नशामुक्ति अभियान में महिलाओं की क्या भूमिका हो सकती है,इसके लिए आज़ादी की लड़ाई के दौरान बारडोली सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने एक वट-सूत्र दिया था.शराब खानों पर पिकेटिंग के लिए ड्यूटी लगाते समय जब सरोजनी नायडू की बारी आई तो उन्होंने गांधी जी के सामने अपने मन का संशय रक्खा.सरोजनी नायडू ने गांधी जी से पूछा कि बापू, जहाँ शराब की भट्ठियां चल रही है,जहाँ लोग नशे में धुत्त होकर पागल हुए जा रहे हैं,जहाँ लोग अपनी पहचान खो देते हैं,अपना आपा खो देते हैं,वैसी जगह पर हम महिलाओं का जाना कितना सुरक्षित होगा ?ऐसे में नशा मुक्ति तो क्या होगी,हमारी जीवन मुक्ति भी हो सकती है...तब महात्मा गांधी ने सरोजनी नायडू से कहा था---शराब विकृति का प्रतीक है और महिला संस्कृति का प्रतीक है.मेरा मानना है कि विकृति का समर्थ मुकाबला करने के लिए सस्कृति को ही आगे आना चाहिए.इसलिए शराब खानों की बंदी के लिए मोर्चेबंदी के काम में मौके पर महिलाओं को ही जाना चाहिए.जाओ,महिलाओं की टोलियाँ इकट्ठी करो और बारडोली के शराबखानों पर सत्याग्रही भाव से टूट पडो.इतिहास गवाह है कि बारडोली में सरोजनी नायडू के नेतृत्व में निकली महिलाओं के सामने नशे की गिरफ्त में पड़कर आत्मविश्वास खो चुके नशेडी पुरुषों की घिघ्घी बांध गयी थी.और महिलाओं की टोलियों के सामने इन पुरुषों ने हथियार डाल दिए थे.बारडोली की शराब भट्ठियां बंद हो गयी थी.उस दिन महात्मा गांधी ने सरोजनी नायडू को एक मन्त्र दिया था---विरोध का मुकाबला करना और झंडा तब तक उठाये रखना जब तक कलाइयाँ टूट न जाएँ..हाथ टूटे तो टूटे,लेकिन झंडा न छूटे...
बारडोली सत्याग्रह एक नजीर है जहाँ नशे से मुक्ति के अभियान में महिलाओं ने सार्थक और परिणामदायक भूमिका निभायी थी.महिला किसी भी घर की केन्द्रीय धुरी होती है.घर की पूरी व्यवस्था,पुरुषों और बच्चों की पूरी दुनिया महिलाओं के ही इर्द-गिर्द घूमती है.नशे का कुप्रभाव सबसे ज्यादा महिलाओं पर ही पड़ता है क्योंकि आर्थिक तौर पर भी और सामाजिक तौर पर भी महिला ही सर्वाधिक असुरक्षित रहती है.बारडोली के ऐतिहासिक सत्याग्रह के बाद देश में अनेक ऐसे मौके आये जब नशे की कुप्रथा के खिलाफ लामबंद हुई महिलाओं ने सशक्त भूमिका निभायी.आज़ादी के बाद सरकारी नीतियों के चलते शराबखानों की जो बाढ़ आई,उसने न केवल घर बल्कि गाँव के गाँव और समाज के समाज बर्बाद कर दिए.यहाँ तक कि गरीबी की जहालत का सामना कर रहे अनगिनत मजदूर परिवारों की अर्थव्यवस्था ही ध्वस्त हो गयी और इस विध्वंस का सबसे बड़ा कुप्रभाव महिलाओं पर पड़ा.लेकिन व्यवस्था की तमाम जड़ताओं के खिलाफ सामजिक हलको में प्रतिरोध की एक संमृद्ध संस्कृति भी साथ-साथ विकसित होती चली गयी.नशे के व्यवसाय से जुड़े नशेड़ियों और नशे के व्यापारियों के रैकेटो के सामने सभ्य सिविल सोसाइटी प्रायः हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़ ही नजर आई.ऐसे में पुरुषों ने जब भी इसका विरोध किया,इसका परिणाम प्रायः सुखदायी नही रहा और तमाम नशामुक्ति अभियान हिंसा का शिकार होकर ख़त्म हो गये.
चूँकि नशे की अराजकता नशे के विक्टिम के आलावा सबसे पहली चोट घर के चूल्हे पर करती है,सबसे पहला विध्वंस घर की अर्थव्यवस्था का करती है.इसलिये इस कुरीति का सर्वाधिक बुरा असर घर की महिलाओं पर पड़ता है..आजाद भारत में भी अनेक मौकों पर देखा गया है कि जो काम पुरुषों की बंदूकें नही कर पातीं,वो काम महिलाओं के हाथ में पड़ा झाड़ू कर देता है.झाड़ू सफाई का प्रतीक है और बेलन रोटी का.नशे की गिरफ्त में पड़े परिवारों की दुर्दशा से आजिज घरों की महिलाएं जब झाड़ू लेकर झुण्ड में निकलती हैं तो शराब,गांजा,चरस,हेरोइन...नशे का कोई भी रैकेट हो,स्त्री शक्ति के सामने देर तक ठहर नही पाता.एक अकेली महिला के लिए कोई नशा या कोई नशेडी भले ही भारी पड़ता हो,लेकिन संस्कृति की समूह शक्ति के सामने सामाजिक विकृतियों के ये झंडाबरदार हर दौर में पराजित हुए हैं.आज भी जब कहीं नशा-केंद्रों की बंदी का सवाल खड़ा होता है,नशे के खिलाफ अभियान चलाने का सवाल उत्पन्न होता है,तो समाज यह समझ चुका है कि यह काम पुरुषों की जोर-ज़बरदस्ती या हिंसा के बल पर संभव नही है.ऐसे किसी भी प्रयास की चरम परिणिति हिंसा और प्रतिहिंसा के जाल में फंस जाती है.इस अराजक वातावरण के सामने प्रेम और ममता से लबरेज महिला शक्ति के हाथों में पड़ा झाड़ू ज्यादा सक्षम,ज्यादा समर्थ और ज्यादा सकारात्मक पाया गया है.महिलाओं की भूमिका या उनका होना ही नशे के औचित्य पर एक बड़ा-सा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है.इस अभियान में महिलाओं का उतरना ही पूरे माहौल को जस्टिफाइड करता है और इस पूरे संघर्ष को सार्थक परिणाम की ओर उन्मुख करता है.इसलिए नशामुक्ति हो या अन्य कोई सामाजिक विकृति उसके खिलाफ महिलाओं की एक सबल और स्वाभाविक संस्कृतिनिष्ठ भूमिका इतिहाससिद्ध है.
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