Saturday, 9 November 2013

दर्द बेटियों का

स्त्री सशक्तिकरण का आन्दोलन भटकता ही इसलिए चला जा रहा है कि उसमे कई गलत नारे,कई गलत मुहावरे,शब्द और धारणाएं साजिशन घुसा दी गयीं हैं.....कहते हैं स्त्री को पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलाकर चलना है...अरे ये क्यों नही कहते कि पुरुषों को स्त्री के बराबर आने की कोशिश करनी चाहिए...?स्त्री कब पीछे थी...? पीछे तो हम थे...दया में,ममता में,करुना में,धीरज में,सहिष्णुता मे,जीवन के लिए जरूरी सभी मूल्यों में........गार्गी ने याज्ञवल्क्य जैसे वेदाचार्य से जब शास्त्रार्थ किया था,तो घूँघट थोड़ी न डाला था.आधा तो महर्षि उसके तेज से हारे थे.मत्स्यगंधा सत्यवती की स्त्री चेतना पराशर की पुरुष चेतना से कमतर तो नही थी..बात को सही दिशा देने की जरूरत है मित्रों.......जब हम कहते हैं कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है,तो जाने अनजाने एक बड़ा अपराध कर गुजरते हैं,औरत की लड़ाई को कमजोर कर देते हैं.थोड़ी बारीकी से देखें तो इस मर्दवादी किस्म की बात का अर्थ समझ में आएगा.गुलामों की परम्परा को जरा करीब से देखिये.जमींदारों के घर जो हरकारे,नौकर होते थे..वो उन्ही गांवों,समाजों से होते थे,जिनपर जमीदारों का जुल्म कहर बन के गिरता था..अपने ही समाज और अपने ही लोगों पर ये लोग जमींदारों को खुश करने,उनकी कृपा हासिल करने के लिए उनसे आगे बढ़ के कहर ढाते थे..लेकिन आप ये नही कह सकते कि गाँव वाले ही गाँव वालों के दुश्मन होते थे..असल अपराधी तो वो था,जिसके कृपापात्र बने रहने और अधिक से अधिक लाभ पाने के लिए उसके करीब रहने वाले लोग अपने ही लोगों को सताते थे...हमारी मित्र शीबा जी एक और उदाहरण देती हैं...जलियांवाला बाग में आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने वाले सिपाही हिन्दुस्तानी ही थे.अंग्रेज जनरल ने तो केवल आदेश दिया था...तो क्या हम कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी ही हिन्दुस्तानी के दुश्मन थे....??ठीक उसी तरह यह नही कहा जा सकता कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है...ये केवल बड़े गुलाम और छोटे गुलाम वाला मामला है..बड़े गुलाम साहबान के करीब होते हैं और उनकी नज़रे इनायत पाने के लिए छोटे गुलामों पर कड़ी नजर रखते हैं.....औरत औरत की दुश्मन है,ये कहने से लड़ाई में कमजोरी आती है...

मुझे ऐसा लगता है कि किसी लड़की के हिस्से में जो अंतहीन दर्द आता है,उसकी जिम्मेदारी निर्विवाद रूप से उसके पिता और भाई पर आयद होती है... इस समस्या की जड़ें हमारे ही स्वार्थ के अंधे कुँए में कहीं हैं.इस बात से मै पूरी तरह सहमत हूँ कि शादी के नाम पर एक घरेलू नौकरानी का इंतजाम करने वाले समाज के रहवासी हैं हम.तीन किस्म की गुलामी में घेरते हैं हम अपनी बेटियों को.उसका विवेक निर्णयात्मक हो,इसके लिए उसे पर्याप्त शिक्षा नही देते..उसका आत्विश्वास मज़बूत हो,इसके लिए उसको अपने फैसले खुद करने की आज़ादी नही देते..और वह खुद आत्मनिर्भर हो सके,इसके लिए जायदाद में हिस्सा नही देते...और बस समस्या की जड़ यहीं है.हम ये कह के मुक्त हो लेते हैं कि बेटी तो ससुराल से भी पाती ही है.क्या पाती है बेटी ससुराल से...?जो दहेज़ लेकर किसी की बेटी ले जाते हैं,वे क्या जायदाद देंगे उसे...?पिता और भाई होने के नाते हम खुद अपनी बेटियों को जो देने का स्वांग करते हैं.....दान,दहेज़,नेग,वगैरह,मै तो कहता हूँ कुछ मत दो.केवल अच्छे से पढ़ा दो भाई..और जैसे बेटों में बांटते हो,जमीन और घर का एक हिस्सा और लगा दो...खाली जुबानी जमाखर्च नही,कागज़ पर...जिस दिन बेटी के पास ससुराल से पलटकर वापस आने का एक अपना रजिस्टर्ड ठिकाना होगा,अपना एक घर होगा,उस दिन वह डोली-अर्थी के चक्रव्यूह से वह मुक्त हो जायेगी, जिस दिन बुरे वक़्त में सहारा बनने के लिए उसके पास अपने रिश्ते और अपनी आर्थिक व्यवस्था होंगी, उसी दिन से वह आत्मसम्मानी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर हो जायेगी..पत्नी और बहू के साथ व्यवहार करना अगर नही आता,तो यही कर डालो...बेटियों की आँख के आंसू तो सूखें....हर पिता से मेरा आग्रह है कि आप दीजिये अपनी बेटी को वो सारे हक.उसके सारे अधिकार.बेटी न हो तो भतीजी को दिलवाइए.किसी एक भी बेटी को अगर आप उसके बाप की हैसियत में से उसका हिस्सा दिलवा सके...तो समझ लीजिये हजारों,लाखों बेटियों,बहनों,लड़कियों के हक़ की लड़ाई को दिशा मिल जाएगी...मै अपनी बेटी के नाम अपने घर और ज़मीन में उसके दोनों भाइयों के साथ १/३ हिस्सा दूंगा.ये मैंने सबको बता रखा है.. औरतों को लड़ना होगा,लड़ना होगा कह के तो हम आखिरी उम्मीद भी ख़तम कर देते हैं..अरे उसका सत्यानाश तो हमने किया है भइया....तो वो क्यों लड़े..लड़ना तो पुरुषों को चाहिए औरत के हक की लड़ाई...

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