Tuesday, 21 October 2014

गांधी

भारतीय मन में गांधी की जो व्यापक उपस्थिति है,उसे कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है.बीजेपी उसी जहरीली विचारधारा की उपज है,जिसपर गांधी की हत्या का आरोप है.यह कुत्सित विचारधारा आजतक इस जघन्य आरोप से खुद को मुक्त करने भर का साहस भी नही जुटा सकी.अलबत्ता वह गांधी के हत्यारे का आज भी महिमामंडन करती है और इस तरह अपने इतिहास के गौरवशाली पृष्ठों पर स्याही उड़ेलती है.इस उग्र धारा के समर्थक और प्रशंसक भी उग्र,उत्तेजित और अराजक होने की हद तक कुंठित हो चले हैं.इस कुं...ठा ने अपनी महत्वाकांक्षा और वर्तमान राजनैतिक बढत के चलते सामाजिक पतन की भूमिका लिखने का कुत्सित कर्म भी शुरू कर दिया है.बहुत दुखद है कि अति उत्तेजना के इस माहौल में राजनैतिक आस्थाओं और विचारों पर मतभेद ने आम लोगों को अलग-अलग खूंटों से इस कदर बाँध रखा है कि सामाजिक शील की तो छोडिये,क़ानून की धज्जियाँ भी खुलेआम उड़ाई जा रही हैं और इस कुप्रवृत्ति पर किसी की निगहबानी नही है.हम राष्ट्र चिह्नों का अपमान नही कर सकते.राष्ट्रीय पशु,राष्ट्रीय पुष्प,राष्ट्रीय पक्षी तक का अपमान करना जहाँ गुनाह है,वहां राष्ट्र-पिता के दर्जे को प्राप्त एक विभूति को बेख़ौफ़ होकर अपमानित करने के शगल जोरों पर है.खैर,ये हो तो गांधी के जीवनकाल से ही रहा है,लेकिन उनकी हत्या के बाद उनकी हत्यारी विचारधारा ने जो तांडव अभियान शुरू किया,इतिहास के सच बदलने की जो कुत्सित कोशिशें शुरू हो गयीं,उनको हवा देने का काम कांग्रेस ने बहुत महीनी से किया.कांग्रेस ने गांधी की विरासत का वैसे ही नाजायज़ अपहरण कर डाला,जैसे अभी सरदार पटेल की विरासत हड़पने की भाजपाई कोशिशें चल रही हैं.यद्यपि न तो कांग्रेस को गांधी से कोई मतलब है,न बीजेपी को सरदार से कोई लगाव है.ये सब केवल राजनैतिक दुराग्रहों का प्रदर्शन है.कांग्रेस ने राष्ट्रीय आन्दोलन की भूमिका से निकलने के बाद गांधी को फ्रेम करके दीवारों पर ऐसा टांगा कि उस फ्रेम को तोडकर गांधी कभी बाहर न आ सकें.ये गांधी को जड़ करने की कोशिशें थीं,जिनके भ्रम में पड़कर सदियों गुलामी का जीवन जीकर आये लोग कुछ समझ ही नही पाए कि ये गांधी को जीवित रखने की कवायदें हैं या धीमा जहर देने की कोशिशें.लाल बहादुर शास्त्री भी इसी देश के प्रधानमंत्री हुए,लेकिन उनकी वैचारिक विरासत को हडपने के लिए भी है कोई जो पागल हुआ जा रहा हो..? जी नही,कोई नही चाहता.इस ठेठ गंवई आदमी के पास उसकी नैतिक आत्म-शक्ति के अलावा ऐसा कुछ भी नही है,जिसका नाम लेकर वोट-व्यभिचार किया जा सके..लेकिन फिर भी इन विभूतियों को याद करते रहना मेरे देश..कि ये लोग असली धन थे हमारे.इन प्रतीक पुरुषों की विभूति के सजदे सिर झुकता है हमारा.

No comments:

Post a Comment