ये १९८६ की बात है .तब हम नगरपालिका इंटर कॉलेज मुगलसराय,वाराणसी में इंटर में पढ़ते थे.मुगलसराय चंदौली में बाद में आया.रोज़ सुबह कॉलेज के लिए निकलते,तो लाट न.१ से होते हुए निर्मल भाई की चाय की दुकान हमारा पहला पड़ाव होती,जहाँ अखबार मिल जाता था.ताजा सूचनाओं से लैस होकर कॉलेज पहुँचते,तो सहपाठियों के बीच रुआब ग़ालिब होता.आज ये हुआ..,कल वो हुआ था...,परसों ये होगा...,ये सब बोलते तो साथी छात्र-छात्राएं रुआब मानते भी थे.तब अपने सामने किसी को लगाते थोड़ी न थे हम.हम जो जानते है,वो और कोई क्या जानेगा..,ऐसी भंगिमा होती थी.प्रधानाचार्य श्री देवमूर्ति मिश्र और दुसरे शिक्षकगण भी 'बहुत तेज़ है'कहकर सर पर चढ़ाए ही रहते थे.३२ इंच की उम्र में ३४ इंच का सीना किये चाय की दूकान पर पहुँचते...,तो दूकान तो दूकान ठहरी,पन्ना-पन्ना अखबार अलग-अलग हाथों में होता.हम पहुँचते और बहुत लगाते हुए किसी एक के हाथ से अखबार ले लेते.पढ़ते जाते,पन्ने बदलते जाते और २०-३० मिनट में पूरा अखबार देखकर कॉलेज निकल जाते.ये रोज़ की दिनचर्या थी.अंग्रेजी और गणित प्रिय विषय थे,तो ये श्रेष्ठताबोध अलग से अंकडू बनाए रखता था.
एक दिन की बात है--टीशर्ट और पैंट पहने,हाथ में किताबों की फाइल दबाये,दुकान में दाखिल हुआ तो एक चाय ली और अखबार पढने लगा.ये पन्ना,वो पन्ना,राष्ट्रीय,अन्तर्राष्ट्रीय,बनारस और आस पास,ये सारी ख़बरें देख लेने के बाद अंतिम मोह सम्पादकीय पृष्ठ का तब भी रहता था.पन्नों की अदला-बदली करते जब सब पन्ने पढ़ गया,तो अब निगाह उसी एक सम्पादकीय पन्ने पर अंटकी हुई थी,जो उस समय एक कोने में बैठे एक अत्यंत बूढ़े और कृषकाय सज्जन के हाथ में था.थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद मन खिसियाने लगा.दुकानदार चूँकि पिताजी के परिचित थे,इसलिए बहुत बेअदबी नहीं दिखाते थे हम उनके सामने.रिपोर्ट हो जाएगी,इस बात का डर होता था.एक बार फिर ध्यान से देखा तो वह बूढा आदमी एक मैली-कुचैली धोती और एक अधबहियाँ बनियान पहने अखबार पढने में तल्लीन था.आँखों पर मोटे ग्लास का एक टुटहा चश्मा और आँखों से अखबार की दूरी महज़ ३ इंच.पूरा दृश्य देखकर मुझे झुंझलाहट होने लगी.लेट भी हो रहा था.पढ़े हुए पन्ने फिर से पढने लगा.बीच-बीच में कनखियों से उधर देख भी लेता था कि कब अखबार खाली हो.गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि ये फालतू आदमी ज़रूर कोई मजदूर ही है,अनपढ़,जाहिल टाइप दिखता है,आँख भी काम नहीं कर रही है और सम्पादकीय पृष्ठ,जो इसकी समझ से एकदम बाहर की बात है,आँखे गड़ाए,ऐसे उंगलियाँ रख-रख के एक-एक शब्द पढ़ रहा है,जैसे सब समझ ही रहा हो.एकदम गंवार होते है ये लोग,कुछ समझते ही नही कि हमें कॉलेज जाना है और कितना लेट हो रहा है.मन का आवेग तीव्र होने लगा.जैसे-जैसे मेरी जल्दबाजी बढती जाती,वैसे-वैसे बूढा भी अखबार में डूबता जाता........और मैंने लगभग छीन लेने के अंदाज़ में अखबार पर झपट्टा मारा----'क्या कर रहे हो दादा,क्या उसी में कुचुर-कुचुर किये जा रहे हो तबसे,हमको लेट हो रहा है,समझ में आता है कुछ....?...बूढ़े के हाथ से छूटकर मेरे हाथ में आने तक अखबार मुड़-तुड गया.अचानक बूढ़े ने एकदम महीन आवाज़ में कहा --''अरे,अरे पढ़ा बचवा,क्रोध मत करा''..मेरी झल्लाहट इस नसीहत ने बढा दी -''अपना काम करिए जाइए,उपदेश मत दीजिये हमको,एक्को अक्षर से भेंट नही,चले है अखबार पढने,हमको लेट हो रहा है न...''...''कहा जाना है आपको?''..मैंने उसी मुद्रा में कहा-''कॉलेज जाना है और अब आप चुप रहिये.''.....'' पढ़ते हो ?''.....''मैंने ज़हर भरी नज़र से देख कर कहा-''नही,घास छीलता हूँ .''...वह आदमी हंसने लगा और मेरा सर सहलाकर बोला-''गुस्सा नही करते बेटा.''...अब तो मुझे आग ही लग गयी.मैंने हाथ झटकते हुए कहा-''मै नहा के आ रहा हूँ समझे,आपका हाथ गन्दा है,''....''बाल बिगाड़ दिया''...भुनभुनाते हुए मैंने अखबार उठाया.अपनी कुचुरी आँखों से मेरी ओर देखते हुए बूढ़े ने कहा -''जो बोल रहे हो, उसको अंग्रेजी में बोल के सुनाओ तो.''...ये नयी बात सुनकर मै थोडा-सा सकपकाया...''क्या?...क्यों?''....''किस क्लास में पढ़ते हो?''...''मै बूढ़े की हिम्मत देखकर दंग था,अंकड़कर कहा-''इंटर में पढता हूँ ''.वे बोले-''अंग्रेजी में बोलो न'' मै अंकड़कर ही बोला-''क्यों बोलूं अंग्रेजी में?''....लेकिन मन में कहीं दृश्य बदलने लगा था,...’.....ये क्या कोइ पढ़ा लिखा आदमी है...लेकिन ऐसा लगता तो नही...'..जो लोग बातचीत सुन रहे थे,उनमे निर्मल भाई भी थे-रिपोर्ट पिताजी तक पहुंचेगी कि आपका बेटा अंग्रेजी नही बोल पाया.मै बोला-''क्या बोलूं अंग्रेजी में?''वे बोले-''यही,जो बोल रहे है आप....''.....मेरी तो हालत खराब होने लगी.एकाध वाक्य का ट्रांसलेशन किया,वे नये-नये वाक्य देने लगे.मैंने कहा-''अरे,वही होगा.''वे बोले-''वही होगा?अच्छा चलो,इसी को अंग्रेजी में बोलो.''अब मै नतमस्तक होने की मुद्रा में पहुँचने लगा था.घड़ों पानी पड़ता जा रहा था.मैंने अपनी गलती स्वीकार करना ही ठीक समझा,जो तबतक समझ मे आने लगी थी.लगभग मिमियाते हुए बोला-''आप ही बताइए न,आपको आती है अंग्रेजी?''मेरी ठसक अभी बाकी थी.तब तक वे शुरू हुए-''I am a retired govt.p.g.college principal in faizabaad and since last two years i'm serving the poor students and teaching them all the subjects,free of cost.Due to my age ,my eyes are not working well.so I come at this shop to get in regular touch with the current news and the students like you......''वह आदमी इसी तरह लगभग १० मिनट अपने पोपले मुह से धराप्रवाह अंग्रेजी बोलता रहा और मै आँखें फाड़े देखता रहा .वे बोलते जा रहे थे और मै गडा जा रहा था.कहने की ज़रुरत नही कि मेरा ३४ इंच का सीना ३० इंच का हो आया.. उस दिन का सम्पादकीय तो मै नहीं पढ़ पाया लेकिन जाहिर तौर पर जो पाठ मिला.वह जीवनभर के लिए सबक बन गया कि किसी को उसकी बाहरी रूपरेखा से कभी मत आंको.. हीरा कोयले की खदानों में ही मिलता है.. वे जब चुप हुए तो मै सरकते-सरकते उनके करीब पंहुचा- "सॉरी सर , ऐसी गलती अब कभी नहीं करूंगा" कहकर मैंने उनके पैर छू लिए.. उन्होंने फिर अपना हाथ मेरे सर पर रख दिया.. लेट बहुत हो चुका था..उनके हाथ लगाने से फिर बिगड़ गये अपने बाल संवारते हुए मै बन्दूक से निकली गोली की तरह कॉलेज भागा..
- प्रेम प्रकाश
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