Sunday, 3 November 2013

"हैप्पी दीपावली"


 कल बनारस के अखबारों में खबर थी कि कभी चचा ग़ालिब जिन रौनको कि शान बढ़ाते थे, उन शामो को गुलजार करने वाली तवायफों के नाम से मशहूर बनारस का वह ऐतिहासिक मोहल्ला ''दालमंडी'' बारूद के ढेर पर है.. मेरी ही तरह बहुतेरे लोग पहले तो हेडिंग पढ़कर अचकचाए, लेकिन तफसील मे जाने पर पता चला कि बनारस और आसपास के दस-बीस जिलों में दीपावली के मौके पर खुशियाँ मनाने के लिए फोड़े जाने वाले पटाखे दालमंडी में... ही बनाए जाते है.. आज देखा तो बाजारों में इन पटाखों कि दुकाने सजने लगी हैं और मिलावटी मिठाइयो कि तो पूछिये मत,दूध, खोया, छेना के सभी सहायक तत्व - फिटकरी,यूरिया आदि से भरी-पूरी मिठाइयों पर एल्यूमिनियम से बनाये गये "चांदी के वर्क"सज गये हैं..वैसे दीपावली के दिन मिठाई के नाम पर कुछ भी चबाना पड़े,लेकिन मह-मह महक से मन मक्खी- मक्खी हो रहा है.. दिये , मोमबत्तियां, लडियां, फुलझड़ियाँ,झालरे.... सब मिलकर बाजार को खुशनुमा बनाये हुए है,,.. कल आने वाले अखबारों में हम जैसे कलमघिस्सुओ को मुंह चिढाते हुए,बड़ी-बड़ी हेडलाइन्स में एक और खबर ये छपने वाली है कि धनतेरस के मौके पर बनारस के बाजारों से कितने करोड रुपयों के सोना-चांदी गरीब लोग खरीद ले गये... कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है- गोया दीपावली आखिर ठन ही गयी.. अब दिये से दिये कि जोत मिलेगी और पटाखो पर पटाखे फूटेंगे.. बारूद के राकेटों से आसमान भी झालर-झालर दिखेगा.. बारूद के धुंए से पट जायेगे हम, पेड़ और पंछी.. यह धुँआ सीधे हमारे फेफड़ो में जहर भहर देता है और सांस भारी होने लगती है.. खबर है कि साल-दर-साल सांस के मरीजो कि संख्या इस शहर में भी बढती जा रही है....बनारस का आसमान ट्रैफिक कि धूल, कोयले के कण, फैक्ट्रियो के धुए और कूडों कि बदबू से पहले ही अत्यंत समृद्ध है.. बारूद का धुआ इसे और विषाक्त करेगा.. बीती बरसात के बाद मदमाये हुए पेड़ों की कचनार पत्तियां अपने पत्तो के साथ कुम्हिला जायेंगी और पंछी अपने कोटरों से दूर, बहुत दूर उड़ जायेंगे.. अचानक शुरू होने वाले इस कोलाहल की गंध उन्हें अभी से मिलने लगी है और अपने - अपने पेड़ छोड़कर अपने बाल बच्चों के साथ वे अन्यत्र कही जाने भी लगे है.. वातावरण में हफ्तों तक बनी रहने वाली इस बारूदी गंध के रहने तक अब वे नहीं लौटेंगे.. मेरे बच्चे रोज इन पंछियों के लिए कसोरे में जो दाना-पानी अलगनी में टांगते है, अब वह हफ्तों तक अनखाया- अनपिया पड़ा रहेगा.. मै सोच-सोच कर परेशान हूँ कि ये निर्दोष जीव अन्यत्र भी जहाँ जाते होंगे , वह कौन-सी जगह होगी.. आखिर वह कौन-सी जगह होगी, जहाँ दीपावली इन महंगी और जहरीली खुशियों के साथ नहीं आयेगी..?? कहाँ का आदमी अपनी अंतर्चेतना में इतना जागरूक है कि वह ये विस्फोटक खुशियाँ नहीं मनायेगा..?? सोचता हूँ - नदी, पहाड़ और बडे मैदानों में शायद यह गंध नहीं पहुचती हो, पर वहां उन्हें दाना-पानी कौन देगा..?? कहाँ से लायेंगे वे..?? कौन=सी नदी को अपने मल=मूत्र से वंचित रहने दिया है हमने..??..................... ओह, मै उनके साथ कहाँ तक उड़ सकता हूँ..?? पर वे तो उड़ गये,मेरे घर के सामने खड़े पेड़ों को खाली करके- मेरे पेड़ आज बहुत उदास है...खैर,छोडिये , आइये , पंछियों के विस्थापन की ख़ुशी मनायें , पटाखे बजायें , दीपावली मनायें.....! ....''हैप्पी दीपावली''....
— with Mansi Manish and 42 others.

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