Sunday, 9 February 2014

जनता कौन है आखिर....?

 


भारत के संविधान में लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना का स्पष्ट विधान है,जिसमे जन-प्रतिनिधियों,लोक-सेवकों, और समूचे तंत्र को लोकहित में काम करने का स्पष्ट निर्देश भी है.'सरकार' शब्द की कल्पना और अवधारणा ही इसी आधार पर टिकी हुई है.समाज ने जब पहली बार अपने लिए सरकार की जरूरत महसूस की होगी,तो उसके पीछे लोकहित,लोकसुरक्षा और लोकानुराग ही प्रमुख तत्व थे.इस बार 25 जनवरी को गणतंत्र-दिवस की पूर्वसंध्या पर भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्र के नाम अपने सन्देश में कहा कि सरकार का काम परोपकार करना नही है.राष्ट्रपति के इस एक वाक्य ने न केवल एक उलझन,बल्कि एक संवैधानिक संकट भी उपस्थित कर दिया है.जब राष्ट्रपति ही संविधान की भावना के विपरीत जाकर तथ्यों को तोड़े-मरोड़े तो बाकी देश क्या करे..!जब राष्ट्रपति,जो स्वयं भी प्रथम श्रेणी के लोकसेवक हैं,संविधान के निर्देशक तत्वों का मखौल उड़ा रहे थे,तो क्या हम ये समझें कि राष्ट्रपति-भवन से लम्बे समय तक कट्टर कांग्रेसी होनेका कर्ज/फर्ज अदा किया जा रहा था..?अगर सरकार का काम परोपकार या लोककल्याण करना नही है,तो हम एक नागरिक होने के नाते भारत के राष्ट्रपति से यह जानना चाहते हैं कि सरकार का काम वास्तव में क्या है..?
26 जनवरी 1950 को अंगीकृत किये गये संविधान की शुरुआत में ही एक शब्द आता है 'जनता',जिसे 'हम भारत के लोग' कहकर परिभाषित किया गया है.बहुत बार ऐसा होता है कि निश्चित शब्दों में बाँधी गयी परिभाषाएं उस पारिभाषिक शब्द की सम्पूर्ण व्यंजना करने में अक्षम हो जाती हैं.आखिर यह 'जनता' है कौन..?यह प्रश्न इसलिए भी उठता है कि इसी जनता के मत से चुनी हुई सरकारें इसी संविधान के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ उठाती हैं.पद के साथ जुड़ा यह दूसरा शब्द 'गोपनीयता' आखिर किसके सापेक्ष है..?जनता के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की शासन-व्यवस्था जनता से ही किसी किस्म की गोपनीयता आखिर कैसे बरत सकती है..?पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा दिए गये धरने के दौरान देखा गया कि मुख्यमंत्री ने सड़क से ही सरकार चलाने का उपक्रम भी किया.तमाम विभागों और कार्यालयों की कई फाइलों और कागजात पर मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों ने हस्ताक्षर किये और सड़क पर ही सरकार के जरूरी कामकाज निपटाए..अदालत में प्रश्न उठाया गया है कि मुख्यमंत्री ने गोपनीय फाइलें सड़क पर मंगवाकर पद से जुड़ी गोपनीयता की शपथ का उल्लंघन किया है..अब एक अहम् प्रश्न ये है कि वहां सड़क पर जो उपस्थित थी,वह जनता ही तो थी.या अधिक से अधिक यह कह सकते हैं कि वह जनता की ही एक टुकड़ी थी.अब शासन जब जनता का ही है और जनता के लिए ही है तो जनता से गोपनीयता कैसी..?मेरा सवाल यहीं से निकलता है कि अगर वहां उपस्थित लोगों को जनता नही कहा जा सकता तो,जनता आखिर है कौन..?


गाँधी जी की कुछ बातें जो बहुतायत में उद्धृत की जाती हैं,उनमे से एक वह भी है,जो उन्होंने वायसराय हाउस में राष्ट्रपति निवास बनाने के प्रस्ताव पर कहा था.उन्होंने कहा था कि भारत जैसे गरीब देश के राष्ट्रपति को लोकसेवक-धर्म का कठोर पालक होना चहिये.इतने बड़े महल में रहने का अधिकार उसे नहीं है.वायसराय हाउस में अस्पताल खोला जाना चाहिए,जहाँ जरूरतमंदों का इलाज और सेवा बेहतर ढंग से हो सके.उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार में जन-भागीदारी होनी चाहिए.. नीतियों और निर्णयों में जनमत शामिल होना चाहिए.इन शब्दों के अर्थ के आलोक में अगर सरकारी कार्यप्रणाली की बात करें तो आलीशान भवनों और कार्यालयों में चाकचौबंद व आरामदेह ऐय्याशगाहें बनाकर वहां से सरकार नही चलाई जानी चाहिए.गांधी के सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक और प्रशासनिक सिद्धान्तो,आदर्शों व सूत्रों को व्यापक समाज ने तब भी सर्वस्वीकृति दे रखी थी,जब देश की आबादी ३३ करोड़ थी और अब भी दे रखी है,जब आबादी तबसे चारगुना बढ़ गयी है.हालाँकि इस सवा अरब जनता में एक बड़ा हिस्सा वह भी है जो गाँधी को बुरा मानता है,उनके जीवन को पाखंड कहता है,उनकी नीतियों को कायराना कहता है,यहाँ तक कि उनको राष्ट्रीय आन्दोलन का खलनायक तक कहा जाने लगा है.नाथू राम गोडसे को शहीद बताने और उसका यशगान करने वाली एक पीढ़ी आ चुकी है.लेकिन फिर भी अभी भारत की जनता, संस्थाएं और व्यवस्थाएं, ये सभी कुल मिलाकर आमतौर पर गांधी की वैचारिक दृढ़ता और समाजशास्त्रीय आध्यत्मिकता को पूरी आस्था से स्वीकार करती हैं.भारत के चुनाव-आयोग में पंजीकृत छोटे-बड़े चार हज़ार के आस-पास राजनैतिक दलों में से कोई एक भी ऐसा नही है,जिसने अपने विज़न में गांधी-विचार और उनकी परिकल्पनाओं को लिखित रूप में स्वीकार न किया हो.बाद में सत्ता-शीर्ष पर पहुंचे दलों ने इन आदर्शों को छूना भी मुनासिब नही समझा,ये अलग बात है.और जितना छुआ भी गया,उतना गांधी,सरकारी गांधी में तब्दील कर दिए गये.पिछले 68 सालों में हमने सरकार और समाज की हैसियत से कई टुकड़ों में गांधी का विखंडन किया है.इतने काल-खंड में इस आवृत्ति से विखंडन की दूसरी कोई क्रिया नही हुई होगी.लोहिया ने गांधी के ये विखंडन भांपे थे--एक था सरकारी गांधी,एक था मठी गांधी,एक था कुजात गांधी.ये टुकड़े वृहत्तर समाज ने नहीं,समाज के एलीट तबके और सरकार के तत्व ने मिलकर किये थे,लेकिन अब तो गांधी हज़ारों टुकड़ों में बिखर गये हैं--अब तो हठी गांधीवादी भी हैं, सरकारी के अलावा राजनैतिक गांधीवादी भी हैं.

ज्यादा आगे बढ़ने से विषयांतर होगा,इसलिए अगर टुकड़ों में बिखरे इस गांधी के किसी भी अंश को अगर कोई सरकार व्यवहार में अपनाती है तो यह सड़क से सरकार चलाने का दृश्य तो असल में गांधी की स्थापना का कार्य है.इस आधार पर तो सभी राजनैतिक दलों को दिल्ली सरकार को समर्थन देना चाहिए.जनता के शासन में जनता के बीच बैठकर जनता की फाइलें खुलने लगें तो मुझे लगता है कि लोकतंत्र अपनी परिपूर्णता पा लेगा.रह गयी वैदेशिक और सुरक्षा सम्बन्धी सावधानियां और गोपनीयता की बात तो ये गोपनीयता किनसे बरती जानी है,उन्हें चिह्नित तो कीजिये,उनकी घोषणा तो कीजिये.लेकिन उसी तरह जनता को भी चिह्नित कीजिये.ताकि पता तो चले कि सड़क से सरकार चलाने का यह कारनामा कितना जरूरी है.इस शिकायत पर तो अदालत को सुनवाई ही नही करनी चाहिए क्योंकि गाँधी की फोटो हर जज की कुर्सी के पीछे टंगी है न.हाँ उसी सरकार से यह अपेक्षा ज़रूर की जानी चाहिए और समग्र समय व कार्य-योजना के साथ की जानी चाहिए कि आपको लोगों ने गांधी कहा, क्योंकि आपने आज़ादी की दूसरी लड़ाई का आह्वान किया.आपके राजनैतिक आन्दोलन में देशभर के लोगों ने राज्यवार जो आपको अपना,समय,श्रम और मेधा दी,वह इसलिए नही कि कालान्तर में उसी तरह की चोर उचक्की एक और राजनैतिक पार्टी बन जाय,जैसी अभी तक की पार्टियाँ रही.आप से हमें रामराज चाहिए.आप से हमें खुशहाल समाज चाहिए.स्वराज की टोपी पहनकर आप ने दिल्ली में स्वराज लाने का वादा किया है और पूरे देश को यह सपना दिखाया है..


आप अपना वह कल्पित तंत्र लागू कीजिये.आपको दिल्ली में कोई ताज नही मिल गया है,और मई जून में भी आप हिन्दुस्तान नरेश नही बनने जा रहे हैं.आपको अभी मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गयी है,उस हैसियत से आपका संघर्ष अभी बाकी है.अगर लम्बी दूरी तय करनी है,तो टाईट रस्सी पर चल कर पहाड़ पार करने की योजनायें घातक हो सकती हैं.यद्यपि इस रस्सी पर चलने का साहस करना और व्यवस्था से इस तरह टकराना अभिनंदनीय है,किन्तु सारी ताकत इस दिशा में केन्द्रित होनी चाहिए कि सत्ता का स्वरुप विकेन्द्रित हो...ज्योही सत्ता विकेन्द्रित होगी (और अपने शुद्ध रूप में होगी),उसी क्षण से हर दिशा में सम्पूर्णता से विकास दिखेगा....जैसे रात में बारिश हो जाय और सुबह पहाड़ी भी हरिया उठे और घाटी भी,ऐसा दृश्य बनना चाहिए...समाज के हर तबके में न्याय पहुंचे,समाज की खुद की टूटन भी थोडा रुके,लोगों का सरकार में विश्वास जागे.एक ऐसी सरकार मिलने की आहट से राष्ट्रपति को तो खुश होना चाहिए और कहना चाहिए कि हाँ,सरकार लोक-कल्याण के लिए ही है.उन्हें सरकार से कहना चाहिए कि अपनी समयबद्ध कार्य-योजना पेश करो.सरकार को परोपकार तो करना ही चाहिए.

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