Monday, 24 March 2014

बनारस का बुढवा मंगल:एक विहंगम अवलोकन

रास-रंग,राग-भंग,फगुआ-चैती,गुलाल-अबीर,केवडा-गुलाब और दूध-मलाई में डूबी ठंढाई,बीच गंगा में बजडों का बेडा और सारी रात की मस्ती...यह बनारस का बुढवा मंगल है.1730 से लेकर अब तक यानी लगभग 284 वर्ष.. बीच में कई वर्ष छूटे भी,लेकिन इतनी बार आयोजित होकर भी जो अभी जवान है और जिसका नाम लेते ही बच्चे-बूढ़े सब जवान हो जाते हैं , वह है बनारस का अपना बुढवा मंगल. बनारसी रहन सहन , जीवन शैली , अलमस्त फक्कड़शाही और निराले रंग- ढंग की पहचान देता एक प्रतीक उत्सव.. यह जल-उत्सव है. भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक वर्णन देखिये- -गंगा में चहुंओर से,दीपहिं दीप लखात. नावनि सो सुरसरि छिप्यो,जल नही नेकु दिखात. तब नावों से गंगा पट जाती थी और और 'जल नहीं नेकु दिखात' का चित्र चरितार्थ होता था.. वह चित्र इस बार भी उपस्थित था.. जल नही नेकु दिखात--यह नदी की व्यथा-कथा है.. जल- पुरुष राजेन्द्र सिंह कहते हैं.. अब गंगा है ही कहाँ.?? जल नहीं नेकु दिखात.. ..जो दीखता है,वो तो मात्र जल-मल है. 9 अप्रैल 2013 की शाम बनारस के दशास्वमेध घाट पर बुढ़वा मंगल की महफ़िल सजी. यह संस्कृति का सरकारी आयोजन था. बनारस के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों की मेजबानी में ऐतिहासिक विरासत को जिन्दा रखने की इस कोशिश ने काशी के मानस में कई दिनों से उल्लास घोल रक्खा था.

इस पर्व के ऐतिहासिक आख्यानों से गुजरते हुए कई बार लगा कि पहले इस आयोजन की सांस्कृतिक जमीन बहुत समृद्ध थी. कल्पना के उन दृश्यों का आवाहन करें,जब भारतेंदु और महाराज बलवंत सिंह के होते रास-रंग की यह महफ़िल गंगा की गोद में सजा करती थी..तब में और अब में जो सबसे बड़ा फर्क आया है,वो ये की तब गंगा थी,पर अब गंगा नही है.जो गंगा आज काशी के घाटों को छूकर गुजर रही है. तब इन घाटों पर चढ़कर लहराया करती थीं. क्योकि तब वह थी. अब तो वह बह नही रही है,गुजर रही है..बस गुजर रही है. डॉ शुकदेव सिंह की बात बड़ी प्रासंगिक है- "तब बनारस के सभी रईस,जिनमे भारतेंदु हरिश्चंद, शाह घराने के लोग, सुडिया राजघराने के पंडित शिव कुमार शास्त्री के पूर्वज, काशीपुरा के मालिक बाबू प्रभुनारायण सिंह के पुरनिया ,भद्दूमल कोठी वाले रईस , घुघ्ररानी गली वाले केडिया , सितारे हिन्द के परिवार वाले ओसवाल, भेलूपुरा के बच्चा बाबू के पूर्वज , शिवाला के जगन्नाथ दास रत्नाकर के घर वाले , राजा मोतीचंद , बाबू किशोरी रमण , दारागंज वाले अस्थाना कायस्थों के पूर्व पुरुष , गली-गली के मस्त मौले 'बदमाश दर्पण' वाले तेग अली ,बड़े रामदास , छोटे रामदास , जद्दन बाई दालमंडी वाली, हुस्ना बाई , छप्पनछुरी,सकलडीहा वाले नन्हकू सिंह - सभी रंगीन मिजाज वालों के बीच सारी रात गाते-बजाते, गुलाब की पंखुड़ियों से खेलते , इत्र-फुलेल, ठंढाई,कसेरू का शर्बत, भांग-बूटी का गोला-गोली, माज़ूम , बर्फी खाते हुए नाच गाना सुनते थे. कुछ ऐसे बुढ़वे भी होते थे जो आपस में जुड़े हुए बजडों को अलग-थलग करने के लिए गंगा में डुबकी लगाकर रस्सी काट देते थे. रईस एक तरफ,नाचने वाली दूसरी तरफ, तबलची तीसरी तरफ, सारंगी वाले चौथी तरफ घाट-घाट पर बहने लगते थे. इसी को रंग में भंग कहते थे.अब तो यह मुहावरा ही लोगों की समझ में नही आता कि रंग में भंग, भांग है या भेद- विभाजन. अब मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट पर केवल धुआं-धुआं हो रहा है.कैसे पढ़े जांय बुढवा मंगल के आसाद..! कैसे याद करूँ बनारस के वे दिन और ये दुर्दिन..!'' काशी का यह प्राचीन लक्खा उत्सव कब शुरू हुआ,यह शोध का विषय है.शायद गोस्वामी तुलसीदास के समय इसकी शुरुआत हो गयी थी.जेम्स प्रिन्सेप 1830 में 'बनारस इलस्ट्रेटेड' में बुढवा मंगल का चित्र और काशी-खंड का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार के दिन लोग दुर्गा जी का दर्शन करने जाते थे.. दुर्गाकुंड के पास मेला लगता था .. यहाँ भस्म रमाये , मोरपंखी बांधे बहुरूपिये घुमते दिखाई देते थे.. नृत्य होते थे और फ़कीर गाते थे.. शाम को यह मेला गंगा तट पर आ जाता था.. रात के नौ बजे काशी नरेश रामनगर किले से अपनी "सोनमुखी" पर बैठे , हुक्का पीते काशी के घाटों की तरफ आते थे, जहाँ 'हिंगुन' का गाना होता था.. राजा बलवंत सिंह और मीर रुस्तम अली एक ही झरोखे से इसका आनंद उठाते थे.. डॉ मोतीचंद और पंडित कुबेर नाथ शुक्ल के अनुसार बनारसियों ने 1730 में काशी के चकलेदार मीर रुस्तम अली को बिजया (भांग) छनाकर खांटी बनारसी बना दिया था.. तबसे वे सारे त्यौहार बड़े उत्साह से मनाते थे..'बनारस गजेटियर' लिखता है कि रजा बलवंत सिंह को ब्रह्महत्या लगी थी.. उसी के प्रायश्चितस्वरूप उन्होंने गंगा पूजा की और रात्रि में उत्सव किया, जो बाद में बुधवा मंगल बन गया.. महाराजा ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह ने इस उत्सव का रूप निखारा और ,मेले को चरमोत्कर्ष पर पंहुचा दिया.. उनके दरबार में भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसी प्रतिभाएं थीं.. महाराज के अनुसार मेले के संस्थापक्क भारतेंदु के दादा बाबू हरषचंद थे.. इतिहास बताता है कि भारतेंदु युग में मेला जमकर होता था लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के समय मेला शिथिल हो गया.. वैसे तो बनारस में गलियां अभी भी हैं और हैं तो मस्तमौले भी लेकिन वे सभी अब केवल गालियों में ही मडराते हैं..

हाँ तो जब हम अस्सी घाट से नाव से चले तो उस दिन बुढवामंगल की संध्या झुक रही थी.. अपनी छाती पर दो दर्जन से अधिक बजडों के बोझ से बेखबर गंगा अपने टूटते घाटों और सिकुड़ती धारा को हवा के थपेड़ों से सम्हालती आगे बढ़ रही थी.. गंगा के पेटे में एक उमस है, दर्द और दुर्गन्ध का एक भभूका हो जैसे.. पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग के अधिष्ठाता रामानंद तिवारी , उनकी धर्मपत्नी पुष्पा जी और बीएचयू के प्रोफ़ेसर राजा वशिस्ठ त्रिपाठी के साथ हम चले नाव लेकर सत्वर... तो सुमित्रानंदन पन्त याद आ गये और मन में उमड़ उठा उनका वह चित्र-काव्य- "सैकत शय्या पर दुग्ध धवल , तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल. लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल.." हाँ सही तो है.. लेटी है श्रांत क्लांत निश्चल... पर न तो दुग्ध है, न ही उसकी धवलता.. बस एक गहन श्यामलता है, जो चारो और पसरी हुई है.. गंगा में हमारा नौका-विहार दमघोंटू उमस से भर जाता है... नाव को दिशा देता माझी जनरेटर चालू कर देता है और काले होते वातावरण में घुलता हुआ धुंआ नाव की गति को तेज कर देता है.. घाटों पर लगे बड़े-बड़े हैलोजन बल्बों की रौशनी गंगा की कालिमा को चीरती है.. दूर दशाश्वमेध घाट पर बजडों की महफिल दिखने लगी है.. हम मेले में पीछे से दाखिल हो रहे हैं.. सामने से आने में सुरक्षा का सरकारी घेरा रोकता है... बजडों पर जो हैं, वे इस आयोजन से जुड़े लोग ही हैं.. काशी का साधारण जन घाट पर ही है- दूर से ही मस्ती का आलम देखता हुआ.. मेजबान जिला कलेक्टर और आयुक्त महोदय की अगवानी हो रही है.. मुख्य मंच पर भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान के जमाई अली अब्बास खान की शहनाई गूँज रही है..हम मुख्य बजड़े पर आते हैं लेकिन ऊपर चढ़ने से हमें रोक दिया जाता है.. बुढवा मंगल की मस्ती का खुमार थोडा उतरता है.. हम बगल वाले बजड़े की ओर लपकते हैं.. उधर पुलिस वाले खड़े हैं.. डीएम साब आ रहे हैं.. मुख्य कार्यक्रम रोक दिया गया है.. कार्यक्रम संचालक की आवाज गूंजती है- हर हर महादेव.... पीछे से कमिश्नर साहब की नाव भी आ रही है.. शहनाई के स्वर रुक गये हैं.. घाटों पर जनता सकुचाई-सी तटस्थ मन से खडी है.. रईसों के बजड़े अलग हैं..- आजकल धन्नासेठों को ही रईस मान लेने का प्रचलन है.. जिनके निमन्त्रण पर हम आये थे, उन डीएम और कमिश्नर महोदय के बजडारोहण के तुरंत बाद मुख्य मंच पर सरगोशियाँ शुरू हो जाती हैं.. शहर के सम्मानित नागरिक और सुप्रसिद्ध कलाविज्ञ राजेश्वर आचार्य ने माइक सम्हाला हुआ है.. जब वे बोलते हैं तो लगता है जैसे साक्षात सरस्वती बोल रही हैं.. उम्मीद जगती है कि जलोत्सव के शबाब का समय शायद आ पहुंचा.. आचार्य राजेश्वर के स्वर हवा में तैरते हैं- "आयुक्त महोदय आज इस कार्यक्रम में संयुक्त होकर नियुक्त हुए हैं." संयुक्त होकर अर्थात सपत्नीक, यह अर्धनारीश्वर भगवान की भूमिका है.आचार्य उसी भाव में आतिथेय का परिचय दे रहे हैं.. संयुक्त आयुक्त को नियुक्त करते हुए आचार्य राजेश्वर की शब्दावली को काशीवासी थोडा असहज भाव से सुन रहे हैं.. आखिर ये सरकारी अधिकारियों की वही फ़ौज है, जो जिस जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए मान पाती है, उसी में खयानत के लिए अदालतों में फटकारी जाती है.. गंगा के बेटे माँ का दर्द कैसे सहें.. और कैसे सुने अपनी नदियों का आर्तनाद!वरुणा के पेटे में आज होटल खड़े हैं,असी नदी का पता ही नही है.रही गंगा,तो उसके लिए करोड़ों खर्च करके भी न हम उसे अविरल कर पाए,न निर्मल कर पाए.गंगा पर आज बुढवा मंगल का बोझ भी भारी है.प्लास्टिक कचरे के साथ-साथ फूल-मालाओं के रूप में हम अपनी श्रद्धा का कचरा भी गंगा को सौंपने आये हैं.मेहमानों का स्वागत करने की परम्परा मेजबानों के स्वागत में चरित्र बदल रही है.इस बार का सांस्कृतिक जलोत्सव सदियों पुराने व्याकरण को तोड़ रहा है.लेकिन रसिक-जन तो फगुआ और चैती के रस में डूबने आये हैं.इन उपालाम्भों से तैरकर बाहर आते लोगों को देर नही लगी.संगीत का नशा बनारस में आम और ख़ास दोनों के सिर सवार ही रहता है.फिर बुढवा मंगल तो मस्ती भरे माहौल का प्रतिनिधित्व करता है.इस सांगीतिक आयोजन ने साल दर साल अपने इतिहास के पन्नों में सुनहरा अध्याय जोड़ा है.अली अब्बास खान साहब ने परम्परागत शैली में चैती और होली की धुनें सुनायीं.उनके बाद आयीं रेवती साकलकर और उनके बाद जब अनुराधा पाल के मंच पर आने की घोषणा हुई तो बजडों और घाटों पर जमा रसिक-समाज सावधान हो गया.देश की एकमात्र महिला तबला-वादक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुकीं अनुराधा पाल ने राग शंकरा और दुर्गा में निबद्ध अनूठी जुगलबंदी पेश की.बनारस,पंजाब,दिल्ली और मेरठ घरानों की वादनशैली प्रस्तुत करते समय उनकी उँगलियों की चपलता देखकर काशीवासियों को पंडित किशन महाराज की याद हो आई.गत और उठान आदि परम्परागत शैलियों के साथ अनुराधा ने अन्त्याक्षरी भी पेश की.इसके बाद जब पंडित महादेव प्रसाद के राग मिश्र खमाज में रचित ठुमरी पर कुमुद दीवान ने तान लिया तो पुरनियों के मन में गिरजा देवी और सिद्धेश्वरी देवी की स्मृतियाँ ताजा हो गयीं.हर हर महादेव के जयघोष के साथ काशी के जन-समाज ने इन सुर-साधिकाओं का अभिनन्दन किया.
काशी में बुढवा मंगल के होने का जहाँ एक गौरवशाली इतिहास है,वहीँ उसके न होने का भी अपना इतिहास है.आज़ादी की लड़ाई के दौरान जब 1919 में जलियांवाला बाग़ में कत्लेआम हुआ,तो काशी उसके गम में डूब गयी.यह आयोजन कई साल स्थगित रहा..इसके पहले 1835 में बुढवा मंगल ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए प्रेरित किया.तत्कालीन काशी नरेश ईश्वरीनारायण सिंह के आमंत्रण पर चरखारी-नरेश रतन सिंह सहित बुंदेलखंड के कई राजा बुढवा मंगल में भाग लेने काशी आये थे.राजाओं में अंग्रेजों के अत्याचार की बात चली.यहाँ हुए फैसले के मुताबिक़ 1836 में बुंदेलखंड में चरखारी के सूपा नामक स्थान पर बुढवा मंगल आयोजित किया गया,जिसमे बुंदेलखंड की 42 रियासतों के राजाओं ने भाग लिया.उल्लेखनीय है कि स्वतन्त्रता का प्रथम राजनैतिक प्रस्ताव 1836 में आयोजित बुढवा मंगल के इसी अवसर पर पारित किया गया था.

No comments:

Post a Comment