वर्ष 2005 की बात है। सर्वोदय आंदोलन के स्तम्भ और राजस्थान की पहली सरकार में उद्योग मंत्री रहे सिद्धराज ढढ्ढा के नेतृत्व में आयोजित एक बड़े अभियान के सिलसिले में हम अहमदाबाद पहुंचे थे। यह महात्मा गांधी की दांडी यात्रा की पुनरावृत्ति थी, पुनस्मृति थी या कहें तो पुनर्प्रतिष्ठा थी। यह यात्रा उन्हीं पड़ावों और रास्तों से होकर गुजरनी थी, जिनसे होकर गांधी जी 1930 में चले थे और जिनके केवल चलने भर से अंग्रेजों की हुकूमत हिल गयी थी। चलने के अपने ही अर्थ होते हैं। केवल चलने भर से और कुछ चाहे न भी होता हो, पर हमारी जगह जरूर बदल जाती है। सड़क पार करते हुए आदमी को देखकर एक उम्मीद जगती है कि दुनिया जो इस तरफ है, शायद उससे कुछ बेहतर हो उस तरफ। सर्वोदय के लगभग सभी बड़े नेता उस दिन साबरमती आश्रम में एकत्र थे। महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई के पुत्र नारायण भाई देसाई भी इस यात्रा के शुभारम्भ के मौके पर उपस्थित थे। सिद्धराज जी ने 96 साल की उम्र में इस यात्रा का संकल्प किया, तो यह उनका गांधी-विचार-दीक्षित जीवट ही था, लेकिन मैंने देखा जब वे बोलने खड़े हुए तो फफक पड़े। आसुंओं से भरा हुआ उनका वह उद्बोधन उल्लेख करने योग्य है। वे बड़े दर्द से बोले–क्या गांधी का देश गांधी को सचमुच भुला देगा? और क्या गांधी का गुजरात भी? सामने बैठे हम सबसे यही सवाल पूछते हुए सिद्धराज जी रो पड़े थे। मैं उस पूरी यात्रा में उनके साथ रहा, वह यात्रा उतने ही दिन चली, उन्हीं पड़ावों से चली, उन्हीं तरीकों से चली और वहीं पहुंची जहां गांधी पहुंचे थे। लेकिन देश फिर भी वहां नहीं पहुंचा, जहां गांधी ने उसे उस समय पहुंचा दिया था। ऐसा हो भी नहीं सकता था। पराधीनता के उस दौर में गांधी के इस एक सधे हुए कदम ने नमक जैसी मामूली चीज को जिस तरह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का मारक प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया था, वह तब सरकार और जनता दोनों के लिए बिलकुल अनपेक्षित बात थी। मोतीलाल नेहरू ने इसके विरोध में गांधी जी को पत्र लिखा–‘बापू, क्यों तमाशा करते हैं? नमक बनाकर क्या होगा? गांधी जी उस समय यात्रा में ही थे। लौटती डाक से उनका जवाब आया-‘बना कर देखो’। पत्र मिला तो मोती लाल नेहरू ने तैयारी शुरू कर दी। इलाहाबाद के जानसनगंज चौराहे पर मोती लाल नेहरू नमक बनायेंगे, यह खबर प्रशासन को दे दी गयी। जमुनालाल बजाज प्रतीकात्मक नमक बनाने के लिए घड़े में जमुना का पानी लिये चौराहे पर खड़े हुए थे। भीड़ बढ़ गयी। मोती लाल जी चले और चौराहे से पहले ही गिरफ्तार करके नैनी जेल पहुंचा दिये गये। उन्होंने जेल पहुंचते ही गांधी जी को पत्र लिखा-‘बापू, मैंने बनाने से पहले ही देख लिया।’
गांधी की टक्कर जब, जहां और जिससे भी हुई, सबसे पहले वे अपने आप से टकराते थे। यह उनकी विलक्षण खूबी थी। इसके बाद और प्रतिद्वंदी पर टूट पड़ने से पहले बाकायदा वे प्रतिपक्षी को इसकी सूचना देते थे। यह उनके निज का कौशल था। यही वह दोधारी तलवार थी, जिससे शत्रु सेना उनसे खौफ खाती थी और सामने टिक ही नहीं पाती थी। युद्ध छेड़ने से पहले आत्मानुशीलन की यह विनम्रता गांधी के आक्रमण की धार को पैना कर देती थी। उनकी लड़ाई का यह वह मोर्चा था, जब शत्रु पैदल और गांधी रथी हो जाते थे यानी नवैयत बदल जाती थी। ‘अगर शान्ति चाहिए तो पहले अशान्ति मचानी पड़ेगी’–इतना तक तो सब समझ लेते थे लेकिन ‘वह शान्ति भी अपनी होनी चाहिए...’-यहीं पहुंचकर बातें दुरूह लगने लगती थीं। ‘हमारे मन का जब खूब मंथन हो जायेगा और हम दुखों की आग में तपने लगेंगे तभी सच्ची शान्ति का अनुभव कर सकेंगे।’ इसके बाद तो बात एकदम समझ के बाहर हो जाती। कैसा है यह आदमी! शत्रु सामने खड़ा है और देश उससे लड़ मरने को आमादा है, ऐसे वक्त में अपना मन मथने की बात...? ओह, नासमझ गांधी... जो समझ में न आ सके वह नासमझ ही तो हुआ। आप जो भी समझ रहे हों, समझें, पर यह भी जरूर समझें कि उस आदमी के हाथ में दोधारी तलवार है। आत्मशोधन... हृदय परिवर्तन... और अथक समर्पण। शत्रु की पराजय जिसका उद्देश्य ही नहीं था, वही सत्याग्रह का अन्वेषक हो सकता था। प्राणिमात्र की अच्छाई में जिसका अखण्ड विश्वास था, उसके लिए मानवता एक सागर की तरह थी, जिसकी कुछ बूंदें खराब भी हों, तो पूरा सागर गंदा नहीं होता।
महात्मा गांधी के मन में इस दुनिया के बरक्स एक बेहतर दुनिया की कल्पना थी। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को भी स्वीकार न करने की एक जिद्द है, जो उनकी प्रासंगिता पर ही सवाल खड़े करती है। उपभोक्ता विश्व उपभोग की सारी सीमाएं जान लेने के बाद गांधी के विचारपुंज में रास्ता तलाश रहा है। यह सत्य केवल आज का नहीं, इसके पहले का भी है। गांधी को तब भी, जब वे जीवित थे, देश की सीमाओं से बाहर अधिक महसूस किया गया। क्या कहें–गांधी की वैचारिक शक्ति को समझने और उसे स्वीकार करने की हमारी योग्यता ही नहीं है? या और कोई दुरभिसंधि है? कुछ तो यह योजनाबद्ध भी लगता है। गांधी ने 1909 में हिन्द स्वराज नाम की एक छोटी-सी किताब लिखी। बड़ी बेचैनी से लिखी इस किताब पर आज देशों की सीमाएं तोड़कर भाष्य लिखे जा रहे हैं। गांधी विचार का बीजग्रंथ बनने की इसकी पूरी यात्रा की अपनी ही कशमकश है। किताब के आते ही उसे एक मूर्ख आदमी की रचना कह कर भारत में खारिज कर दिया गया। जवाहर लाल नेहरू ने उसे पढ़ने लायक भी नहीं माना। गोखले ने तो यह भी कह दिया कि अभी गांधी अपने देश को नहीं जानते। कुछ वक्त भारत में बिता लेने के बाद वे स्वयं इस किताब को नष्ट कर देंगे। लेकिन यह आदमी तीस वर्ष बाद भी उस किताब का एक भी शब्द बदलने को तैयार नहीं हुआ। उसकी जिद्द देखिये कि ‘इस किताब में लिखे विचारों में परिवर्तन करने का कोई कारण मुझे नहीं मिला। इसमें जो कुछ भी लिखा, उसकी सत्यता की पुष्टि मेरे अनुभवों से हुई। इसमें विश्वास रखने वाला अगर मैं अकेला भी रह जाऊं तो मुझे अफसोस नहीं होगा।’ लेकिन गांधी को ये नसीहतें तब दी जा रही थीं। जब गांधी शोषण के चरित्र को सत्याग्रह की चुनौती देकर दक्षिण अफ्रीका का इतिहास लिख चुके थे। गांधी ने कहा था कि ‘यह किताब किसी बच्चे के हाथ में भी दी जा सकती है क्योंकि यह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है और पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। यह ‘आत्म’ शब्द गांधी की वैचारिक जीवन की कसौटी है। संघर्ष के साथ-साथ शिक्षण और रचना उनके औंजार थे और आजादी मात्र एक पड़ाव। जाना तो उन्हें कहीं दूर था, जहां देश के गांवों में देश की शक्ति को विकेन्द्रित कर देना था। भले यह रास्ता भारत ने छोड़ दिया, पर इसके सूत्र विश्व बिरादरी में ढूंढे जा रहे हैं। उनके जीवन कार्यों का सूक्ष्म अवलोकन करने के अलावा मानवता के लिए उनका कोई शाब्दिक संदेश नहीं मिलता।
आज मानवता यह महसूस कर रही है कि मानव समाज को जैसा होना चाहिए, वैसा वह नहीं है। उसमें आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए। मनुष्य के लिए बेहतर समाज कैसा हो, उसकी एक रूपरेखा गांधी ने हिन्द स्वराज में खींची है। इस किताब में आधुनिक सभ्यता की आलोचना है। इसी विन्दु पर आधुनिक समाज इस किताब, इसमें व्यक्त विचार और जिद्दी सपनों वाले इस आदमी से कन्नी काटता है। कुछ आधारभूत मूल्य और कुछ ओज भरे सिद्धांत हैं, जिनसे यह किताब ग्रंथ बनती है और जिनको बहुत दुरूह मान व कहकर हम उससे दूर भागते हैं। एक समानान्तर प्रवाह पर गौर करें तो एक वैश्विक बिरादरी आकार ले रही है, जो कहती है कि–वैकल्पिक दुनिया संभव है। यह बिरादरी किस प्रकार और अधिक व्यापक हो, भीतर की यह प्रेरणा हमें गांधी का अवगाहन करने के लिए बाध्य करती है। आखिर आप उस पर्वत से कैसे टकरा सकते हैं, जिससे टकराकर अपना ही सिर फूटना निश्चित है? ‘सत्य को मैं जैसा देखता हूं, वही मेरे लिए उसका प्रमाण है। सारी दुनिया उसके विपरीत दिशा में जा रही है। मुझे उसका डर नहीं है क्योंकि जब अंत नजदीक आ जाता है तो पतिंगा दिये के चारों ओर अधिक चक्कर लगाने लगता है। अगर पतिंगे जैसी स्थिति से भारत को न भी बचाया जा सके, तो भी भारत और उसकी मार्पâत सारी दुनिया को इस नियति से बचा लेने की मेरी कोशिश अंतिम सांस तक चलती रहेगी, यही मेरा धर्म है।’
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि गांधी के इस धर्म की दुरूहता को आसान करने के लिए एक विशिष्ट अभिगम और संपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक है। 20वीं सदी के आरंभिक वर्षों में लिखे गये उन बेचैन शब्दों को २१वीं सदी में समझने के लिए जिस बारीकी की जरूरत पड़ती है, उसके अभाव में कोई आश्चर्य नहीं कि हम शब्दों की सीमाओं में ही उलझे रह जायं और परिभाषाएं तथा व्याख्याएं अधोगामी हो जायं। आज की दुनिया के समाज, बाजार बनते जाने को अभिशापित हैं। सबकुछ हमें बाजार में उपलब्ध कराये जाने के दावे हवा को प्रदूषित किये हुए हैं। अलग बात है कि बाजार अब केवल व्यापार नहीं करता। पहले वह हमारी जरूरतें गढ़ता है फिर उनकी पूर्ति करने का पूंजीवादी खेल खेलता है। बड़ी बारीकी से देखकर गांधी ने कहा था कि यह शैतानी सभ्यता है और एक दिन यह खुद को नष्ट कर देगी। हिंद स्वराज के ये दो वाक्य आज की दुनिया के सामने साफ चेतावनी बनकर उभरते हैं। जी हां, यह सभ्यता खुद को नष्ट करने के मार्ग पर कई पड़ाव तय कर आयी है। बारूद के ढेर पर बैठी इस सभ्यता का ‘शैतान’ मुसकुराने लगा है। वह देख रहा है कि मनुष्य प्रकृति से खेलते-खेलते विनाश के कगार पर आ पहुंचा। कैसी कारसाजी है? पहाड़ों को काट डाला, नदियों को सोख डाला, धरती को छेद डाला, घर को दुकान और नगर को बाजार बना डाला। बच गये गांव तो उन्हें निर्जन कर डाला। स्वर्ग के सारे सुख धरती पर ही उपलब्ध करा देने के दंभ में बाजार की छाती फूली जा रही है और शैतान हंस रहा है। इस अट्टहास को कोई सुनना नहीं चाहता, जो त्रासद विनाश की पूर्व सूचना भर है। इस सभ्यता की ऊंचाई अब आकाश छूने लगी है और हमारी आंखें कंगूरों पर ही लगी हैं। शैतान की लपलपाती हुई जीभ इधर पांवों में अपना जहर बांटने के काम में चुपचाप लगी हुई है। कभी-कभी एक शोर उठता है–सुनामी और भूकंप की आवाजें अभी कम पड़ रही है, पर गांधी का बनाया ब्लू प्रिंट भी साथ-साथ फैलता ही जाता है। न देख पाने वालों की आंखों में जो दोष आ गया है, पीढ़िया उसकी पहचान करने से कतरा रही हैं। बिल्ली झपट्टा मारने ही वाली है और कबूतर ने आंखें बंद कर रखी हैं। आंखें बंद करके देखे जाने वाले सपने जीवंत नहीं, आभासी होते हैं। यह चित्र मानवता के भवितव्य की ओर संकेत करता है। सत्य से आंखें चुराना भी तो शैतान की सभ्यता है।
इधर शैतानी और बाजारू सभ्यता का दुर्निवार सत्य पांव जमा कर खड़ा है। बचने की राह तलाशे या नहीं, यह सभ्यता सोचे क्योंकि विकास तो उसका ही होना है। सत्यशोधक की भूमिका के साथ न्याय करके, अपने प्रति अन्याय पीकर गांधी जा चुके हैं। पर कहते हैं कि विचार नहीं मरते। एक विचार पुंज है, जिसमें जीवन की सभी संभावनाएं निहित हैं। देश की व्यवस्था पर यह लांछन है कि वह अपने लिए जब मॉडल ढूंढती है तो उसे कभी माक्र्स दिखते हैं, कभी लेनिन, कभी हो ची मिन्ह, तो कभी कोई, तो कभी कोई। उसे केवल गांधी का मॉडल नहीं जमता बाकी सब तो ठीक ही है। सत्य नहीं जमता, अहिंसा नहीं जमती इसलिए यह सब कहने वाला भी नहीं जमता। यह सब होते हुए भी, वह गांधी ही है जो मरने के बाद भी अपनी कब्र से बोलूंगा, कहते हुए इस सभ्यता को रसातल में जाने से रोकने की अपनी कल्पना लिखकर जाता है। विचारपुंजों ने अपनी रोशनी से धराधाम को रोशन तो किया पर रोशनी की दिशा खुद की ओर नहीं मोड़ी। गांधी यहीं बाकी सबसे अलग हो जाते हैं। नयी सभ्यता के लिए उन्होंने हिन्दुस्तान को तैयार ही नहीं पाया। इसीलिए अपने देशवासियों को खाने, पहनने, रहने... यहां तक की पाखाना जाने का ढंग भी लिख कर बताया। सरकारें तो कुछ नहीं मानतींr पर समाज भी क्यों नहीं मानता, यह बड़ा सवाल है। गांधी के जाने के बाद 12 फरवरी 1948 को जब मर चुके गांधी के शोक में देश के तब के सभी बड़े नेता सेवाग्राम आश्रम में इकट्ठा हुए तो सबके मन भी मरे हुए थे। विनोबा के नेतृत्व में ‘बापू का काम आगे कैसे बढ़े’ इस प्रश्न पर गहन मंथन कई दिन होता रहा। बापू द्वारा बनायी और चलायी संस्थाओं को मिलाकर ‘सर्व सेवा संघ’ बना दिया गया। यह संघ भी कालान्तर में विनोबा और जयप्रकाश के जाने के बाद एक बार फिर मरे हुए मन का शिकार हो गया। लेकिन कम से कम इतना नैतिक दायित्व उसका भी है कि गांधी को गांधी बने रहने दिया जाय और इससे भी ज्यादा यह कि गांधी को गांधी ही बने रहने दिया जाय।
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