Sunday, 9 February 2014

क्या दिन थे वे ...


हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी बेटी के लिए शादी खोजने वालों को तिलकहरू/देखहरू कहते हैं.मेरी स्मृतियाँ अभी वैसी ही ताज़ी हैं.साल 1989 बीत चला था.मै लगभग 20 बरस का हो रहा था और मेरे तिलकहरु आने लगे थे और "अभी बच्चा है" कहकर बाबूजी टालने लगे थे.ऐसे करते हुए बाबूजी तीन साल खींच लाये.. मै 23 का हुआ और लौटे हुए तिलकहरूओं की संख्या हुई 19.मेरे बाबा उस समय 85 पार कर रहे थे.बाबा बाबूजी पर चिल्लाते थे- "लइका के बूढ क के बियाह करबा...? तोहार मति ठीक काम न करत ह...अपने के टाटा बिड़ला बुज्झत हउआ..??"... "अरे अभी पढ़ रहा है पढने दीजिये" कहके बाबूजी किसी तरह बाबा को समझाते.दूसरी तरफ अम्मा थीं.बाबूजी का रोज कान भरती- "अब हमके पतोह चाही बस"......
तब हम चंदौली पॉलीटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा के दूसरे साल में थे और मुगलसराय में रहते थे.बाबूजी गोरखपुर में शाहपुर थाने पर सबइंस्पेक्टर पोस्ट थे.उन दिनों मोबाईल,फोन,कंप्यूटर कुछ न होने से चिठ्ठियों के ज़रिये बाते पहुचाई जाती थी.. दो चार महीने पर जब सब लोग गाँव पर इकठ्ठा होते तो बाबा लाठी लिए हुए घर से बाहर तक टहलते और चिल्लाते - ''असों बियाह होके रही''.ऐसे ही एक मौके पर पता चला कि 20वें तिलकहरू की आमद हो गयी है.बाबा बता रहे थे-''बड़ा मानिंद आदमी हउवन..जिला में उनकी मतिन पंडित ना मिली..सीताराम पांडे के इलाका जानेला.. हम जबान दे देले हईं.. बियाह क के मानब..आ जे बिच्चे में बोली ऊ ई गोजी देख लेव..'' बाबूजी खाना खा रहे थे और सर झुकाए सुन रहे थे.. तबतक माथे तक घूँघट डाले अम्मा प्रगट हुई - "जाईं आप आराम करीं..बियाह त असों होइबे करी" बाबूजी दबाव में आ चुके थे.. दोनों चाचा , चाची मूक समर्थक.. बाबूजी और बाबा जो भी फैसला ले लें , वो सबको मंजूर..इस तरह लगभग एक राय-सी बन गयी कि 20वें तिलकहरू को लौटाना नहीं है.यही 20 वीं आमद मेरी ज़िन्दगी में दाखिल हुई.पता चला कि लड़की के पिता फौजी है.मेरे छोटे भाई बहन सारे के सारे खुश कि भइया की शादी होगी और भाभी आएगी.अम्मा के पाँव धरती पर न पड़ें.एक अच्छा सा दिन तय करके बाबूजी ने मुझे बुलवा भेजा.हम गाँव पहुँचे तो पता चला कि आज तिलकहरू आने वाले हैं, क्या गहमा गहमी थी ! बाबा दो भाई और बाबूजी ३ भाई...सबका मिलाजुला संयुक्त परिवार छत्तीस लोगो का था.चारो बुआ, चारो फूफा..सब लोग इकठ्ठा थे.लड़की के पापा और बाबा लड़के को देखने आने वाले थे.पूरे गाँव में ही उस दिन एक अजीब-सी ख़ुशी का माहौल था.हमारी हालत बड़ी विचित्र थी..गाँव में जिधर भी निकलते ,जो भी मिलता, धीरे से मुस्कुरा के निकल लेता था.हमारी हालत बहुत पतली थी उन दिनों..पूरा गाँव ही तीन चार पीढ़ी पहले के पूर्वजो के परिवारों से बना था..हर कोई चाचा,बाबा,भैया,चाची,बुआ,अम्मा,आजी या भाभी - सबसे ऐसे ही रिश्ते थे.गाँव में बड़ों की संख्या ज्यादा थी.मुझसे छोटे कम ही लोग थे,सब तो बड़े ही थे..मै शरमाया-शरमाया सा कहीं भी जाता तो हर किसी को मुस्कुराता देखकर खुद मुस्कुराना भूल गया था.गाँवों में भाभी लोग भौजी होती हैं, वो लोग भी बड़ों की नज़र बचा के कुछ न कुछ मजा ले ही लेती थीं......
लड़की के पिता चूंकि फौजी थे.इसलिए शाम की बैठक में होने वाले दामाद की पेशी हुई..नाम,पढाई-लिखाई,काम-धाम,सोच-सपना,नौकरी-चाकरी...तरह-तरह के सवालों से मुकाबला था.मै बहुत असहज महसूस कर रहा था.खैर,सारे रिश्तेदारों के बीच बैठा घंटों अपनी घबराहट से झूझता रहा.अन्दर ही अन्दर उस पूरे माहौल से चिढ भी हो रही थी,लेकिन बाबूजी की सिखावन थी कि-''कोई चिढ भी हो तो चेहरे से ज़ाहिर नही होनी चाहिए.बुरी से बुरी मनोदशा में भी अच्छे से अच्छा व्यवहार किया जा सकता है,किया जाना चाहिए.आधा तो मै बाबूजी के डर से ही बैठा रहा,हालत सच में पतली थी.सामूहिक आदेश और बाबूजी के इशारे से मै अन्दर पंहुंचा तो अम्मा,चाची,बुआ सब की ख़ुशी का ठिकाना नही था...शादी तय.
सात फरवरी 1993 को वैलेंटाइन वीक के पहले दिन शादी की तिथि निश्चित हो गयी (लेकिन तब हमें वैलेंटाइन के बारे में कुछ भी पता नही था,ये भी नही की ये भी कुछ होता है ).मैंने किसी को कहते सुना की लड़की सआदतपुर के इंटर कालेज में पढ़ती है.मेरी अक्तूबर में परीक्षाएं होने वाली थी.मै इंस्टीट्यूट चला गया.बाबूजी गोरखपुर चले गये और सारे रिश्तेदार अपने घर.घर में सोलह साल बाद शादी का मौका आया था.पूरा गाँव ही करीब-करीब शादी की तैयारियां कर रहा था.मेरे मन के अन्दर चिडचिडाहट के बाद भी लड्डू तो फूट ही रहे थे.चिडचिडाहट ये कि अभी शादी का मन नही था मेरा.फिर भी शादी के चार महीने बाकी थे.सबका घर आना जाना बढ़ गया था.मैंने अम्मा से कई बार कहा कि लड़की मुझसे छः साल छोटी है.अभी मत करो शादी.बाबूजी से तो कहने की हिम्मत ही नही थी,भले ही बाबूजी कहते थे कि अपनी सारी बातें मुझसे कहा करो.अम्मा मेरी बात पर घूर कर देखती.कहतीं कि तुम लड़की की फोटो देखकर बताओ,लड़की कहाँ छोटी है तुमसे.कोई भी मेरी एक बात सुनने को तैयार नही था.......
एक दिन अपने इन्स्टीट्यूट में ही था कि खयाल आया,क्यों न लड़की से ही मिल लें.पता तो था कि सआदतपुर में पढ़ती है.मैंने दोस्तों से बात कह दी.निकेश ने मुझे चढ़ाया-''चल यार देख आते हैं''.झटपट बात फैली और हम तीन जने सआदतपुर चल दिए.बनारस से गाज़ीपुर,गाजीपुर से जंगीपुर,जंगीपुर से सआदतपुर.पूछते हुए हम स्कूल पर पंहुंच गये.घर में बताया किसी से नही था.पूरी सेटिंग चोरी से की थी,इसलिए आधा तो डरे हुए थे,आधा दोस्तों का साथ था और बाबूजी का कहा एक वाक्य कि शादी के लिए अपनी पसंद बता सकते हो,निर्णय नही ले सकते.आधे में इस एक बात का संबल था कि बाबूजी से पसंद-नापसंद बता सकता हूँ तो देखकर कह दूंगा कि लड़की मुझे पसंद नही है.स्कूल के सामने जब हम लोग जीप से उतरे तो पहले ठेले पर जा कर जलेबी खायी.हिम्मत जुटा रहे थे कि स्कूल में किसी से लड़की के बारे में कैसे पूछेंगे.शर्म भी आएगी और पिटाई भी हो सकती है.पूरा इलाका गाँवों से भरा हुआ है.शहर 15 किलोमीटर दूर है.ग्रामीण रहन-सहन तब ऐसा था कि सड़कों पर लोग कम ही दिखाई देते थे,चट्टियों और बाजारों में लोग काम-धाम से खाली होकर ही जुटते थे.बाकी समय नई-नई बनी उस संपर्क-सड़क पर कभी-कभी हल बैल लिए हलवाहे किसान आ जा रहे होते.चारों ओर सूना-सूना ही था.स्कूल के गेट पर इधर-उधर तीन चार दुकानें थी.एक साइकिल का पंचर बनाता था,दूसरी चाय की दूकान थी,तीसरी पान की,जिसमे सिगरेट,बीडी,बिस्कुट आदि भी था.इसी तीसरी दूकान पर पंहुंच कर हम लोगों ने पांच रु.में दालमोठ का एक पैकेट खरीदा और तीनों खाने लगे.अगल-बगल देखसुन कर दूकानदार से बातचीत भी करने लगे.यह दुकानदार मुझे बड़ा मुफीद जरिया लगा.चूँकि मेरा गाँव वहा से पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर ही था,इसलिए बोली समान थी.निकेश मुंगेर-पटना से था लेकिन ज़्यादातर शहरों में रहने के कारण उसे भोजपुरी लगभग नही आती थी.मैंने ही दुकानदार से बातचीत शुरू की.पता चला उसका नाम कन्हैया था.उसको मिलाकर हमलोगों ने अपनी पोलपट्टी उसको बता दी.वह तैयार भी हो गया.बोला-''भईया,हम किसी से सनेसा भेज के लड़की को बाहर बुलवा देंगे.आप लोग दूर से देख लेना..''मै बोला -''यार बात करा दो थोडा किसी बहाने..वह तैयार हो गया और बोला -''भईया हम सनेसा भिजवा देंगे कि आपके कोई रिश्तेदार आये है.वो बाहर आएगी तो आप लोग बात कर लेना लेकिन हमारा नाम नही खुलना चाहिए..''. हम लोग तैयार हो गये.वह बोला एक घंटा टहल के आइये आप लोग तब तक हम जोह भेजवाते हैं.मुझे 1985 में हाईस्कूल फर्स्टक्लास पास करने पर बाबूजी ने एच एचएमटी कोहिनूर घडी दी थी.मैंने टाइम देखा- दो बज रहे थे.कम से कम बनारस तो लौटना ही था..bhu में निकेश के साथ रुक के चंदौली अगले दिन भी जा सकते है,यही सब सोच के हम लोग सड़क पर टहलने लगे.तीन शहरी टाइप लड़कों का उधर गावों में दिखना तब एक दृश्य होता था.वहां दुकानों पर हम लोगो के बारे में चर्चा होने लगी थी.घंटे भर बाद कन्हैया के पास पहुँचे तो वह हकला कर बोला-''भैया हम नही बुला पायेंगे.आपलोग भी जाइये न तो पिटा जाइएगा.सब लोग जान गये हैं.फौजी की बेटी है,उसके गाँव के और लड़के लड़कियां भी यहाँ पढ़ते हैं.अभी खबर फैलेगी.आप लोग पक्का पिटा जाइएगा.हमारी हिम्मत टूटने लगी थी लेकिन एक बात मुझे टिकाये हुए थी कि हम उनके होने वाले दामाद हैं यार,पिटेंगे थोड़ी न.निकेश बोला-''चल आगे तक टहल के आते हैं..''
हम लोग सडक पर सीधे टहलते हुए आगे बढ़ने लगे.अचानक स्कूल की एक लड़की बाहर आई.मैंने हिम्मत जुटाकर उससे नाम पूछा और कहा-''बहन जी,किरन से मिलवा दोगी...?''वो मारे ख़ुशी के उछलकर बोली-अभी मिलवाती हूँ.उसने अन्दर जाकर कहा होगा.लड़कियों में बात फ़ैल गयी.कुछ लड़कों में भी हलचल होती देखकर हमलोग घबराकर आगे बढ़ गये और दूर निकल आये करीब १ किलो मीटर.लेकिन वहां से भी बिलकुल सीध में स्कूल साफ़ साफ़ दिख रहा था.वहां एक खलबली-सी मची थी कि तीन लड़के बैग टाँगे सड़क पर घूम रहे हैं और किसी लड़की को देखने आये हैं.वहां सड़क के किनारे कडाहे में गुड खौलाया जा रहा था.तीन,चार लोग थे.हम लोग उन लोगों से बतियाने लगे.महिया तैयार थी.उन लोगों ने कहा-''आप लोग तो शहर से आये हो,महिया खाओ.भूख तो लगी ही थी.हम तीनों माहिया खाने लगे और कनखियों से स्कूल की ओर भी देखते रहते कि उधर क्या हो रहा है.माहिया खाते हुए ही नज़र आया कि स्कूल के बाहर लाल कपड़ों में एक लड़की हमारी तरफ चली आती है.मै झट से पानी पीने लगा और एकटक उधर ही देखने लगा.उस समय गावों की सड़कों पर वाहन भी यदा-कदा ही नज़र आते थे.दूर तक साफ़ दिख रहा था,फिर भी एक किलोमीटर की दूरी का अपना महत्व होता है.इतनी दूर से दिख रहा लड़कीनुमा वह बड़ा सा धब्बा जब साफ़-साफ़ लड़की जैसा दिखने लगा तो पता नही कैसे,पर मै जान गया कि वह किरन ही आ रही है.हम तीनों भी स्कूल की तरफ बढ़ने लगे.धीरे-धीरे लड़की बड़ी होती गयी-हाथ में किताबों की फाइल दबाये हुए,लाल शलवार सूट पहने सत्रह साल की बारहवीं की छात्रा किरन के जब हम करीब पंहुंचे तो मेरे दोस्त आगे बढ़ लिए.अब उस सुनसान सड़क पर आम के पेड़ के नीचे मै खड़ा था और मुझसे 3,4 फीट की दूरी पर सहमी-ठिठकी एक लड़की खड़ी थी.चारों ओर स्कूल के अलावा और कहीं कोई दिखाई न दे.नीचे की ओर देखती हुई,पैर का अंगूठा अप-डाउन करती,फ़ाइल संभालती हुई किरन बेहद खबराई हुई थी.मेरा भी कलेजा मुंह को आने लगा था.हमें मालूम था कि कभी भी, कोई भी उधर आ सकता है.मैंने हिम्मत जुटाई और पूछा -''तुम किरन हो न...?''वह गुस्से में बोली -''कोई और नही था क्या परिवार में देखने वाला..?आपको ही आना था...?बेइज्जती करा दिया आपने.अब देख लिया न,अब यहीं बता के जाइए कि मै पसंद आई या नही ..?''.....अब रोमांटिक तो पता नही,लेकिन एक साथ इतने सारे सवाल सुन के मेरे होश तो फाख्ता हो गये.मै किसी तरह बोला -''देखो किरन हम चोरी से आयें हैं छुट्टी लेकर और तुमको देखने नही आये हैं.खुद को दिखाने आये हैं कि तुम मुझे देख लो और नापसंद कर दो,वैसे भी मै तुमसे 6 साल बड़ा हूँ.''वो चुप रही.मैंने फिर कहा कि-'' देखो हमको अभी बनारस लौटना है,तुम घर जा कर सबको बता देना कि वो लड़का मुझे देखने आया था और बहुत खराब है.मै उससे शादी नही करूंगी''..वह चुप खड़ी अंगूठा हिलाती रही.फिर हम हाथ जोड़ कर चलने को हुए तो वह भी आगे बढ़ गयी.मुझे पीछे से उसकी आवाज़ सुनाई पड़ी-''एक फोटो भिजवा दीजियेगा..''मैंने सामने देखा तो स्कूल की छुट्टी हो गयी थी और लड़के-लड़कियों का झुण्ड बाहर सड़क पर आ चुका था.लगभग उसी समय सड़क से गुजरी एक बस में बैठे किरन के चाचा-चाची ने हमें देख लिया था.स्कूल में सब यह जान चुके थे कि एक लड़की को देखने एक लड़का आया है.सड़क छोड़कर किरन अपने गाँव की पगडंडी पर उतर गयी और मै दोस्तों के साथ स्कूल से लौटते,शोर मचाते लड़कों के बीच से निकलकर इस पार आ गया.थोडा आगे लड़कियों की टोली थी.आस-पास छितराई हुई लड़कियां हमें ही देख रही थी.हम तीनों नज़र झुकाए निकल आये.स्कूल पर पहुंचे तो कन्हैया अपनी दुकान बंद करके जा चुका था.हम लोग जल्दी-जल्दी गाजीपुर पहुंचे,गाजीपुर से बनारस,देर रात bhu हॉस्टल पहुंचे तो किसी ने बताया कि आपके पिताजी आये थे.घिघ्घी बंध गयी कि अब क्या जवाब देंगे.लेकिन कोई जरिया नही था बाबूजी से बात करने का.ऑफिस से बाबूजी की चिट्ठी मिली ''तुरंत गोरखपुर आ जाओ''..मै तुरंत गोरखपुर के लिए चल पड़ा........
5 दिसंबर 1992 को लड़की देखने गया था मै.7 फरवरी 1993 को मेरी शादी थी.7 दिसंबर को गोरखपुर पहुंचा तो बाबूजी क्वार्टर पर ही मिले.राधा स्वामी सत्संग-भवन के पास सिर्कुलेटिंग एरिया बिछिया में बाबूजी रहते थे..बाबूजी अनुशासन के बेहद सख्त थे.पूरे पुलिसिया अनुशासन में ही सबको रखना चाहते थे और खुद अनुशासन के हम सबसे ज्यादा पाबन्द थे.जाड़ा,गर्मी,बरसात कोई भी मौसम हो,भोर में 4 बजे उनके सिर पर पानी पड़ ही जाता था.एक घंटा वो चुपचाप पद्मासन योग में बैठा करते थे,फिर एक घंटा भजन सुनते.हम हर पोस्टिंग पर उनके साथ रहते थे.वो तो पोलिटेक्निक में मेरे चयन और उनके गोरखपुर ट्रान्सफर के कारण हमें अलग-अलग रहना पड़ा.मुझे बाबूजी का पूरा अनुशासन मालूम था.जब भजन शुरू होती तब वे हम तीनों भाई-बहन को जगा देते और हम लोग उठ कर पहले भजन गाते फिर दोनों भाई-अम्मा,बाबूजी और गुडिया का पैर छूते.गुडिया मुझसे 6 साल छोटी है,छोटे भाई से भी 4 साल छोटी है.लेकिन बाबूजी कहते कि तुम दोनों गुडिया का पैर छूकर उसे रोज़ प्रणाम किया करो,क्योंकि लडकियां देवी होती हैं.उसके बाद बाबूजी वर्दी चढाते और थाने पर चले जाते थे ,अम्मा चूल्हे-चौके में लपटती और हमलोग स्कूल कि तैयारी में,लेकिन बाबूजी मेरे प्रति मोह से ज्यादा ग्रस्त रहते थे.मेरे ही जन्मदिन पर तीनों भाई बहन का जन्मदिन एक साथ मनता.गुडिया उनकी cid ऑफिसर थी,वो दिन भर हम लोगों के साथ मिली भी रहती थी,बड़ी मासूमियत से खेलती भी रहती और शाम को चोरी छुपे बाबूजी को दिनभर की रिपोर्ट भी करती..'भैया ने बच्चा को आज बिना गलती के मारा,(छोटे भाई को वह आज भी बच्चा ही कहती है ),बच्चा ने भैया का कहना नही माना,आज भैया सड़क पर साइकिल चला रहे थे,और बच्चा ने पप्पू से पिल्लों के लिए लड़ाई की,हम और बच्चा दिनभर में 5 घंटा पढ़े लेकिन भैया केवल दो घंटे ही पढ़े.भैया एक दिन और सड़क पर साइकिल चला रहे थे,मै आपको बताना भूल गयी थी.इस तरह की पूरी रिपोर्टिंग करके वो फिर हम लोगों के साथ वैसे ही मिल जाती.सवेरे बाबूजी क्लास लगाते,बाबूजी के मुंह से हमारे एक-एक राज़ खुलते,और हम दोनों भाई भौचक्के रह जाते.सोचते कि इनको पता कैसे चल जाता है.ज़रूर बाबूजी एक्स्ट्रा पॉवर का नाम है.वे कहते थे कि मै अपनी तीसरी आँख यहीं पेड़ पर टांगकर जाता हूँ.जब वापस आता हूँ तो वह मुझे सारी बात बता देती है.अगले दिन हमलोग पेड़ पर खूब ढेले मारते कि बाबूजी की आँख आज गिरा देंगे..वो तो हमें बहुत बाद में पता चला कि ये सब गुडिया करती थी.नालायक रोज़ पैर भी छुआती थी,पिटवाने का इंतजाम भी किये रहती थी और अपने देवी भी बनी रहती थी,बाबूजी की तो खैर सबसे प्यारी,लाडली बेटी थी ही....
इसी तरह की सिखावन,अनुशासन और देहाती माँ तथा पुलिसिया बाप की परवरिश में पले थे हम.बाबूजी के सामने एक भय होता था,एक एक्सरे मशीन होती थी,एक अनुशासन का दायरा होता था,जिसके प्रभाव में हम 24 घंटा रहते थे.बाबूजी हमें ठीक से सोने का तरीका और आसन भी समझाते थे.बायीं करवट,शरीर सीधा,थोडा धन्वाकार,बायाँ हाथ तकिये और सिर के बीच,दायाँ हाथ जाँघों पर,ये सोने का उनका सर्वोत्तम आसन था.खैर,मै बाबूजी के सामने पंहुंचा तो उनसे पहले उनके सवालों से सामना हुआ.उनकी नज़रें जैसे-जैसे ऊपर उठीं,मेरी वैसे-वैसे नीचे झुकीं-----------
''परसों कहाँ थे तुम..?''
''लड़की देखने गया था''-सीधे सवाल का सीधा ही जवाब देना ठीक था.
''लड़की देखने....?क्यों..?कौन लड़की....?''
''हम किरन को देखने उसके स्कूल गये थे.''
''स्कूल गये थे...?क्यों...?''
''अम्मा ने कहा था.''
''अच्छा....''-बाबूजी का चेहरा तमतमाने लगा था.
''तो तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गयी है..?हेमामालिनी से बात चलाऊं क्या...?ठीक रहेगी...?''
आज मेरे पैर का अंगूठा अपने-आप अप-डाउन हो रहा था.मै हिम्मत जुटाकर किसी तरह बोल पाया-''बाबूजी,लड़की हमसे छः साल छोटी है,और मै उसे पसंद भी नही.''
''तो,मना कर दूं..?''
मै चुप....किसी तरह खड़ा था बस.
.......और बाबूजी ने गुस्से में संदेसा भिजवा दिया-''शादी नही होगी''
यहाँ से वहाँ तक धरती हिल गयी.उधर तो हलचल मची ही हुई थी कि लड़का लड़की देखने खुद आया था.अगले हफ्ते गाँव पर फिर जुटान हुई.किरन के पिताजी घर आये.बाबूजी मुझे लेकर गाँव पहुंचे.मै सीधे घर में अम्मा के पास भागा.अम्मा बोली-''क्यों झूठ बोल रहे हो कि लड़की ने तुम्हे नापसंद कर दिया...?''मै बड़ी मासूमियत से बोला-''अम्मा,उसी ने कहा था मुझसे.'' अम्मा ने धमाका किया-''तो उसने अपने बाल क्यों काट लिए...??''मै भौचक्क-''बाल काट लिए..?क्यों...?अरे बाप रे,बिन बाल के कैसी रहेगी..?अम्मा ने पूरी बात बतायी.किरन के घर पूरा तूफ़ान आया हुआ था.उसके चाचा-चाची ने हमें देखा था सड़क पर,लड़का अपने दोस्तों के साथ लड़की देखने आया था,ज़रूर आवारा होगा.किरन कि दादी ने ताना मारा था--''-बेंट भर का लड़का,इतना इतराता है,बिना किसी को बताये देखने चला आया...?आगे क्या करेगा''.किरन चुप-चाप सब सुन रही थी.सब ठीक था लेकिन लड़का आवारा है,ये बात उसे अच्छी नही लग रही थी,लेकिन एक तो लड़की जात,वो भी गाँव की,चुप होकर सब सुन रही थी.भुनभुनाते हुए दादी किरन से बोली--''नही करनी ऐसे लड़के से शादी..जितनी उसकी लम्बाई है,उससे लम्बे तो मेरी बच्ची के बाल हैं.''बस यही बात ग्राम-बाला को चुभ गयी.किरन ने घर में जाकर कैंची उठायी और अपने बाल लगभग एक फुट काट डाले..इस सत्याग्रह का मौन सन्देश पाकर घर वाले घबरा उठे.बाल क्यों काटे..??कोई समझ नही पा रहा था.दादी को अपनी बात याद थी.इसलिए वो हवा का रुख समझ रही थी.उन्होंने बेटे से कहा-''उनकी घरे जा भईया,बियाह उहवें होई''
अम्मा से पूरी बात सुनकर मै स्तब्ध था.अम्मा बोली--''बाबू,अब हम शादी से मना नही कर सकते..तुम लड़की देख आये हो,अब वो हमारी है.किसी लड़की को अपने बाल बहुत प्यारे होते हैं उसने अपनी दादी के ताने के जवाब में अपने बाल छोटे करके मौन सत्याग्रह संघर्ष छेड़ दिया है..वो तुमसे ही शादी करेगी.''मुझे काटो तो खून नही-''वो तो मुझे डांट रही थी अम्मा ...?''बाहर बाबूजी बोल रहे थे-लड़के ने लड़की देख ली है..आपकी बेटी हमारी बेटी...शादी होगी...ज़रूर होगी..''
मेरी योजना फेल हो चुकी थी.मै किरन के कटे बालों का शिकार हो चुका था.मेरे पास शब्द नही थे.अम्मा कह रही थी शादी-ब्याह भगवान् के घर में तय होता है.27 जनवरी को तिलक और 7 फरवरी को शादी हो गयी.एक वो दिन था एक आज का दिन है 21 साल सचमुच हरहराते हुए कब गुज़र गये,पता ही नही चला.इस बीच बाबूजी चले गये.किरन के कटे हुए बालों ने रस्सी बनकर मुझे बाँध लिया,उज्ज्वल आया,श्रेया आई और हर्षित भी आया.किरन के बाल फिर कभी उतने लम्बे नही हुए. वह आज भी कहती है कि बाल काट कर मैंने ठीक नही किया.कवियों और लेखकों से कभी शादी नही करनी चाहिए.24 घंटा कागज़ बीनते ही बीतता है.इतने बड़े संयुक्त परिवार में 16 साल बाद आई बहू ने अपने समर्पण से अपने लिए अनंत यश बटोरा.बाबूजी जीवनभर मुग्ध रहे.अपने ही गाँव जवार में कई बार मै किरन के काम से पहचाना जाता हूँ.आस-पास के गांवों में बड़ी बूढियों को कहते सुना है--''ऊ दरोगा जी के बडकी पतोहिया इनहीं क मेहरारू हईं न...?''किरन की इस व्याप्ति के पीछे उसकी गजब की कर्त्यव्यपरायणता है.मेरी शादी के बाद जब सालभर बाद छोटी चाची अचानक चल बसी तो उनके 4 बच्चे अम्मा की ज़िम्मेदारी बन गये.मुझे याद है,मैंने किरन से कहा था-अपने बच्चे पर थोडा कम ध्यान देना,मुझे बुरा नही लगेगा.अगर तुम्हारा उज्ज्वल और चाची का किशन कहीं एक साथ खड़े हों,तो किशन को गोद में उठा लेना.उसने इसका शब्दशः निर्वाह किया.चाची का छोटा बच्चा तब 4 माह का था,अब 20 साल का है.उज्ज्वल 19 साल का है.
हम तुम्हार्रे ऋणी हैं किरन.36 जनों का मेरा संयुक्त परिवार आज 44-45 की संख्या पार कर रहा है और अभी भी सब एक साथ है,तो उसमे किरन की लम्बी भूमिका है.......!

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