जो अमित शाह लोकसभा चुनाव के बाद हुए प्रदेशों के चुनावों में मिली जीत को हरबार मोदी के काम पर लगी मुहर बताते रहे,उन्ही अमित शाह का एक हारा हुआ बयान इस बार अंग्रेजी की छौंक लिए आया है,जिसमे उन्होंने कहा है कि दिल्ली का चुनाव केंद्र सरकार के काम पर कोई रेफरेंडम नही है..बहुत दुखी मन से कह रहा हूँ कि संघ का कैडर बौद्धिक रूप से प्रायः अल्प विकसित ही पाया जाता है.कई बार मेरे इस विश्वास का आरएसएस कैडर के कुछ और कनिष्ठ वरिष्ठ मित्रों ने भी समर्थन किया है.ये लोग सच में अगर कुछ रचनात्मक सोच पाते तो कांग्रेस से पटेल छीनने के बजाय अरविन्द और उनके जैसों से उनका गांधी ही छीन लेते.इनमे अगर लोक कल्याणकारी राजनीतिक भाव होता तो ये 'आप' से उसका स्वराज का मुद्दा छीन लेते.बहुत बड़ी और बहुत गहरी आवाज रही है इस देश में स्वराज और स्वदेशी की.नाहक एक मूढ़मति हत्यारे के पाप का बोझ लिए फिरते हैं ये मूर्ख लोग.ये हारे हुए जुआरियों की तरह जंग से पहले ही पराजित भाषा न बोल रहे होते अगर इनमे शुचिता बची होती.अंदरूनी राजनीतिक खबरें ये हैं कि बीजेपी के तलघरों में अभी से मातम है और लोकसभा चुनावों में राष्ट्रवादी होकर उभरा जनमत अभी से कोसा जाने लगा है.कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी कि अगर दिल्ली हाथ से निकल गयी तो ये टर्निंग पॉइंट होगा.मोदी जी का काउंटडाउन स्टार्टिंग पॉइंट.अगर ऐसा सच में हो गया तो फिर मोदी भगवान को मोदी भगवान् ही बचा पायेंगे और इस गेम में अब कोई मैन ऑफ़ द मैच नही होगा.
एक सवाल बहुत पूछा जाता है--गुजरात दंगों के अलावा क्या देश में दंगे नही हुए..?आखिर क्यों मोदी को ही लगातार कठघरे में खड़ा किये रखा गया..? कांग्रेस ने तो देश में दंगों की परम्परा ही डाली.बाद में दंगों को उसने अपना राजनीतिक अस्त्र तक बना लिया.दंगों के बल पर कई बार उसने केंद्र सहित प्रदेशों में सत्ताएं हासिल कीं.लेकिन उनकी चर्चा कहीं नही होती,कोई नही करता.आखिर सब लोग मोदी के ही पीछे क्यों पड़े रहते हैं..? क्यों गुजरात ही याद रहता है सबको..? 84 क्यों नही,भागलपुर क्यों नही..? क्यों नही बनारस..? क्यों नही और ..और ..और..?कई बार चाहा लेकिन समय नही मिला लिखने का.नरेंद्र मोदी आकर्षक वक्ता शुरू से ही रहे हैं.ये प्रायः संघ से निकले लोगों की एक खासियत होती है कि वे अपने ही सलीके से हिंदी बोलते हैं.अटल जी की हिंदी देखिये,अडवानी जी की तो इंग्लिश हिंदी दोनों ही देखिये..जोशी,सुषमा,जेटली,उमा भारती,एक साथ कहा जा सकता है कि इन सबकी भाषा मजबूत,और शैली सुरुचिपूर्ण है,एक विशेष ठसक लिए हुए..प्रमोद महाजन भी थे,नरेंद्र मोदी भी हैं..जब पार्टी विथ डिफ़रेंस का नारा देकर बीजेपी राजनीति में आई थी तो पूरे देश ने इस विकल्प का स्वागत इसी भाव से किया था,जैसे वो अभी दो तीन सालों से आम आदमी के नारे का स्वागत कर रहा है.
वे तमाम लोग जो कभी न कभी इस मुहिम के हिस्सा रहे और बाद में अरविन्द के पार्टी बनाने के बाद उपजे विवादों में जिन्होंने अपने अपने तर्क गढ़ लिए,कम से कम उन्हें तो समझ में आनी ही चाहिए ये बात कि क्यों मोदी या बीजेपी ज्यादा निशाने पर रहते हैं.यही दर्द उस पीढ़ी का भी है दोस्त.एक मन्दिर के सवाल पर.दूसरे कॉमन सिविल कोड के सवाल पर,तीसरे कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव के सवाल पर ये लोग पहले खुद से ही बिलगाए.वर्ना इनकी तमाम अतिवादी बातों के बावजूद देश ने इनसे बहुत उम्मीदें पाल रखी थीं.राजनीतिक दलों ने और सिस्टम ने तो बीजेपी का ह्रदय से स्वागत किया था.इतिहास को असम्भव सा लगने वाला प्रयोग तक किया था.कम्युनिस्ट पार्टी और बीजेपी ने बाहर से समर्थन देकर ग्यारह महीने वीपी सिंह की सरकार चलाई थी.पार्टी विथ डिफ़रेंस का अर्थ सभी समझना चाहते थे.देश में एक ज्वार तब भी था.बौद्धिक मुस्लिम जगत भी बीजेपी को बहुत अछूत नही मान रहा था तब.लेकिन तभी अचानक मस्जिद गिरा के बीजेपी ने अपनी जात की मुनादी खुद कर दी.यद्यपि अडवानी जी ने इसकी नीव पहले से ही रखनी शुरू कर दी थी,जब उनका ढोल समस्तीपुर में लालू यादव ने फोड़ दिया.मै ऐसे बहुतों को जानता हूँ जो बीजेपी में तब बड़ी निष्ठा रखे हुए थे लेकिन उस दिन बुरी तरह बिदक गये जब अडवानी जी लाखों लाख लोगों को अयोध्या में ठूंसकर ''कौन माई का लाल मुझे गिरफ्तार करेगा'' गरजते हुए नये नये बने जेल-महल में जा बिराजे और इधर अयोध्या में हजारों लाखों सिर कट गये.सोमनाथ से चली उस रथयात्रा को देश ही नही,पूरी दुनिया गौर से देख रही थी,जो केवल और केवल वोट बढाने के लिए आयोजित की गयी थी,इसे लोगों ने तब समझा जब अयोध्या में हुई कारसेवकों की हत्याओं से सरयू का पानी सच में लाल हो गया और ये आग लगाने वाले सारे नेता अपने-अपने महलों में दुबक गये.लोगों का ज्वार उतर गया.
इस उतरे हुए ज्वार के बाद जब धीरे-धीरे सबकुछ शांत हुआ तबतक बीजेपी अछूत बन चुकी थी.लेकिन फिर भी जिन कुछ नेताओं की ओर लोग उम्मीद से देखा करते थे,उनमे मोदी भी अपने राजनीतिक चातुर्य और सांगठनिक कौशल के कारण लोगों की निगाह में थे.उनकी इसी क्षमता को परखने के लिए अटल जी ने उन्हें गुजरात की गद्दी के रूप में पहली बड़ी प्रसासनिक दक्षता वाली शासकीय जिम्मेदारी दी.कत्तई लोग ये भी सोच रहे थे कि ये अलग दिखने वाले लोग हैं.अब दंगे नही होंगे.कांग्रेस के लम्बे निष्ठुर,निरंकुश और क्रूर शासन से ऊबे लोगों को उनसे उम्मीद थी कि अब बदलाव दिखेगा..कि तबतक गुजरात हो गया और मोदी जी की संवैधानिक शपथ और उसकी गरिमापूर्ण मर्यादा सवालों के घेरे में आ गयी.लोगों को शॉक लगा..जनमत चौंका..क्योंकि मोदी जी गुजरात में ही नही,देशभर में तब भी देखे जा रहे थे.इन दंगों के बाद मोदी फेल हुए पाए गये.उनके नियोक्ता ने उन्हें सार्वजनिक मंच से उपालम्भ दिया था इतिहास साक्षी है.इस देश के जनमत को उथला कभी मत समझना मेरे दोस्त.वो बहुत गहरी मार करता है.वो पहले भी महसूस करता ही रहा था.उस दिन उसे यकीन हो गया कि आरएसएस ने ये पार्टी बनाकर गलती की.जबकि वो ज्यादा बड़ा काम कर सकता था राजनीति से वियुक्त रहकर.वो ज्यादा प्रभावी हो सकता था समाज बने रहकर.आरएसएस भी समझने लग गया था कि ये हज़ार साल की गुलामी झेलकर आये लोगों का देश है.इन्हें आप चरका नही पढ़ा सकते.वे जान गये कि इस राह वे निपटा दिए जायेंगे.फिर मोदी का स्टीयरिंग बदला गया.लोग जो ये मानते हैं कि मोदी का उभार गुजरात दंगे के कारण ध्रुवीकरण के चलते हुआ,वे ठीक नही समझते हैं.असल में मोदी की स्वीकार्यता फिर बारह साल दंगे न होने देने के लिए बनी.अडवानी जैसे महारथी का प्रताप इसलिए चुक गया कि उनके पास अपने किये का अयोध्या के अलावा कोई मॉडल नही था.कारसेवकों के खून से सींची अडवानी जी की बीजेपी मोदी बीजेपी में इसीलिए ढल पायी क्योंकि उनके पास गुजरात दंगों का नही,गुजरात के विकास का मॉडल था.........क्रमशः..
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