Saturday, 14 February 2015

एक उदास राजनैतिक विश्लेषण,पार्ट-II


 
मोदी ने गुजरात दंगों के बाद ये समझ लिया कि महाभारत जब खत्म होता है तो रक्त से सनी मिटटी के अलावा शासन करने को कुछ नही मिलता.मोदी ने वहां से रिवर्स गियर बदला.इस सामूहिक मुस्लिम नर-संहार से एक ध्रुवीकृत हिन्दू शक्ति के रूप में उन्हें जो नफा नुक्सान होना था,वो हो चुका था.और अब वे पूंजीपतियों के साथ खेलने को तैयार हुए.चूँकि ये विरासत उन्हें कांग्रेस से मिली थी,इसलिए उन्होंने मॉडल नेहरु वाला उठाया,गांधी वाला नही.जानने वाले गाँधी और नेहरु के मॉडल का बुनियादी अंतर जानते हैं.पूंजीवादी विकास का ये रास्ता ख़त्म कहाँ होता है,ये तीसरी दुनिया के अनेक देश भुगत रहे हैं,लेकिन गुजरात देश नही था,देश का एक कोना भर था..मोदी वक़्त की नब्ज को समझ रहे थे.उनके सामने उनके राजनीतिक वजूद का संकट था.यही वो दौर था जब देश में करीब करीब पहली बार कोई राजनीतिक जमीन का नेता कार्पोरेट कल्चर को ओढ़ रहा था और मुख्यमंत्री कार्यालय में एक सीईओ देखा जाने लगा.गुजरात के बड़े बड़े शहरों में कुछ दर्शनीय मॉडल खड़े किये पूंजीपतियों ने मोदी के पीछे खड़े होकर.लेकिन वही पुरानी बीमारी.ग्रामीण आर्थिकी की रीढ़ तोडकर संभव हुआ वो सब जिसके ढोल अगले दशक भर पीटे जाते रहे.
कभी गांधीनगर और अहमदाबाद के गाँवों में खादी का काम देखिये और कृपा करके मोदी की छाया से जरा अलग खड़े होकर देखिये.ये ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का आदर्श ढांचा है और इसे मोदी ने खड़ा नही किया.मोदी इसे कर भी नही सकते थे.ये काम पहले दिन से केवल गांधी संस्थाओं और उसके कर्मठ कार्यकर्ताओं तथा करोड़ों ग्रामीण गुजरातियों ने अपना पसीना बहाकर किया है.खादी के धंधे ने गुजराती समाज को जैसे संमृद्ध किया है,वैसा दूसरा उदाहरण खोजने चलिए तो महाराष्ट्र के अलावा कोई और नही मिलेगा.ध्यान दीजिये अतिवादी रक्त रंजित देशभक्ति से झटका खाने के बाद जब विकास का नाम पहली बार सूझा तो वो हमल पूंजीवाद के घर से आया,उसके लिए न गुजरात के गांधी दिखे,न गुजरात के गाँव.लेकिन फिर भी चूंकि नाम विकास था,इसलिए उस ब्रांड के कुछ मॉडल शो रूम्स के जरिये विकास गुजरात में पालथी मारकर बैठकर बैठ गया.फिर घुटनों पर चलने के दिन आये,फिर एकदिन लुढकते लुढकते लंगड़ी टांग पर विकास खड़ा होने का यत्न करने लगा.अबतक विकास एक जुमला बन गया था और इस बारह साला जुमले के अपने ही तर्कातीत तर्क थे.तर्कातीत इसलिए कि इसी देश में लगातार सरकार चलाने और चुनाव जीतने के 25 साला,तीस साला उदाहरण भी तो हैं.लेकिन पूंजीवाद को विकास का बारह साला गुजराती मॉडल ही मुफीद लगना था,लगा भी..
अब आये लोकसभा के वे चुनाव,जिनकी तैयारी मोदी पांच सालों से और आरएसएस पांच दशकों से कर रहा था.यहाँ आने तक के रास्ते में मोदी ने कोई दूसरी गलती करना ठीक नही समझा या कहें तो इस दूसरी गलती का अब हौसला नही बचा था उनमे.वे इतना तो जान ही चुके थे कि वो व्यापक जन समाज को छूने वाला विकास जैसा कोई नाम ही हो सकता है,जो उन्हें लोकसभा की सीढ़ियों पर ला पटके...और उसने उन्हें वहां पहुंचाया भी.केन्द्रीय सत्ता हाथ में आ जाने के बाद मोदी का इतिहास बुरी तरह उनके चरित्र में लौटता दीखने लगा..और इस बात की आशंका हर उस जिम्मेदार और जवाबदेह नागरिक के मन में थी,जिसे अपने देश और समाज से प्यार है.आम चुनाव के बाद हुए प्रदेशों के चुनावों में ये लौटता हुआ चरित्र कभी लव जिहाद बनकर बोला,कभी सहारनपुर में गरजा,कभी मेरठ में तो कभी हरियाणा में,कभी झारखंड में बोला.हमारी आशंकाएं निर्मूल नही थीं.लोकसभा चुनावों के बाद मोदी की राजनीति वापस मुड़ने को हुई,वे नागपुर की आँखों से देखने को बाध्य हैं,ये सब जानते हैं.दिल्ली में बैठकर सारे देश को उन्होंने गुजरात की नजर से देखना शुरू किया.नफरत और गंदी राजनीति का नाग केन्द्रीय सत्ता के गलियारों में फन उठाने लगा.पिछले 13 सालों से लगातार जीतते जा रहे मोदी की पराभव की पटकथा लिखी जानी शुरू हुई.
ओवैसी बन्धुओं की राजनीति से आन्ध्र प्रदेश पहले से ही परिचित रहा है..देश ने भी उन्हें जाना पहचाना.मई ओवैसियों को आंध्रा हाई कोर्ट की एक टिप्पणी के दायरे में याद करता हूँ.मोदी का नाम लेकर हिन्दुस्तान को संबोधित करने वाले ओवेसी के वे भाषण सुनिए.आप धार्मिक हों न हों,हिन्दू हों न हों..एक बार उसका मुंह नोच लेने का आपका मन जरूर हो जाएगा.बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं और उनके आस्तिक प्रतीकों पर जैसे जैसे हमले ओवैसी ने किये,राम का नाम जिस हिकारत से लिया,कौशल्या,पार्वती आदि स्त्री प्रतीक नामों के प्रति अपनी कुंठा का जैसा मुजाहिरा उसने किया,हाई कोर्ट के जज ने उसपर टिप्पणी की थी-तुमने हिन्दुस्तान को भी नही छोड़ा.राम को भी ही छोड़ा,पीछे देखो दो दो राम तुम्हे बचाने को खड़े हैं.ये दोनों राम ओवैसी के वकील थे....खैर,तो भारत की राजनीति में दुसरे भिंडरावाले का लालन-पालन शुरू हुआ..और ये कहते थे कि हम कांग्रेस मुक्त भारत देंगे.मोदी को हज़ार गालियाँ खुलेआम मंच से देने वाले ओवैसी की आव भगत में जिस तरह ये भाजपाई जमात बिछते देखि गयी,वह ऐतिहासिक मूर्खता की पराकाष्ठा साबित होगी.जहाँ से चले थे अगर वहीँ आकर विराम पाना था तो मोदी को दिए ये 12,13 साल तो गुजरात और देश को बहुत रुलाने जा रहे हैं.देश का मुसलमान मतदाता मोदी के पास न कभी जाएगा,न उसे जाना चाहिए.हिन्दू मतदाता भी उनकी और वही चार कदम चला है,जो इस उन्माद की राजनीति को समझता नही और इस ख्याली नशे में राष्ट्र निर्माण के सपने भी देख रहा है.
मोदियों को गुजरात के लिए माफ़ नही किया जा सकता और इसलिए माफ़ किया भी नही जाना चाहिए कि ये लोग सुधरकर रास्ता बदलते कभी नही दिखे.वोटों की थोक फसल काटने के बाद इन्हें सोनिया और मुलायम के खिलाफ जो ओवैसी धारदार हथियार नजर आ रहा है,इनका अपना गला भी इसी उस्तरे से कटेगा.इतिहास में साबित हो चुका है ये खेल खतरनाक है लेकिन फिर से आयोजित तो हो रहा है.ये डीजल और पेट्रोल के दामों में दी जाने वाली चुनावी रियायतों का सलीका कांग्रेस से ही तो सीखा हैं कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देकर कांग्रेसी विरासतों की पालकी ढोने वाले इन सपनों के सौदागरों ने.ये डीजल भी कांग्रेसी,ये भिन्द्र्वाला भी कांग्रेसी,ये सत्ता के तुरुप भी कांग्रेसी,विकास का ढांचा भी कांग्रेसी,झूठों का सिलसिला भी कांग्रेसी.अहमन्यता के बीज भी कांग्रेसी,जिन वोटों के तुम नये नये व्यापारी हो,वो वोट भी कांग्रेसी,शासन का आदर्श भी कांग्रेसी,कट्टर हिन्दू नेताओं की बड़ी खेप इतिहास और वर्तमान में मौजूद होने के बावजूद जिन्हें उधार लिया,उन सरदार पटेल की विरासत भी कांग्रेसी..आपका क्या है मोदी जी..??

No comments:

Post a Comment