मेरा गाँव भी पूरा महोबागढ़ है.छुटपन में गाँवों में आल्हा सुनाने वाले नट कलाकारों की टोलियाँ आती थी.प्रायः दोपहर में खेतों से खाली होकर नहाने खाने के बाद लोग किसी एक जगह इकठ्ठा होते और ढोलक की थाप पर ढाई तीन घंटे आल्हा चलता था.बीडी,सुरती के साथ-साथ आल्हा सुन रहे बूढ़े-बुज़ुर्ग वीर रस के प्रसंगों पर ताल ठोंकते भी पाए जाते थे.आल्हा ऊदल की यह गाथा इतनी जनश्रुत और लोकप्रिय है कि इसके पात्रों के नाम लोकजीवन में कहावतों तक में उतर आये हैं.मेरे गाँव में किसी न किसी आदमी का नाम तो आल्हखंड के पात्रों के नाम पर रख ही दिया गया था.कोई आल्हा है,कोई ऊदल है,कोई ताला सैयद,कोई माहिल मामा तो कोई डेभा तिवारी.सोनवा और रुपवा भी थीं.जिसका जैसा कैरेक्टर हो....इसी में एक करैक्टर हैं संकठा पांडे.मनचलों ने इनका नाम डेभा तिवारी रक्खा था.इनके कैरेक्टर की कुछ तफसील----- जवानी के दिनों में लम्बे समय तक पहलवानी की और जहाँ-तहां भिड जाते रहे.कभी किसी को पीठ पर हाथ नही रखने दिया.जांघिया पहनकर खेतों में काम करते और धोती कुरता के साथ बड़का फौजी जूता पहनकर बाज़ार जाते हुए इन्हें तब भी देखा जा सकता था अब भी देखा जा सकता है.गाँव में सारा झगडा भी इन्ही से है और हर एक के बीच पहुँच कर बीच बचाव भी यही करते हैं.क्या मजाल कि कोई लड़का 18-20 का हो गया हो और डेभा तिवारी उसके लिए लड़कियों और तिलकहरुओं की लाइन न लगा दें..! ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई लड़की वाला बिना उनकी अगुआई के गाँव में आ भी जाए तो वे उनसे कोई पुराना परिचय या जान-पहचान न निकाल लायें.जिले भर के लोगों को वो और जिले भर के लोग उनके जानते हैं,ऐसा वे मानते है....इसकी भी क्या मजाल कि जिसके लिए वे अड़ जाएँ,वो शादी हो न जाए....रगडा झगडा से लेकर लाठियां तक निकल सकती हैं..और अगर शादी हो जाए तो शादी के तीसरे दिन वो संकठा पांडे ही हैं जो लड़के को कहीं रास्ते में गरियाते हुए मिल जायेगे--साले,टांग लड़ने लगी बेटा की....! घुटने से घुटना लड़ रहा है....! किचोई साले...! कसरत मेहनत से मतलब ही नहीं है तो क्या होगा..! आजकल उनकी एक स्थायी भंगिमा देखनी हो तो मेरे गाँव आइये,एक गमछा लपेटे दिनभर नंगे बदन तेज चाल में मिल जायेंगे..एक और मुद्रा प्रसिद्द है उनकी.दो दो उँगलियाँ दोनों हाथ की..पीछे गमछे में घुसा लेंगे और अण्डों से निकले मुर्गियों के बच्चों के पीछे-पीछे उनकी ही चाल में चलते हुए,उन्हें चराते हुए,उन्हें एकटक निहारते हुए कहीं भी मिल सकते हैं,गाँव के बाहर भी,गाँव के अंदर भी..खडी हिंदी एकदम शुद्ध उसके व्याकरण के साथ बोलते हैं और बहस किसी से भी कर सकते हैं,बस ये पता नही होना चाहिए कि अगला कोई डीएम या सीएम या पीएम है..तीरंदाज अपने मन के हैं..और फेंकू एक नम्बर..! हार स्वीकार करना उनकी फितरत में नही.एक छोटा सा किस्सा लिखकर पूरा करता हूँ.गाँव के लडके कबड्डी खेल रहे थे.पहुँच गये डेभा तिवारी खैनी मलते,अंगोछा लपेटे.बोले-हमहूँ खेल्लब.... लड़कों ने मिला लिया-आइये और ताला सैयद बच्चों के साथ ताल में ताल मिलाकर कबड्डी खेलने में मशगूल हो गये.ये उनका दूसरा नाम था,जो कभी-कभी ही बुलाया जाता था.आज भांप नही पाए उस्ताद कि लडकों ने कुछ तय करके बुलाया है उन्हें.बहुत गरियाते हैं,आज उतार देना है-कनखियों में इशारे हो गये और लडके सक्रिय हो गये,बस किसी तरह गमछे तक हाथ पहुंचे किसी का...और बाप रे बाप...ये क्या..! लडके गमछा खींच ले भागे और डेभा तिवारी एकदम से नंग-धड़ंग जमीन पर पसर गये.सारे गाँव के बीच लाज लुट गयी.खिसिया रहे थे और हंस रहे थे बस,कोई बस नही चलता था.जोर का शोर हुआ..कोई आँखें मूंदे,कोई हकबका के देखते सब चिल्ला रहे थे,सब हंस रहे थे.जल्दी से किसी ने धोती फेंकी..लपेट के खड़े हुए.........एक वो दिन था और एक आज का दिन है..बूढ़े हो चले लेकिन मानते नही हैं संकठा पांडे कि उस दिन दो-दो दिन के लडकों ने उन्हें बेपर्दा कर दिया था..आप पूछ के देखिये.तुरत जवाब मिलेगा...अरे नाही...ऊ तो ऐसा है कि ऊ तो ऐसे हो गया था बस,ओइसे नही होता तो ओइसा थोड़े होता..ई सारे लड़का कुल............
No comments:
Post a Comment