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' ने बताया था कि लोहे का स्वाद जानना हो तो उस घोड़े से पूछो,जिसके मुंह में लगाम होती है.आसमान को ही धूमिल किये बैठे इन नव-रईसों ने 'धूमिल' गुरु की बात नही मानी और अपनी सठियाई हुई जंग लगी अक्कल पर ज्यादा भरोसा करने लगे.लोहे का स्वाद जल्दी से जान लेने के चक्कर में इन लोगों ने मिल के गेट का लोहा ही चबाना शुरू कर दिया.अब क्या..?जो होना था,वो शुरू हो गया.महादेव ने त्रिशूल पर थपकी दे दी..काशी करवट हो गयी.सारी चिमनियाँ जमींदोज हो गयीं और प्रेतात्माएं पेड़ों में दुबक गयीं.सुनामी कहर बनकर आकाश-कुसुमों पर गिरी.दिवा-स्वप्न धूल होकर आसमानी धुंए में विलीन हो गये.अब तो बस अपनी-अपनी छातियाँ हैं,अपने-अपने हाथ हैं.पीट मुसाफिर पीट..

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