आत्महत्या एक ऐसा अपराध है,जिसके सफल अपराधी को कभी सजा दी ही नही जा सकती.अलबत्ता असफल अपराधी का ट्रायल जरूर हो जाता है.सफल आत्महत्या के अपराधी के तो प्रायः परिजन ही सजा पाते हैं.इस एक आधार पर भी इस विषय में बहुत से तर्क-वितर्क और पक्ष-विपक्ष हो सकते हैं.यह मुद्दा एक बड़ी सामाजिक बहस की मांग वैसे भी करता है.उस तरह के खामोश सियापे की मांग तो बिलकुल ही नही करता,जैसा इस मुद्दे पर अभी छाया हुआ है.सुना है क़ानून ने अब आत्महत्या को अपराध मानने से इनकार कर दिया है.इस निर्णय के आलोक में अपनी सहज सामाजिक गति को जरा महसूस तो कीजिये.क़ानून में इस बदलाव के बाद आत्महत्याओं की खबरें बढ़ी हैं.खासकर बनारस में..जहाँ लोग मरने और मरकर मोक्ष पाने की लालसा लेकर आते हैं,इनमे आत्महत्या की प्रवृत्ति पनप रही है.मुमुक्षु भवन जैसी गंगा के किनारे-किनारे अन्य कई और भी व्यवस्थाएं हैं,जहाँ अपने अंतिम दिनों में रहकर लोग काशीलाभ करते हैं.भर जिंदगी तो इंतज़ार में ही बीती,अब यहाँ रहकर मरने का भी इंतज़ार क्यों करें,सो लोग आत्महत्या की राह पकड़कर त्वरित मोक्ष पा लेने का सरल तरीका निकाल लाये हैं.अब मोक्ष तो मिलना तय है,आखिर काशी में मर रहे हैं..! चित्रगुप्त को तो बाध्य होकर मोक्ष देना पड़ेगा.क़ानून यहाँ बदला है तो वहां भी तो बदल गया होगा.अब भगवान भी भला राष्ट्रद्रोही हो सकते हैं क्या...... ?!!
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