Friday, 9 January 2015

सत्य के दो स्वरुप ...

सत्य के दो स्वरुप हमारे वांग्मय से....!
हमारी प्राचीन सभ्यता में दो तरह के सत्य वर्णित हैं.एक सत्य बोला सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने..और दूसरा सत्य बोला धर्मराज युधिष्ठिर ने.इन दोनो नामों के साथ लगे सत्यवादी और धर्मराज शब्द इन दो तरह के सत्यों की अच्छी पड़ताल कराते हैं.जहाँ एकमात्र निष्ठा सत्य के प्रति है,वहां धर्म भी सत्य ही है.राजा हरिश्चंद्र की सत्य के लिए निष्ठा उन्हें सत्य में ही ईश्वर के दर्शन करा देती है और वे अपनी पूरी भारभूमि के साथ अपनी निष्ठा पर ही आरूढ़ हो जाते हैं.कथानक कहता है कि इस सत्य का परिपाक उनके निर्वासन में हुआ,लेकिन उपरि-कथानक में चलें तो इस निर्वासन का परिपाक हरिश्चन्द्र के प्रतिस्थापन में होता है.ध्रुव की माँ सुनीति ने पिता के उपेक्षाभाव पर बेटे को समझाया-तू पिता की गोद या राजसिंहासन के लिए नही जनमा.तेरे प्रतिस्थापन के लिए तो ऊंची जगह है.तू उसकी जुगत कर..और ध्रुव के तप से सुनते हैं न...उत्तरी आसमान जगमगा उठा.हरिश्चन्द्र के सत्य ने उन्हें स्थूल निर्वासन तो दिया,जग ने देखा किन्तु जो सूक्ष्म प्रतिस्थापन किया,जो अनिर्वचनीय ऊंचाई बख्शी,उसने उस निष्ठा को बलवान कर दिया.हरिश्चन्द्र के पास रहकर सत्य ईश्वर हो उठा.
सत्यनिष्ठा धर्मराज ने भी पाली,किन्तु याद कीजिये शंख के शोर में धीरे से बोले गये वे दो शब्द.सत्य को छुपा लेने,सत्य को धुंधला कर देने वाले वे दो शब्द उन्हें सत्य से और सत्य को उनसे बहुत दूर ले गये....हां गुरुदेव..! अश्वत्थामा मारा गया....''किन्तु हाथी''..और बस इसी समय कृष्ण का पांचजन्य जाग उठा.वो एक शंखमात्र नही बजा,सत्य के पीछे का उद्देश्य,सत्य का अस्तित्व,सत्य के प्रति निष्ठा और उस व्रत का अनुराग ही इतिहास के उस एक अध्याय की वैसी जरूरत से बजबजा उठा.सत्य से विचलन की ये जो सूक्ष्म जरूरत पैदा हुई,उसने युधिष्ठिर के पांडु-तत्व को कौरव कर दिया.इस विचलन के औचित्य के लिए कोशिश की गयी.सत्य को छुपा ले जाने का दुस्साहस पैदा किया गया,सत्य से खेलने की इजाज़त दी गयी.सत्य पर पर्दा डालने की कवायद हुई और सत्य तिमिराच्छन्न हो गया.जो अधर्म की राह पर थे,धर्म के पथिक उनके संग जा खड़े हुए.पांडव-कौरव,कौरव-पांडव..सत्य-असत्य,असत्य-सत्य सब गड्डमड्ड हो गये.धर्मराज के इस स्खलन को स्वयं धर्म भी काले अक्षरों में लिखता है.ये दो दृष्टांत हैं.सत्य के पक्ष और विपक्ष में ये दो गवाहियाँ हैं.अपने-अपने चिन्तन के लिए हम सभी स्वतंत्र हैं... 

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