Tuesday, 21 October 2014

बीटा बेटी में फर्क तो होता है..

बेटा बेटी में फर्क तो होता है भाई.लोग झुट्ठे कहते हैं बेटा बेटी एक समान.....! अरे,कैसे एक समान ... ! बेटा बेटी तो अपने स्वभाव में ही बहुत अलग होते हैं.बोलने में,सुनने में,सोचने में,चलने में,हंसने में,हंसाने में सबमे तो अलग होते हैं.नवरात्र बीतते बीतते कल मेरी बेटी का जन्मदिन भी आ गया.मौके को सेलिब्रेट करने उसकी सहपाठी सहेलियां और दोस्त भी आये.उज्जवल के दोस्त भी आये.खूब सारा धमाल किया बच्चों ने.वो जो केक होता है न,उसकी तो होरी हो गयी.ले मलाई पोत रहे हैं सब एक दूसरे को और देखते... देखते सबकी शक्लें बिगड़ गयीं.अच्छे खासे बच्चे भूत-भूतनी बन गये लेकिन खिलखिला सब रहे थे.कल की शाम बेटी के नाम थी.दोनों भाई सुबह से ही लगे पड़े थे.उज्जवल के दोस्त आयुष और मनीषा ने तो सारी जिम्मेदारी ही उठा ली थी.तो अब इस धमाल के बाद बेटा बेटी में फर्क क्या रह गया..? रह गया भइया,बताता हूँ.मान लीजिये सुबह ऑफिस निकलते हुए तीनों को तीन काम सौंप जाऊं.उज्ज्वल को बोलूं कि आज पांच बजे से पहले घर आ जाना बेटा,कुछ जरूरी काम है.हर्षित को बोलूं कि मम्मी के साथ बाज़ार चले जाना बेटा,सब सामन ले आना.और श्रेया को बोलूं कि ये वाला कुरता मेरा साफ़ नही है बेटी,लेकिन इसकी जरूरत कल पड़ेगी.अब होगा ये कि उज्जवल को उस दिन इतने सारे काम निकल आयेंगे कि वो पूरे जेनुइन कारण का साथ रात दस,ग्यारह बजे भी लौट सकता है.हर्षित अपनी माँ के पीछे खड़े होकर बड़े आराम से बतायेगा कि हम जरा प्रह्लादघाट चले गये थे पापा.वो एक बुक लेनी थी और मम्मी ने मना कर दिया.बोली कल चलेंगे.अब हमे अगर गुस्सा आये तो आये,जाहिर नही कर सकते.उनकी माता जी उनके साथ खड़ी होती हैं.लेकिन साहब बेटी...! कोई शंका नही.हम आश्वस्त रह सकते हैं कि केवल कुरता भले कह गये थे,पाजामा भी धुला मिलेगा.न केवल धुला मिलेगा,आयरन भी हुआ रहेगा.रखा कहाँ है..डोंट वरी.सब सही जगह पर है.जो चीज़ें बेटी के हाथ में हैं,वे सलीके से हैं,जगह से हैं..और सबसे बड़ी बात ये कि वे हैं....! जो चीज़ें बेटों के हाथ में हैं,पता नही किस दशा में हैं,कैसे हैं,हैं भी कि नही हैं,विधाता भी न जाने,हम तो खाली पापा हैं.तो साहब ये है पूरा मामला.बेटा बेटी में फर्क तो होता है.बेटे वंश तो चलाते हैं,पर बेटियां जिंदगी चलाती हैं साहब.जिंदगी में रौनक घोलती हैं.हर आदमी के पास एक बेटी तो होनी ही चाहिए...

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