पिछले तीन सालों में भारत की राजनीतिक आबोहवा में ये जो एक उत्साहजनक बदलाव आया दिख रहा है,उसके पीछे अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक उपस्थिति है.देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी का जन्म एक परिघटना की तरह है,तो इसलिए कि इसने मूल्यों की बात उठाई.संवैधानिक मूल्यों की,सामाजिक मूल्यों की और रा...जनीतिक मूल्यों की बात करने वाले ये लोग व्यवस्था में बदलाव की सवा अरब आबादी की सामूहिक इच्छा के वाहक बन गये.व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट और बेशर्म हो चुकी है,और इसका पूरा आर्थिक व सामाजिक बोझ केवल और केवल आम आदमी पर है.इस व्यवस्था को भ्रष्ट करने वाले राजनेता,नौकरशाह व पूँजीपति कुल मिलाकर जितना देश को देते है,आम आदमी आज भी उससे ज्यादा ही देता है.फिर भी वह हाशिये का हाशिये पर ही है.विडंबना है कि जिसका इस व्यवस्था को चलाते रहने में सबसे बड़ा योगदान है,उसी पर यवस्था की सबसे ज़बरदस्त मार भी पड रही है.क्या गज़ब की बात है कि भारत की संरचना में बहुतायत में उपस्थित आम आदमी देश बनाता है.इसी संरचना का लगभग0.05 प्रतिशत वह ख़ास हिस्सा जो राजनेता, नौकरशाह या पूंजीपति के रूप में है,सरकार बनाता है.इन ख़ास लोगों को शासन करने का अधिकार देकर देश ने सरकार की तरफ से आँखे फेर लेने की प्रवृत्ति पाल ली,तो इन आम लोगों से शासन करने का अधिकार लेकर सरकार ने देश की तरफ से नज़रें फेर लेने की प्रवृत्ति पाल ली.यह प्रवृत्ति इतनी बुरी साबित हुई कि लोकतांत्रिक सत्ता पूरी तरह पूँजीनियंत्रित हो गयी.इन 67 सालों में देश पूरी तरह त्रस्त हो गया और व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट हो गयी.असमानता का अनुपात इतना बढ़ गया कि असहनीय हो गया.व्यवस्था रावण हो गयी और देश बन्दर हो गया.बीच का अनुपात आज समुन्दर जितना बड़ा है.एक पुल तो बांधना ही है,उस पार तो जाना ही है,और लंकादहन करना ही है,वक्त की इस ज़रुरत को आवाज़ दी अरविन्द केजरीवाल ने और एकबारगी पूरे देश में अरविन्द के पक्ष में एक खामोश लहर बन गयी.क्योंकि अरविन्द बात कर रहे थे देश की दूसरी आज़ादी की,अरविन्द बात कर रहे थे देश में स्वराज की,अरविन्द बात कर रहे थे व्यवस्था की शक्ति को घर-घर बांटने की और अरविन्द बात कर रहे थे बदलाव की.ख़ास बात यह कि यह सब बातें करते हुए अरविन्द रास्ता पकड़ रहे थे गांधी का.देश ने देखा वे कान में तेल डाले आराम की नींद में मस्त व्यवस्था को जगाने के लिए उपवास कर रहे थे,उसे झकझोरने के लिए सड़कों पर पानी की बौछारें झेल रहे थे,व्यवस्था के सिपाहियों द्वारा सड़कों पर घसीटे जा रहे थे,उपेक्षा और उपहास का दौर तबतक बीत चुका था,बौखलाई हुई व्यवस्था ने उनकी आवाज़ न सुनने का फैसला किया था और अपने लिए खतरा समझकर सीधे-सीधे अरविन्द से भिड़ने लगी थी.व्यवस्था के विरोध में जनसमर्थन बढ़ता गया.और अंदाज़े लगा रहा देश तब भौचक रह गया जब दिल्ली के लोगों ने बैलेट बॉक्स के ज़रिये अरविन्द को सत्ता की ताकत सौंप दी.देश में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं.सामूहिक चेतना का निर्णय ईश्वरीय निर्णय होता है.नर से नारायण होने की कल्पना भारत के आध्यात्मिक मानस ने की ही है.दिल्ली के लोगों ने ऐतिहासिक फैसला इस अर्थ में दिया कि बहुमत के करीब लाकर छोड़ दिया.8 सीटों की कमी रखकर इस तरह दिल्ली ने अरविन्द केजरीवाल को अपनी कसौटी पर रख लिया.समाज की सामूहिक चेतना ने उन्हें उसी नैतिकता की भट्ठी में झोंक दिया,जिसकी सार्वजनिक जीवन में मांग करते हुए वे यहाँ तक पहुंचे थे.अब निभाओ गांधी मूल्य.अब करो स्थापना नये राजनीतिक मूल्यों की.ताकि बदलाव दिखे.जिस चीज़ के लिए तुमने पूरी व्यवस्था को अपने निशाने पर ले लिया,उस चीज़ को स्थापित करो.करो वचनपालन,दो समर्थन-लो समर्थन,व्यवस्था संभालो-विपक्ष में बैठो,अब अपने काम में गांधी का दर्शन कराओ.
अरविन्द घनघोर परीक्षा में थे.उन्होंने कुछ नई लीकें बनानी शुरू भी कीं.उनके होने की हनक साफ़-साफ़ महसूस भी होने लगी. कई भ्रष्ट राजनितिक परम्पराओं ने उनके होने भर से मुह छिपा लिया.देश ने बड़े आनंद से देखा कि विधायकों की खरीद-फरोख्त नहीं हुई. देश ने सुखद आश्चर्य से देखा कि सभी एक दूसरे को सत्ता संभालने के लिए आमंत्रित कर रहे थे. जनता से पूछ-पूछ कर फैसले करने तक तो अरविन्द और उनके आन्दोलन पर गांधी की छाप का असर साफ़-साफ़ देखा जा रहा था, लेकिन उसके बाद भटकाव भी नज़र आने लगे.दिल्ली में सरकार बनाने के फैसला ही मुझे एक बुनियादी भटकाव लगता है, मैंने उस समय भी लिखा था कि अरविन्द को सरकार बनाने का कोई प्रयास कत्तई और किसी हालत में नही करना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा शुरू किये गये इस राजनैतिक आन्दोलन को जनता ने बहुमत का जनादेश नही दिया था. संविधान की देखिये या भारत के राष्ट्रीय मानस की देखिये,दोनों दृष्टिकोण से उन्हें सरकार बनाने के लिए मत नही मिला था.यद्यपि बहुमत तो किसी को नहीं मिला, लेकिन उनसे बड़ा जनमत तो परम्परागत दल को ही मिला था. ऐसे में चाहिए तो यही था कि जीते हुए 28 विधानसभा क्षेत्रों में अरविन्द स्वराज की स्थापना के लिए काम करते दीखते. सरकार कौन बनाता, बनाता या नही बनाता, इसके विकल्प तलाशना उपराज्यपाल के जरिये केवल और केवल केंद्र सरकार की जिमीदारी थी.पूर्ण बहुमत के अभाव में संवैधानिक संकट की स्थिति में अल्पमत सरकार की अवधारणा ने भी जोड़-तोड़ की राजनीति खडी करने में बड़ी भूमिका निभाई है.. जो लोग व्यवस्था को भ्रष्ट करते चले आये हैं, उन लोगों ने अपनी सुविधा के लिए कई-कई आदर्श वाक्य भी गढ़ डाले हैं,आपने 28 सीटें जीती हैं,सरकार बनाना आपका नैतिक दायित्व है.आप सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं,यह बात अरविन्द को वे लोग समझा रहे थे जो उनसे ज्यादा ताकत लेकर भी इस नैतिक दायित्व से पहले ही भाग रहे थे. अरविन्द राजनीति के इन बड़े खिलाडियों के झांसे में आ गये और उनके अखाढ़े में उतरने का साहस कर बैठे.49 दिनों के शासन में अरविन्द ने सरकार का नया चेहरा भी दिखाया,कुछ नये मापदंड भी बनाये,कुछ दुस्साहस भरे फैसले भी लिए,कुछ गलतियाँ भी कीं,कुछ नाकामियां भी हिस्से आयीं,और यह सब करते हुए कई बार वे बड़े खिलाड़ियों के जाल में भी फंसे.कुल मिलाकर इन 49 दिनों ने अरविन्द की चमक में थोड़ी चकाचौंध भी पैदा की और उनकी छवि थोड़ी मलिन भी की.सत्ता पाते ही आन्दोलन से लोगों को जोड़ने और पार्टी के विस्तार के प्रयास में आबादी की जो बहुतायत संख्या आन्दोलन में दाखिल हुई,उसके कई चेहरे थे.कई विचार थे,कई आस्थाएं थीं,और कई चरित्र थे,कहने की ज़रुरत नही कि इसमें राजनीतिक रंग भी थे.इसके बाद से अरविन्द का आन्दोलन उनके नियंत्रण से बाहर जाने लगा.उसी परम्परागत राजनीति के तत्व आन्दोलन में दाखिल होने लगे,जिनके खिलाफ़ इस संभावना को राजधानी के लोगों का चमत्कारी जनसमर्थन मिला था.अलग-अलग लोग अलग-अलग बातें कहने लगे,उन्ही कार्पोरेट घरानों,उन्ही राजनीतिक नेताओं,उन्ही नौकरशाहों और उन्ही पूंजीपतियों से पार्टी का आकर बड़ा होने लगा,जिनका विरोध करने के कारण ही उसका अस्तित्व स्वीकार किया गया था.अरविन्द कई जगह समझौते करते दिखे.जो सपना लेकर वे चले थे,उसको पूरा करने की राह में आशुतोष जैसों की कोई जरूरत नही थी.कश्मीर और खाप आदि के बारे में प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव के बयानों की कोई ज़रुरत नही थी.अपना खर्च चलाने के लिए जो दिल्ली देश की जीडीपी का 3.4 % राजस्व अन्य राज्यों से लेती है,उस दिल्ली की राज्यसीमा के विद्यार्थियों के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय में आरक्षण का प्रस्ताव करने की कोई ज़रुरत नही थी.सरकार का इस्तीफ़ा देने का फैसला करने की कोई ज़रूरत नही थी.
किसी भी संगठन का चरित्र उसके नेतृत्व की स्वीकार्यता और उसके विजन से ही बनता-बिगड़ता है.जहाँ एक तरफ इसका क्षरण हो रहा था वहीँ दूसरी तरफ निजी स्तर पर अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री के रूप में बिना किसी सुरक्षा के मफ़लर बांधे अकेली गाडी में दिल्ली की सड़कों पर टहल रहे थे,बड़े पूँजीपतियों के खिलाफ मुकद्दमे दर्ज करा रहे थे.व्यवस्था की साजिश भरी जकड़नों से जूझते हुए बिजली और पानी की दरें कम कर रहे थे,इलेक्ट्रोनिक और सोशल मीडिया की मांग पर मकान बदल रहे थे और 67 साल के इतिहास में पहली बार किसी चुनी हुई सरकार के मुखिया के तौर पर मिनट-मिनट की जननिगरानी से गुजर रहे थे.इस जन-निगरानी में वर्तमान व्यवस्था की पोषक शक्तियों की अपनी बनाई कूटनीतिक कसौटियां और कटाक्ष भी शामिल थे.अरविन्द और उनकी सरकार 49 दिन तलवार की धार पर थी.देश पहली बार देख रहा था कि गलत करे या ठीक,अरविन्द की सरकार लोगों के कहने पर फैसले बदल रही थी,कहीं अड़ भी रही थी लेकिन कुल मिलाकर जवाबदेह नज़र आ रही थी.सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद लोकसभा चुनाव के इस पड़ाव पहुँचने तक कई सारे निर्णय उलटे पड़े.उम्मीदवारों का चयन कई जगह गलत हुआ.उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया कई बार ढीली पड़ी.कई बार अन्य नेताओं के बडबोले बयान आ गये.और कई बार तो वे हद भी लांघ गये.पार्टी के कितने ही उम्मीदवार मैदान छोड़कर हट गये,कितने ही बिक गये,और आन्दोलन इस स्थिति पर नियंत्रण नही कर पाया.हालांकि इसका कारण पार्टी में मचा भेडियाधसान और पुराने खिलाड़ियों की बौखलाहट ही थी,जिसके चलते फर्रूखाबाद जैसी महत्वपूर्ण सीट पर सलमान खुर्शीद जैसे भ्रष्ट व्यवस्था के भ्रष्ट प्रतीक के लिए भी मैदान खाली छूट गया.इस बीच कुछ दुस्साहस भरे फैसले भी लिए गये जिनके चलते इस आन्दोलन का आकर्षण अबतक बना हुआ है,जिसके चलते अरविन्द के जरिये व्यवस्था के अन्दर गांधी जी के राजनीतिक मूल्य दाखिल हो सकने की हम जैसे कितनों की ही उम्मीद अभी बनी हुई है.अरविन्द का गुजरात जाकर विकासवाद की प्रतीक व्यवस्था से टकराना और बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला ऐसे दुस्साहस भरे फैसलों में शामिल है.लेकिन पार्टी और आन्दोलन की पूरी शक्ति लेकर बनारस में बैठ जाने का उनका फैसला मुझे बहुत उचित नही लगा.देश की चार सौ से ज्यादा अन्य सीटों पर भी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में हैं, जहाँ केवल आन्दोलन लड़ रहा है,पार्टी नही .राष्ट्रीय नेतृत्व को उन जगहों पर भी समय और शक्ति लगानी चाहिए.आन्दोलन से भावनात्मक रूप से जुड़े जुनूनी कार्यकर्ताओं की फ़ौज तो बनारस के ज़र्रे-ज़र्रे में लगी ही हुई है और हर मतदाता के जेहन में हर वक्त मौजूद रहने का चमत्कार पूर्ण काम कर ही रही है.सभी जगह नही तो अरविन्द को बनारस के आस-पास की सीटों पर जरूर ध्यान देना चाहिए,शाज़िया इल्मी तथा कुमार विश्वास जैसे अपने बहुबाती नेताओं और उनके शब्दों,विचारों को भी आन्दोलन के चरित्र में ढालना चाहिए या फिर कुछ कठोर निर्णय करने चाहिए.अरिन्द केजरीवाल को यह नही भूलना चाहिए कि देश की उनपर पैनी निगाह है..
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