सीता को वनवास देकर राम ने अश्वमेध यज्ञ रचाया.यज्ञ के बाद दिग्विजयी अश्व छोड़ा गया.सन्देश साफ़ था--या तो राम की अधीनता स्वीकार करो या फिर घोडा रोको और युद्ध करो.कई क्षत्रपों ने घोडा पकड़ने की कोशिश की लेकिन महाराज राम की सेना के सामने टिक नही सके.चंहुदिशि दिग्विजय की धूम मच रही थी.कई राजा शरणागत हुए.चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित होने लगा.लेकिन वन में सीता का तप भी तो शायद इसी दिन के लिए था.किशोर लव-कुश ने जंगल में अश्वमेध का घोडा बाँध लिया.सेनापति और योद्धाओं ने पहले बच्चों को समझाया और राम के नाम का प्रताप बताया.यूँ,मुनि-शावकों ने अश्व को बाँधा तो हंसी खेल में ही था.लेकिन राम का नाम सुन के तिलमिला उठे..कुश ने लव से पूछा-क्या ये वही राम हैं,जिन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को वनवास दे दिया था और वे आज भी कहीं जंगलों में मारी मारी फिरती हैं.?बच्चों को मालूम नही था कि सीता उन्ही की माँ का नाम है....उन्हें तो यहीं बताया गया था कि वे वनदेवी के बेटे हैं.आँखों ही आँखों में इशारे हुए और वल्कल वस्त्रधारियों ने अपनी बाल धनुहियों की कमान राम की सेना पर तान दी..बोले ये जंगल हमारा है और हम तुम्हारे राजा का प्रभुत्व स्वीकार नही करते.सेना ने बात को खेल समझा और बच्चों ने धूल चटा दी.
पहले शत्रुघ्न मूर्छित हुए फिर पीछे से दलबल के साथ भरत आये लेकिन 14 वर्ष के तपस्वी का मुनिबालकों से यह युद्ध देर तक नहीं ठहर सका.भरत की मुनिकल्प काया लव के बाणों से छलनी हो उठी.वे युद्धभूमि से ले जाए गये.इस बीच कुश थोडा थोडा समय निकालकर माँ को खबर दे आते थे-माँ लव भैया ने घोडा पकड़ा है,लड़ाई हो रही है.जीत गये तो घोडा अपना.बड़ा सुन्दर है.सीता चिंतित हुईं.लेकिन वाल्मीकि के संकेत पाकर मौन भी हो गयीं.उधर भरत की खबर जब अयोध्या पहुंची तो राम के माथे पर बल पड़ गये...होनहार कुछ और है....लक्ष्मण को बुलावा भेजा और समझाया--ये कोई साधारण बालक नही लगते लक्ष्मण..पूरी योग्यता से युद्ध संभालना..लेकिन युद्धभूमि के किशोरों में राम की छवि देखकर लक्ष्मण मंत्रमुग्ध हो गये.बोले-मै लक्ष्मण हूँ..बच्चों धनुष रख दो और घोडा छोड़ दो.जाओ खेलो...बच्चों ने कहा-हम जानते हैं आपको.आपने सूपनखा के नाक कान काटे थे..लेकिन यहाँ कोई सूपनखा नही है..हम घोडा नही छोड़ेंगे..मुनि वाल्मीकि ने बच्चों को पूरी रामायण सुना रक्खी थी.कहाँ तो दो किशोर बच्चे और कहाँ मेघनादविजेता लक्ष्मण जैसा वीर..यह युद्ध थोडा लम्बा चला.कुश घायल होते होते बचे.यह दृश्य लव से सहन नही हुआ और परिणाम ये हुआ कि लक्ष्मण जिन्दगी में दूसरी बार मूर्छित हुए.हाहाकार करते बचे खुचे सैनिकों ने दरबार में गुहार लगाईं तो राम खड़े हो गये और भुनभुनाये--देखूं तो कौन प्रलय उतरी है..!
इस अंतिम दृश्य का वर्णन करने में कलम थर्राती है.युद्ध भूमि में पिता-पुत्र आमने सामने खड़े हैं.पिछली रात गुरु ने शिष्यों में इस अंतिम युद्ध के संस्कार डाले हैं.लव-कुश को मालूम है कि सामने खड़े राजा के पास रामबाण हैं और वह कभी खाली नही जाता.बस..गुरु की भक्ति ह्रदय में और वनदेवी की शक्ति मन में संजोये दो वीर बालक उस रामबाण वाले राजा के सामने तीर ताने खड़े हैं.राम अचरज में हैं.वे पूछते हैं-बच्चों तुमलोग कौन हो.घोडा क्यों पकड़ रखा है.क्या चाहते हो..?लवकुश बोले-हम मुनि वाल्मीकि के शिष्य और वनदेवी के पुत्र हैं.घोडा हमने खेलने के लिए बाँधा है और स्वयं आपसे युद्ध करना चाहते हैं.थकित चकित राम ने पूछा--हमारे जिन योद्धाओं ने लंका का रण जीता .. जिस सेना ने भीमकाय राक्षसों को मारा..जिस लक्ष्मण ने मेघनाद जैसे वीर को संहारा....ऐसे योद्धाओं को तुमने कैसे मारा..?लव ने कहा-मीठी मीठी बातें न करो महाराज..! तब तुम वनवासी थे और तुम्हारे सामने अन्यायी राजा रावण खड़ा था.आज हम वनवासी हैं और हमारे सामने अन्यायी राजा राम खड़ा है.जैसे तब रावण हारा था.वैसे ही आज राम हारेगा.बहुत सवाल न पूछो सरकार,सवाल हमे भी पूछना है.बोलो तुमने सीता क्यों त्यागी....?बोलो तुमने सीता क्यों त्यागी..??बोलो तुमने सीता क्यों त्यागी..???
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