ये न सोचियेगा कि पेशावर में छलनी-छलनी हुआ बचपन किसी मनुष्यता का स्खलन है.विकसित और हमारी आधुनिक दुनिया के अब यही नियम हैं.आतंक और हिंसा का दिन-दिन बढ़ता हुआ जोर केवल और केवल उसी 'विकास' की कीमत है,जिसकी धुन पर तीसरी दुनिया मंत्रमुग्ध होकर थिरक रही है.आइये न,अपना ही चेहरा आईने में जरा गौर से निहारकर देखें,कितनी दुविधा है वहां..हम खुद खप्पर भर-भरकर मासूम लोगों,जीवों,बच्चों और जिंदगियों के खून पी रहे हैं और विकास की धुन पर नाच रहे हैं..पेशावर की नृशंस त्रासदी के बाद जो एक बयान पढकर मन सबसे अधिक खौल उठा,वो पाकिस्तानी प्रीमियर का था,जो अपने 'शरीफ' होने के लिए जाने जाते हैं.खून के छींटों से भरे अखबार के पन्नों पर बीच में कहीं लिखा था--'तालिबान के खिलाफ हमारी लड़ाई जारी रहेगी'--नवाज शरीफ..हम जानते हैं मिस्टर शरीफ,आपकी इस लड़ाई के पीछे का नपुंसक सच.दुनिया जानती है कि ओसामा बिन लादेन का अंतिम पता क्या था.हमे दाउद इब्राहीम का पता भी मालूम है.हम जानते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ तुम्हारी दोगली लड़ाई पिछले तीसेक सालों से किस अदा से चल रही है.हम अच्छी तरह जानते हैं कि इस दुनिया में अबतक जितना भी खून बहाया गया है,उसके पीछे केवल और केवल राजनीति रही है.कोई नवाज शरीफ,कोई परवेज मुशर्रफ,कोई जॉर्ज बुश,कोई इंदिरा गांधी,कोई नरेंद्र मोदी,कोई होस्नी मुबारक या कोई बराक ओबामा .... एक बहुत बड़ी अंतहीन सीढ़ी है,जिस पर चढ़ते जाइए,कहीं कोई ओर-छोर नही मिलेगा.यूँ ही नही है कि जिस दुनिया पर ये लोग राज करते आ रहे हैं,वो दुनिया इतनी अराजक और इतनी भयानक नजर आ रही है.हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के पाले में खड़े होकर देखेंगे तो इस रक्तवर्षा का सच धुंधला होकर दिखेगा.हिंदुस्तान और पाकिस्तान आज की तारीख में कोई संप्रभुता संपन्न दो देशों के नाम भर नही हैं.हम कुरुक्षेत्र की जमीन भर रह गये है बस.ऐसे खुनी वक़्त में जब हम जानलेवा और आत्मघाती प्रवृत्तियों को भी टुकड़े-टुकड़े में देखने के आदी हुए जा रहे हैं,कुछ मुशर्र्फों ने आग में घी डाला है,राजनीति के बजबजाते हुए चूल्हों पर खून सनी रोटियां सेंकने की जुर्रत की है.ये बयान मनुष्यता के हत्यारों के हैं,लेकिन हमे सावधान रहना है.मुशर्रफ या उनके जैसे सिरफिरे लोग जो आज की दुनिया को चलाने वालों में शामिल हैं,हमारे गाइड नही हो सकते.थोडा आगे चलें तो पायेंगे कि करुणा और शोक मनुष्यता के हिस्से हैं और वे भाव से संचालित होते हैं.मुशर्रफ जैसों में भाव की जगह अभाव पाए जाते हैं.हम नही भूल सकते कि हमारी दुनिया को यहाँ तक ले आने वालों में पाकिस्तानी क़ानून का ये भगोड़ा अपराधी भी शामिल रहा है.....
एक सवाल उस विडंबना से भी,जहाँ हम खुली आँखों से देख रहे हैं कि दसियों हज़ार साल पुरानी हमारी संस्कृति की रक्षा का भार कुछ उन्मादी कन्धों पर आन पड़ा है.ये धर्मधुजा वाहक इन मासूम हत्याओं पर प्रतिशोध के वश ठहाके लगाने की मुद्रा में हैं.ध्यान रखना दोस्तों..ये आवाज इसी मिटटी से उठ सकती है कि हम मनुष्यता के खिलाफ नही खड़े हो सकते.इस बियाबान में हम अपनी करुणा ही रोप सकते हैं और करुणा किसी से सीखी नही जाती.करुणा मनुष्यता का एक बेशकीमती गहना है.यह खुद से उत्पन्न होती है.यह मनुष्यता के मुशर्रफ जैसे दुश्मनों की किसी सिरफिरी सोच से प्रभावित भी नही होती.हमे समस्या को उसकी सम्पूर्णता में देखना चाहिए.हमे समझना चाहिए कि हर युग में कत्लेआम के पीछे सिर्फ आर सिर्फ सियासत ही रही है...और हर युग में करुणा के पीछे केवल मनुष्यता ही रही है.अलग-अलग स्थानों के अनुपात आगे पीछे होंगे,वरना पूरी दुनिया ही आज पेशावर बनी बैठी है.ये आतंकवाद किन्ही सिरफिरे हिंसक संगठनों की गतिविधि मात्र नही है.इसके बीज समाज की बुनियाद में ही हैं.सरकारें इसी समाज का ही तो नेत्रित्व कर रही हैं.सरकारों की प्रतिहिंसा भी एक तरह का आतंकवाद ही है.न तो ये समस्या सतही है न इस समस्या का समाधान सतही है.आज जो पेशावर में हुआ है,वो भारत में दशकों से होता ही रहा है.कांगो,गिनी और इथियोपिया जैसे अफ्रीकी कबीलाई देशों के लोगों को गोलियों की तड़तडाहट के बीच ही जीने की पीढ़ियों से आदत पड़ी हुई है.ये पावर-गेम है.पद,पैसे और प्रभाव को पाने और उसे बनाये रखने के लिए लोमहर्षक हिंसा का ये खेल तात्विक दृष्टि से समझने की जरूरत है.शान्ति के नोबेलों पर ताली पीटने वाली दुनिया बारूद के पूरे एक ढेर पर ही बैठी हुई है.जो जानें आज गयी हैं,उनपर आवाज रुद्ध है.ईश्वर के लिए अमानवीयता की इस आखिरी हद पर हिन्दू,मुसलमान को अलग-अलग न खड़ा करें..मनुष्यता की हत्या है ये.कमीनगी ने रूप बदलकर नर-पिशाच का भेष धर लिया है.नन्हे नौनिहालों की इस बर्बर हत्या के पीछे मनुष्यता मुंह छुपाकर सिसक रही है.संवेदना के अंतर में अन्धकार और गहन..और काला हुआ जा रहा है.आदमीयत सदमे में है.इन हत्याओं का जवाब क्या हो सकता है..बची हुई मनुष्यता के सामने सवाल उपस्थित है..जवाब की तलाश तेज होनी चाहिए....
एक सवाल उस विडंबना से भी,जहाँ हम खुली आँखों से देख रहे हैं कि दसियों हज़ार साल पुरानी हमारी संस्कृति की रक्षा का भार कुछ उन्मादी कन्धों पर आन पड़ा है.ये धर्मधुजा वाहक इन मासूम हत्याओं पर प्रतिशोध के वश ठहाके लगाने की मुद्रा में हैं.ध्यान रखना दोस्तों..ये आवाज इसी मिटटी से उठ सकती है कि हम मनुष्यता के खिलाफ नही खड़े हो सकते.इस बियाबान में हम अपनी करुणा ही रोप सकते हैं और करुणा किसी से सीखी नही जाती.करुणा मनुष्यता का एक बेशकीमती गहना है.यह खुद से उत्पन्न होती है.यह मनुष्यता के मुशर्रफ जैसे दुश्मनों की किसी सिरफिरी सोच से प्रभावित भी नही होती.हमे समस्या को उसकी सम्पूर्णता में देखना चाहिए.हमे समझना चाहिए कि हर युग में कत्लेआम के पीछे सिर्फ आर सिर्फ सियासत ही रही है...और हर युग में करुणा के पीछे केवल मनुष्यता ही रही है.अलग-अलग स्थानों के अनुपात आगे पीछे होंगे,वरना पूरी दुनिया ही आज पेशावर बनी बैठी है.ये आतंकवाद किन्ही सिरफिरे हिंसक संगठनों की गतिविधि मात्र नही है.इसके बीज समाज की बुनियाद में ही हैं.सरकारें इसी समाज का ही तो नेत्रित्व कर रही हैं.सरकारों की प्रतिहिंसा भी एक तरह का आतंकवाद ही है.न तो ये समस्या सतही है न इस समस्या का समाधान सतही है.आज जो पेशावर में हुआ है,वो भारत में दशकों से होता ही रहा है.कांगो,गिनी और इथियोपिया जैसे अफ्रीकी कबीलाई देशों के लोगों को गोलियों की तड़तडाहट के बीच ही जीने की पीढ़ियों से आदत पड़ी हुई है.ये पावर-गेम है.पद,पैसे और प्रभाव को पाने और उसे बनाये रखने के लिए लोमहर्षक हिंसा का ये खेल तात्विक दृष्टि से समझने की जरूरत है.शान्ति के नोबेलों पर ताली पीटने वाली दुनिया बारूद के पूरे एक ढेर पर ही बैठी हुई है.जो जानें आज गयी हैं,उनपर आवाज रुद्ध है.ईश्वर के लिए अमानवीयता की इस आखिरी हद पर हिन्दू,मुसलमान को अलग-अलग न खड़ा करें..मनुष्यता की हत्या है ये.कमीनगी ने रूप बदलकर नर-पिशाच का भेष धर लिया है.नन्हे नौनिहालों की इस बर्बर हत्या के पीछे मनुष्यता मुंह छुपाकर सिसक रही है.संवेदना के अंतर में अन्धकार और गहन..और काला हुआ जा रहा है.आदमीयत सदमे में है.इन हत्याओं का जवाब क्या हो सकता है..बची हुई मनुष्यता के सामने सवाल उपस्थित है..जवाब की तलाश तेज होनी चाहिए....
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