अगर आप उनको बोलते हुए सुनेंगे तो अपने देश के बारे में आपका गुमान थोड़ा और बढ़ जायेगा। आपको अच्छा लगेगा यह जानकर कि भ्रष्टाचार और व्यभिचार की लपटों से घिरा हुआ भारत वैसा भी है, जैसा होशिला देवी बताती हैं। वे कहती हैं कि भारत बड़े विद्वानों का देश है। राम और कृष्ण की यह भूमि स्वर्ग जैसी लगती है। भारत अच्छे लोगों का देश है। मेरी ससुराल भले ही मॉरीशस में है, पर मायका भारत में ही है। जब यहां से वापस जाती हूं तो लगता है कि मायका छूट रहा है। १९वीं सदी के आठवें दशक में जब उनके पूर्वज गिरमिटिया बनाकर मॉरीशस ले जाये गये थे तो उनके एक हाथ में लोटा और एक हाथ में रामायण थी। उनके झोले में तुलसी का पौधा और जुबान पर भोजपुरी भाषा थी। यह विरासत हमें अपने पूर्वजों से मिली है इसलिए हम इसे बहुत संभाल कर रखते हैं–होशिला देवी कहती हैं। लगभग १५० वर्षों के संघर्ष ने गिरमिटिया मजदूरों की कहानी बदल दी है, जिन खेतों में होशिला देवी के बाप-दादों ने मजदूरी की थी, आज वे उन जमीनों के मालिक हैं। भोजपुरी को मॉरीशस की मातृभाषा घोषित किया जा चुका है। होशिला देवी बताती चली जाती हैं और उनके चेहरे पर चढ़ती-उतरती भावनाओं के रंग-विन्यास उनके कथ्य की व्याख्या करते जाते हैं। होशिला देवी रिसॉल नाम है एक सक्रियता का और समाज कर्म में निपुणता का। वे लोक गायिका भी हैं, लेखिका भी हैं और पत्रकार भी। थियेटर कलाकर के तौर पर वे जानी जाती हैं और भोजपुरी गीतों के उनके कई एलबल भी निकले हैं। भारत के हिन्दी और भोजपुरी फिल्म माध्यमों में उनका असरकारी हस्तक्षेप है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है। मॉरीशस की होने की बावजूद वह भारत की हैं। होशिला देवी दूरदर्शन के लिए बनाये जा रहे एक ऐसे सीरियल की शूटिंग के सिलसिले में आजकल बनारस आयी हुई हैं, जिसकी विषय-वस्तु और पृष्ठभूमि बनारस की अपनी है।
राष्ट्रीय आन्दोलन जब अपनी धार पकड़ रहा था और महात्मा गांधी की वैचारिक जमीन जोती जा रही थी, तब १९३० में बनारस में बाबू विष्णु राव पराड़कर ने रणभेरी अखबार निकाला था। स्वतंत्रता के आंदोलन में बनारस की उल्लेखनीय भूमिका का चेहरा थी रणभेरी। १९३० से १९४७ तक १७ वर्षों में कुल १२ बार इस अखबार को अंग्रेजी सरकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। फिर भी कभी छुपछुपाकर तो कभी सीनाजोरी से निकलती ही रही रणभेरी। अंग्रेज सरकार के लिए बहुत दुष्कर हो गया था कलम के सिपाहियों से पार पाना। बनारस की अनजान गलियों और बेनाम मुहल्लों से संचालित होती रहीं इसकी गतिविधियां। राष्ट्र रत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त, पंडित कमलापति त्रिपाठी, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णांनन्दजी, रामेश्वर प्रसाद चौरसिया, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ सान्याल... एक लम्बी पेâहरिस्त है बनारस के उन नामों की जो राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा भी देते रहे और रणभेरी जैसी प्रतीक संघर्षों का गुरिल्ला संचालन भी करते रहे। रामेश्वर प्रसाद चौरसिया के पुत्र प्रह्लाद चौरसिया बताते हैं कि रणभेरी की प्रतियां पान की गिलौरियों के बीच तश्तरियों में छिपाकर बांटी जाती थीं। अंग्रेज पुलिस इस बात के लिए हलकान रहती थी कि कब और कहां से प्रगट हो जाती है शब्दों के जरिये मार करने वाली रणभेरी। आजादी मिली तो इतिहास का यह पन्ना भी खामोश हो गया। लेकिन रणभेरी की दस्तक बनारस के लोगों के मनों में जब तब पड़ती ही रहती है। इसी रणभेरी की कहानी फिल्मायी जा रही है, उस धारावाहिक के लिए जिसे दूरदर्शन प्रसारित करने वाला है।
इसी सिलसिले में इस बार होशिला देवी का बनारस आना हुआ। कमलाश्री फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले बनने वाले इस धारावाहिक की वह सहनिर्मात्री हैं और निर्माता दिलीप सोनकर के घर पर ठहरी हुई हैं। उनसे बातचीत करने का मौका मिला तो रणभेरी के साथ-साथ भारत और मॉरीशस की रिश्तेदारी और भारतीयों के गिरमिटिया इतिहास की कहानी के पन्ने भी एक-एक कर खुलते चले गये। एक घंटे की बातचीत के दौरान हमने कई सूत्र तलाशे और इतिहास के कई पन्ने खुले। भारत के दक्षिणी पड़ोस में हिन्द महासागर के बीच टापू की शक्ल में बसा मॉरीशस अप्रिâकी महाद्वीप का देश है। ईश्वर ने इस द्वीप में प्राकृतिक संपदा का खजाना मुक्त हाथों से लुटाया है। दुनिया भर के पर्यटक एक बार यहां जरूर आते हैं। कुल १५ लाख की आबादी वाला यह देश अंग्रेजों की गुलामी से १९६८ में आजाद हुआ। २०४० वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पैâले मॉरीशस की कुल आबादी का ६५ प्रतिशत हिस्सा उन हिन्दुओं का है जो गिरमिटिया बनाकर भारत से ले जाये गये थे। अपने श्रम और पुरुषार्थ से इन भोजपुरियों ने मॉरीशस में विकास की अनुकरणीय पटकथा लिखी, जिसकी भाष्यकार हैं होशिला देवी। वे भारत और मॉरीशस की सद्भावना दूत हो गयी हैं। जब वे कहती हैं कि मॉरीशस हमारा होमलैण्ड लेकिन भारत हमारा मदरलैण्ड है, तो उनकी आंखें चमक उठती हैं। वे बताती हैं कि मॉरीशस की कुल आबादी, जिसमें चाइनीज भी हैं और ईसाई भी, सभी भोजपुरी बोलते हैं। भोजपुरी परम्परा के हमारे लोकनृत्यों को वहां के ईसाई और चाइनीज समाज ने थोड़ी गति देकर, पश्चिमी संगीत का मिश्रण देकर नया रूप दिया है। इसे सेगा डांस कहते हैं। मॉरीशस की मूल भाषा क्रियोल, प्रेंâच भाषा में प्रचलित शब्दावली के साथ मिलकर भोजपुरी में इस तरह समाहित हो गयी है कि इन तीनों ही भाषाओं का नवोन्मेष हो गया है। यह उन्मेष वहां के समाज में साफ दिखायी देता है। भोजपुरी के लिए संघर्ष की यह धारा होशिला देवी के साथ भारत तक चली आती है। ६ जनवरी २०११ से शुरू होकर २५ फरवरी २०११ तक उन्होंने भारत में एक लम्बी पदयात्रा का नेतृत्व किया। यह भोजपुरी को भोजपुरियों के देश में स्थापित करने का स्तुत्य उद्यम था।
बोली के दायरे से निकलकर एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बनने तक का भोजपुरी का यह सफर उतना ही गौरवशाली है, जितना भोजपुरी का अपना इतिहास। भोजपुरी में अश्लीलता के प्रश्न पर वह बोलीं-‘भोजपुरी हमनी के माई हव और माई के साथ अश्लील बर्ताव नाही हो सकत। भारत में भोजपुरी क दुर्गति देख के दु:ख होला।’ इस स्थिति के लिए वे भारत में काम कर रही संस्थाओं को सवालों के घेरे में खड़ा करती हैं। वे कहती हैं कि युगान्तरकारी परिवर्तनों और उपब्धियों के लिए जिस ताकत की जरूरत होती है, वह बंद मुट्ठी की ताकत है। भारत में यह मुट्ठी अभी बंधी नहीं है। संस्थाओं और सामाजिक समूहों की अहमन्यता इसके मूल में है। एक उद्देश्य के लिए काम करने वाले लोग भी एक साथ नहीं आते। सबकी अपनी ढपली है और सबका अपना राग है। भारत में भोजपुरी की वर्तमान दशा के पीछे की यह कठोर सच्चाई है। समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सभी को मिलकर काम करने और सफलताओं का श्रेय सामूहिक रूप से सबको देने की जरूरत है। इस देश की तासीर, यहां की भाषाएं, यहां की संस्कृतियां, यहां की लोक अभिरूचियां इतनी मीठी हैं कि इनसे सांस्कारित होकर मिठास की एक बेल फूटती है, लेकिन भारत इस मिठास को महसूस नहीं करना चाहता। वे कहती हैं कि समुंदर के सीमा के पार हम भारतवंशी इस मिठास को महसूस भी करते हैं और उसे महफूज भी रखना चाहते हैं।
राष्ट्रीय आन्दोलन जब अपनी धार पकड़ रहा था और महात्मा गांधी की वैचारिक जमीन जोती जा रही थी, तब १९३० में बनारस में बाबू विष्णु राव पराड़कर ने रणभेरी अखबार निकाला था। स्वतंत्रता के आंदोलन में बनारस की उल्लेखनीय भूमिका का चेहरा थी रणभेरी। १९३० से १९४७ तक १७ वर्षों में कुल १२ बार इस अखबार को अंग्रेजी सरकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। फिर भी कभी छुपछुपाकर तो कभी सीनाजोरी से निकलती ही रही रणभेरी। अंग्रेज सरकार के लिए बहुत दुष्कर हो गया था कलम के सिपाहियों से पार पाना। बनारस की अनजान गलियों और बेनाम मुहल्लों से संचालित होती रहीं इसकी गतिविधियां। राष्ट्र रत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त, पंडित कमलापति त्रिपाठी, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णांनन्दजी, रामेश्वर प्रसाद चौरसिया, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ सान्याल... एक लम्बी पेâहरिस्त है बनारस के उन नामों की जो राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा भी देते रहे और रणभेरी जैसी प्रतीक संघर्षों का गुरिल्ला संचालन भी करते रहे। रामेश्वर प्रसाद चौरसिया के पुत्र प्रह्लाद चौरसिया बताते हैं कि रणभेरी की प्रतियां पान की गिलौरियों के बीच तश्तरियों में छिपाकर बांटी जाती थीं। अंग्रेज पुलिस इस बात के लिए हलकान रहती थी कि कब और कहां से प्रगट हो जाती है शब्दों के जरिये मार करने वाली रणभेरी। आजादी मिली तो इतिहास का यह पन्ना भी खामोश हो गया। लेकिन रणभेरी की दस्तक बनारस के लोगों के मनों में जब तब पड़ती ही रहती है। इसी रणभेरी की कहानी फिल्मायी जा रही है, उस धारावाहिक के लिए जिसे दूरदर्शन प्रसारित करने वाला है।
इसी सिलसिले में इस बार होशिला देवी का बनारस आना हुआ। कमलाश्री फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले बनने वाले इस धारावाहिक की वह सहनिर्मात्री हैं और निर्माता दिलीप सोनकर के घर पर ठहरी हुई हैं। उनसे बातचीत करने का मौका मिला तो रणभेरी के साथ-साथ भारत और मॉरीशस की रिश्तेदारी और भारतीयों के गिरमिटिया इतिहास की कहानी के पन्ने भी एक-एक कर खुलते चले गये। एक घंटे की बातचीत के दौरान हमने कई सूत्र तलाशे और इतिहास के कई पन्ने खुले। भारत के दक्षिणी पड़ोस में हिन्द महासागर के बीच टापू की शक्ल में बसा मॉरीशस अप्रिâकी महाद्वीप का देश है। ईश्वर ने इस द्वीप में प्राकृतिक संपदा का खजाना मुक्त हाथों से लुटाया है। दुनिया भर के पर्यटक एक बार यहां जरूर आते हैं। कुल १५ लाख की आबादी वाला यह देश अंग्रेजों की गुलामी से १९६८ में आजाद हुआ। २०४० वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पैâले मॉरीशस की कुल आबादी का ६५ प्रतिशत हिस्सा उन हिन्दुओं का है जो गिरमिटिया बनाकर भारत से ले जाये गये थे। अपने श्रम और पुरुषार्थ से इन भोजपुरियों ने मॉरीशस में विकास की अनुकरणीय पटकथा लिखी, जिसकी भाष्यकार हैं होशिला देवी। वे भारत और मॉरीशस की सद्भावना दूत हो गयी हैं। जब वे कहती हैं कि मॉरीशस हमारा होमलैण्ड लेकिन भारत हमारा मदरलैण्ड है, तो उनकी आंखें चमक उठती हैं। वे बताती हैं कि मॉरीशस की कुल आबादी, जिसमें चाइनीज भी हैं और ईसाई भी, सभी भोजपुरी बोलते हैं। भोजपुरी परम्परा के हमारे लोकनृत्यों को वहां के ईसाई और चाइनीज समाज ने थोड़ी गति देकर, पश्चिमी संगीत का मिश्रण देकर नया रूप दिया है। इसे सेगा डांस कहते हैं। मॉरीशस की मूल भाषा क्रियोल, प्रेंâच भाषा में प्रचलित शब्दावली के साथ मिलकर भोजपुरी में इस तरह समाहित हो गयी है कि इन तीनों ही भाषाओं का नवोन्मेष हो गया है। यह उन्मेष वहां के समाज में साफ दिखायी देता है। भोजपुरी के लिए संघर्ष की यह धारा होशिला देवी के साथ भारत तक चली आती है। ६ जनवरी २०११ से शुरू होकर २५ फरवरी २०११ तक उन्होंने भारत में एक लम्बी पदयात्रा का नेतृत्व किया। यह भोजपुरी को भोजपुरियों के देश में स्थापित करने का स्तुत्य उद्यम था।
बोली के दायरे से निकलकर एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बनने तक का भोजपुरी का यह सफर उतना ही गौरवशाली है, जितना भोजपुरी का अपना इतिहास। भोजपुरी में अश्लीलता के प्रश्न पर वह बोलीं-‘भोजपुरी हमनी के माई हव और माई के साथ अश्लील बर्ताव नाही हो सकत। भारत में भोजपुरी क दुर्गति देख के दु:ख होला।’ इस स्थिति के लिए वे भारत में काम कर रही संस्थाओं को सवालों के घेरे में खड़ा करती हैं। वे कहती हैं कि युगान्तरकारी परिवर्तनों और उपब्धियों के लिए जिस ताकत की जरूरत होती है, वह बंद मुट्ठी की ताकत है। भारत में यह मुट्ठी अभी बंधी नहीं है। संस्थाओं और सामाजिक समूहों की अहमन्यता इसके मूल में है। एक उद्देश्य के लिए काम करने वाले लोग भी एक साथ नहीं आते। सबकी अपनी ढपली है और सबका अपना राग है। भारत में भोजपुरी की वर्तमान दशा के पीछे की यह कठोर सच्चाई है। समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सभी को मिलकर काम करने और सफलताओं का श्रेय सामूहिक रूप से सबको देने की जरूरत है। इस देश की तासीर, यहां की भाषाएं, यहां की संस्कृतियां, यहां की लोक अभिरूचियां इतनी मीठी हैं कि इनसे सांस्कारित होकर मिठास की एक बेल फूटती है, लेकिन भारत इस मिठास को महसूस नहीं करना चाहता। वे कहती हैं कि समुंदर के सीमा के पार हम भारतवंशी इस मिठास को महसूस भी करते हैं और उसे महफूज भी रखना चाहते हैं।
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