गंगा नहाने के नाम पर मेरे किसी भी विरोध या तर्क,वितर्क,सुतर्क पर मेरे घर में कोई सुनवाई नही होती.हम बड़ी गम्भीरता से समझाते हैं-अरे भाई ऑक्सीजन नही बचा गंगा में,सीवर बहता है,सीवर.गंगा बची ही कहाँ है.जान निकाल ली है सरकारों ने नदी की.घर में नहाओ सबलोग.ये क्या गंगा-गंगा लगा रखी है.कैसे कोई नहा सकता है इतने गंदे पानी में.घर मे भी तो वही पानी आता है........मै सोचता हूँ कि सारी बात समझा दूँ,सारा ज्ञान उड़ेल दूँ और गंगा नहान का ये धरम-काज रुके.लेकिन इतने में सुनता हूँ कि चलना हो तो चलिए.गंगा नहाने जा रहे हैं.ऑक्सीजन नहाने नही.आते हैं थोड़ी देर में महिषासुर घाट से....और भाई साहब दांत किटकिटा के रह जाते हैं हम.कभी-कभी तो चल भी पड़ते हैं साथ.चलो तुमको सामने दिखाएँगे गंदगी तब समझ में आएगी मेरी बात.मन्त्र गुनगुनाते श्रीमती जी और तर्क भुनभुनाते हम चल देते हैं गंगा की ओर.घाट पर पहुँचता हूँ तो इनकी हालत देखकर कई बार माथा ही घूम जाता है.ऐसा हहा के,धधा के चलती हैं गंगा की ओर जैसे कितने सालों बाद मिली हों.दोनों हाथ फैला के जैसे भर अंकवार नदी को भींच लेना चाहती हों.कई बार चिल्लाता हूँ-अरे,उधर नही इधर....,अरे,इधर नही उधर....,अरे,ज्यादा नही,अरे बस करो.मन वितृष्णा से भी भर जाता है.कैसे नहाते हैं सब लोग इस सीवर में.लेकिन घाट के कोलाहल में मेरे तर्कों को सुनने वाला कोई नही होता भाई साहब.घाट नक्कारखाना हो जाता है और मेरे तर्क तूती बन जाते हैं..उधर जय गंगा मइया की समूह ध्वनि गूंजती है और एक साथ हजारों महिलाएं और सैकड़ों पुरुष एक साथ गंगा में ऐसे डुबकी लगाते हैं,जैसे डुबकी ही उस वक़्त का धर्म हो गयी हो.आस्था के उस रेले में मै अक्सर देखता हूँ कि मेरे तर्क बिला जाते हैं.नदी के प्रवाह में घुलकर मेरी बातें बह जाती हैं.गंगा नहाकर निकलती पत्नी के चेहरे पर जो चमक होती है,उसकी वजह मुझे कभी समझ में नही आती.एक स्थायी कोफ़्त का भाव बना ही रहता है.उधर वो मन्दिर,मूर्ति,पेड़,पालो पूजती,बंदरों को खिलाती,भिखारियों को बांटती लौटने लगती हैं और पीछे-पीछे हम भी वापस......................................
मुझे नही मालूम दोस्तों कि कैसे इसी मानसिक दशा में उस दिन मै पहुँच गया,जब 18 तारीख को सत्याग्रह करने सैकड़ों लोगों के साथ अस्सी नदी के किनारे पहुंचा.9 तारीख के सांकेतिक सत्याग्रह के बाद 18 तारीख को जुटे सत्याग्रहियों की संख्या ज्यादा थी.करीब दो ढाई सौ लोग थे.उस दिन सडक पर सत्याग्रह देखने वालों की भीड़ भी ज्यादा थी.हर हर घोष बनारसियों का डिवाइन मन्त्र है.पिछली बार हम घाव कुरेद कर चले आये थे सो आज नदी उलाहने से भरी हुई थी,लेकिन नदी का उल्लास भी तो छलका ही पड़ रहा था.आज वेग बढ़ा हुआ था थोडा.नदी थोड़ी रौ में थी.उस दिन का टखनों तक पानी आज पिंडलियों तक चला आया था.आज हम गाने भी गा रहे थे.नारे भी लग रहे थे और एक साथ,हमकदम नदी में चहलकदमी भी कर रहे थे.इतने में नीचे पैर की अँगुलियों में शीशे की कोई किरच चुभी और गंदले पानी के बहाव में कुछ लाल धब्बे उभरे.....नदिया चले चले रे धारा....चंदा चले,चले रे तारा...तुझको चलना होगा....तुझको बहना होगा....ये पंक्तियाँ जब साथियों ने झूमकर गायीं तो नतनयन हम अंतरमन तक भींग-भींग आये.निगाहें ऊपर उठा के देखा तो फादर आनंद स्वर में स्वर मिला रहे थे.ब्रजभूषण जी की मुट्ठियाँ आसमान में लहरा रही थीं.आनन्द तिवारी जी के मुंह से नारा निकला-आवाज दो....इमरान भाई चिल्लाया-वन्देमातरम...मुहम्मद तारिक की पीछे से आवाज आई-गुरूजी,झुकिए और एक साथ,एक मन हममे से कई साथी झंडा बैनर छोडकर नदी में झुक आये.मुझे नही मालूम दोस्तों वो क्या प्रेरणा थी,वो कौन सी अदृश्य शक्ति थी जो आबाल वृद्ध हम कई लोग वैसे ही हहा के,वैसे ही धधा के नदी में झुक आये कि जैसे आस्था ही का रेला टूट पड़ा हो.लगभग सौ मीटर नदी हम लोगों ने छान डाली.तपन भाई तो मौनमूक बस कचरा बीने जाते थे.एक एक प्लास्टिक,एक एक कचरा,गंदगी,मैला,ईंट-पत्थर ,शीशे,बोरियों में भर-भर कर फेंके गये मल व कूड़े हम घंटों बीनते रहे और नदी उमगती रही.एक घंटे का घोषित सत्याग्रह दो घंटे तक चला और उतना कचरा निकल जाने से नदी जैसे ममता से रो पड़ी हो,आंसुओं की धार चल पड़ी हो...नदी का प्रवाह थोडा और बढ़ आया.
सड़कों पर लोग थे और नदी में हम.मीडिया वाले अपने-अपने एंगल से लगे हुए थे.लेकिन सत्याग्रही उस दिन सनके हुए थे.जी हाँ दोस्तों,ये सनकियों के ही बस की बात है.गंदगी और मैले के अम्बार ढोती नदी से ऐसा लाड़ लड़ाते हमने कभी किसी को नही देखा.ऐसा लाड़ उमड़ते पहले कभी नही महसूस किया.उस वक़्त मेरे जेहन में मेरी पत्नी का अक्स बार-बार घूम आया,जब वो बाँहें फैलाए गंगा की ओर ऐसे दौड़ती हैं,जैसे बरसों के बिछुड़े आज मिले हों.मेरे सारे तर्क उस दिन अस्सी बहाए लिए जाती थी और हम अँगुलियों से बहते खून से बेपरवाह जैसे नदी के गर्भ से एक एक तिनका बीनकर फेंक देने के लिए संकल्पवान हुए जाते थे.अपने-अपने हिस्से भर नदी साफ़ करके हम चले तो आये दोस्तों,लेकिन नदी से वायदा कर आये हैं.अपनी तो दिवाली भी अब इसी घाट पर मनेगी.हम दिए जलाएंगे और छठ का त्यौहार भी यहीं मनेगा व्रती महिलाओं के साथ आयेंगे.एक घना विश्वास है कि सत्याग्रहियों की ये सामूहिक कोशिश रंग तो जरूर लाएगी एक दिन.एक घंटे का यह सत्याग्रह जिस उद्देश्य के लिए किया गया है,उसके लिए हम 24 घंटे भी खड़े रहेंगे अस्सी में....इस संकल्प के साथ भर देह जलमल लपेटे हम वापस तो चले आये हैं,लेकिन हरपल लगता है कि अस्सी जैसे फिर बुला रही हो.कुछ साथी जो बाहर से आ गये थे-इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोभनाथ और मलेशिया से इंजिनीयर प्रवीण......तो नदी की ये विह्वलता समझ में भी आती है..
No comments:
Post a Comment