Thursday, 31 December 2015

यूं ही याद आ गए पिता


हमारे देहातों के लगभग हर पुलिस थाने के आस-पास ध्यान से खोजिए तो और कुछ मिले न मिले, एक बढ़िया धोबी की दुकान जरूर मिलेगी। खास तौर पर वर्दियों की धुलाई और आयरन के लिए। वर्दियों के बेहतरीन रख रखाव के लिए बहुत कुशल धोबी की जरूरत होती है। अभी कुछ समय पहले तक हर औपचारिक मौके और विभागीय पेशियों के दौरान अनिवार्य रूप से पहनी जाने वाली सूती वर्दियों की तैयारी के लिए तो बहुत ही कुशलता की जरूरत होती है। आमतौर पर पुलिस वाले अपनी वर्दियाँ खुद नही तैयार कर सकते। जो करना जानते भी हैं, तो इतनी फुर्सत कहाँ है। खासकर पुलिसवाले तो 24 घंटे के नौकर होते हैं। आम तौर पर हर पुलिस वाला लगभग बीस घंटे की ड्यूटी करता भी है। बाकी के 4 घंटों मे ही वो अपना बाकी सब कुछ करता है। यही घंटे कभी दो एक बढ़ जाते हैं तो कभी कभी खत्म भी हो जाते हैं। एक आम पुलिसवाला रोज यही तीन चार घंटे की नीद ले पाता है, वो भी टुकड़ों मे। इसलिए अमूमन आँखें भारी और लाल ही रहती हैं। अपने बच्चों के साथ अभी खाने बैठा ही है कि कोई खबर आ गयी, कोई एक्सीडेंट हो गया, कोई अपराध हो गया, कहीं विवाद हो गया और बाकी दुनिया को इस बात से कोई मतलब नही होता कि ऐसे मे एक पुलिस वाले को सामने की थाली छोडकर भागना पड़ता है। कई बार पुलिस वाले अपने परिवार के साथ बिलकुल नही रह पाते, तब भी नही, जब रहना आवश्यक हो , क्योंकि कही और रहना, तब घर पर रहने से ज्यादा जरूरी होता है। अब ऐसे मे कोई वर्दी क्या साफ करेगा...! इसलिए बड़े कुशल धोबियों की जरूरत पड़ती है पुलिस विभाग को भी और सैनिकों को भी।
मेरे बाबूजी फिर भी समय निकाल लेते थे अपने लिए भी, अपनी वर्दी के लिए भी। जाड़ा, गर्मी या बरसात, धुंध कुहरा, पाला कुछ भी हो, भोर मे चार बजे उनके सिर पर पानी गिर जाना चाहिए, दुनिया का सबसे जरूरी काम था ये उनके लिए। सात बजते-बजते नाश्ते के साथ उनकी आधी दिनचर्या पूरी हो जाती थी। फिर तो दिनभर ड्यूटी मे न जाने कहाँ-कहाँ रहना पड़े। बज्र ढाते कुहासे भरे जाड़ों मे रात को जब हम सब घरवाले खाना खा पी के हिलते हुए रजाइयों मे घुस रहे होते थे, तब वे रात की गश्त के लिए वर्दी चढ़ा रहे होते थे। अपने वक़्त की ये बहुत बड़ी तस्वीर मेरी आँखों मे आजतक पेवस्त है, जो मुझे कभी भी पिता की रूहानी छाया से वंचित नहीं होने देती। ड्यूटी से कभी गाफिल नहीं हुए और पुलिस मे होते हुए भी अक्सर एक शिक्षक की भूमिका मे देखे,पाये,जाने और माने जाते रहे। कोई इमरजेंसी हो तभी उनकी वर्दी धोबी के पास जाती थी वर्ना हमेशा अपनी वर्दी अपने हाथ से ही धोया करते थे। अमूमन अपना कोई भी कपड़ा कभी किसी और को नही धोने देते थे। अम्मा को भी नही,हमलोगों को भी नही। स्वावलंबन उनमे सबको टोकते रहने की हद तक प्रबल था। हममे से किसी का कपड़ा अगर अम्मा धो रही हो, तो हमपर फटकार पडनी तय थी। महीने मे एक दिन मौन रहते थे। जाड़ों के मौसम मे अक्सर दो तीन महीना मूली टमाटर अमरूद और गन्ने के जूस पर रह लेते थे। इस अभ्यास के साथ केवल मन ही नही, उनका शरीर भी बालिष्ठ हुआ। मुंह मे हुए कैंसर का सामना उन्होने अपने बलिष्ठ मन से ही ज्यादा किया। शरीर की ताकत कुछ साल आगे भी चलती तो वे और आगे भी जीते क्योंकि अपने रोग और उसके भीषण दर्द को तो वे अपने मन से ही पकड़े हुए थे। और मन उनका जीवन के अनुशासनों से अंतिम दिन, अंतिम क्षण तक जुड़ा रहा। 2004 मे उनके रिटायर होने से बहुत पहले ही सूती वर्दियों का चलन खतम हो चुका था। ,तब ये पोलिएस्टर आदि की मिक्स्ड वर्दियाँ धोने का काम थोड़ा आसान हो गया। एक बार उनकी वर्दी मेरी पत्नी के हाथ लग गयी उन्होने उसको खूब शौक से धोया। धोने, प्रेस करने के बाद एकदम टाइट कलफदार वर्दी जब उनके सामने पेश हुई तो वे इतने खुश हुए कि उसके बाद उनकी वर्दी फिर घर मे ही धुलने लगी। दोनों बहुओं मे से किसने वर्दी धोयी है, ये वो वर्दी देखकर पहचान जाते थे। लेकिन अपने बाकी के रोज़मर्रा के कपड़े धोने का उनका क्रम अंतिम समय तक उनसे नही छूटा।
मृत्यु से एक महीना पहले जब वे पूरी तरह बिस्तर पर थे, और कम से कम दो लोग उनको उठाते बैठाते थे, तब एक बार हमारे परिसर मे आग लग गयी। घर के सामने कुछ दूर खड़े अशोक के पेड़ों के नीचे कुछ सूखी लकड़ियाँ भी रक्खी थीं। न जाने कैसे आग लगी, सघन रूप से खड़े पेड़ों के तने भी जलने लगे। सैकड़ों लोग आग बुझाने मे लगे थे। हम सब लोग दंग रह गए जब देखा कि बाबूजी भी बाल्टी बाल्टी पानी फेंक रहे हैं। जब तक आग बुझी तब तक बीसियों बाल्टी पानी वे भी फेंक चुके थे। यह आत्मबल का एक उत्कृष्ट और जबर्दस्त नमूना है। मेरा अपनी आँखों देखा हुआ, जिसने भी देखा दंग रह गया। अंतिम विदा लेने से ठीक पहले वाली पिछली रात जब हम उन्हे अस्पताल से लेकर घर लौटे तो सीढ़ियाँ चढने की नौबत आई, हममे से किसी को भी हाथ नही लगाने दिया और अकेले 29-30 सीढ़ियाँ चढ़ गए। सुबह जब नीद खुली तो एक बार खुद से उठने की कोशिश की, चक्कर खा कर बिस्तर पर गिर पड़े। जब आराम हुआ तो सवेरे की दवा खाने के बाद नहाने चल पड़े। हम तीन-चार जने साथ साथ, लेकिन छूने किसी को नही दिया। खुद से नहा लेने के बाद अपने कपड़े धोने लगे। हम नहाते समय अक्सर बाबूजी को पानी चलाते थे, इसलिए उनके कपड़े धोने का ये सीन मेरा हजारों बार का देखा था, जो आज देखा नही जा रहा था। हम लोगों के हाथ पैर जोड़ते हुए भी वे अपना अंडरवियर बनयान और तौलिया धोकर ही उठे... और हजारो बार की तरह यह कहते हुए ही उठे कि कम से कम अपना अंडरवियर बनयान तो सभी को हर हाल मे खुद से ही धोना चाहिए। बोलने मे तकलीफ होती थी फिर भी इतना बोल कर ही चुप हुए। हमलोग उनको पकड़ कर बिस्तर पर ले आए। एकदम सफ़ेद कुर्ता और पाजामा पहने हुए थे। मीठा ही खा पाते थे। खीर खाई, दवा ली और आराम करने को लेटे। लगभग आधे घंटे बाद अचानक उठे और भइया भइया कह के मुझे बुलाने लगे। मै पहुंचा तो अम्मा उन्हे सहारा देकर बैठा रही थी। वे बैठे-बैठे ही पीछे लगे तकियों के सहारे बेहोश से होने लगे। बाबूजी बाबूजी कह कर सभी ने उनको थोडा झिंझोड़ा...इस हलचल से अचानक वे जागे। मै सामने ही खड़ा था। मेरी गोद मे आने के लिए दोनों हाथ बढ़ाया। बच्चों की तरह मेरे कंधे पर चढ़कर मुझे कस कर पकड़ लिया। अम्मा चिल्लाई -डॉक्टरररररररर......बदहवासी की हालत मे मै उनको गोद मे ही लिए-लिए नीचे की ओर भागा.... नीचे उतरते-उतरते सीढ़ियों के बीच ही .........जो होना था, वो हो गया। मैंने उसी समय महसूस किया कंधे पर उन्हे चेहरा रगड़ते हुए............................ ......................................................................................................................(छोड़िए कितना लिखूंगा,कितना आप पढ़ेंगे )

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