Friday, 9 January 2015

पैगम्बर का अपमान..

पैगम्बर या प्रवर्तक होने की अनिवार्य अर्हता और जरूरी शर्त ये है कि वह मान-अपमान के द्वंद्व से ऊपर उठ चुका होता है.नानक स्थितप्रज्ञ हो चुके थे-सुख-दुःख के एहसास से निवृत्त.बुद्ध वीतरागी हो गये थे-लोभ,मोह के एहसास से मुक्त.महावीर दिगम्बर ही हो गये थे-देहभान के एहसास से विमुख.निश्चित रूप से मुहम्मद साहब भी समद्रष्टा हो चुके होंगे,वे भी प्रज्ञा के पार देख सकते होंगे.ऊंच-नीच,नफा-नुकसान,सुख-दुःख और मान या अपमान से परे नही हो चुके होते तो वे और कुछ भी हो जाते,इतने बड़े पन्थ के प्रवर्तक तो नही हो सकते थे.तुम किसके अपमान का बदला लेने गये थे नराधमों..! अल्लाह का अपमान..! या पैगम्बर का अपमान..!! वो क्या होता है..? पूरी दुनिया के सामने तुम इतनी बेहयाई से ये झूठ भी बोल रहे हो और इसी दुनिया में अपनी खूनी सल्तनत भी कायम करना चाहते हो..इसी दुनिया से पनाहगाह भी चाहते हो.धर्म और पैगम्बर तो तुम्हे पढने ही नही दिया गया अनपढ़ों..! तुम्हारी इस अनपढ़ सनक के सामने भला सहम जाएगी कलम..? मलाला--वो चौदह-पन्द्रह साल की एक लडकी ने तो तुम्हे हिजड़ा बनाकर रख दिया.कलम जिनका धर्म है,उनको डिगा पाओगे तुम..? तुम मूर्ख हो गधों..! जन्नत का दरवाजा उनके लिए खुलेगा,जो सच बोलते हुए शहीद हुए हैं.तुम्हे कभी नही मिलेंगी बहत्तर हूरें..! पैगम्बर के कभी न हो सकने वाले अपमान का बदला लेने जितना बड़ा झूठ बोलकर तुम तो वैसे भी अब बेहया जिंदगी जी रहे हो.मुझे मालूम है कि मान-अपमान तुम खुद भी कुछ नही समझते और ये भी नही समझते कि पैगम्बरों का अपमान कर सके,वो सलाहियत तो दुनिया वाले ने दुनिया वालों को दी ही नही....!

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