जूट के बोरे पर चक्की बैठाकर धनपत्ती काली उड़द की दाल दल रही है.इसके तुरंत बाद उसे इतनी ही मूंग की दाल भी दलनी है.दलने के बाद वह दाल को सूप में फटकती है.घंटों तक गर्द और धूल उडाती है फिर पूरी दाल को पानी में डुबाती है और बकरी चराने चली जाती है.दो घंटे में नातिन को बकरी सौंपकर धनपत्ती वापस आती है तो दाल के टोकरे को उठाकर बाहर नल पर चली आती है और फांड लपेटकर बैठ जाती है.फूली हुई दाल को दोनों हाथों से रगड-रगडकर धो रही है,छिलके उतार रही है और धोयी की दाल तैयार कर रही है धनपत्ती..उठ...ती है,झुकती है फिर बैठ जाती है,भींग भी जाती है,लेकिन कितना भी जल्दी करे, चार किलो धोयी की दाल तैयार करने में उसे पांच घंटे लग जाते हैं.....और अब धोयी हुई धोयी की दाल को सुखा रही है धनपत्ती..!
आज मालिक के घर मेहमान हैं,सो कचौड़ियाँ और बड़े बनने हैं.लगभग पूरा दिन लगाकर तैयार की गयी दाल के बड़े छनते देख रही है धनपत्ती.कटोरियों में सजाकर मालिक के मेहमानों तक पहुंचाई जा रही हैं कचौड़ियाँ भी और बड़े भी..खट्टी चटनी में डुबाकर बड़े का एक बड़ा सा टुकड़ा मुंह में डालते हुए मेहमान अपने दोस्त को अंग्रेजी बोलकर दिखाता है.ओ शिट यार...औरत,...? उसके लिए बस दो जगह..आइदर इन द किचेन....और ऑन द बेड...! अब धनपत्ती क्या समझे अंग्रेजी की गिटिर पिटिर.उसको अपने किचेन की चिंता हो रही है..और फिर बेड पर भी तो जाना है...! उसकी निगाह धोयी की भूसी पर है,उसकी लिट्टी बनती है.धनपत्ती मालिक के मैनेजर को खोज रही है कि एबुलकेसन लिखवा ले..बिना तस्दीक या गवाही के भूसी भी कहाँ मिलती है..!
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