Friday, 1 November 2013

इंदिरा गाँधी,मुगलसराय और संजय

 31 अक्टूबर 1984 को जब इंदिरा गाँधी कि हत्या हुई,तब मै मुगलसराय में था.दिल्ली में भयंकर दंगा छिड़ चुका था.कांग्रेस ने अंदरखाने से ये दंगे प्रायोजित किये थे,ये हम बाद में तब जान पाए,जब हरिकिशन लाल भगत और जगदीश टाइटलर जैसे लोग कानून के दायरे में लाये गये.सिखों के खिलाफ मारकाट,लूटपाट की ख़बरों की आग में बनारस भी झुलसने लगा था.आंच मुगलसराय तक भी पहुंची.आनन-फानन में कर्फ्यू... लगा दिया गया.लेकिन सावधानियां बरतने कि जुगतें लगाते-लगाते दिल्ली से मुगलसराय तक हजारों सिख परिवार लुट चुके थे.सिखों की दुकानें जला दी गयीं,मकान तोड़ डाले गये,डर और आशंकाओं का एक ऐसा कुहासा छाया,जो अपनी संस्कृति के समृद्धि में इतराये मुगलसराय का इतिहास भी काला कर गया.कितने ही सिख परिवार बड़ी हसरतों से बनवाये 20-20 लाख के अपने मकान,तब 20-20 हजार में बेचकर पलायन कर गये.उस उन्माद में भारतभर में भाईचारे को एक साथ आग लग गयी,सदभावनाएँ जल मरीं,सहज सामाजिक संबंधों पर तुषार बरस गया और दिल के एहसास खाक हो गये.
आज 31 अक्टूबर के बहाने मुगलसराय की याद मुझे इसलिए भी आ रही है कि इसी ऐतिहासिक स्थान पर मेरी जिज्ञासु किशोर वय को युवावस्था मिली,वहीँ मेरी पढाई-लिखाई हुई,वहीँ से मेरे आगे के रास्ते खुले और वहीँ मैंने एक कस्बाई जीवन जिया,जिसकी स्मृतियाँ अब भी धरोहर लगती हैं.मुगलसराय तबतक केवल क़स्बा ही था,बेहद खूबसूरत,ग्रामीण संस्कारों को समेटे,औसत ढंग का,बेहद कलात्मक और शांत,कोलाहल से दूर,एक पूरी कस्बाई संस्कृति की जीवंत उपस्थिति से लबरेज़.मुझे आज भी ऐसा ही लगता है,जैसे टीवी पहले-पहल मुगलसराय में ही आया.ऐसा मुझे इसलिए लगता है कि मेरे जीवन में जब पहले-पहल टीवी आया,तब हम और मुगलसराय एक साथ रहते थे.कन्हैया टाकीज से लेकर रेलवे टाकीज तक...इन दो सिनेमा टाकीजों के बीच धडकता,छलकता हुआ यह क़स्बा अपने हर रहवासी का आइडेंटिटी कार्ड अपने पास रखता था,उसे व्यक्तिगत रूप से जानता पहचानता था.तब जिन्दगी का पूरा सिनेमा मुगलसराय की इन दो टाकीजों के बीच के हर जर्रे में बिखरा रहता था.
अब मुगलसराय बहुत बदल गया है.अब उसका छोर बनारस को छूने लगा है.कन्हैया टाकीज के इधर बहुत दूर तक फ़ैल गया है मुगलसराय.मुगलसराय कंछियाने लगा है.उसकी इन कंछियों में कई-कई नए मुगलसराय उग आये हैं.इन मुगलसरायों ने कस्बे से चिपके गांवों को अपने से बहुत दूर ढकेल दिया है.ग्रामीण जन-जीवन से कस्बे के रिश्ते अब मुगलसराय में भी बाज़ार तय करता है.यादव बंधु अपने दूध-भरे बाल्टों के साथ तब भी आते थे,अब भी आते हैं.पर अबके आने में ऋणात्मक बदलाव आये हैं.तब मुगलसराय उनका आना बड़ी हसरत से देखता था.अब वे आते भी हैं या नही...,नही जानता मुगलसराय.कस्बे के बाज़ार आधुनिक हो गये हैं.सड़कों पर भीड़ बढ़ गयी है.लोगों के चेहरे बदल गये हैं.चाल-ढाल,रंग-रूप बदल गये हैं.लोगों के रहन-सहन,उनके साधन बदल गये हैं,कस्बे का पूरा चरित्र ही बदल गया है....लेकिन एक बात है,गुम होती टाकीजों की नवसंस्कृति के इस प्रगतिशील दौर में भी इसने अपनी टाकीजें बचा रखी हैं और इसी बहाने बचा रखी है जीवन की आपाधापी से थके,ऊबे लोगों की टाकीजों की ओर चपल चहलकदमी भी,जिंदगी कि एक रौनक भी.
मुगलसराय जाना,मेरे लिए अपने बीते हुए दिनों की पुनर्यात्रा करने जैसा होता है,जैसे कोई आभासी दुनिया हो सपनों की.ठिठके हुए मकान और रुकी हुई गलियाँ मेरा इंतजार करती हों जैसे.बाज़ारों का विस्तार बहुत हो गया है यद्यपि,पर मोहल्लों को सिकुड़ते हुए देख रहा हूँ.कंछियाता हुआ मुगलसराय अपने चारों तरफ जिस गति से भाग रहा है,उसी अनुपात में अन्दर से सिमटते,सिकुड़ते,घटते हुए भी देख रहा हूँ उसे.अपने विस्तार और सिकुडन,दोनों में नित्य सघन होते जाते इस कस्बे में मेरे लिए एक और चीज,एक और खास बात बची हुई है अभी...और वो ये कि मुगलसराय में संजय रहता है.कुमार संजय:मेरी किशोर अवस्था के दोस्तों में से एक.जिंदादिल और शायराना शख्सियत का चिरयुवा इन्सान.उन दिनों भी वह अपने ही अंदाज़ में जीता था,आज भी वह अपने उसी अंदाज़ के साथ मौजूद है.एक ऐसा दोस्त,जिसके लिए एक दीवानगी रहती थी.12 वीं पास करने के बाद सिविल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स में मेरा चयन हुआ और उसका मैकेनिकल इंजीनियरिंग के डिग्री कोर्स में.वह लखनऊ चला गया.निकेश भी बीएचयू चला गया.निकेश तो नये माहौल में खपने लगा लेकिन वह दौर,जब संजय और निकेश दोनों ही मुगलसराय से दूर चले गये,संजय के साथ मेरी दोस्ती का स्वर्णकाल सिद्ध हुआ.जब संजय मुगलसराय में नही था,तब उसका और उसके पत्रों का इंतजार मेरे हिस्से आया सबसे कीमती धन हो गया जैसे.उन दिनों हमलोग उँगलियों पर दिन गिनते और 10 बजे के बाद से ही डाकिये का इंतजार करने लगते.जैसे दिन और समय निश्चित हो कि आज तो चिट्ठी आएगी ही आएगी...और आ भी जाती.तब मोबाईल नही था,ये फेसबुक नही था,हाँ,कम्प्यूटर के आने का शोर मच रहा था.एक टेलीफोन का जरिया था,लेकिन दूसरे शहरों में बहुत श्रमसाध्य,बहुत उबाऊ और थका देने वाली प्रक्रिया के बाद ही फोन संपर्क हो पाता था.ऐसे में चिट्ठियां आसान,निरापद और सस्ता साधन थीं.उन दिनों ऐसा लगता था,जैसे एक हफ्ते संजय कि चिट्ठी नही आयी तो बीमार ही पड़ जाऊंगा.कुछ बहुत महत्वपूर्ण चीज छूट जाने का एहसास छाया रहता.
संजय के लिखे वे सतरंगी पत्र,उसके हमउम्र शेर,उसके बहुभुज संस्मरण,उसके समुद्री एहसास,उसकी श्लील कहानियां,उसकी तरंगिणी कवितायेँ,उसके शंखपुष्पी शब्द और उसके पुण्यश्लोकी बंधन.....सब आज भी जुगा रखे हैं मैंने.......लोहे के एक बक्से में......ताला लगाकर बंद कर रखा है,25 साल पुराने कस्बे की तरह.डरता हूँ कि कहीं खुशबू ही न उड़ जाये,इसलिए रोज खोलता भी नही.उन दस्तावेजों की उम्र भी ढाई दशक पूरी हो गयी.पर जो खोल ही दूं,.....तो घर,उम्रदराज़ हो चुके उन अहसासों से भर जाता है,जो मुझमे अभी भी वैसे ही जवां हैं.

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